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Friday,21-August-2026
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भारत नहीं कर अफगान क्षेत्र का उपयोग, पाकिस्तान दावा झूठा : काबुल

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KABUL

अशरफ गनी सरकार ने इस्लामाबाद के इस आरोप को खारिज कर दिया है कि अफगानिस्तान पाकिस्तान को अस्थिर करने के लिए भारत को अपने क्षेत्रों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे रहा है।

इमरान खान सरकार ने गुरुवार को एक बयान में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र विश्लेषणात्मक सहायता एवं प्रतिबंध निगरानी टीम ने इस्लामाबाद के इस दावे का समर्थन किया है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) अफगानिस्तान से भारतीय समर्थन से चल रहा है।

अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को काबुल में आरोपों को पूरी तरह से खारिज करते हुए एक बयान जारी कर कहा कि वह बिना किसी भेदभाव के सभी आतंकवादी समूहों से लड़ रहा है। मंत्रालय ने कहा, “टीटीपी और उसके अन्य समूहों के हाथों पर अफगान लोगों का खून लगा हुआ है (ये संगठन अफगान नागरिकों के हत्यारे हैं)। राष्ट्रीय खतरे को देखते हुए अफगानिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में इन्हें आतंकवादी संगठनों के तौर पर नामित किया गया है।”

बयान में कहा गया है कि अफगानिस्तान में न्याय कायम रखने के लिए पिछले वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में टीटीपी नेताओं और उसे गुर्गों को मुठभेड़ के दौरान ढेर किया गया है।

गनी सरकार ने पाकिस्तान को याद दिलाया कि आतंकवाद के शिकार के रूप में, अफगानिस्तान ने इस आम (कॉमन) दुश्मन के खिलाफ क्षेत्र की सामूहिक लड़ाई में अपनी भूमिका से कहीं अधिक प्रयास किया है।

अफगानिस्तान की सरकार ने कहा कि उसकी ओर से टीटीपी के कई शीर्ष नेताओं का सफाया किया गया है और वह आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में किसी भी तरह का कोई भेद नहीं करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अल्पसंख्यक रिपोर्ट में कहा गया है कि न केवल तालिबान और अलकायदा अफगानिस्तान में एक-दूसरे के साथ सहयोग जारी रख रहे हैं, बल्कि कश्मीर-विशिष्ट पाकिस्तानी आतंकवादी समूह, जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) और लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) अपने हत्यारों को लक्षित हत्याओं को अंजाम देने के लिए अफगानिस्तान भेज रहे हैं।

पारदर्शिता और क्षेत्रीय सहयोग की बात करते हुए अफगान विदेश मंत्रालय ने कहा कि अफगानिस्तान ने आतंकवादी संगठनों के नेताओं और गुर्गों की हिसारत के लिए संबंधित साझेदार देशों तक पहुंच प्रदान की है।

यह दोहराते हुए कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में प्रतिबद्ध है, सरकार ने कहा कि उन्होंने हमेशा पारदर्शिता दिखाई है और किसी भी देश या तीसरे पक्ष को किसी अन्य देश को अस्थिर करने के लिए अफगानिस्तान का उपयोग करने की न तो कभी इजाजत दी है और न ही ऐसी किसी हरकत को वह कभी बर्दाश्त करेंगे।

अंतरराष्ट्रीय समाचार

दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान ने प्योंगयांग के मिसाइल प्रक्षेपण पर की चर्चा

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दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान के वरिष्ठ राजनयिकों ने शुक्रवार को उत्तर कोरिया के बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपण को गंभीर माना है। इस मामले को लेकर राजनयिकों ने फोन पर बातचीत की और स्थिति से जुड़ी सूचनाएं साझा करते हुए संभावित जवाबी कदमों पर भी चर्चा की। दक्षिण कोरिया के अनुसार, गुरुवार को प्योंगयांग की ओर से मिसाइलें दागी गई थीं।

