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Tuesday,09-June-2026
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फिसीपींस में भूकंप के बाद 37 हुई मृतकों की संख्या, 20 हजार लोग हुए विस्थापित

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नई दिल्ली, 9 जून: दक्षिणी फिलीपींस के सारंगनी प्रांत में सोमवार सुबह आए 7.8 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप से भारी तबाही हुई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस आपदा में मृतकों की संख्या बढ़कर 37 हो गई है, जबकि लगभग 20 हजार लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं।

भूकंप में करीब 500 लोग घायल हुए हैं। इसके अलावा कई इमारतों को नुकसान पहुंचा है और अनेक क्षेत्रों में स्कूलों तथा उड़ानों का संचालन प्रभावित हुआ। भूकंप के बाद जापान सहित कई देशों ने सुनामी की चेतावनी जारी की थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया।

फिलीपींस के सिविल डिफेंस कार्यालय की प्रवक्ता जूनी कैस्टिलो ने बताया कि साउथ कोटाबाटो के जनरल सैंटोस शहर में 10 लोगों की मौत की सूचना मिली है। यह पोर्ट सिटी 7 लाख से अधिक आबादी वाला क्षेत्र है। यहां कम से कम 12 लोगों के लापता होने की भी सूचना है। अधिकांश मौतें मलबा गिरने, इमारतों के ढहने और भूस्खलन के कारण हुई हैं।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, फिलीपींस नेशनल पुलिस ने पहले बताया था कि कम से कम 134 लोग घायल हुए हैं। जनरल सैंटोस में एक दो मंजिला स्कूल भवन भी ढह गया, जिसमें छात्रों के फंसे होने की आशंका जताई गई। अधिकारियों ने कहा कि वे घटना से जुड़ी जानकारियों का सत्यापन कर रहे हैं।

सोशल मीडिया और ऑनलाइन वीडियो में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में यूनिवर्सिटी और रेस्टोरेंट की बिल्डिंगें गिर गईं। कई व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को स्ट्रक्चरल डैमेज हुआ, साइनबोर्ड गिर गए और खिड़कियों के शीशे टूट गए। भूकंप के झटकों के बाद लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागते नजर आए।

फिलीपींस में गर्मी की छुट्टियां समाप्त होने के बाद स्कूल खुले ही थे कि यह शक्तिशाली भूकंप आ गया। कई स्कूलों के सर्विलांस फुटेज में भूकंप के दौरान जोरदार झटके दिखे। शिक्षकों और छात्रों को या तो तुरंत निकाला गया या वे डेस्क के नीचे छिप गए। देश के शिक्षा विभाग ने कहा कि जिन स्कूलों पर असर पड़ा है, उनमें 5,800 से ज्यादा स्टूडेंट्स हैं। इन स्टूडेंट्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्लास रोकने का आदेश दिया गया है।

जनरल सैंटोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने पूरी सुरक्षा जांच के लिए स्थानीय समय के हिसाब से सुबह 8:45 बजे से दोपहर 3 बजे तक ऑपरेशन रोक दिया। तीन एयरलाइनों ने कुल 17 घरेलू उड़ानें कैंसिल कर दीं। सिविल एविएशन अधिकारियों के मुताबिक, एयरपोर्ट पर लैंडिंग और टेकऑफ ऑपरेशन अभी सोमवार दोपहर 3 बजे से 11 जून शाम 6 बजे तक सरकारी, मिलिट्री और मानवीय मदद वाली उड़ानों तक ही सीमित हैं।

अंतरराष्ट्रीय

एक दूसरे के खिलाफ तुरंत हमले रोकें इजरायल और ईरान: ट्रंप

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वाशिंगटन, 8 जून: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल और ईरान से तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है। बेहद कम शब्दों में उन्होंने ट्रुथ सोशल के जरिए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को “फौरन शूटिंग (गोलीबारी)” बंद करनी चाहिए।

2 महीनों की सीजफायर के बाद रविवार को ईरान की ओर से इजरायल पर मिसाइल दागे गए। जवाबी कार्रवाई में तेल अवीव ने भी तेहरान के कई प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जिसमें कारून पेट्रोकेमिकल्स प्लांट भी शामिल था।

ट्रंप ने इससे पहले दोनों देशों से संयंम बरतने को कहा था। उन्होंने अमेरिकी मीडिया आउटलेट फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा, “मैं ईरान से यही कहूंगा कि आपने अपनी मिसाइलें चला दीं, अब बस कीजिए। वापस बातचीत की मेज पर आइए और समझौता कीजिए।”

सिन्हुआ समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान की ओर से मिसाइलें दागने से पहले अमेरिका और ईरान किसी समझौते के बहुत करीब पहुंच चुके थे। उन्होंने कहा, “हम बहुत करीब थे। मेरा मानना है कि इस आने वाले हफ्ते में सोमवार, मंगलवार या बुधवार तक समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते थे। लेकिन अब यह सब हो गया।”

