राष्ट्रीय समाचार
मुंबई कबूतरखाना विवाद: पेटा इंडिया ने सीएम देवेंद्र फडणवीस को लिखा पत्र, एसी, ह्यूमिडिफायर और धूल कबूतरों की बीट से भी ज़्यादा चिंताजनक
मुंबई: पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर कहा है कि कबूतरों को दाना खिलाना सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व की एक मानवीय और आवश्यक परंपरा है।
पशु कल्याण संगठन ने एक तथ्य पत्र भी जारी किया, जिसमें कबूतरों से होने वाले स्वास्थ्य खतरों के दावों को खारिज किया गया तथा दावा किया गया कि हानिकारक पदार्थ एयर कंडीशनर, ह्यूमिडिफायर के साथ-साथ दूषित भोजन में भी पाए जा सकते हैं, न कि केवल पक्षियों की बीट या पंखों में।
मुंबई के प्रतिष्ठित कबूतरखानों में कबूतरों को दाना डालने को लेकर चल रही गरमागरम बहस और प्रदर्शनों के बीच, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने इस मुद्दे पर नागरिकों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं।
बुधवार को, पेटा इंडिया ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर उनके इस बयान का स्वागत किया कि “गोशालाओं को अचानक बंद करना कोई समाधान नहीं है” और कबूतरों को दाना खिलाने के मुद्दे पर एक व्यावहारिक समाधान ज़रूरी है। पेटा इंडिया ने उनके इस आश्वासन की भी सराहना की कि बीएमसी की निगरानी में नियंत्रित दाना-पानी जारी रहेगा।
एनजीओ ने एक तथ्य-पत्र भी जारी किया जिसमें दावा किया गया कि छह दशकों के वैज्ञानिक प्रमाण इस बात की पुष्टि करते हैं कि कबूतरों से इंसानों में बीमारी फैलने का खतरा बहुत कम है। हालाँकि इसने एक जर्मन अध्ययन का हवाला दिया जिसमें दावा किया गया है कि कबूतरों का घर में रहना मानव स्वास्थ्य के लिए मामूली चिंता का विषय हो सकता है, लेकिन इसने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय का भी हवाला दिया जिसमें दावा किया गया है कि कबूतरों में बर्ड फ्लू वायरस होने की संभावना नहीं है।
इसमें यह भी कहा गया है कि मुंबई के तीन सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों से प्राप्त आरटीआई के जवाब से पता चलता है कि 2024 में श्वसन संबंधी बीमारियों के केवल 0.3% मामले ही कबूतरों के संपर्क से जुड़े थे।
पेटा इंडिया ने दावा किया कि ‘अतिसंवेदनशीलता न्यूमोनाइटिस’ पर चिकित्सा साहित्य से पता चलता है कि यह पर्यावरण में बैक्टीरिया, फफूंद या रसायनों को बार-बार सांस के माध्यम से अंदर लेने से हो सकता है, और हानिकारक पदार्थ कई स्रोतों में पाए जा सकते हैं, जैसे एयर कंडीशनर, ह्यूमिडिफायर, दूषित खाद्य पदार्थ, धातु के तरल पदार्थ, लकड़ी का बुरादा, घास या अनाज तथा गर्म टब, न कि केवल पक्षियों की बीट या पंख।
पेटा ने नियंत्रित आहार के लिए तीन-चरणीय योजना का सुझाव दिया
पेटा इंडिया ने परंपरा और पक्षी कल्याण को बनाए रखते हुए जन स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए एक त्रि-चरणीय योजना का सुझाव दिया है। इसने मौजूदा कबूतरखानों में विशिष्ट आहार केंद्र स्थापित करने, उचित भोजन समय स्पष्ट रूप से निर्धारित करने, केवल कबूतरों के अनुकूल भोजन की आवश्यकता और कूड़ा-कचरा, ब्रेड और प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया है।
दूसरे, इसने अनुरोध किया है कि सफाई कर्मचारी प्रत्येक स्थल की नियमित रूप से धुलाई और सफाई करें, तथा पोषक तत्वों से भरपूर मल को नगर निगम की खाद बनाने वाली सुविधाओं तक पहुंचाया जाए, जिससे अपशिष्ट को लगभग बिना किसी लागत के मूल्यवान उर्वरक में बदला जा सके।
