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Tuesday,15-September-2026
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राजनीति

मैनपुरी में अखिलेश यादव कर रहे बड़ी चुनौती का सामना

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समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के निधन के एक महीने के भीतर ही पार्टी में अशांति और परिवार में बेचैनी बढ़ रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को उनके पिता मुलायत सिंह यादव के निधन से खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव के रूप में एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि मैनपुरी लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी के साथ-साथ परिवार के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 1989 से समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक रही है।

5 दिसंबर को मैनपुरी सीट पर होने वाले उपचुनाव में उम्मीदवार तय करना अखिलेश यादव के लिए एक बड़ी चुनौती है। क्योंकि उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव ने कुछ महीने पहले घोषणा की थी कि अगर मुलायम सिंह चुनाव नहीं लड़े तो वह 2024 में मैनपुरी सीट से चुनाव लड़ेंगे।

एक वरिष्ठ नेता ने कहा शिवपाल यादव इस सीट पर किसी बाहरी व्यक्ति को स्वीकार नहीं कर सकते और अखिलेश के लिए इस समय परिवार और पार्टी को एकजुट रखना महत्वपूर्ण है-खासकर हाल ही में लखीमपुर खीरी में हार के बाद।

अखिलेश पर मैनपुरी में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने का भी दबाव है क्योंकि समाजवादी पार्टी की बागडोर संभालने के बाद से उनको लगातार हार का सामना करना पड़ा है।

अखिलेश के नेतृत्व में पार्टी 2017 का विधानसभा चुनाव, 2019 का लोकसभा चुनाव और फिर 2022 का विधानसभा चुनाव हार गई।

2022 के विधानसभा चुनावों के बाद सपा को आजमगढ़ और रामपुर व अब लखीमपुर उपचुनाव में अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा है।

मैनपुरी और रामपुर में एक और हार पार्टी और परिवार में अखिलेश के लिए समस्या पैदा कर सकती है।

पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक माना जा रहा है कि तेज प्रताप यादव पार्टी का उम्मीदवार हो सकते हैं, जिन्होंने 2014 के उपचुनाव में मैनपुरी सीट जीती थी।

तेज प्रताप यादव मुलायम के भतीजे हैं और उनके करीबी रहे हैं। मुलायम ने राजनीति में तेज प्रताप का मार्गदर्शन किया और तेज प्रताप ने महत्वपूर्ण मामलों पर हमेशा उनसे सलाह ली।

तेज प्रताप राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के दामाद हैं और 2019 में मैनपुरी सीट से मुलायम सिंह के चुनाव जीतने के बाद से ही तैयारी कर रहे हैं।

मुलायम सिंह के सबसे बड़े भाई के पोते तेजप्रताप, मुलायम के दो साल से अस्वस्थ होने के कारण उनके निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि थे।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, तेज प्रताप मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र के लोगों से बहुत घुलेमिले हुए हैं और संभवत: वही सपा की पसंद हैं।

इसके अलावा तेज प्रताप शिवपाल के भी उतने ही करीबी हैं और पारिवारिक सूत्रों ने कहा कि अगर तेज प्रताप को पार्टी का उम्मीदवार बनाया जाता है, तो शिवपाल उन्हें उपचुनाव में चुनौती नहीं देंगे।

पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि मुलायम सिंह की अनुपस्थिति में उनके छोटे भाई अभय राम, जो परिवार को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं, ने सुझाव दिया है कि तेज प्रताप को मैनपुरी से चुनाव लड़ना चाहिए। इससे अखिलेश और शिवपाल के बीच कोई और टकराव नहीं होगा।

राष्ट्रीय समाचार

ब्रिक्स 2026 की सफलता भारत की वैश्विक कूटनीतिक ताकत का प्रमाण : एस जयशंकर

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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ब्रिक्स शिखर सम्मलेन के सफल आयोजन पर कहा कि पूरे देश और दुनिया ने ब्रिक्स सम्मेलन 2026 की सफलता देखी। इस सम्मेलन में कुल 32 प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया, जिनमें 11 सदस्य देशों, 10 साझेदार देशों, 4 क्षेत्रीय संगठनों और 7 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।

उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की मजबूत वैश्विक भूमिका रही। सम्मेलन में अधिकांश देशों का प्रतिनिधित्व राष्ट्राध्यक्षों या सरकार प्रमुखों के स्तर पर हुआ। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद, यूएई के क्राउन प्रिंस और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी समेत कई बड़े नेता इसमें शामिल हुए।

इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ-साथ विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुखों ने भी भाग लिया। सम्मेलन के दौरान इन नेताओं और प्रधानमंत्री मोदी के बीच बेहतर तालमेल और आत्मीय संबंध भी देखने को मिले।

विदेश मंत्री ने कहा कि यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ, जब दुनिया कई राजनीतिक और भू-राजनीतिक मतभेदों तथा बड़े संघर्षों का सामना कर रही है। इसके बावजूद ब्रिक्स देशों ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनाने में सफलता हासिल की। विशेष रूप से पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के संघर्ष को लेकर सदस्य देशों ने शांति, सुरक्षा, स्थिरता और दीर्घकालिक समाधान का समर्थन किया। साथ ही वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखला और ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने तथा आम नागरिकों और नागरिक ढांचे की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया।

एस. जयशंकर ने कहा कि सम्मेलन केवल मतभेदों को दूर करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने विभिन्न देशों के नेताओं को खुलकर बातचीत करने का अवसर भी दिया। कई ऐसे नेता, जो सामान्य परिस्थितियों में शायद एक-दूसरे से मुलाकात नहीं कर पाते, वे इस मंच पर साथ आए और महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की। इससे दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों पर सकारात्मक संवाद को बढ़ावा मिला।

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का एक प्रमुख फोकस वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास, तकनीक और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत बनाना था। सम्मेलन से यह स्पष्ट संदेश गया कि विकासशील देशों की चिंताओं और जरूरतों को वैश्विक मंचों पर अधिक महत्व मिलना चाहिए। सम्मेलन के दो प्रमुख विषय “सुधार” और “लचीलापन” रहे। इन्हीं विषयों ने सदस्य देशों को एकजुट करने और विभिन्न मुद्दों पर सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर भी ब्रिक्स देशों के बीच मजबूत सहमति देखने को मिली। सदस्य देशों ने स्पष्ट कहा कि आतंकवाद का कोई भी कृत्य अपराध है। उन्होंने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले को अस्वीकार्य बताते हुए उसकी निंदा की। साथ ही आतंकवाद के सभी रूपों, विशेषकर सीमा पार आतंकवाद, के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाने और दोहरे मापदंडों को खारिज करने पर जोर दिया।

विदेश मंत्री ने कहा कि यह पूरा सम्मेलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “संवाद, कूटनीति और विकास” के संदेश को प्रतिबिंबित करता है। दुनियाभर के नेताओं की सक्रिय भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि यह संदेश वैश्विक स्तर पर प्रभावी रहा। उन्होंने कहा कि कई लोगों को संदेह था कि ऐसा सम्मेलन सफलतापूर्वक आयोजित हो पाएगा या नहीं, लेकिन यह नई दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने एक बार फिर अपनी वैश्विक कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

अमेरिकी महंगाई बढ़ने से फेड की ब्याज दर बढ़ाने की आशंका तेज होने से सोने की कीमतों में आई गिरावट

