राजनीति
न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर अन्नदाता को गुमराह होने की जरूरत नहीं
कोरोना महामारी के संकट के समय पूरे देश का पेट भरने की शक्ति साबित करने वाले अन्नदाता को उनकी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर गुमराह होने की जरूरत नहीं है। मोदी सरकार के हर फैसले में किसानों का हित सर्वोपरि होता है, क्योंकि सरकार का मानना है कि किसान समृद्ध होगा, तो देश समृद्ध होगा। इसलिए एमएसपी को हटाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद एमएसपी पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया, जिससे किसानों को फसलों की लागत पर 50 फीसदी से ज्यादा लाभ के साथ एमएसपी मिलना सुनिश्चित हुआ है।
मोदी सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि कोरोना काल में भी एमएसपी पर गेहूं की रिकॉर्ड खरीद हुई है। इसके अलावा दलहनी और तिलहनी फसलों की भी एमएसपी पर खरीद कर सरकार ने किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिलाया। अबकी बार खरीफ सीजन में तय समय से पहले ही धान की खरीद शुरू हो चुकी है, जबकि कुछ फसलों की एमएसपी पर खरीद 1 अक्टूबर से शुरू होने जा रही है।
किसानों को उनकी फसलों का बेहतर व लाभकारी दाम मिले इसके लिए सरकार प्रयासरत है और इसी मकसद से नये कानून के जरिए कृषि क्षेत्र में सुधार के कार्यक्रमों को लागू करने का मार्ग सुगम बनाया गया है। किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी करने के लक्ष्य को लेकर चल रही यह सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी, जो अन्नदाता की समृद्धि के मार्ग में बाधक बने।
किसानों को आर्थिक आजादी दिलाने और उनकी समृद्धि की कामना से मोदी सरकार ने कोरोना काल में कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव के मकसद से तीन अहम फैसले लेते हुए तीन अध्यादेश लाए, जिन्हें संसद के मानसून सत्र में विधेयक के रूप में पेश किया गया और संसद की मुहर लगने के बाद महामाहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के साथ अब ये कानून बन गए हैं।
इससे कृषि उत्पादों के विपणन के लिये न सिर्फ एक देश एक बाजार का वर्षों से संजोये सपने को मोदी सरकार ने साकार किया है, बल्कि कृषि को उद्योग का दर्जा दिलाने की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया है। किसान अब अपनी उपज का दाम खुद तय कर पायेंगे। ऐसे में अब उन्हें एमएसपी को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है।
वर्ष 2014-15 में गेहूं, ज्वार, मूंग, सूर्यमुखी, राम तिल और नारियल के एमएसपी से तुलना करें तो 2019-20 में इन फसलों के एमएसपी में 525 रुपये से लेकर 4,410 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा हुआ है। इसी प्रकार, अन्य फसलों के एमएसपी में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। एमएसपी में यह वृद्धि मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान हई है।
कोरोना काल में केंद्र सरकार के प्रयासों से रबी सीजन की फसलों की खरीद की समुचित व्यवस्था करने के लिए खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई गई, जिससे गेहूं की रिकॉर्ड खरीद हुई और अन्य फसलों की खरीद के परिमाण में भारी इजाफा हुआ। देशभर में सरकारी एजेंसियों ने बीते रबी खरीद सीजन में 389.76 लाख टन गेहूं सीधे किसानों से खरीदा, जोकि अब तक का रिकॉर्ड है, इसके लिए किसानों को 75,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। धान की खरीद में 2014-15 के मुकाबले 2019 में करीब 74 फीसदी का इजाफा हुआ है।