इसमें यह भी कहा गया है कि बहुभाषी सार्वजनिक शिक्षा से नागरिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि कबूतरों से बीमारी फैलने का वास्तविक खतरा लगभग शून्य है, जिससे मानव और पक्षी मुंबईकरों के बीच सद्भाव को बढ़ावा मिलेगा।
वैश्विक मानवीय जनसंख्या नियंत्रण मॉडल प्रस्तावित
इसमें यह भी सुझाव दिया गया है कि विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवीय जनसंख्या नियंत्रण पद्धति कबूतर नियंत्रण सलाहकार सेवा (PiCAS) मॉडल को भी प्रस्तावित योजना में शामिल किया जा सकता है, जिसने यूरोपीय शहरों में मापनीय सफलता दिखाई है।
इस मॉडल के तहत, कबूतरों को संवेदनशील जगहों से दूर आकर्षित करने और निगरानी को सक्षम बनाने के लिए, निर्दिष्ट भोजन क्षेत्रों के पास कृत्रिम घोंसले और बसेरा गृह बनाए जाते हैं। कबूतरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए, अंडों को हटाकर उनकी जगह नकली अंडे लगाने का भी सुझाव दिया गया है।
इसने प्रमुख सार्वजनिक और निजी भवनों को गैर-घातक निवारकों, जैसे परावर्तक पक्षी विकर्षक टेप, के उपयोग के माध्यम से कबूतर-रोधी बनाने की भी सिफारिश की है।
पेटा इंडिया के अभियान समन्वयक अथर्व देशमुख ने कहा, “कबूतरों को दाना डालना एक मानवीय परंपरा है जिसका सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है और कबूतरों से होने वाले संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। मुंबई के कबूतरखाने सदियों पुराने हैं और अनगिनत नागरिकों को इन कोमल पक्षियों को रोज़ाना मुट्ठी भर दाना खिलाकर सुकून और आध्यात्मिक संतुष्टि प्रदान करते हैं। इसके अलावा, जिन कबूतरों को पीढ़ियों से कबूतरखानों में दाना डाला जाता रहा है, वे अपने ज्ञात, विश्वसनीय भोजन स्रोत के बिना भूख से मर जाएँगे।”
पिछले हफ़्ते, पेटा की संस्थापक अध्यक्ष इंग्रिड न्यूकिर्क भारत आईं और द फ्री प्रेस जर्नल से बातचीत में उन्होंने इस मुद्दे पर निराशा व्यक्त की। शुक्रवार को, न्यूकिर्क ने कहा, “अंग्रेजों ने इन पक्षियों को तब खरीदा था जब उन्होंने भारत पर आक्रमण किया था। वे उन्हें भारत में ही छोड़ गए, लेकिन जैन और हिंदुओं ने यह सुनिश्चित करने के लिए पूरे देश में ये चारागाह स्थापित किए कि वे भूख से न मरें। वे वफ़ादार, अद्भुत और हानिरहित हैं, लेकिन अब उन्हें भूखा रहना चाहिए। हम ऐसा नहीं होने देंगे। हम अदालतों में जाएँगे और जैन और हिंदुओं का समर्थन करेंगे।”
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भारत में इस्तेमाल हो रहा ऑफिस स्पेस 900 मिलियन स्क्वायर फीट के पार, बीते एक वर्ष में 6 प्रतिशत का हुआ इजाफा

भारत में इस्तेमाल हो रहे कमर्शियल स्पेस 2026 की पहली छमाही (जनवरी-जून अवधि) में सालाना आधार पर 6 प्रतिशत बढ़कर 901.1 मिलियन स्क्वायर फीट हो गया है, जो कि 2025 की पहली छमाही में 847 मिलियन स्क्वायर फीट था। यह जानकारी बुधवार को जारी रिपोर्ट में दी गई।
नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, देश में कुल ऑफिस स्टॉक 1.05 बिलियन स्क्वेयर फीट दर्ज किया गया है। देश के शीर्ष आठ ऑफिस मार्केट में इस्तेमाल हो रहे ऑफिस स्पेस में वृद्धि, कंपनियों के लगातार विस्तार को दिखाती है।
नाइट फ्रैंक इंडिया में इंटरनेशनल पार्टनर और सीनियर एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर विरल देसाई ने कहा, “जीसीसी के विस्तार और घरेलू कंपनियों के बढ़ते दायरे की वजह से ऑफिस की मांग बनी हुई है। कंपनियां ऐसे स्थापित बाजारों की ओर बढ़ रही हैं जहां उन्हें टैलेंट, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े पैमाने पर काम करने की सुविधा मिलती है।”