योनहाप न्यूज एजेंसी ने दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रालय के हवाले से बताया कि, कोरियाई प्रायद्वीप नीति के महानिदेशक बेक योंग-जिन ने अमेरिकी विदेश विभाग में पूर्वोत्तर एशिया मामलों के उप सहायक सचिव डेविड वाइलजोल और जापान के विदेश मंत्रालय के एशियाई एवं ओशिनियाई मामलों के ब्यूरो के उप महानिदेशक ताकाशी अरियोशी से बातचीत की।

मंत्रालय ने कहा कि तीनों अधिकारियों ने जरूरी और प्रासंगिक सूचनाएं साझा कीं और भविष्य में इस पर कैसे रिएक्ट करना है इस पर विचार-विमर्श किया। बता दें कि तीनों देशों के विदेश मामलों के अधिकारियों के बीच उत्तर कोरिया के बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपण की स्थिति में तत्काल सूचनाएं और आकलन साझा करने के लिए एक नियमित चैनल मौजूद है।

दक्षिण कोरियाई सेना ने गुरुवार को बताया था कि उत्तर कोरिया ने पूर्वी सागर की ओर कम दूरी की कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी थीं। यह प्रक्षेपण ऐसे समय हुआ जब दक्षिण कोरिया और अमेरिका अपना संयुक्त सैन्य अभ्यास कर रहे थे। प्योंगयांग इस अभ्यास को युद्ध की तैयारी बताते हुए लगातार इसकी आलोचना करता रहा है।

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के बाद दक्षिण कोरिया-अमेरिका का मौजूदा संयुक्त सैन्य अभ्यास निर्धारित अवधि से करीब एक हफ्ते पहले ही समाप्त करने की घोषणा की गई। ट्रंप ने उत्तर कोरिया के साथ तनाव कम करने और उसके नेता किम जोंग-उन के साथ फिर बातचीत शुरू करने की इच्छा भी जताई है। जिसे लेकर फिलहाल नॉर्थ कोरिया ने खास रुचि नहीं दिखाई है।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

ईरान के खिलाफ ट्रंप की ‘आर्थिक हमले’ वाली बात चीन को नहीं आई रास

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चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस कैंपेन की आलोचना की है जिसके तहत वो ईरान और उसके साझेदारों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की बात कर रहे हैं। बीजिंग के मुताबिक ऐसी पाबंदियां स्थिति को और उलझा सकती हैं। “इकोनॉमिक डी-डे” कैंपेन की आलोचना करते हुए कहा कि और ज्यादा प्रतिबंध लगाने से लंबित मुद्दों को सुलझाने में मदद नहीं मिलेगी।

बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने प्रेस ब्रीफिंग में पत्रकारों से कहा, “प्रतिबंध लगाने और दबाव डालने से समस्या का समाधान नहीं होता है।”

इसमें आगे कहा गया, “चीन संबंधित पक्षों से जिम्मेदार कदम उठाने और कूटनीतिक व राजनीतिक तरीकों से मुद्दों को सुलझाने का आग्रह करता है।”

दरअसल, इन कदमों से चीन पर खास तौर पर असर पड़ेगा, क्योंकि एनालिटिक्स फर्म केप्लर के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, वह ईरान से निर्यात होने वाले तेल का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा खरीदता है। ऐसे में अगर अमेरिका ने ईरानी तेल खरीदने वाली चीनी कंपनियों, बैंकों या शिपिंग नेटवर्क पर व्यापक प्रतिबंध लगाए, तो इसका सीधा असर अमेरिका-चीन संबंधों पर पड़ सकता है। यही ट्रंप की नई आर्थिक रणनीति का सबसे संवेदनशील मोर्चा हो सकता है।

अमेरिका पहले भी ईरानी तेल की खरीद और उसके परिवहन से जुड़े चीन स्थित रिफाइनरी तथा शिपिंग कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुका है। अब ट्रंप की ताजा चेतावनी से संकेत मिल रहा है कि वाशिंगटन ऐसे प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ा सकता है।