अमेरिकी मीडिया संस्थान एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि वह इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को फोन करेंगे और उनसे जवाबी कार्रवाई न करने की अपील करेंगे।

ट्रंप ने कहा, “मैं अभी बीबी (नेतन्याहू) को फोन करने वाला हूं और उनसे कहूंगा कि जवाबी हमला न करें। दोनों पक्ष अपना-अपना कदम उठा चुके हैं। इजरायल ने हमला किया और ईरान ने भी जवाब दिया। अब हमें और टकराव की जरूरत नहीं है।”

क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों, सैन्य जवाबी कार्रवाइयों और क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चिंता में डाल दिया है। इजरायली रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) ने स्पष्ट कहा है कि ये हिज्बुल्लाह के खिलाफ हमले न रोकने का परिणाम है।

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अंतरराष्ट्रीय

मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव: ईरान के समर्थन में उतरा इराकी ‘कताइब हिज्‍बुल्लाह’, अमेरिका को चेताया

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बगदाद, 8 जून: इराक की शिया मिलिशिया ‘कताइब हिज्‍बुल्लाह’ ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ईरान के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है, तो वह इराक और पूरे क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएंगे।

समूह ने अपनी वेबसाइट पर जारी एक संक्षिप्त बयान में कहा, “अगर अमेरिका इस टकराव में हस्तक्षेप करता है, तो हम इराक और क्षेत्र में उसके ठिकानों और हितों पर हमला करेंगे।”

स‍िन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, यह बयान ऐसे समय आया है, जब रविवार शाम ईरान ने इजरायल की ओर कई चरणों में मिसाइलें दागीं। उत्तरी इजरायल के बड़े हिस्सों में हवाई हमले के सायरन बजने लगे। इजरायली सेना ने कहा कि उसने इन मिसाइल हमलों को रोक लिया। इस बीच, इराक के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने देश का हवाई क्षेत्र 72 घंटों के लिए अस्थायी रूप से बंद करने की घोषणा की है।

मिसाइल हमलों के कारण उत्तरी इजरायल के कई इलाकों में सायरन बज उठे। फिलहाल किसी के घायल होने या किसी बड़े नुकसान की खबर नहीं है।

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने एक बयान में कहा कि उसने इजरायल के रामत डेविड एयरबेस को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया। उसके अनुसार यह कार्रवाई लेबनान में इजरायल के ‘व्यापक अपराधों’ के जवाब में की गई।

ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्स के मुताबिक, ईरान के खातम अल-अंबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रमुख कमांडर अली अब्दोल्लाही ने रविवार रात कहा कि अगर इजरायल दक्षिणी लेबनान और बेरूत के दक्षिण में स्थित दहियेह इलाके पर अपने हमले बढ़ाता है, या ईरान की कार्रवाई का जवाब देता है, तो उसे और भी ‘कड़े और पछतावा कराने वाले’ हमलों का सामना करना पड़ेगा।

दूसरी ओर इजरायल ने सोमवार तड़के पश्चिमी और मध्य ईरान में सैन्य ठिकानों पर हमले किए। ईरान की मिसाइल बौछारों के बाद इजरायल ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। इजरायल डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) ने दावा किया कि इजरायली वायु सेना ने पश्चिमी और मध्य ईरान में सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। तेहरान अग्निशमन विभाग के हवाले से आईआरएनए ने बताया कि पश्चिमी तेहरान के निवासियों ने तड़के लगभग 4:43 बजे और 4:45 बजे दो धमाकों की आवाजें सुनीं। हालांकि, शहर के किसी भी शहरी क्षेत्र में विस्फोट की पुष्टि नहीं हुई।

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अंतरराष्ट्रीय

अमेरिका-ईरान तनाव का समाधान युद्ध से नहीं, सिर्फ कूटनीति से संभव: डॉ. मोहम्मद फतहली

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नई दिल्ली, 5 जून: भारत में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फतहली ने मिडिया को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिका-ईरान तनाव और बार-बार टूटते संघर्षविराम पर चर्चा की। उन्होंने क्षेत्रीय हालात, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और शांति को लेकर ईरान का पक्ष रखते हुए कहा कि उनका देश शांति, संवाद और कूटनीति में विश्वास रखता है।

अमेरिका और ईरान के बीच फिर बढ़ते तनाव तथा कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर डॉ. फतहली ने कहा, “हम पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि हम युद्ध और शांति, दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार हैं। हम बातचीत और संवाद का स्वागत करते हैं। हमारा मानना है कि किसी भी विवाद या मतभेद का समाधान कूटनीति के माध्यम से निकाला जा सकता है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ने कभी युद्ध या तनाव की शुरुआत नहीं की है और हमेशा शांतिपूर्ण तथा राजनीतिक समाधान पर जोर दिया है।”

