राजनीति
प्रधानमंत्री के बिहार दौरे से पहले तेजस्वी ने दागे 11 सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर बिहार चुनाव के दौरान तीन चुनावी सभाओं को संबोधित करने के लिए बिहार पहुंच रहे हैं। इससे पहले राजद के नेता और महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने मंगलवार को उनसे 11 सवाल पूछे हैं। तेजस्वी ने कहा कि दरभंगा एम्स की घोषणा 2015 में हुई लेकिन ऐन चुनाव के पहले ही उसका काम शुरू करने की घोषणा क्यों की गई?
तेजस्वी इस चुनाव में किसी भी मुद्दे को हाथ से नहीं छोड़ना चाहते हैं। यही कारण है कि चुनाव के दौरान उन्होंने मृजफरपुर बालिका गृह में लड़कियों से कथित दुष्कर्म का मामला उठाया है। उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा है, ”प्रधानमंत्री जी, मुजफ्फरपुर भी आ रहे हैं। सत्ता संरक्षण में मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड में 34 अनाथ बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म के मुख्य आरोपी को मुख्यमंत्री ने बचाया ही नहीं बल्कि उसके घर जन्मदिन की पार्टी में भी गए, उसे निरंतर वित्तीय मदद की और चुनाव भी लड़वाया? क्या प्रधानमंत्री जी डबल इंजन सरकार के इस घृणित कार्य पर बोलेंगे?”
तेजस्वी ने दरभंगा और मुजफ्फरपुर में सुपर स्पेशलिटी अस्पताल नहीं बनाने तथा स्किल विश्वविद्यालय नहीं खोलने को लेकर भी प्रधानमंत्री से सवाल पूछे हैं।
उन्होंने बिहार के गंदे शहरों को लेकर भी प्रधानमंत्री से सवाल करते हुए कहा, ”प्रधानमंत्री को बिहारवासियों को बताना चाहिए कि देश के टॉप 10 सबसे गंदे शहरों में बिहार के 6 शहर क्यों हैं? पटना और बिहार की इस बदहाली का जिम्मेवार कौन है?”
उल्लेखनीय है कि बुधवार को नरेंद्र मोदी बिहार में तीन चुनावी सभाओं को संबोधित करने आ रहे हैं। प्रधानमंत्री बुधवार को दरभंगा, मुजफरपुर और पटना में रैली को संबोधित करेंगें।
बता दें कि बुधवार को ही बिहार में पहले चरण में 71 सीटों पर मतदान होना है।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र: चीनी मिलों के लिए राहत पैकेज, सरकार लाएगी 2,000 करोड़ की आसान ऋण योजना

महाराष्ट्र सरकार की ओर से सहकारी चीनी मिलों के लिए आसान लोन योजना और बाय प्रोडक्ट पॉलिसी लाई जाएगी। सहकारी चीनी मिलों को आर्थिक स्थिरता देने और गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए सरकार केंद्र सरकार की पॉलिसी के आधार पर एक सॉफ्ट लोन स्कीम शुरू करने जा रही है।
डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे मंजूरी के लिए राज्य कैबिनेट के सामने तुरंत एक औपचारिक प्रस्ताव पेश करें। प्रस्तावित योजना के तहत, योग्य सहकारी चीनी मिलों को लगभग 2,000 करोड़ का कम ब्याज वाला सॉफ्ट लोन फंड मिल सकेगा। इन लोन को चुकाने के लिए 7 साल का समय मिलेगा और राज्य सरकार सालाना लगभग 100 करोड़ रुपए का ब्याज का बोझ उठाएगी।
यह फंड हर फैक्ट्री की गन्ना पेराई क्षमता और आर्थिक स्थिति की समीक्षा के बाद डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक (डीसीसीबी) और महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक (एमएससीबी) के जरिए दिया जाएगा। सरकार की ओर से यह फैसला ऐसे समय पर लिया गया है कि जब राज्य की चीनी मिलें भारी आर्थिक संकट से जूझ रही हैं और उन पर पिछले पेराई सीजन का किसानों का लगभग 200 करोड़ का बकाया है। इस फंड से मिलों को बकाया चुकाने और आने वाले पेराई सीजन के लिए आसानी से तैयारी करने में मदद मिलेगी।
