राष्ट्रीय
बिहार में किसान औने-पौने भाव पर धान बेचने को मजबूर
पंजाब और हरियाणा में सरकारी एजेंसियां विगत एक महीने से किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर धान खरीद रही हैं, लेकिन बिहार में किसानों को औने-पौने दाम पर धान बेचना पड़ रहा है क्योंकि वहां की एजेंसियों ने अभी एमएसपी पर खरीद शुरू नहीं की है।
केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन 2020-21 के लिए धान (कॉमन ग्रेड)का एमएसपी 1,868 रुपये प्रति क्विं टल जबकि धान (ग्रेड-ए) के लिए 1,888 रुपये प्रति क्विं टल तय किया है। केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, सरकार द्वारा तय एमएसपी पर पंजाब, हरियाणा समेत विभिन्न राज्यों में 28 अक्टूबर तक 179.827 लाख टन धान की खरीद हो चुकी थी, मगर बिहार में जहां इन दिनों विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हैं वहां धान की सरकारी खरीद अभी शुरू भी नहीं हुई है।
बिहार में सहकारिता विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य में धान की खरीद आमतौर पर 15 नवंबर के बाद ही शुरू होती है। हालांकि राज्य में खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान की कटाई जोरों पर है और रबी सीजन की फसलों की बुवाई के लिए किसानों को पैसों की जरूरत है इसलिए वे औने-पौने भाव पर धान बेचने को मजबूर हैं।
बिहार में कृषि उत्पादों की सबसे बड़ी मंडी पूर्णियां जिला की गुलाब बाग मंडी में शुक्रवार को धान का बाजार भाव करीब 1,260-1,270 रुपये प्रति क्विं टल था। मतलब, इस भाव पर किसानों से मंडी के निजी कारोबारी धान खरीद रहे थे। मंडी के एक कारोबारी ने बताया कि अधिकतम 1,300 रुपये प्रतिक्विं टल तक धान की खरीद हो रही है। गुलाब मंडी में अनाज कारोबारी के मुंशी सिकंदर चौररिसा ने कहा कि मंडी में इन दिनों धान की नई फसल की आवक तेज हो गई है। इस प्रकार बिहार में किसानों को एमएसपी से 600 रुपये प्रतिक्विं टल से कम भाव पर धान बेचना पड़ रहा है।
मधेपुरा जिला के किसान प्रणव कुमार भंवर ने बताया कि बड़े और साधन संपन्न किसान ही गुलाब बाग मंडी अपनी फसल ले जाते हैं। छोटे किसानों को गांवों के व्यापारियों के हाथों ही अपनी फसल बेचनी पड़ती है, जो मंडी रेट से भी कम भाव पर किसानों से फसल खरीदते हैं। प्रणव ने बताया कि गांव के व्यापारी इस समय 1,100-1,150 रुपये प्रति क्विं टल से उंचे भाव पर धान नहीं खरीद रहे हैं।
सहकारिता विभाग के अधिकारी ने बताया कि बिहार में मुख्य रूप से धान और गेहूं की सरकारी खरीद होती है जो पैक्स (प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट सोसायटी) और व्यापार मंडल जैसी एजेंसियों के जरिए की जाती है और किसानों को खरीद की तारीख से तीन दिन के भीतर फसल के दाम का भुगतान किया जाता है।
हालांकि, एक किसान ने बताया कि समय पर भुगतान नहीं होने की वजह से किसान सरकारी एजेंसियों के बजाय निजी कारोबारियों के हाथों अपनी फसल बेचना पसंद करते हैं।
केंद्र सरकार द्वारा हाल में लागू किए गए तीन कृषि कानूनों को लेकर पंजाब और हरियाणा में किसान संगठन लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके विरोध की मुख्य वजह यह है कि उन्हें लगता है कि नये कृषि कानून से मंडी व्यवस्था समाप्त होने से किसानों को उनकी फसलों का एमएसपी नहीं मिल पाएगा जबकि केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि किसानों से एमएसपी पर फसलों की पूर्ववत जारी रहेगी।
दरअसल, नये कानून में कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) द्वारा संचालित मंडियों की परिधि के बाहर कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री पर कोई शुल्क का प्रावधान नहीं है, जबकि मंडी में मंडी शुल्क होता है, लिहाजा इससे मंडी में फसलों की खरीद नहीं होने पर मंडी व्यवस्था के समाप्त होने की आशंका है।
गौरतलब है कि बिहार में 2006 में ही एपीएमसी एक्ट को निरस्त कर दिया गया था, जिसके बाद से मंडियों में कोई मंडी शुल्क नहीं लगता है।
राष्ट्रीय
पश्चिम एशिया संकट के बीच डीजी शिपिंग का बड़ा कदम, निर्यातकों को राहत देने के निर्देश; नाविकों को सुरक्षित रहने की सलाह