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अमेरिका में उम्मीद से अधिक महंगाई के आंकड़े आने के बाद वैश्विक बाजारों में सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव देखने को मिला है। निवेशकों को अब इस सप्ताह अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना अधिक नजर आ रही है, जिसके चलते सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने में बिकवाली बढ़ी है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड करीब 4,340 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार करता दिखा, जो दिनभर में लगभग 0.2 प्रतिशत की गिरावट दर्शाता है। पिछले सप्ताह के दौरान सोने की कीमतों में कुल मिलाकर 1.8 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई। वहीं चांदी लगभग 0.8 प्रतिशत गिरकर 64 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर आ गई। प्लैटिनम और पैलेडियम की कीमतों में भी नरमी देखी गई।

घरेलू बाजार में गणेश चतुर्थी के अवसर पर सोमवार को एमसीएक्स के सोना और चांदी वायदा बाजार का सुबह का सत्र बंद रहा। कारोबार केवल शाम के सत्र में शाम 5 बजे से रात 11:30 बजे तक होगा।

एमसीएक्स पर अक्टूबर डिलीवरी वाला सोना वायदा 1,52,655 रुपए प्रति 10 ग्राम के आसपास और सितंबर डिलीवरी वाली चांदी 2,34,886 रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर पर रही।

शुक्रवार को जारी अमेरिकी आंकड़ों के अनुसार, खाद्य और ऊर्जा कीमतों को छोड़कर मापी जाने वाली कोर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई अगस्त में मासिक आधार पर 0.3 प्रतिशत बढ़ी। यह बाजार की अपेक्षाओं से अधिक रही और इससे यह संकेत मिला कि महंगाई पर अभी भी पूरी तरह नियंत्रण नहीं पाया जा सका है।

इसी कारण बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को और बढ़ा सकता है। कारोबारी अब सितंबर बैठक में करीब 88 प्रतिशत की संभावना देख रहे हैं कि फेड ब्याज दरों में वृद्धि करेगा। ऊंची ब्याज दरें आमतौर पर सोने जैसी बिना ब्याज देने वाली परिसंपत्तियों के लिए नकारात्मक मानी जाती हैं।

इस बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री आपूर्ति मार्गों पर जोखिम के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भी तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है, जबकि तेल आपूर्ति से जुड़े जोखिमों ने ऊर्जा महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

हौथी बलों ने यमन में महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया है, जो उस महत्वपूर्ण तटीय रेखा से सटे हुए हैं जो दुनिया के समुद्री तेल व्यापार के एक बड़े हिस्से का आधार है।

रविवार को होर्मुज जलडमरूमध्य में ड्रोन हमलों और एक व्यापारिक पोत पर हमले के बाद सऊदी अरब ने अपनी पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है, ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हो गई और तीन घायल हो गए।

विश्लेषकों का कहना है कि तेल की ऊंची कीमतें वैश्विक महंगाई को बढ़ा सकती हैं, जिससे केंद्रीय बैंकों पर सख्त मौद्रिक नीति बनाए रखने का दबाव बढ़ेगा। इसी वजह से निवेशकों ने सोने और चांदी में नई खरीदारी से फिलहाल दूरी बनाई है।

आने वाले दिनों में निवेशकों की निगाहें पूरी तरह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति बैठक और उसके ब्याज दर संबंधी निर्णय पर टिकी रहेंगी। यदि फेड अपेक्षा के अनुरूप दरें बढ़ाता है और आगे भी सख्त रुख के संकेत देता है, तो सोने और चांदी पर दबाव जारी रह सकता है।

हालांकि दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता अभी भी कीमती धातुओं को सुरक्षित निवेश के रूप में कुछ समर्थन दे सकती है। ऐसे में आने वाले सप्ताह में सोने और चांदी की दिशा मुख्य रूप से फेड के फैसले और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

ईरान की चेतावनी के बाद भी होर्मुज में तैनाती पर व‍िचार कर रहा दक्षिण कोरिया, अमेर‍िका के साथ करेगा रक्षा वार्ता