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री ने चीनी उद्योग की कच्ची चीनी उत्पादन पर निर्भरता कम करने और उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत करने के लिए चीनी उप-उत्पादों पर केंद्रित एक स्वतंत्र और व्यापक नीति तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इस रोडमैप का उद्देश्य सौर ऊर्जा, को-जनरेशन बिजली, प्रथम और द्वितीय पीढ़ी (1जी और 2 जी) एथेनॉल, कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी), ग्रीन हाइड्रोजन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (एसएएफ) जैसे वैकल्पिक क्षेत्रों में विनिर्माण और प्रसंस्करण क्षमताओं को बढ़ावा देना है।
मंगलवार को आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में सुनेत्रा पवार ने कहा कि मूल्य संवर्धित उप-उत्पादों में विविधीकरण से उद्योग की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती बढ़ेगी, आय के नए स्रोत विकसित होंगे और गन्ना किसानों को मौसमी मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी।
सहकारी चीनी कारखानों के सूत्रों ने सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि वर्तमान में कारखानों को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित फेयर एंड रेम्यूनरेटिव प्राइस व्यवस्था (एफआरपी) के तहत गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर किसानों को भुगतान करना अनिवार्य होता है। हालांकि, चीनी की घरेलू बिक्री से मिलने वाली आय और एफआरपी भुगतान की बाध्यता के बीच असंतुलन के कारण अक्सर कार्यशील पूंजी की कमी और किसानों के बकाये की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
महाराष्ट्र में गन्ने की खेती राज्य की कुल कृषि भूमि का लगभग 4 प्रतिशत क्षेत्र घेरती है, लेकिन यह सिंचाई जल का 60 से 70 प्रतिशत तक उपयोग करती है। इसी वजह से फसल विविधीकरण और ड्रिप सिंचाई को अनिवार्य बनाने जैसे मुद्दों पर लगातार बहस होती रही है। अधिक उत्पादन वाले वर्षों में चीनी की कीमतों में गिरावट आ जाती है, जिससे किसानों के भुगतान में चूक रोकने के लिए राज्य और केंद्र सरकार को निर्यात कोटा तथा रियायती ऋण जैसी हस्तक्षेपकारी नीतियां लागू करनी पड़ती हैं।
सूत्रों के अनुसार, चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए चीनी मिलें अब एकीकृत बायोरिफाइनरी मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। भारत के एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के तहत बी-हेवी शीरे (मोलासेस) और सीधे गन्ने के रस से एथेनॉल उत्पादन करने पर सफेद चीनी की बिक्री की तुलना में अधिक तेजी से नकदी प्रवाह प्राप्त होता है। वहीं, गन्ने से बची रेशेदार सामग्री बैगास का उपयोग नवीकरणीय बिजली उत्पादन के लिए किया जा रहा है, जिससे कारखानों की अपनी जरूरतें पूरी होने के साथ-साथ ग्रिड को भी बिजली आपूर्ति की जा सकती है।
इसके अलावा, कंप्रेस्ड बायो-गैस, ग्रीन हाइड्रोजन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल जैसे क्षेत्रों में विस्तार राज्य सरकार की उस योजना के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य चीनी कारखानों के राजस्व मॉडल को पारंपरिक चीनी उत्पादन से आगे बढ़ाकर आधुनिक और बहुआयामी बनाना है।
राष्ट्रीय समाचार
भारत-बेल्जियम रक्षा साझेदारी को मिलेगी मजबूती, 10 बड़े समझौतों से बढ़ेगा सैन्य-औद्योगिक सहयोग

भारत और बेल्जियम के बीच रक्षा सहयोग केवल राजनीतिक वार्ता तक सीमित नहीं रहने वाला है। दोनों देश सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा और रक्षा तकनीक के साथ-साथ रक्षा उत्पादन क्षेत्र में भी साझेदारी को जमीन पर उतारने की तैयारी में हैं। बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर और रक्षा एवं विदेश व्यापार मंत्री थियो फ्रांकेन की भारत यात्रा के दौरान रक्षा उद्योग से जुड़े 10 प्रमुख समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।
