अंतरराष्ट्रीय समाचार
भारत नहीं कर अफगान क्षेत्र का उपयोग, पाकिस्तान दावा झूठा : काबुल
अशरफ गनी सरकार ने इस्लामाबाद के इस आरोप को खारिज कर दिया है कि अफगानिस्तान पाकिस्तान को अस्थिर करने के लिए भारत को अपने क्षेत्रों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे रहा है।
इमरान खान सरकार ने गुरुवार को एक बयान में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र विश्लेषणात्मक सहायता एवं प्रतिबंध निगरानी टीम ने इस्लामाबाद के इस दावे का समर्थन किया है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) अफगानिस्तान से भारतीय समर्थन से चल रहा है।
अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को काबुल में आरोपों को पूरी तरह से खारिज करते हुए एक बयान जारी कर कहा कि वह बिना किसी भेदभाव के सभी आतंकवादी समूहों से लड़ रहा है। मंत्रालय ने कहा, “टीटीपी और उसके अन्य समूहों के हाथों पर अफगान लोगों का खून लगा हुआ है (ये संगठन अफगान नागरिकों के हत्यारे हैं)। राष्ट्रीय खतरे को देखते हुए अफगानिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में इन्हें आतंकवादी संगठनों के तौर पर नामित किया गया है।”
बयान में कहा गया है कि अफगानिस्तान में न्याय कायम रखने के लिए पिछले वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में टीटीपी नेताओं और उसे गुर्गों को मुठभेड़ के दौरान ढेर किया गया है।
गनी सरकार ने पाकिस्तान को याद दिलाया कि आतंकवाद के शिकार के रूप में, अफगानिस्तान ने इस आम (कॉमन) दुश्मन के खिलाफ क्षेत्र की सामूहिक लड़ाई में अपनी भूमिका से कहीं अधिक प्रयास किया है।
अफगानिस्तान की सरकार ने कहा कि उसकी ओर से टीटीपी के कई शीर्ष नेताओं का सफाया किया गया है और वह आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में किसी भी तरह का कोई भेद नहीं करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अल्पसंख्यक रिपोर्ट में कहा गया है कि न केवल तालिबान और अलकायदा अफगानिस्तान में एक-दूसरे के साथ सहयोग जारी रख रहे हैं, बल्कि कश्मीर-विशिष्ट पाकिस्तानी आतंकवादी समूह, जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) और लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) अपने हत्यारों को लक्षित हत्याओं को अंजाम देने के लिए अफगानिस्तान भेज रहे हैं।
पारदर्शिता और क्षेत्रीय सहयोग की बात करते हुए अफगान विदेश मंत्रालय ने कहा कि अफगानिस्तान ने आतंकवादी संगठनों के नेताओं और गुर्गों की हिसारत के लिए संबंधित साझेदार देशों तक पहुंच प्रदान की है।
यह दोहराते हुए कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में प्रतिबद्ध है, सरकार ने कहा कि उन्होंने हमेशा पारदर्शिता दिखाई है और किसी भी देश या तीसरे पक्ष को किसी अन्य देश को अस्थिर करने के लिए अफगानिस्तान का उपयोग करने की न तो कभी इजाजत दी है और न ही ऐसी किसी हरकत को वह कभी बर्दाश्त करेंगे।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
पोप लियो इटली के अस्पताल में कराएंगे ‘लंग नोड्यूल’ की सर्जरी

पोप लियो XIV (चौदहवें) मंगलवार को रोम के जेमिली अस्पताल में भर्ती हुए। यहां उनके लंग नोड्यूल यानी फेफड़े में मौजूद एक गांठ को सर्जरी से हटाया जाएगा। वेटिकन ने विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि यह ऑपरेशन आम तौर पर कम जोखिम वाला होता है।
71 वर्षीय पोप के फेफड़े की गांठ (पल्मोनरी नोड्यूल) या फेफड़े में ऊतकों की छोटी सी गांठ को हटाने के लिए ये सर्जरी हो रही है। जर्मनी के मीडिया आउटलेट डीडब्ल्यू (डॉयचे वेले) ने उन्हें अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती कराए जाने की पुष्टि की। पोप 8 मई 2025 को कैथोलिक चर्च के प्रमुख बनने के बाद कैथोलिक ईसाई समाज के धर्मगुरु पहली बार अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
पोप ने रविवार को एंजेलस प्रार्थना के बाद इसका ऐलान किया था। लियो ने सेंट पीटर्स स्क्वायर में मौजूद लोगों को बताया कि मेडिकल जांच के दौरान डॉक्टरों को यह गांठ “प्रारंभिक चरण” में मिली थी। अपोस्टोलिक पैलेस की खिड़की से भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “डॉक्टरों का मानना है कि इस पर इलाज करना सही रहेगा।”