केंद्र सरकार निरंतर किसानों के हित में कार्य कर रही है। इस साल 2020 में गेहूं, धान, दलहन और तिलहन फसलों को मिलाकर किसानों को 1 लाख 13,000 करोड़ रुपये न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के रूप में भुगतान किया गया है। यह भुगतान राशि पिछले वर्ष की तुलना में 31 फीसदी ज्यादा है। पिछले वर्ष कुल 86.8 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था।
फसलों का एमएसपी किसानों को दिलाने की आवश्यकता तब होती है, जब किसानों को उनके उत्पादों का उचित दाम नहीं मिलता है। लेकिन जब किसान खुद अपने उत्पादों का मूल्य तय करेगा तो फिर उन्हें एमएसपी की चिंता करने की जरूरत नहीं होगी। मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठाने वाले एमएसपी के मसले पर किसानों को गुमराह कर अपनी खिसकती राजनीतिक जमीन को बचाने की जुगत में हैं। इसलिए किसानों को गुमराह होने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार ने कृषि से जुड़े जो तीन कानून बनाए हैं, उनका एक ही मकसद है कि किसानों को उनके उत्पादों का अधिकतम लाभकारी दाम मिले जिससे उनके जीवन में खुशहाली आए।
देश में कोरोना वायरस संक्रमण की विषम परिस्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार ने जब प्रभावी कदम उठाया था, उस समय देश में रबी फसलों की कटाई चल रही थी और ग्रीष्मकालीन फसलों की बुवाई का सीजन था। इसलिए, सरकार ने फसलों की बुवाई कटाई, परिवहन, विपणन को पूर्णबंद से मुक्त रखा। लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में कृषि उपज विपणन समिति (एमएसपी) द्वारा संचालित जींस मंडियां बंद रहने से किसानों की कठिनाइयां बढ़ गई थीं। वे अपनी फसल बेच नहीं पा रहे थे। लिहाजा, सरकार ने अध्यादेश के जरिए किसानों को देश में कहीं भी और किसी को भी फसल बेचने की आजादी देते हुए, एक देश एक कृषि उत्पाद बाजार के उनके सपने को साकार किया।
देश में जब फसलों के भंडारण, परिवहन, प्रसंस्कारण समेत मूल्यवर्धन श्रंखला दुरुस्त होगी तो किसानों को फसलों का बेहतर दाम मिलेगा। आज सिर्फ 22 अनुसूचित फसलों के लिए एमएसपी का निर्धारण किया जाता है, जबकि सरकार चाहती है कि तमाम कृषि एवं बागवानी फसलों का किसानों को लाभकारी मूल्य मिले। इसी मकसद से दशकों पुराने कानून (आवश्यरक वस्तुय अधिनियम, 1955) में संशोधन किया गया है और दो ऐसे कानून बनाये गये हैं, जिससे किसान बेरोक-टोक अपनी फसल देश में कहीं भी बेच सकता है। साथ ही किसानों को खेती करने से पहले ही दाम मिलने का भरोसा होगा, इसके लिए अनुबंध पर खेती करने का प्रावधान किया गया है। इसमें बुवाई के वक्त ही किसानों को फसल की तय कीमत मिलने का आश्वासन दिया जाएगा और कटाई के वक्त कीमत ज्यादा होने पर उसके लाभ से भी किसान वंचित नहीं होंगे। यह सिर्फ फसल का अनुबंध होगा, न कि किसानों की जमीन का।
आवश्यक वस्तु अधिनियम,1955 में संशोधन करके अनाज, दलहन, तिलहन व खाद्य तेल समेत आलू और प्याज, टमाटर को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया गया है। इन कृषि उत्पादों के भंडारण प्रसंस्करण व मूल्यवर्धन के लिए अब निजी निवेशक आगे आएंगे, जिससे किसानों को इन उत्पादों का बेहतर व लाभकारी मूल्य मिलेगा। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि बागवानी उत्पादों की खेती जिन क्षेत्रों में होती है, वहां की मंडियों में कीमतें कम होती हैं, जबकि उपभोक्ता बाजार में फल व सब्जियां ऊंचे भाव पर बिकती हैं। दरअसल उत्पादक से उपभोक्ता के बीच की जो कड़ियां हैं, उनमें कई सारे बिचैलिये होते हैं, जो मोटा मुनाफा कमाते हैं, जबकि किसानों को कम दाम मिलता है। सरकार ने इन बिचैलियों को सप्लाई चेन से हटाने के लिए ही ये कानूनी बदलाव किए हैं, जिसके बाद अब किसान सीधे थोक व्यापारी, फुटकर व्यापारी व प्रशंस्करणकर्ताओं को अपने उत्पाद बेच सकते हैं। इससे किसानों को उनकी फसलों का उचित व लाभकारी दाम दिलाना सुनिश्चित होगा।
कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून, 2020 मोदी सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला है। इससे किसानों को देशभर में कहीं भी और किसी को भी अपनी फसल बेचने की आजादी मिली है, पहले ऐसा नहीं था। किसानों को कृषि उपज मंडी समिति कानून के तहत संचालित मंडियों में आढ़तियों और व्यापारियों का मोहताज बने रहना पड़ता था। उनकी फसलों की बोली लगायी जाती थी। क्या किसी औद्योगिक उत्पाद की बिक्री के लिये उसकी बोली लगायी जाती है? शायद नहीं। क्योंकि औद्योगिक उत्पादों के दाम तो पहले से ही तय होते हैं और यह दाम तय करने का अधिकार उद्योगपतियों के हाथों में होता है। कंपनियां अपने उत्पादों के दाम तो फिर किसानों के उत्पादों का दाम कोई आढ़ती या बिचैलिया क्यों करें? किसानों की इस विवशता को आजादी के बाद अगर किसी ने समझा तो, वह देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी हैं। किसानों के दर्द को महसूस करने वाले मोदी जी ने सत्ता में आने के बाद कृषि क्षेत्र की उन्नति और किसानों की समृद्धि के लिये एक के बाद एक किसान हितैषी कई फैसले लिये हैं। कृषि और सम्बद्ध क्षेत्र में सुधार के लिये लाये गये नये कानून किसानों के हक में हैं। इसे कॉरपोरेट और निजी पूंजीपतियों को फायदा दिलाने की दिशा में कदम बताने वाले दरअसल इसे मुद्दा बनाकर राजनीति करना चाहते हैं, क्योंकि उनके लिये राजनीति करने का कोई मसला नहीं बचा है। जो लोग यह कह रहे हैं कि मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता (अधिकार प्रदान करना और सुरक्षा) और कृषि सेवा कानून 2020 से कॉरपोरेट को फायदा होगा, उनको मालूम होना चाहिए कि मोदी सरकार ने देश में दस हजार किसान उत्पादन संगठन (एफपीओ) बनाने का लक्ष्य रखा है।
दरअसल उत्पादन से लेकर बाजार तक किसानों की हिस्सेदारी होगी। मतलब उत्पादक विक्रेता भी बनेंगे। कृषि क्षेत्र में निसंदेह इन फैसलों से निजी निवेश, यहां तक कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी आकर्षित होगा, लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा किसानों को होगा।
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू कर विभिन्न फसलों के एमएसपी में बढ़ोतरी की गई। एमएसपी के निर्धारण में डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के फार्मूले का अनुपालन किया जा रहा है। इस सरकार ने स्वामीनाथन समिति की 201 सिफारिशों में से 200 सिफारिशों को लागू किया है, जिसका वर्षों से इंतजार किया जा रहा था। आज जो लोग एमएसपी को लेकर किसानों को गुमराह कर रहे हैं दरअसल, उनकी ही सरकारों ने कभी स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करने में दिलचस्पी नहीं दिखायी। इसलिए एमएसपी को लेकर को गुमराह होने की जरूरत नहीं है। एसएसपी हमेशा रहेगा।
(लेखक केंद्र सरकार में कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री हैं और इस आलेख में उनका निजी विचार है)
महाराष्ट्र
नवी मुंबई में शहरी नियोजन और ट्रैफिक संकट पर राज ठाकरे का हमला, बोले- महाराष्ट्र में सत्ता का इंतजार

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने सोमवार को राज्य के जर्जर शहरी बुनियादी ढांचे और बिगड़ते यातायात प्रबंधन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वे उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं जब महाराष्ट्र की जनता उन्हें सत्ता सौंपेगी।