बेल्जियम के प्रधानमंत्री के साथ 15 रक्षा कंपनियों का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया है। इनमें से अधिकांश कंपनियों का प्रतिनिधित्व उनके मुख्य कार्यकारी अधिकारी कर रहे हैं। प्रस्तावित समझौतों के तहत बेल्जियम की कई रक्षा तकनीकों का भारत में उत्पादन और असेंबली शुरू होने की संभावना है। इनमें रॉकेट, गोला-बारूद, हथियार प्रणालियां, ड्रोन, रडार और समुद्री सुरक्षा से जुड़ी तकनीक शामिल हैं।
बेल्जियम के रक्षा एवं विदेश व्यापार मंत्री थियो फ्रांकेन ने भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की एक तेजी से उभरती आर्थिक और सैन्य शक्ति बताते हुए कहा, “यूरोप और एशिया की सुरक्षा अब एक-दूसरे से अलग नहीं देखी जा सकती। रूस-यूक्रेन में युद्ध जारी है और वह ईरान तथा उत्तर कोरिया के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। वहीं चीन हिंद-प्रशांत में लगातार अधिक आक्रामक रुख अपना रहा है। ऐसे में एशिया में होने वाली घटनाओं का असर यूरोप पर और यूरोप की घटनाओं का असर एशिया पर पड़ता है।”
फ्रांकेन के मुताबिक, बेल्जियम जैसे खुले व्यापार वाले देश के लिए दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा बेहद जरूरी है इसलिए भारत जैसे मजबूत साझेदार के साथ सैन्य, तकनीकी और औद्योगिक स्तर पर सहयोग बढ़ाना समय की जरूरत है।
भारत और बेल्जियम के बीच मौजूदा रक्षा पहल की नींव पिछले आर्थिक मिशन के दौरान रखी गई थी। उस दौरान दोनों देशों की कंपनियों के बीच संपर्क बढ़ा और राजनीतिक स्तर पर भी सहयोग के रास्ते खुले।
अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बेल्जियम के प्रधानमंत्री की बैठक और दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ पर हस्ताक्षर इस बढ़ते विश्वास को संस्थागत रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
इस समझौते में दोनों देशों की सेनाओं के बीच प्रशिक्षण, अधिकारियों का आदान-प्रदान, अनुसंधान एवं विकास, सेमिनार, संयुक्त सैन्य अभ्यास और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग का ढांचा तैयार किया जाएगा।
दोनों देश रक्षा उद्योग के लिए एक साझा औद्योगिक रोडमैप तैयार करने पर भी काम करेंगे। इसके अलावा बेल्जियम डिफेंस कॉलेज 2027 में अपनी ‘वर्ल्ड स्टडी ट्रिप’ के लिए भारत को मेजबान देश के रूप में चुनने की योजना बना रहा है।
फ्रांकेन ने कहा कि अब अगला चरण सिर्फ घोषणाओं का नहीं, बल्कि संयुक्त प्रशिक्षण, औद्योगिक परियोजनाओं और कंपनियों के लिए वास्तविक कारोबारी अवसर पैदा करने का है।
भारत के रक्षा उद्योग संगठन सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैनुफैक्चर्स (एसआईडीएम) और बेल्जियम के बेल्जियन सिक्योरिटी एंड डिफेंस इंडस्ट्री (बीएसडीआई) के बीच भी सहयोग समझौता किया जाएगा।
इसका उद्देश्य दोनों देशों की रक्षा कंपनियों को भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत संयुक्त विकास और उत्पादन परियोजनाओं में भाग लेने का रास्ता आसान करना है।
बेल्जियम का मानना है कि भारत जिस बड़े पैमाने पर अपनी सशस्त्र सेनाओं का आधुनिकीकरण कर रहा है, उससे उसकी कंपनियों के लिए लंबे समय के बड़े कारोबारी अवसर पैदा हो सकते हैं।
दोनों देशों के बीच सहयोग का एक बड़ा क्षेत्र ‘समुद्री सुरक्षा’ है। भारत अपनी नौसेना की माइन काउंटरमेजर्स क्षमता, स्वायत्त समुद्री प्रणालियों, अंडरवाटर रोबोटिक्स और अत्याधुनिक सेंसरों को मजबूत करना चाहता है।
बंदरगाहों, पाइपलाइनों और समुद्र के भीतर बिछी डेटा केबल जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी संरचनाओं की सुरक्षा भी सहयोग के दायरे में है।
इसके अलावा हथियार प्रणालियों, गोला-बारूद, रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम तथा काउंटर-ड्रोन तकनीक में भी बेल्जियम की कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