गुरुवार सुबह (स्थानीय समयानुसार) अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्रुथ सोशल पर ‘इकोनॉमिक डी-डे’ का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि वो ईरान के साझेदारों और मददगारों के खिलाफ अब तक का सबसे सख्त कदम उठाने जा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान को डील करने का जितना बड़ा मौका मैंने दिया, उतना किसी और ने नहीं दिया। दुख की बात है कि वे इसका फायदा उठाने में सफल नहीं रहे।’

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान को अब अभूतपूर्व स्तर पर आर्थिक युद्ध और अलग-थलग पड़ने का सामना करना पड़ेगा। ट्रंप ने दूसरे देशों को भी चेतावनी दी कि वे ईरान को किसी भी तरह की मदद न मुहैया कराएं, और ऐसा करने पर उन्हें भी भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

कोलंबिया भूकंप: प्रभावित इलाकों में 30 दिनों के लिए इमरजेंसी घोषित

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कोलंबिया के राष्ट्रपति एबेलार्डो डे ला एस्प्रीला ने 10 अगस्त को आए भूकंप से प्रभावित देश के कुछ हिस्सों में 30 दिनों के लिए आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय आपातकाल घोषित करने वाले एक आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं।

यह आदेश बुधवार (स्थानीय समयानुसार) बोगोटा में हुई कैबिनेट बैठक के बाद जारी किया गया। इसमें वैले डेल काउका, रिसारल्डा और कैलडास समेत 15 प्रभावित विभागों (प्रांतों) को शामिल किया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम एक गंभीर सार्वजनिक आपदा से निपटने के लिए उठाया गया है।

स‍िन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, एस्प्रीला ने कहा कि आपातकालीन उपायों का उद्देश्य सिर्फ क्षतिग्रस्त घरों का पुनर्निर्माण करना नहीं है, बल्कि कारोबारों को फिर से खड़ा करना और स्कूलों, अस्पतालों जैसी जरूरी सार्वजनिक सुविधाओं को बहाल करना भी है।

उन्होंने कहा कि कोलंबिया इस समय अपने गणराज्य के इतिहास की सबसे जटिल वित्तीय स्थिति का सामना कर रहा है, इसलिए असाधारण कदम उठाना जरूरी हो गया है।

राष्ट्रपति ने बताया कि उनकी सरकार मौजूदा राष्ट्रीय जरूरतों को पूरा करने के लिए पिछली सरकार के कुछ कम प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में कटौती करेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों पर इसका कोई नकारात्मक असर न पड़े।

कोलंबिया की नेशनल यूनिट फॉर डिज़ास्टर रिस्क मैनेजमेंट की ओर से बुधवार शाम जारी आंकड़ों के अनुसार, पश्चिमी कोलंबिया में आए 7.4 तीव्रता के भूकंप में 319 लोगों की मौत हो चुकी है, 4,469 लोग घायल हुए हैं और 260 लोग अभी भी लापता हैं। अब तक 364 लोगों को सुरक्षित बचाया गया है।

एजेंसी ने बताया कि 15 विभागों के 476 नगरपालिकाएं इस आपदा से प्रभावित हुई हैं और करीब 2,72,830 लोग इसकी चपेट में आए हैं।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खोज एवं बचाव दल अब भी मलबे में लापता लोगों की तलाश कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक अब तक 358 लोगों को बचाया जा चुका है।

कोलंबिया के विदेश मंत्रालय ने बताया कि देश में 220 टन से अधिक मानवीय सहायता सामग्री पहुंच चुकी है और 144 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ राहत और बचाव कार्यों में मदद के लिए शामिल हुए हैं।

वैले डेल काउका, रिसारल्डा और चोको के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में कई लोग अब भी अस्थायी शिविरों और पार्कों में लगाए गए टेंटों में रह रहे हैं, क्योंकि उनके घर भूकंप में क्षतिग्रस्त हो गए हैं।

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