नवी मुंबई में वाणिज्यिक वाहन परिवहन सम्मेलन और ट्रांसपोर्टरों की रैली को संबोधित करते हुए राज ठाकरे ने नागरिक अनुशासन की कमी, खराब शहरी नियोजन और ई-चालान प्रणाली के दोषपूर्ण कार्यान्वयन की आलोचना की और चेतावनी दी कि राज्य का यातायात संकट जल्द ही बेकाबू हो जाएगा।
राज ठाकरे ने चेतावनी दी कि शहरी क्षेत्रों में यातायात की समस्या पहले ही चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है और सुव्यवस्थित सीमाओं या नागरिक नियमों के पूर्ण अभाव के कारण यह और भी बदतर होने वाली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ई-चालान प्रणाली के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जुर्माने लगाने के मनमाने तरीके की आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि ई-चालानों की निगरानी कैमरे द्वारा सख्ती से की जानी चाहिए, न कि कर्मचारियों द्वारा मौके पर मैन्युअल रूप से जारी किए जाने चाहिए।
राज ठाकरे ने अधिकारियों पर विशेषज्ञों से परामर्श करने या उचित नगर नियोजन लागू करने के बजाय ‘बिल्डरों से दोस्ती’ के आधार पर विकास योजनाएं बनाने का आरोप लगाया।
उन्होंने बताया कि आदर्श रूप से सड़कें किसी क्षेत्र के कुल क्षेत्रफल के लगभग 15 प्रतिशत हिस्से को कवर करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों को मूल रूप से 50 लोगों के लिए बनाया गया था, उनमें अब पर्याप्त पार्किंग सुविधा के बिना 500 लोग रहते हैं। उन्होंने टिप्पणी की कि पुल और सड़कें अक्सर दो साल के भीतर खराब होने के लिए बनाई जाती हैं ताकि मरम्मत के ठेके लगातार जारी किए जा सकें।
ठाकरे ने कहा कि इस देश के यातायात को देखकर मुझे इसके वर्तमान और भविष्य की झलक मिलती है। हमें न तो वाहन चलाना आता है और न ही उन्हें पार्क करना। आधुनिक यातायात प्रबंधन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि शहरों में स्वचालित यातायात सिग्नल तो हैं, लेकिन उनके ठीक बगल में मानव यातायात कांस्टेबल तैनात रहते हैं क्योंकि किसी को भी वाहन चालकों पर नियमों का पालन करने का भरोसा नहीं है।
मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) आयुक्त को दिए गए अपने अनसुने सुझाव को साझा करते हुए ठाकरे ने फुटपाथों के लिए रंग-कोडिंग का प्रस्ताव रखा (लाल और काला रंग सख्त ‘नो पार्किंग’ क्षेत्रों के लिए, पीला और काला रंग निर्धारित पार्किंग क्षेत्रों के लिए)।
हालांकि, उन्होंने अफसोस जताया कि सार्वजनिक कार्यान्वयन की कमी के कारण ऐसे विचार निष्प्रभावी हो जाते हैं। ठाकरे ने चेतावनी दी कि शहरों में दूरदर्शिता की कमी है। यदि उपनगरीय रेलवे प्रणाली कभी ठप हो जाती है, तो सड़कों पर निजी वाहनों की अचानक बाढ़ से पूरा शहर जाम हो जाएगा और निवासी अपने घरों में ही फंसे रह जाएंगे।
उन्होंने खेल के मैदानों, बगीचों या टिकाऊ जल आपूर्ति जैसी पर्याप्त सार्वजनिक सुविधाओं के अभाव में बन रही बेतरतीब इमारतों और कॉलोनियों की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या इस अव्यवस्थित शहरीकरण को सचमुच ‘अनुशासन’ कहा जा सकता है।
अपने भाषण का समापन एक प्रत्यक्ष राजनीतिक बयान के साथ करते हुए ठाकरे ने घोषणा की कि महाराष्ट्र के परिवहन और शहरी क्षेत्रों में अनुशासन लाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का काम है। ठाकरे ने कहा कि मैं वास्तव में उस पल का इंतजार कर रहा हूं जब महाराष्ट्र की जनता मुझे सत्ता सौंपेगी। इस तरह की चीजों में अनुशासन लाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। इसके लिए बस इसे करने की इच्छाशक्ति चाहिए। उनके इस बयान पर ट्रांसपोर्टरों और पार्टी कार्यकर्ताओं से भरी सभा ने जोरदार तालियां बजाईं।
राष्ट्रीय समाचार