बेल्जियम की न्यू लाचौसे और भारत की टेंबो क्लासिक इंजीनियरिंग के बीच होने वाली परियोजना सबसे ठोस औद्योगिक समझौतों में से एक है।
इसके तहत दो प्रकार के गोला-बारूद के लिए पूरी उत्पादन लाइन और दो अन्य कैलिबर के लिए उपकरण उपलब्ध कराए जाएंगे। प्रस्तावित संयंत्र की क्षमता करीब 10 करोड़ राउंड प्रति वर्ष होगी।
परियोजना का अनुमानित मूल्य 5 करोड़ यूरो है और इसकी डिलीवरी 2028 तथा 2029 में निर्धारित की गई है। इसके बाद मशीनरी के रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और आधुनिकीकरण में भी बेल्जियम की कंपनी की भूमिका बनी रहेगी।
इसके अलावा दो कंपनियों के बीच हुए सहयोग के तहत बेल्जियम के 70 मिमी रॉकेट अब भारत में भी असेंबल किए जाएंगे। भारतीय कंपनियां इसकी उत्पादन प्रक्रिया में भाग लेंगी। भारत में पूरी तरह निर्मित पहला रॉकेट 2027 की शुरुआत में तैयार होने की उम्मीद है।
एक्सैल बेल्जियम और लार्सन एंड टुब्रो के बीच सहयोग भी बेहद महत्वपूर्ण है। एलएंडटी भारत के लिए माइन काउंटरमेजर वेसल बना रही है, जबकि एक्सैल इन जहाजों के लिए समुद्री बारूदी सुरंगों को खोजने, पहचानने और निष्क्रिय करने वाली स्वायत्त प्रणालियां उपलब्ध कराएगी।
पहले चरण में 12 जहाजों का कार्यक्रम है, लेकिन भविष्य में यह संख्या 59 तक पहुंच सकती है।
बेल्जियम की एफएन हर्स्टल और कल्याणी स्ट्रेटजिक सिस्टम्स भारत में हथियार तथा काउंटर-ड्रोन प्रणालियों के संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं तलाशेंगी।
बेल्जियम की ओआईपी सेंसर सिस्टम्स और भारत की सरकारी कंपनी इंडिया ओप्टेल के बीच भी सहयोग जारी है।
ओआईपी पहले ही अर्जुन एमके-I टैंक के लिए 130 से अधिक साइट उपलब्ध करा चुकी है। अर्जुन एमके-II के लिए कंपनी ने नया फायर-कंट्रोल सिस्टम विकसित किया है, जो लेजर-गाइडेड मिसाइलों को लॉन्च करने में भी सक्षम है।
यह सहयोग भविष्य में भारतीय बख्तरबंद वाहनों के नए संस्करणों और अपग्रेड कार्यक्रमों तक बढ़ सकता है।
वहीं, भारत के हल्के टैंक जोरावर कार्यक्रम में भी बेल्जियम की जॉन कॉकेरिल डिफेंस महत्वपूर्ण भूमिका हासिल करने की कोशिश कर रही है। कंपनी जोरावर के लिए टरेट (टैंक या युद्धपोत पर लगी वह घूमने वाली संरचना जिसमें तोप या मशीन गन फिट होती है) उपलब्ध कराने की दावेदार है।
जोरावर को ऊंचाई वाले इलाकों में सैन्य अभियानों के लिए विकसित किया जा रहा है और इसका संबंध चीन से लगी भारत की सीमा पर सैन्य क्षमता बढ़ाने से भी है।
बेल्जियम की पिटागन भारत में अपनी मोबाइल बैरियर तकनीक के उत्पादन और बिक्री के लिए क्रिशना एलिड के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित कर रही है। इसमें पिटागन बेल्जिमय की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी।
कंपनी भारत को केवल घरेलू बाजार के लिए नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे बाजारों तक पहुंच बनाने के संभावित केंद्र के रूप में भी देख रही है।
इसी तरह ऑक्टेव और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (भेल) के बीच सहयोग भारत की वायु रक्षा प्रणालियों में पहले से मौजूद है। ऑक्टेव की तकनीक आकाश तीर, अरुधरा, आईपीएसएस और आईएसीसीएस जैसे कार्यक्रमों में इस्तेमाल हो रही है।
वहीं बेल्जियम और भारतीय कंपनियों के बीच समुद्री इंजन क्षेत्र में सहयोग की बातचीत चल रही है। भारतीय कंपनी पहला पूरी तरह भारत में विकसित 6 मेगावाट का समुद्री डीजल इंजन तैयार कर रही है।
भारत और बेल्जियम के बीच यह पहल ऐसे समय में हो रही है जब यूरोप और हिंद-प्रशांत दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
