राजनीति
लाल कृष्ण आडवाणी के जन्मदिन पर पीएम मोदी, राजनाथ सिंह ने दी बधाई
भाजपा के वरिष्ठ नेता एल.के. आडवाणी के 95वें जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें शुभकामनाएं दी। राजनाथ सिंह ने ट्विटर पर यात्रा की तस्वीरें पोस्ट कीं और कहा कि भाजपा के दिग्गज को भारतीय राजनीति के सबसे ऊंचे शख्सियतों में गिना जाता है।
उन्होंने कहा, उन्होंने देश, समाज और पार्टी की विकास यात्रा में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य और लंबे जीवन की कामना करता हूं।
कई अन्य मंत्रियों और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने भी बधाई दी।
ट्विटर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि आडवाणी ने अपनी निरंतर कड़ी मेहनत से पूरे देश में संगठन को मजबूत किया और जब वे सरकार में थे, तो दिग्गज राजनीतिक ने भी देश के विकास में अमूल्य योगदान दिया।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीताराम ने भी एक ट्वीट में कहा, लालकृष्ण आडवाणी जी ने काले धन के खिलाफ की गई जन चेतना यात्रा के प्रभाव को याद करें.. इस प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शासन में पारदर्शिता लाने के लिए कई कदम उठाए हैं।
अपने अभिवादन में, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि आडवाणी के देश के लिए कई योगदान और सेवाएं हमें हमेशा प्रेरित करती रहेंगी।
आडवाणी को राजनीति का शिखर और मार्गदर्शक बताते हुए, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि उनका राष्ट्र और संगठन के प्रति समर्पण हमारे लिए एक प्रेरणा है।
आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को कराची में हुआ था। वह दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भाजपा के संस्थापक सदस्य हैं।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
संयुक्त राष्ट्र महासभा: नेपाल ने भारत-चीन के साथ ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ बनाने का रखा प्रस्ताव

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु से जुड़े खतरों से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने के मकसद से नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ बनाने का प्रस्ताव रखा है।
शाह का यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के पहाड़ी इलाकों में कई बस्तियों को बहा दिया था। बाढ़ की भयावहता को देखते हुए कई लोगों ने इसे ‘माउंटेन सुनामी’ या ‘हिमालयन सुनामी’ तक बताया।
नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के मुताबिक, गुरुवार शाम तक इस बाढ़ में 1,453 लोगों की मौत हो चुकी थी जबकि 5,550 लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में 636 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। विशेषज्ञों ने इस आपदा को जलवायु परिवर्तन से जुड़ा बताया है।
शाह ने कहा कि नेपाल, भारत और चीन की यह साझा व्यवस्था सैटेलाइट डेटा और तकनीकी जानकारी साझा करने, खतरनाक ग्लेशियल झीलों पर नजर रखने और क्षेत्रीय स्तर पर समय रहते चेतावनी देने वाले सिस्टम को मजबूत करने पर काम करेगी।
उन्होंने कहा, “आइए, खतरनाक ग्लेशियर झीलों पर नजर रखें। मिलकर चेतावनी देने वाले सिस्टम को मजबूत करें। और जब कोई आपदा आए, तो सीमाओं के पार भी आपसी तालमेल से मदद पहुंचाएं।”
शाह ने कहा कि हिमालय को ऐसी जगह बनना चाहिए, जहां देश एक-दूसरे से अलग-अलग जानकारी रखने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए मिलकर काम करें।
उन्होंने कहा कि हिमालय को बंटी हुई जानकारी की सीमा बनाने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला बनने दें। नेपाल की ओर से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि देश ने अपने करीब आधे क्षेत्र में वन क्षेत्र को फिर से बहाल किया है।