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नई दिल्ली, 9 अप्रैल : पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच नौवहन महानिदेशालय (डीजी शिपिंग) ने बंदरगाहों को निर्देश दिया है। कि युद्ध प्रभावित पर्शियन गल्फ (फारस की खाड़ी) क्षेत्र में फंसे माल (कार्गो) वाले निर्यातकों को राहत दी जाए और उन्हें जरूरी छूट प्रदान की जाए।
एक सर्कुलर में कहा गया है कि बंदरगाह प्राधिकरण द्वारा दी जाने वाली छूट, जैसे डिटेंशन चार्ज, ग्राउंड रेंट, रीफर प्लग-इन (कनेक्टेड लोड) और अन्य टर्मिनल चार्ज, सभी मामलों में समान रूप से निर्यातकों तक नहीं पहुंच रही हैं।
डीजी शिपिंग ने निर्देश दिया है कि पोर्ट अथॉरिटी द्वारा दी गई सभी छूट पारदर्शी तरीके से सीधे संबंधित हितधारकों, जिनमें फ्रेट फॉरवर्डर्स और एनवीओसीसी शामिल हैं, को दी जाएं और वे आगे इसे निर्यातकों तक पहुंचाएं।
इसके साथ ही बंदरगाह प्राधिकरणों को यह जिम्मेदारी भी दी गई है कि वे टर्मिनल स्तर पर इसकी निगरानी करें ताकि छूट का लाभ बिना देरी के सही लोगों तक पहुंचे।
रेगुलेटर ने पोर्ट और टर्मिनल ऑपरेटर्स से कहा है कि वे इन निर्देशों का सख्ती से पालन करें ताकि लागत में पारदर्शिता बनी रहे, निर्यातकों के हित सुरक्षित रहें और संकट के दौरान कामकाज प्रभावित न हो।
यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि निर्यातक 497 करोड़ रुपए की रेजिलिएंस एंड लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन (रिलीफ) योजना के तहत दावा कर सकें और लाभ उठा सकें।
डीजी शिपिंग ने कहा, “शिपिंग कंपनियां ऐसे मामलों में पूरी पारदर्शिता और ऑडिट की सुविधा बनाए रखें। साथ ही, कार्गो पर लगने वाला वॉर रिस्क प्रीमियम भी बदला है, जो पहले के निर्देशों के अनुरूप नहीं हो सकता। इस मामले को बीमा कंपनियों के साथ उठाया जा रहा है।
इसी बीच डीजी शिपिंग ने ईरान के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में काम कर रहे भारतीय नाविकों के लिए सुरक्षा एडवाइजरी भी जारी की है।
एडवाइजरी में कहा गया है कि जो नाविक किनारे पर हैं, वे घर के अंदर रहें, संवेदनशील जगहों से दूर रहें और अपनी आवाजाही के लिए भारतीय दूतावास के संपर्क में रहें।
वहीं, जो नाविक जहाज पर हैं, उन्हें जहाज पर ही रहने और बिना जरूरत किनारे पर जाने से बचने की सलाह दी गई है।
सभी कर्मियों से सतर्क रहने, आधिकारिक जानकारी पर नजर रखने और अपनी कंपनी व संबंधित अधिकारियों के संपर्क में बने रहने की अपील की गई है।
राष्ट्रीय
राणा अयूब के संदेशों पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और एक्स से मांगा जवाब

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नई दिल्ली, 8 अप्रैल : दिल्ली उच्च न्यायालय में पत्रकार राणा अयूब से जुड़े एक मामले में अहम सुनवाई हुई है।
यह मामला वर्ष 2013 से 2017 के बीच उनके सामाजिक माध्यम पर किए गए संदेशों से जुड़ा है, जिनमें उन पर भारत विरोधी भावना फैलाने का आरोप लगाया गया है। अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राणा अयूब द्वारा हिंदू देवी-देवताओं और वीर सावरकर को लेकर किए गए कुछ संदेशों पर कड़ी टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि ये संदेश अपमानजनक, भड़काऊ और सांप्रदायिक प्रकृति के प्रतीत होते हैं, जो समाज में तनाव पैदा कर सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में उचित कार्रवाई होना आवश्यक है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस संबंध में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और एक्स को निर्देश दिया है कि वे इन संदेशों के खिलाफ अब तक की गई कार्रवाई की जानकारी दें। साथ ही, यह भी बताएं कि आगे क्या कदम उठाए गए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में देरी उचित नहीं है और इसे तुरंत सुना जाना जरूरी है।
न्यायालय ने राणा अयूब को भी नोटिस जारी किया है और उनसे इस मामले में अपना पक्ष रखने को कहा है। अदालत का कहना है कि यह मामला सार्वजनिक भावना और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसकी गंभीरता को देखते हुए सभी पक्षों का जवाब समय पर आना जरूरी है।