वेटिकन पहले पोप की सेहत को लेकर बहुत गोपनीयता बरतता था, लेकिन लियो से पहले के पोप फ्रांसिस (जो अर्जेंटीना के थे और अपनी बीमारियों के बारे में खुलकर बात करते थे) की बीमारी के दौरान इसमें अधिक पारदर्शिता बरती जाने लगी।
इस घोषणा पर वेटिकन ने कहा कि पोप के ठीक होने में लगभग एक हफ्ता लग सकता है। नतीजतन, 20 अक्टूबर तक उनके सभी कार्यक्रम (लोगों से मुलाकात) रद्द कर दिए गए हैं।
रोम का जेमिली अस्पताल वह जगह है जहां आमतौर पर पोप का इलाज होता है, और उम्मीद है कि लियो कड़ी सुरक्षा के बीच सबसे ऊपरी मंजिल पर बने एक खास सुइट में रहेंगे।
संभवतः उनके साथ उनके निजी नर्स मैसिमिलियानो स्ट्रैपेटी भी होंगे, जिन्होंने पिछले साल जेमिली अस्पताल में भूतपूर्व पोप फ्रांसिस की देखभाल की थी।
शिकागो में जन्मे लियो, जो अमेरिका के पहले पोप हैं, खेल-कूद में रुचि रखते हैं और माना जाता है कि उनकी सेहत अच्छी है।
लियो का 6 से 17 नवंबर तक उरुग्वे, अर्जेंटीना और पेरू की यात्रा करने का कार्यक्रम है। ज्यादातर पल्मोनरी नोड्यूल्स बिनाइन (यानी कैंसर-रहित) होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये फेफड़ों के कैंसर का शुरुआती संकेत भी हो सकते हैं।
अब तक मिली जानकारी के अनुसार, यह नोड्यूल रूटीन हेल्थ चेकअप के दौरान मिला था, और पोप के फेफड़ों की जांच करने की कोई खास वजह या लक्षण नहीं थे।
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चीन ने भारत के लद्दाख मैप को बताया गैरकानूनी, 28 स्थानों पर जताया अपना दावा

चीन ने भारत के लद्दाख स्थित कई क्षेत्रों के स्टैंडर्ड नाम घोषित करने पर मंगलवार को सख्त आपत्ति जताई है। चीनी विदेश मंत्रालय ने इसे एकतरफा और पूरी तरह से गैरकानूनी कदम करार दिया है।
चीन के सरकारी मीडिया आउटलेट ग्लोबल टाइम्स ने बताया, विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि ये फैसला एकतरफा है जिसे चीन नहीं मानता। उनके मुताबिक गैर-कानूनी तरीके से केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख बनाया गया है। बीजिंग भारत के मानक नाम घोषित करने का विरोध करता है और इसे पूरी तरह से गैरकानूनी करार देता है।
माओ से भारत के गृह मंत्रालय के उस बयान पर प्रतिक्रिया मांगी गई थी जिसमें भारत ने मैप में 28 जगहों के लिए मानक नाम तय किए थे और उन्हें आधिकारिक नक्शे में शामिल किया गया था।
भारत के रुख पर हुए सवाल के जवाब में माओ निंग ने स्पष्ट किया कि ये इलाके उसके हैं और भारत के नाम बदलने या रखने से जमीन पर मालिकाना हक नहीं बदल जाएगा। उन्होंने कहा, “चीन ने भारत के एकतरफा और अवैध रूप से स्थापित तथाकथित केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को मान्यता नहीं दी है। भारत के तथाकथित मानक स्थान नामों का बीजिंग कड़ा विरोध करता है। भारत का यह कदम अवैध और अमान्य है। इस तथ्य को नहीं बदला जा सकता कि दोनों देशों की सीमा का पश्चिमी भाग हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है।”
भारत ने 2 अक्टूबर को इन जगहों के नाम आधिकारिक तौर पर तय किए थे। इसे लेकर भारत सरकार ने एक बयान जारी किया था। बताया कि केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के परामर्श से वहां स्थित 28 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं के नाम तय किए हैं। इन स्थानों और विशेषताओं को भारतीय सर्वेक्षण विभाग के आधिकारिक मानचित्र में मानक नामों के साथ दर्शाया गया है। इनमें अतिशा गिरी, ब्रांगसा और चापचिंगल दर्रा सहित अन्य स्थान शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने कहा है कि इसका उद्देश्य इन स्थानों की सटीक पहचान सुनिश्चित करना और आम लोगों में इनके बारे में जागरूकता बढ़ाना है।
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होर्मुज समझौता बंद होने से 2026 में खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट की आशंका, क्रूड ऑयल की कीमत 95.74 डॉलर रहने का अनुमान: आईएमएफ

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को कहा कि मध्य पूर्व में जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद रहने के कारण 2026 में मध्य पूर्व और मध्य एशिया क्षेत्र की अर्थव्यवस्था सिकुड़ सकती है। आईएमएफ की अक्टूबर 2026 वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (डब्ल्यूईओ) रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि दर 2025 के 3.7 प्रतिशत से घटकर 2026 में -0.3 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि 2027 में इसके दोबारा 6.3 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है।