उन्होंने कहा कि नेपाल अपनी हाइड्रोपावर यानी पनबिजली उत्पादन क्षमता भी बढ़ा रहा है, ताकि साफ ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सके और विदेशों में जीवाश्म ईंधन से बनने वाली ऊर्जा की जगह स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा सके।
शाह ने कहा, “हम इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दे रहे हैं और इन्हें अपनाने की हमारी दर यूरोप के कुछ हिस्सों के बराबर है। हम स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने की तैयारी मजबूत कर रहे हैं और आगे भी ज्यादा काम करेंगे, ताकि लगातार ज्यादा गंभीर और बार-बार आने वाली जलवायु आपदाओं का सामना कर सकें।”
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन में नेपाल का योगदान बेहद कम है। उनके मुताबिक, दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में हिमालयी देश नेपाल की हिस्सेदारी 0.1 प्रतिशत से भी कम है।
शाह ने कहा कि हमने यह संकट पैदा नहीं किया लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत हम चुका रहे हैं। हमारे ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, पहाड़ी ढलान अस्थिर हो रहे हैं, हमारी नदियों के व्यवहार का अंदाजा लगाना मुश्किल होता जा रहा है और हर बड़ी आपदा वर्षों में हुए विकास को मिटाने का खतरा पैदा करती है।
उन्होंने कहा कि नेपाल के लिए जलवायु से जुड़ी ऐसी आपदाएं सिर्फ मानवीय संकट नहीं हैं बल्कि देश के विकास के लिए भी बड़ी चुनौती हैं। यह सड़कें, पुल, स्कूल, घर, खेत और लोगों की रोजी-रोटी बर्बाद कर देती है। यह साफ ऊर्जा से जुड़े उस बुनियादी ढांचे को भी नष्ट करती है, जिसकी हमें अपने भविष्य के लिए जरूरत है। और फिर एक गरीब देश को उस नुकसान की मरम्मत के लिए कर्ज लेना पड़ता है, जिसे उसने खुद पैदा नहीं किया।
शाह ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था की कमजोरियों की वजह से और गंभीर हो रहे जलवायु संकट का मुकाबला करने के लिए नेपाल अकेले अपने दम पर पर्याप्त तैयारी नहीं कर सकता।
उन्होंने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्रों में बाढ़ से हुई भारी तबाही का भी जिक्र किया। बाढ़ कई बस्तियों, पुलों और सड़कों को बहा ले गई और स्कूलों, घरों तथा लोगों की रोजी-रोटी को नुकसान पहुंचा। इस आपदा से उबरने में नेपाल की मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एकजुट होकर सहयोग करने की अपील की।
नेशनल प्लानिंग कमीशन और नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी की संयुक्त तकनीकी टीम की ओर से तैयार ‘रैपिड डिजास्टर नीड्स असेसमेंट'(आरडीएनए) की रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया बाढ़ से करीब 2.69 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित बुनियादी ढांचे और दूसरी संपत्तियों के पुनर्निर्माण और हालात सामान्य करने के लिए करीब 4.77 अरब डॉलर की जरूरत होगी। यह रकम नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब 10 प्रतिशत के बराबर है।
प्रधानमंत्री शाह ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा कि जलवायु आपदाओं के बाद सिर्फ राहत और पुनर्निर्माण पर ध्यान देना काफी नहीं है। उनके मुताबिक, जिम्मेदारी, नुकसान की भरपाई और भविष्य की आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस महासभा को छह शब्दों पर ध्यान देना चाहिए राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण और साथ ही जिम्मेदारी, नुकसान की भरपाई और मुश्किल हालात से निपटने की क्षमता।
शाह के मुताबिक, पहली तीन चीजें किसी आपदा के तुरंत बाद जरूरी होती हैं, जबकि बाद की तीन चीजें इसलिए जरूरी हैं, ताकि कमजोर देशों के लिए आपदाएं हमेशा बनी रहने वाली समस्या न बन जाएं।
उन्होंने जलवायु संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित विकासशील देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग्रांट यानी ऐसी आर्थिक मदद बढ़ाने की मांग की, जिसे कर्ज की तरह वापस न करना पड़े।