साथ ही, दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार और सोशल साइट एक्स को निर्देश दिया है कि वे अगले दिन तक अपना जवाब दाखिल करें। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को तय की है, जहां इस पूरे प्रकरण पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
राजनीति
बारामती उपचुनाव से पहले कांग्रेस उम्मीदवार आकाश मोरे की इस शर्त से बढ़ी सियासी हलचल

पुणे, 6 अप्रैल : बारामती विधानसभा उपचुनाव में एक नए मोड़ आ गया है। कांग्रेस उम्मीदवार और वकील आकाश मोरे ने साफ कह दिया है कि वह अपना नामांकन तभी वापस लेंगे, जब महाराष्ट्र सरकार अजित पवार के विमान हादसे की जांच के लिए एफआईआर दर्ज करेगी। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह हादसा केवल संयोग नहीं था और सच सामने लाना बेहद जरूरी है।
आकाश मोरे ने कहा, “हम यह लड़ाई लोकतंत्र की रक्षा और भाजपा की विचारधारा का विरोध करने के लिए लड़ रहे हैं। अगर सरकार इस मामले में एफआईआर दर्ज करती है और गंभीर जांच करती है, तभी मैं अपना नामांकन वापस लेने पर विचार करूंगा।”
आकाश मोरे पेशे से वकील हैं और उनकी एक राजनीतिक विरासत है। उनके पिता 2014 में अजित पवार के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं।
उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि गृह मंत्रालय को इतने बड़े नेता की मौत को गंभीरता से लेना चाहिए। मोरे ने कहा, “बारामती और महाराष्ट्र के ‘कर्तापुरुष’ चले गए। सवाल यह है कि आखिर एफआईआर क्यों नहीं हुई या जांच क्यों नहीं हुई? हमने अजित दादा का राजनीतिक विरोध किया, ये हो सकता है, लेकिन राज्य के विकास के मामले में उनके साथ खड़े रहे। अगर कोई बड़ा नेता हादसे में मर जाए और एफआईआर दर्ज न हो, तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है।”
उन्होंने कहा कि राज्य कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल भी इस रुख से सहमत हैं। पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता अतुल लोंढे ने कहा कि मोरे की शर्त पूरी तरह जायज है। उन्होंने कहा, “अजित दादा के निधन के बाद उनके परिवार ने भी जांच की मांग की थी। इसलिए उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने सीबीआई जांच की मांग की थी, लेकिन यह प्रक्रिया कहां अटकी? रोहित पवार को एफआईआर दर्ज कराने के लिए महाराष्ट्र भर में दौड़ लगानी पड़ी और आखिरकार यह एफआईआर केवल कर्नाटक में हुई। क्या यही संवेदनशीलता है? हमारी मांग है कि एफआईआर महाराष्ट्र, खासकर बरामती में दर्ज हो तभी हम निर्णय करेंगे।”
अतुल लोंढे ने कहा कि मोरे सोमवार को कांग्रेस की तरफ से नामांकन दाखिल करेंगे। इस पर काफी चर्चा और आलोचना हो रही है। कई लोग पुरानी परंपराओं का हवाला देते हुए सुझाव दे रहे हैं कि कांग्रेस को इस चुनाव में निर्विरोध मतदान होने देना चाहिए। क्या नांदेड में वसंतराव चव्हाण की मृत्यु के बाद चुनाव नहीं हुए थे? क्या भरत भालके के निधन के बाद मंगलवेढा में चुनाव नहीं हुए थे? ऐसे अनगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं जहां भाजपा ने अपनी सुविधा के अनुसार राजनीति की है।”
कांग्रेस के इस कदम ने निर्विरोध चुनाव की संभावना को रोक दिया है। पहले यह उम्मीद की जा रही थी कि शरद पवार और उद्धव ठाकरे के समर्थन से सुनेत्रा पवार बिना मुकाबले चुनाव जीत सकती हैं, लेकिन कांग्रेस द्वारा आकाश मोरे को मैदान में उतारे जाने के फैसले ने सबको चौंका दिया और अब नामकंन वापस लेने के लिए ये मांग रखी है।
उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने पहले कोशिश की कि चुनाव बिना मुकाबले हो, लेकिन कांग्रेस ने आकाश मोरे को मैदान में उतारकर खेल बदल दिया। जैसे-जैसे नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख नजदीक आ रही है, सबकी नजरें अब महायुति सरकार पर हैं कि वह इस मांग का क्या जवाब देती है। इस बीच, एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने बारामती के लोगों से अपील की है कि सुनेत्रा पवार को रिकॉर्ड बहुमत से चुने।
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