उन्होंने दावा किया कि आठ अप्रैल को घोषित सीजफायर का हाल के दिनों में कई बार अमेरिकी सेनाओं की ओर से उल्लंघन किया गया। उनके अनुसार, इसी कारण ईरानी सेना ने आत्मरक्षा के अपने वैध अधिकार का उपयोग करते हुए जवाबी कार्रवाई की।

डॉ. फतहली ने कहा कि हम संघर्षविराम के प्रति अब भी प्रतिबद्ध हैं और बातचीत का रास्ता चुनते हैं, लेकिन हमारे देश की सुरक्षा और संप्रभुता हमारे लिए ‘रेड लाइन’ है। यदि हमारे देश पर कोई हमला या आक्रामकता होती है, तो उसका जवाब उसी स्तर पर और जरूरत पड़ने पर उससे भी अधिक कड़े तरीके से दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि कूटनीति के लिए अभी भी अवसर मौजूद हैं और समझौता संभव है, बशर्ते दूसरा पक्ष भी अपनी जिम्मेदारियों का पालन करे तथा किसी प्रकार की उकसावे वाली कार्रवाई या संघर्षविराम उल्लंघन से बचे।

सवाल: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में हाल ही में पारित उस प्रस्ताव को आप कैसे देखते हैं, जिसमें ईरान संघर्ष में राष्ट्रपति ट्रंप के अधिकारों को सीमित करने की बात कही गई है? क्या यह वॉशिंगटन में राजनीतिक विभाजन का संकेत है?

जवाब: यह सवाल कि क्या यह प्रस्ताव अमेरिका के भीतर किसी असहमति या राजनीतिक विभाजन को दर्शाता है, इसका जवाब अमेरिकी नेताओं और विश्लेषकों को देना चाहिए। हम अमेरिका के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करते।

हमारे लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि जो भी कदम तनाव कम करने, संघर्ष को बढ़ने से रोकने और क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है, वह सकारात्मक और ध्यान देने योग्य है। इस दृष्टिकोण से हम इसे तनाव बढ़ने से रोकने और युद्ध दोबारा शुरू होने की आशंका को कम करने की दिशा में एक कदम मानते हैं।

ईरान ने कभी युद्ध नहीं चाहा है और न ही वह युद्ध चाहता है। हम हमेशा कहते आए हैं कि मौजूदा विवादों का समाधान धमकी या बल प्रयोग से नहीं, बल्कि बातचीत, आपसी सम्मान और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के पालन से होना चाहिए। हर देश में विदेश नीति को लेकर अलग-अलग राय होना स्वाभाविक है, अमेरिका में भी ऐसा है। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि जो लोग कूटनीति, संयम और शांतिपूर्ण समाधान की बात करते हैं, उनकी भूमिका ज्यादा प्रभावी होनी चाहिए ताकि संकट न बढ़े। हम अब भी मानते हैं कि मौजूदा समस्याओं का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि बातचीत की मेज पर और रचनात्मक संवाद से ही निकलेगा।

सवाल: कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमले के आरोपों पर ईरान की क्या प्रतिक्रिया है?

जवाब: कुवैत और बहरीन की तरफ से जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी नियमों और अच्छे पड़ोसी संबंधों के सिद्धांत का खुला उल्लंघन हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 3314 के अनुसार, इन्हें ईरान के खिलाफ ‘आक्रामक कार्रवाई’ माना जाता है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर कोई देश अपनी जमीन, समुद्री या हवाई क्षेत्र या वहां मौजूद सुविधाओं को किसी आक्रामक पक्ष को ईरान के खिलाफ हमले या सैन्य कार्रवाई के लिए इस्तेमाल करने देता है, तो वह भी आक्रामकता में शामिल माना जाता है।

हम अपने देश की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के अपने अधिकार के तहत हर जरूरी कदम उठाएंगे, जिसमें हमले की जगह और स्रोत को निशाना बनाना भी शामिल है। हालांकि हमारे सैन्य विशेषज्ञों की जांच और आकलन बताता है कि कुवैत एयरपोर्ट की तरफ कोई ईरानी मिसाइल नहीं दागी गई। एयरपोर्ट को जो नुकसान हुआ, वह संभवतः अमेरिका में बने ‘पैट्रियट’ डिफेंस सिस्टम की खराबी की वजह से हुआ, जिनकी इंटरसेप्टर मिसाइलें लक्ष्य को रोकने में असफल रहीं और टर्मिनल पर गिर गईं।