बेंगलुरु सबसे बड़े ऑफिस मार्केट के तौर पर सबसे आगे है, जहां 2026 की पहली छमाही में इस्तेमाल हो रहा ऑफिस स्पेस का आंकड़ा 222.4 मिलियन स्क्वायर फीट तक पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 8 प्रतिशत की मजबूत ग्रोथ दिखाता है।
दिल्ली-एनसीआर 178.1 मिलियन स्क्वायर फीट ऑफिस स्पेस के साथ दूसरे नंबर पर है, जहां सालाना आधार पर 2 प्रतिशत की मामूली ग्रोथ देखी गई। मुंबई में इस्तेमाल हो रहे ऑफिस स्पेस का आंकड़ा 146.6 मिलियन स्क्वायर फीट रहा, जिसमें सालाना आधार पर 5 प्रतिशत की ग्रोथ हुई।
पुणे सबसे तेजी से बढ़ने वाले मार्केट में से एक बनकर उभरा है। यह शहर 100 मिलियन स्क्वायर फीट का आंकड़ा पार करने की राह पर है। रिपोर्ट के अनुसार, पुणे ने सालाना आधार पर 10 प्रतिशत की ग्रोथ दर्ज की और इस्तेमाल हो रहा ऑफिस स्पेस 98.8 मिलियन स्क्वायर फीट तक पहुंच गया।
वहीं, चेन्नई ने सालाना आधार पर 6 प्रतिशत की अच्छी ग्रोथ बनाए रखी और कुल इस्तेमाल हो रहा ऑफिस स्पेस 88.9 मिलियन स्क्वायर फीट रहा, वहीं अहमदाबाद ने सभी ट्रैक किए गए शहरों में सबसे ज्यादा ग्रोथ दिखाई, जहां इस्तेमाल हो रहा ऑफिस स्पेस 9 प्रतिशत बढ़कर 27.5 मिलियन स्क्वायर फीट हो गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता में इस्तेमाल हो रहा ऑफिस स्पेस 24.4 मिलियन स्क्वायर फीट रहा, जिसमें सालाना आधार पर 6 प्रतिशत की स्थिर बढ़ोतरी देखी गई।
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ऑपरेशन सिंदूर में किराना हिल्स पर टकराया हो सकता है युद्धक ड्रोन: पूर्व सीडीएस जनरल चौहान

भारत के पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने कहा है कि पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय लोइटरिंग म्यूनिशन (युद्धक ड्रोन) संभवत पाकिस्तान के किरना हिल्स इलाके से टकराया हो सकता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय सशस्त्र बलों ने किराना हिल्स को जानबूझकर निशाना नहीं बनाया था।
गौरतलब है कि किराना हिल्स पाकिस्तानी सशस्त्र बलों के परमाणु ढांचे से जुड़ा महत्वपूर्ण इलाका माना जाता है। जनरल अनिल चौहान ने मंगलवार को नई दिल्ली स्थित विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद की परिस्थितियों पर आयोजित ‘विमर्श’ कार्यक्रम में यह जानकारी दी। उन्होंने ऑपरेशन के दौरान किराना हिल्स को लेकर सामने आई रिपोर्टों और घटनाक्रम पर विस्तार से बात की तथा बताया कि भारतीय लोइटरिंग म्यूनिशन के उस इलाके तक पहुंचने की संभावित वजह क्या हो सकती है।
जनरल चौहान के मुताबिक, भारतीय सेना ने पाकिस्तान के सरगोधा इलाके और उसके आसपास मौजूद रडारों की तलाश तथा उन्हें निशाना बनाने के लिए कई लोइटरिंग म्यूनिशन भेजे थे। इनमें से एक लोइटरिंग म्यूनिशन को इजरायल में डिजाइन किए गए हारोप ड्रोन के रूप में बताया गया है। उन्होंने बताया कि यह म्यूनिशन अपने निर्धारित इलाके में लक्ष्य की तलाश कर रहा था, लेकिन उसे लक्ष्य नहीं मिला और किराना हिल्स के आसपास संचालन के दौरान उसका ईंधन खत्म हो गया। ऐसी स्थिति में उसके संभवतः किराना हिल्स की किसी पहाड़ी से टकराने की संभावना है।