सरकार ने चालू इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर खर्च किए 17.73 लाख करोड़ रुपए

सरकार ने सोमवार को बताया कि सितंबर 2026 तक केंद्र के 17 मंत्रालयों और विभागों में कुल 37.56 लाख करोड़ रुपए की नवीनतम अनुमानित लागत वाली 1,853 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की निगरानी की जा रही है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स पर अब तक कुल 17.73 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, जो प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का लगभग 47.21 प्रतिशत है। यह इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के क्रियान्वयन में निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
बयान में कहा गया, “काफी संख्या में प्रोजेक्ट्स अग्रिम चरण में पहुंच गए हैं। कुल 654 प्रोजेक्ट्स (35 प्रतिशत) में 80 प्रतिशत से अधिक भौतिक प्रगति दर्ज की गई है, जबकि 338 प्रोजेक्ट्स (18 प्रतिशत) में 80 प्रतिशत से अधिक वित्तीय कार्य पूरा हो चुका है।”
कुल 1,853 जारी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में से 780 मेगा प्रोजेक्ट्स हैं, जिनकी लागत 1,000 करोड़ रुपए या इससे अधिक है। वहीं, 1,073 प्रमुख इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की लागत 1,000 करोड़ रुपए से कम है।
बयान के अनुसार, परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में सबसे अधिक 1,320 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जिनकी कुल लागत 20.07 लाख करोड़ रुपए है। यह कनेक्टिविटी आधारित बुनियादी ढांचे के विकास को दी जा रही प्राथमिकता को दर्शाता है।
बयान में आगे कहा गया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के तहत सबसे अधिक 974 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जो कुल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का 53 प्रतिशत है। इनकी संशोधित कुल लागत 9.46 लाख करोड़ रुपए है, जो सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का 25 प्रतिशत है। यह राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के विकास में मंत्रालय की केंद्रीय भूमिका को दिखाता है।
रेल मंत्रालय के तहत 284 प्रोजेक्ट्स (15 प्रतिशत) जारी हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 7.21 लाख करोड़ रुपए है। यह कुल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स लागत का 19 प्रतिशत है।
कोयला मंत्रालय के तहत 121 प्रोजेक्ट्स (6 प्रतिशत) चल रहे हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 2.22 लाख करोड़ रुपए है। यह कुल लागत का 6 प्रतिशत है।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय तथा जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग क्रमशः 115, 106, 49 और 35 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को क्रियान्वित कर रहे हैं। इनकी संबंधित लागत क्रमशः 4.30 लाख करोड़ रुपए, 6.40 लाख करोड़ रुपए, 3.41 लाख करोड़ रुपए और 1.95 लाख करोड़ रुपए है।
बयान में कहा गया कि शेष 169 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (9 प्रतिशत) विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के अंतर्गत आते हैं। इनकी कुल लागत 2.62 लाख करोड़ रुपए है, जो सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का 7 प्रतिशत है।
महाराष्ट्र
मुंबई महानगर क्षेत्र की बढ़ती जरूरतों के लिए महाराष्ट्र सरकार की व्यापक जल योजना तैयार