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दक्षिण कोरिया और अमेरिका इस सप्ताह अपने वरिष्ठ अधिकारियों के बीच नियमित रक्षा वार्ता करने जा रहे हैं। दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय ने सोमवार को यह जानकारी दी। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब सोल, होर्मुज स्‍ट्रेट में सैन्य तैनाती के विकल्प पर विचार कर रहा है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, कोरिया-अमेरिका इंटीग्रेटेड डिफेंस डायलॉग (केआईडीडी) की द्विवार्षिक बैठक बुधवार से शुक्रवार तक दक्षिण-पूर्वी बंदरगाह शहर बुसान में आयोजित की जाएगी।

इन वार्ताओं का नेतृत्व दक्षिण कोरिया के उप रक्षा मंत्री (नीति) किम होंग-चोल और अमेरिका के पूर्वी एशिया मामलों के उप सहायक रक्षा सचिव जॉर्ज लेमूर करेंगे। इनके साथ रक्षा और विदेश मामलों के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में शामिल होंगे।

मंत्रालय ने कहा कि बैठक में कई महत्वपूर्ण सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। इनमें युद्धकालीन सैन्य संचालन का नियंत्रण (ओपीकॉन) वापस हासिल करना, दोनों देशों की संयुक्त रक्षा व्यवस्था और जहाज निर्माण क्षेत्र में सहयोग जैसे विषय शामिल हैं।

हालांकि दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की है, लेकिन माना जा रहा है कि बैठक में होर्मुज स्‍ट्रेट में दक्षिण कोरियाई सेना की संभावित तैनाती पर भी चर्चा हो सकती है। अमेरिका काफी समय से दक्षिण कोरिया पर इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा के प्रयासों में शामिल होने का दबाव बना रहा है।

पिछले सप्ताह दक्षिण कोरिया ने होर्मुज स्‍ट्रेट के आसपास की सुरक्षा स्थिति का आकलन करने के लिए एक टीम संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भेजी थी।

इस कदम के बाद अटकलें लगने लगीं कि दक्षिण कोरिया वास्तव में वहां सैन्य बल भेजने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि सरकार ने साफ किया है कि इस मामले में अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

दूसरी ओर, ईरान पहले ही सार्वजनिक रूप से चेतावनी दे चुका है कि अगर उस क्षेत्र में किसी प्रकार की सैन्य तैनाती की जाती है, तो इसके ‘गंभीर परिणाम’ हो सकते हैं।

इस सप्ताह की बैठक में एक और अहम मुद्दा युद्धकालीन सैन्य नियंत्रण (ओपीकॉन) का होगा। दक्षिण कोरिया चाहता है कि अमेरिका से यह अधिकार वापस लेकर वह अपनी सेना का पूर्ण नियंत्रण हासिल करे।

सोल की कोशिश है कि राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के 2030 में समाप्त होने वाले पांच वर्षीय कार्यकाल से पहले, या संभव हो तो अगले साल ही, यह प्रक्रिया पूरी हो जाए।

दक्षिण कोरिया चाहता है कि संयुक्त सैन्य बलों की ‘पूर्ण परिचालन क्षमता’ के सत्यापन के दूसरे चरण को पूरा किया जाए और इस साल शरद ऋतु में होने वाली रक्षा प्रमुखों की बैठक में ओपीकॉन हस्तांतरण का लक्ष्य वर्ष घोषित किया जाए।

केआईडीडी की शुरुआत 2011 में हुई थी। यह दोनों सहयोगी देशों के बीच वरिष्ठ स्तर की एक व्यापक रक्षा वार्ता है।

इस साल यह दूसरी केआईडीडी बैठक होगी। इससे पहले मई में इसका पिछला सत्र वॉशिंगटन में आयोजित किया गया था।

इस बार की बैठक पहली बार सोल या वॉशिंगटन के बाहर आयोजित की जा रही है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, बुसान को चुनने का उद्देश्य जहाज निर्माण के क्षेत्र में दोनों देशों के बढ़ते सहयोग और उसकी प्रतिबद्धता को दिखाना है।

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