इसके अलावा, कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरानी ड्रोन हमलों और उनसे जुड़े प्रभावों के दावे जो किए जा रहे हैं, वे रात के समय हुए बताए जाते हैं। लेकिन जिन तस्वीरों और वीडियो को सबूत के तौर पर दिखाया जा रहा है, वे साफ तौर पर दिन के उजाले में लिए गए लगते हैं। इससे साफ होता है कि ये वीडियो असली घटनाओं से मेल नहीं खाते और बनावटी हैं। हमारा मकसद नागरिकों को नुकसान पहुंचाना नहीं है, लेकिन इस पूरी स्थिति के परिणामों की जिम्मेदारी अमेरिकी-जायोनिस्ट पक्ष और उनके सहयोगियों पर है, जो अपने इलाके और सुविधाएं उनके इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराते हैं।

सवाल: लेबनान और इजरायल के बीच संघर्ष का लेबनान की संप्रभुता और आंतरिक स्थिरता पर क्या असर पड़ता है?

जवाब: हमारी राय में, इजरायली शासन जो लेबनान में कर रहा है, वह साफ तौर पर लेबनान की राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन है और युद्ध अपराधों की श्रेणी में आता है। पिछले कई दशकों से इस शासन का रिकॉर्ड कब्जे, सैन्य हमलों, हत्याओं और आम नागरिकों की हत्या जैसी घटनाओं से भरा रहा है। हमारा मानना है कि यह शासन पश्चिम एशिया में अस्थिरता और असुरक्षा का मुख्य कारण है। गाजा में जो घटनाएं हुईं, उन्हें कोई नहीं भूल सकता, जहां 70,000 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे गए। इनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। दस लाख से ज्यादा लोग बेघर हुए और गाजा शहर लगभग पूरी तरह तबाह हो गया।

आज भी यह शासन अलग-अलग बहानों के नाम पर लेबनान पर हमले जारी रखे हुए है, जिससे सिर्फ लेबनान ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। ये कदम अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और देशों की संप्रभुता के सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ हैं। हम हमेशा से इस बात पर जोर देते आए हैं कि लेबनान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। हमारा मानना है कि लेबनान की सुरक्षा वहां के लोगों और सरकार को खुद सुनिश्चित करनी चाहिए, और किसी भी देश को यह अधिकार नहीं है कि वह बलपूर्वक दूसरे देश पर अपना फैसला थोपे।

हमने यह भी कहा है कि लेबनान के खिलाफ चल रहे युद्ध को खत्म करना, क्षेत्र में शांति स्थापित करने के किसी भी समझौते का जरूरी हिस्सा होना चाहिए। हम किसी भी हाल में नागरिकों और निर्दोष लोगों की हत्या के खिलाफ हैं, चाहे उनका धर्म या राष्ट्रीयता कुछ भी हो। हमारा मानना है कि स्थायी शांति तभी संभव है जब हिंसा और अपराधों को रोका जाए।

सवाल: मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता के समय में ईरान अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शांति और स्थिरता के बारे में क्या संदेश देना चाहता है?

जवाब: ईरान एक ऐसा देश है, जिसकी सभ्यता सात हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है। इतिहास में यह हमेशा से देशों के बीच शांति, साथ रहने और दोस्ती का संदेश देने वाला रहा है। हमारी ऐतिहासिक पहचान और संस्कृति दूसरे देशों के साथ बातचीत और सहयोग पर आधारित रही है। इतिहास यह दिखाता है कि पिछले तीन सौ वर्षों में ईरान ने किसी भी युद्ध की शुरुआत नहीं की है और हमेशा विवादों को सुलझाने के शांतिपूर्ण तरीकों का समर्थन किया है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की सोच हमेशा बातचीत, कूटनीति और आपसी सम्मान पर आधारित रही है।

आज जब दुनिया अनेक चुनौतियों और अनिश्चितताओं का सामना कर रही है, तब ईरान का संदेश अमेरिका और पूरी दुनिया के लिए स्पष्ट है। टिकाऊ शांति, स्थिरता और सुरक्षा तभी संभव है, जब देशों के अधिकारों का सम्मान किया जाए, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन हो और समानता के आधार पर खुला तथा सकारात्मक संवाद स्थापित किया जाए।

हम उम्मीद करते हैं कि अमेरिका एक मजबूत और स्वतंत्र ईरान की हकीकत को स्वीकार करेगा, जिसकी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम भूमिका है, और ईरानी लोगों के वैध अधिकारों को भी मान्यता देगा। ईरान हमेशा से आपसी सम्मान और साझा हितों के आधार पर बातचीत और सहयोग के लिए तैयार रहा है। हमारा मानना है कि सभी देशों के लिए सुरक्षित और स्थिर भविष्य का निर्माण केवल कूटनीति और आपसी समझ के माध्यम से ही संभव है।

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