आईएमएफ ने कहा कि अप्रैल 2026 के अनुमान की तुलना में 2026 के लिए वृद्धि दर में 2.2 प्रतिशत अंक की कटौती की गई है, जिसकी प्रमुख वजह होर्मुज जलडमरूमध्य के लंबे समय तक बंद रहने की आशंका है, जबकि उसके दोबारा खुलने के बाद 2027 में अपेक्षाकृत मजबूत रिकवरी देखने को मिल सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक असर छोटे खाड़ी तेल उत्पादक देशों पर पड़ेगा। कुवैत की अर्थव्यवस्था 2026 में 16.7 प्रतिशत, इराक की 16 प्रतिशत, कतर की 15.6 प्रतिशत और बहरीन की 11.3 प्रतिशत तक सिकुड़ सकती है। आईएमएफ का मानना है कि ऊर्जा उत्पादन और परिवहन में बाधाओं का इन देशों पर सबसे ज्यादा प्रभाव होगा।
हालांकि 2027 में इन देशों में तेज वापसी की संभावना जताई गई है। आईएमएफ के अनुसार, 2027 में इराक 19 प्रतिशत, कतर 18.8 प्रतिशत, कुवैत 17.1 प्रतिशत और बहरीन 13.9 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर्ज कर सकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहेगा क्योंकि उसके पास निर्यात के अधिक विविध मार्ग उपलब्ध हैं। सऊदी अर्थव्यवस्था के 2026 में 3.3 प्रतिशत सिकुड़ने और 2027 में 7.9 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अर्थव्यवस्था 2026 में 3.9 प्रतिशत घट सकती है और 2027 में 7.7 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। ओमान इस रुझान से अलग रहेगा और उसके 2026 में 4.1 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है।
आईएमएफ ने ईरान की अर्थव्यवस्था के 2026 में 7.6 प्रतिशत सिकुड़ने का अनुमान लगाया है। रिपोर्ट के अनुसार, सैन्य तनाव बढ़ने, नौसैनिक नाकेबंदी फिर से लागू होने और कड़े प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था दबाव में रहेगी। देश में मुद्रास्फीति 78.6 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।
आईएमएफ के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल, जो दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई है, इसी मार्ग से गुजरता था। रिपोर्ट में कहा गया है कि खाड़ी देशों ने कुछ निर्यात अन्य बंदरगाहों के जरिए मोड़ा है, जबकि खाड़ी क्षेत्र के बाहर तेल उत्पादन में भी प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल की वृद्धि हुई है।
वहीं इसके साथ ही, आईएमएफ ने कहा है कि 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95.74 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है, जो 2025 के 67.74 डॉलर प्रति बैरल से काफी अधिक है। 2027 में यह कीमत घटकर 87.39 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में कच्चे तेल की कीमतों में 41 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 48 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इसके प्रभाव से उर्वरक कीमतें 10 प्रतिशत और खाद्य कीमतें 5 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है।
आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा आयात पर निर्भर देश सबसे ज्यादा दबाव में रहेंगे। उन्हें ऊंचे आयात बिल, मुद्रा विनिमय दर पर दबाव, कम वास्तविक आय और सीमित राजकोषीय क्षमता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि आईएमएफ ने कहा कि ऊंची तेल कीमतों के बावजूद भारत मजबूत घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र के समर्थन से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है और उसे ऊर्जा आयातक उभरती अर्थव्यवस्थाओं की उन श्रेणियों से अलग रखा गया है, जिनके विकास अनुमान में कटौती की गई है।
आईएमएफ ने आगाह किया है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है या लंबे समय तक बना रहता है, तो ऊर्जा और खाद्य कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं, जिससे वैश्विक महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वित्तीय संतुलन पर और अधिक दबाव पड़ सकता है।
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