भारत के प्रमुख आर्थिक केंद्र मुंबई महानगर क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक जल स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महाराष्ट्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। सरकार ने मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) के लिए एक व्यापक 25 वर्षीय जल प्रबंधन योजना का मसौदा तैयार करने हेतु एक उच्च स्तरीय अध्ययन समूह का गठन किया है।
जल संसाधन विभाग द्वारा जारी सरकारी संकल्प (जीआर) के माध्यम से दिए गए निर्देश में विशेषज्ञ पैनल को भविष्य की मांग का मूल्यांकन करने, उपलब्ध संसाधनों का आकलन करने, संरचनात्मक कमियों की पहचान करने और तीन महीने के भीतर एक व्यावहारिक रूपरेखा प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है।
प्रमुख नगर निगमों, औद्योगिक क्षेत्रों और तेजी से विकसित हो रहे अर्ध-शहरी केंद्रों से युक्त मुंबई महानगर क्षेत्र जनसंख्या वृद्धि, वाणिज्यिक विस्तार और बड़ी परियोजनाओं के कारण बढ़ती जल मांग का सामना कर रहा है।
वर्तमान में यह क्षेत्र राज्य के बांधों और नगर निगमों के जल स्रोतों के मिश्रित नेटवर्क पर निर्भर है, लेकिन सरकार ने इस बात पर जोर दिया है कि खंडित प्रबंधन अब व्यवहार्य नहीं है।
अध्ययन समूह घरेलू, औद्योगिक, वाणिज्यिक, संस्थागत और निर्माण क्षेत्रों में एकीकृत ऑडिट करेगा ताकि तीन प्रमुख समय सीमाओं (2031, 2041 और 2051) के लिए सटीक मांग अनुमान स्थापित किए जा सकें। नवगठित अध्ययन समूह की अध्यक्षता जल संसाधन विभाग के सेवानिवृत्त सचिव संजय बेलसारे कर रहे हैं।
विभिन्न प्रशासनिक क्षेत्रों में अंतर-एजेंसी समन्वय सुनिश्चित करने के लिए पैनल में प्रमुख शहरी और क्षेत्रीय प्राधिकरणों के नेतृत्व को शामिल किया गया है।
इस अध्ययन समूह में कोंकण क्षेत्र के मुख्य अभियंता (सदस्य सचिव), बीएमसी और एमएमआरडीए के अतिरिक्त आयुक्त, ठाणे, नवी मुंबई और कल्याण-डोम्बिवली के आयुक्त, और महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी), महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण (एमजेपी), और महाराष्ट्र रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर (एमआरएसएसी) के प्रतिनिधि शामिल हैं। अध्ययन समूह का कार्यक्षेत्र बांध निर्माण के पारंपरिक समाधानों से परे है, जिसमें सतत मांग प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन को प्राथमिकता दी गई है।
अध्ययन समूह पूर्ण हो चुकी, चल रही और प्रस्तावित जल आपूर्ति परियोजनाओं की समीक्षा करेगा ताकि अनुमानित स्थानीय कमियों के मुकाबले कुल सुनिश्चित उपज की गणना की जा सके, पुनर्चक्रित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग, बड़े पैमाने पर वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जल निकायों के पारिस्थितिक पुनरुद्धार का मूल्यांकन किया जा सके, गैर-राजस्व जल (एनआरडब्ल्यू) को कम करने, वितरण रिसाव को दूर करने और मीटरिंग प्रणालियों के आधुनिकीकरण के लिए सख्त उपायों की सिफारिश की जा सके और मानसून चक्र में परिवर्तन, अनियमित अत्यधिक वर्षा, लंबे समय तक सूखे और तटीय जलभंडारों पर बढ़ते समुद्री जल के प्रभाव से जुड़ी कमजोरियों का आकलन किया जा सके।
अंतिम रिपोर्ट में एक एकीकृत जल सुरक्षा योजना 2051 प्रस्तुत की जाएगी, जिसमें प्राथमिकता वाले अवसंरचना परियोजनाओं, अनुमानित पूंजीगत व्यय, कार्यान्वयन समयसीमा, वित्तपोषण तंत्र और स्पष्ट अंतर-विभागीय जिम्मेदारियों का विवरण दिया जाएगा।
जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीली और स्पष्ट जल रणनीति तैयार करके, राज्य का लक्ष्य भविष्य में आपूर्ति संबंधी बाधाओं को दूर करना और अगले पच्चीस वर्षों तक पूरे क्षेत्र में आर्थिक स्थिरता को सुरक्षित रखना है।
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