बेल्जियम के लिए भारत केवल एक बड़ा रक्षा बाजार नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार भी बन रहा है। वहीं भारत के लिए बेल्जियम के साथ सहयोग का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इससे अत्याधुनिक यूरोपीय तकनीक के साथ-साथ संयुक्त उत्पादन, तकनीकी हस्तांतरण और वैश्विक सप्लाई चेन में नए अवसर खुल सकते हैं।
फ्रांकेन के शब्दों में, दोनों देशों ने भरोसा कायम कर लिया है और अब उस भरोसे को “ठोस सहयोग” में बदलने का समय है।
महाराष्ट्र
नशा तस्कर और शराब निर्माता भाजपा के संरक्षण में, राज्य बन रहा उड़ता महाराष्ट्र : शिवसेना (यूबीटी)

महाराष्ट्र सरकार द्वारा 2029 तक राज्य को नशामुक्त बनाने के संकल्प के बाद शिवसेना के उद्धव बालासाहेब ठाकरे ने गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है।
ठाकरे खेमे ने पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में एक संपादकीय में इस महत्वाकांक्षी पहल को “पाखंडी” और “घटना-आधारित तमाशा” करार देते हुए सवाल उठाया कि एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बावजूद सत्तारूढ़ प्रशासन फलते-फूलते नशीले पदार्थों के व्यापार पर अंकुश लगाने में क्यों विफल रहा।
ठाकरे गुट ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी की सरकार 2014 से केंद्र में सत्ता में है जबकि देवेंद्र फडणवीस लगभग इतने ही समय से महाराष्ट्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। पार्टी ने नागरिकों से अपने कैलेंडर में 2029 की समय सीमा अंकित करने और समय सीमा समाप्त होने पर वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को जवाबदेह ठहराने का आग्रह किया।
संपादकीय में राज्य प्रशासन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए, जिसमें दावा किया गया कि अवैध मादक पदार्थों के व्यापार नेटवर्क, शराब निर्माता और तस्करी करने वाले आपूर्तिकर्ता स्पष्ट राजनीतिक संरक्षण के तहत काम करते हैं।
नासिक, पुणे और सतारा में अवैध विनिर्माण इकाइयों के पूर्व भंडाफोड़ का हवाला देते हुए शिवसेना (यूबीटी) ने मुख्यमंत्री फडणवीस के नेतृत्व वाले राज्य गृह विभाग पर भूमि आवंटन और रासायनिक गोली कारखानों से संबंधित महत्वपूर्ण जांचों को दबाने का आरोप लगाया।
बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति का संपादकीय में चेतावनी दी गई है कि नासिक और पुणे जैसे क्षेत्र राज्य को “उड़ता महाराष्ट्र” में बदल रहे हैं। संपादकीय में मादक पदार्थों के बढ़ते दुरुपयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे स्थानीय नागरिकों का कथित तौर पर मजाक उड़ाने के लिए भाजपा नेताओं की निंदा भी की गई है।
संपादकीय में कहा गया कि भाजपा एक बेहद पाखंडी और प्रचार-प्रसार की भूखी पार्टी है। वर्तमान में महाराष्ट्र में सभी नशीले पदार्थों के तस्कर, शराब निर्माता, सिगार और सिगरेट विक्रेता तथा भांग-गांजा बेचने वाले भाजपा के संरक्षण में हैं। भाजपा की राजनीति का पहिया इसी नशीले पदार्थों के व्यापार पर घूमता है, फिर भी यही लोग महाराष्ट्र को ‘नशामुक्त’ बनाने का बीड़ा उठा रहे हैं।
शराब उत्पादन करने वाले कई शुगर मिलों के मालिक भाजपा के खेमे में शरण ले चुके हैं। इसमें यह सवाल उठाया गया कि क्या मुख्यमंत्री फडणवीस इन “शराब व्यापारियों” को कड़ी चेतावनी देने का साहस करेंगे या चुनाव प्रचार के उद्देश्य को कमजोर करने के लिए शराब के वर्गीकरण को फिर से परिभाषित करने का प्रयास करेंगे।
सामना में आगे कहा कि राज्य में नशाखोरी केवल चरस, गांजा और भूरी चीनी जैसे अवैध पदार्थों तक ही सीमित नहीं है। नशा और मदहोशी केवल नशीले पदार्थों से ही नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और धन से भी उत्पन्न होती है और महाराष्ट्र को इस नशे से भी मुक्त करना होगा।
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