उन्होंने यह भी बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के तत्कालीन महानिदेशक वायु अभियान, सेवानिवृत्त एयर मार्शल ए.के. भारती ने भी स्पष्ट किया था कि भारतीय सशस्त्र बलों ने किराना हिल्स में मौजूद परमाणु प्रतिष्ठान को निशाना नहीं बनाया था। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मीडिया को संबोधित करते हुए एयर मार्शल ए.के. भारती ने कहा था, “हमें यह बताने के लिए धन्यवाद कि किराना हिल्स में कोई न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन है। हमें इसके बारे में पता नहीं था। और हमने किराना हिल्स पर हमला नहीं किया है, चाहे वहाँ कुछ भी हो।”
जनरल चौहान ने घटनाक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में हमले शुरू होने से पहले भारतीय बलों ने सरगोधा और किराना हिल्स की दिशा में बड़ी संख्या में लोइटरिंग म्यूनिशन भेजे थे। किराना हिल्स सरगोधा से करीब 10 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। उन्होंने कहा, “उन हमलों से पहले, हमने सरगोधा और किराना हिल्स (जो सरगोधा से 10 किमी उत्तर में है) की तरफ बहुत से ‘लोइटर एम्युनिशन’ भेजे थे। ये ‘लोइटर एम्युनिशन’ सरगोधा और उसके आस-पास मौजूद रडार की तलाश कर रहे थे, और इनकी एक निश्चित समय-सीमा (लाइफटाइम) होती है।”
लोइटरिंग म्यूनिशन की कार्यप्रणाली समझाते हुए उन्होंने कहा कि यह हथियार किसी निर्धारित इलाके में कुछ समय तक घूमकर अपने लक्ष्य की तलाश कर सकता है। यदि उसे लक्ष्य नहीं मिलता है तो उसकी निर्धारित संचालन अवधि पूरी होने के बाद वह नीचे गिर सकता है। जनरल चौहान ने कहा, “यह लगभग दो घंटे तक हवा में मंडराता रहेगा और अगर इसे कोई टारगेट नहीं मिला, तो यह कहीं न कहीं जाकर टकरा जाएगा। यह उन्हीं पहाड़ियों में से किसी एक से टकराया होगा।”
इस तरह जनरल चौहान के बयान से किराना हिल्स को लेकर सामने आई अटकलों को एक संभावित स्पष्टीकरण मिला है। उन्होंने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि किराना हिल्स भारतीय सैन्य अभियान का जानबूझकर चुना गया लक्ष्य नहीं था। कार्यक्रम के दौरान पूर्व सीडीएस ने ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थित स्कर्दू पर हमला करने की मंजूरी दी गई थी। हालांकि, खराब मौसम के कारण स्कर्दू में प्रस्तावित कार्रवाई को बाद में रद्द करना पड़ा और मिशन का रुख भोलारी की ओर कर दिया गया।
जनरल चौहान ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान भारतीय वायुसेना प्रमुख ने उनसे सरगोधा पर हमला करने को लेकर पूछा था। इसकी अनुमति दी गई थी साथ ही दो और लक्ष्यों की पहचान करने को कहा था। इनमें से एक लक्ष्य स्कर्दू था। जनरल चौहान के अनुसार, स्कर्दू क्षेत्र में मौसम की स्थिति अनुकूल नहीं रहने के कारण वहां नियोजित अभियान को आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया। इसके बाद भारतीय वायुसेना ने मिशन को भोलारी की ओर मोड़ दिया।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 10 मई को भारतीय वायुसेना द्वारा भोलारी में किए गए हमले का दृश्य बाद में पूरे अभियान के सबसे प्रमुख दृश्यों में शामिल रहा। इस हमले में भोलारी स्थित वायुसेना के एक हैंगर को निशाना बनाया गया था। यह अभियान भारतीय वायुसेना की गांधीनगर स्थित दक्षिण पश्चिमी वायु कमान द्वारा संचालित हवाई अभियान का हिस्सा था।
पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान के ताजा बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सैन्य अभियानों में लक्ष्यों का चयन, लोइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल और मौसम जैसी परिचालन परिस्थितियों के आधार पर योजनाओं में बदलाव किस तरह किया गया। किराना हिल्स के मामले में उन्होंने साफ किया कि वहां किसी परमाणु प्रतिष्ठान को निशाना बनाने की कोई पूर्व नियोजित कार्रवाई नहीं थी।
मनोरंजन
‘संस्कृति और परंपराएं दिलों में होती हैं, कपड़ों में नहीं’, कृति सेनन का कंगना रनौत को करारा जवाब

बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन इन दिनों एक रक्षाबंधन विज्ञापन को लेकर लगातार चर्चा में हैं। दरअसल, ज्वेलरी ब्रांड के एक विज्ञापन में कृति का इंडो-वेस्टर्न लुक कुछ लोगों को पसंद नहीं आया। सोशल मीडिया पर उनके पहनावे को लेकर सवाल उठाए गए। इसके बाद अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी बिना नाम लिए विज्ञापन की स्टाइलिंग पर निशाना साधा।
अब कृति ने पूरे मामले पर चुप्पी तोड़ी है और इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए अपनी बात रखी है। कृति ने साफ किया कि किसी महिला के कपड़ों को देखकर उसकी संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान तय नहीं किया जा सकता।
कृति सेनन ने इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा, ”त्योहारों का मतलब आपके पहने हुए कपड़ों में नहीं है, बल्कि उन परंपराओं के प्रति भावनाओं और उनके महत्व में है। रक्षाबंधन का त्योहार सुरक्षा और प्यार के रिश्ते का प्रतीक है। मैं और मेरी बहन एक-दूसरे को राखी बांधती हैं और एक-दूसरे की सुरक्षा, अच्छी सेहत, खुशी और लंबी उम्र की कामना करती हैं।”
कृति ने पोस्ट में आगे लिखा, ”मेरे लिए यह प्यार, प्रार्थना और एक-दूसरे की देखभाल का रिश्ता हमारे डॉग्स तक भी पहुंचता है, क्योंकि वे भी हमारे परिवार का हिस्सा हैं।”
इसके बाद कृति ने पोस्ट में पूछा, ”हम महिलाओं को यह बताना आखिर कब बंद करेंगे कि उन्हें क्या पहनना चाहिए? समय के एथनिक फैशन में भी काफी बदलाव आया है, लेकिन आज भी किसी महिला के कल्चर के प्रति सम्मान को उसके कपड़ों से मापा जाता है। संस्कृति और परंपराएं महिला के दिल में होती हैं, नेकलाइन में नहीं।”
कृति के इस पोस्ट को कंगना रनौत की टिप्पणी से जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल, पूरा विवाद एक रक्षाबंधन विज्ञापन से शुरू हुआ। ज्वेलरी ब्रांड के एक विज्ञापन में कृति सेनन ने ऑफ-व्हाइट कलर का इंडो-वेस्टर्न आउटफिट पहना हुआ है। इसमें ब्रालेट स्टाइल ब्लाउज, ड्रेप्ड स्कर्ट और केप शामिल है। विज्ञापन सामने आने के बाद कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके कपड़ों को त्योहार के हिसाब से सही नहीं बताया।
मामला तब और चर्चा में आया जब कंगना रनौत ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर एक पोस्ट शेयर किया। उन्होंने कृति का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी बातों को इसी विज्ञापन से जोड़कर देखा गया।
कंगना ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा, ”महिला होने के लिए यह शानदार समय है। हमारी अलमारियां कई तरह के कपड़ों से भरी हैं और आज की महिला ग्लोबल महिला है। कॉकटेल ड्रेस से लहंगा चोली, जींस से साड़ी और बिकिनी से सलवार-कमीज तक, आज हमारे पास कपड़ों के इतने विकल्प हैं। फिर आप अपने भाई को बिकिनी या अंडरगारमेंट्स में राखी क्यों बांधेंगी? आपके पास स्टाइलिंग के इतने विकल्प कहां गए? हा हा, यह विज्ञापन जानबूझकर अजीब बनाया गया लगता है।”
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