प्रधानमंत्री शाह ने आपदाओं से निपटने की क्षमता मजबूत करने के लिए ज्यादा फंड देने और बीमा व नई तकनीकों में निवेश करने की अपील की। उन्होंने जलवायु संकट से निपटने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा और संस्थाएं बनाने की जरूरत भी बताई। साथ ही उन्होंने कार्बन उत्सर्जन कम करने पर जोर दिया।
राष्ट्रीय समाचार
भारत और जापान ने वन प्रबंधन क्षमता को मजबूत करने के लिए शुरू किया प्रोजेक्ट

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने शुक्रवार को जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) के सहयोग से मंत्रालय द्वारा आयोजित “प्रभावी वन प्रबंधन प्रोजेक्ट के लिए क्षमता वृद्धि” पर एक वर्कशॉप का उद्घाटन किया।
2025-26 से 2031-32 तक लागू होने वाले इस प्रोजेक्ट का मकसद वन और वन्यजीव प्रबंधन की बदलती जरूरतों, जलवायु चुनौतियों और पर्यावरण से जुड़ी नई चिंताओं से निपटने के लिए फ्रंटलाइन वन कर्मियों की क्षमता को बढ़ाना है।वर्कशॉप को संबोधित करते हुए यादव ने कहा कि जलवायु कार्रवाई, जैव विविधता संरक्षण और वनों पर निर्भर समुदायों की आजीविका के लिए जंगल बहुत ज़रूरी हैं। उन्होंने वन कर्मियों की तकनीकी और फील्ड-लेवल क्षमताओं को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया, खासकर जंगल की आग के प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में।
मंत्री ने क्षेत्र-विशिष्ट ट्रेनिंग मॉड्यूल की मांग की, जिनमें पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक तरीकों और आधुनिक तकनीकों का मेल हो। उन्होंने रिसर्च और डेवलपमेंट, पायलट प्रोजेक्ट और वानिकी ट्रेनिंग संस्थानों को मज़बूत करने को भी इस पहल के अहम हिस्से बताया। जेआईसीए इंडिया के सीनियर प्रतिनिधि ईजी वाकामात्सु ने कहा कि यह प्रोजेक्ट वैश्विक चुनौतियों के समाधान विकसित करने के लिए भारतीय और जापानी रिसर्च संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देगा। उन्होंने कहा कि भारत के साथ जेआईसीए की वानिकी साझेदारी लगभग तीन दशकों से चल रही है और इससे सात लाख से ज्यादा लोगों को फायदा हुआ है।
प्रोजेक्ट का दूसरा चरण लकड़ी के ट्रांसफॉर्मेशन और आजीविका पैदा करने, बेहतर वन प्रबंधन के लिए डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और मिलकर किए जाने वाले एकेडमिक रिसर्च पर केंद्रित होगा। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एडीजी (वन्यजीव) रमेश पांडे के अनुसार, इस प्रोजेक्ट का कुल बजट 537.10 करोड़ रुपये है, जिसमें जेआईसीए से 440.42 करोड़ रुपये और भारत सरकार से 96.68 करोड़ रुपये शामिल हैं। यह प्रोजेक्ट सभी राज्यों को कवर करेगा, जिसमें नए भाग लेने वाले राज्यों को प्राथमिकता दी जाएगी।
मंत्री भूपेंद्र यादव ने एक्स पर पोस्ट में कहा, “दिल्ली में जेआईसीए की मदद से चल रहे ‘कैपेसिटी एनहांसमेंट फॉर इफेक्टिव फॉरेस्ट मैनेजमेंट’ (प्रभावी वन प्रबंधन के लिए क्षमता वृद्धि) प्रोजेक्ट की लॉन्च वर्कशॉप को संबोधित किया। इस बात पर ज़ोर दिया कि फ्रंट-लाइन कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाना सिर्फ़ समय-समय पर क्लासरूम में दी जाने वाली ट्रेनिंग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वे फील्ड में वैज्ञानिक जानकारी, नई टेक्नोलॉजी और व्यावहारिक कौशल का इस्तेमाल कर सकें। साथ ही, स्थानीय समुदायों व अन्य संबंधित लोगों के साथ मिलकर काम करने की अपनी क्षमता को भी मजबूत कर सकें।”
उन्होंने कहा, “यह प्रोजेक्ट वन क्षेत्र में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए ) के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग में एक और अहम पड़ाव है।”
राष्ट्रीय समाचार
आने वाले वर्षों में चालू खाता घाटा और एफटीए से पैदा हुए अवसरों से रुपया होगा मजबूत: आरबीआई डिप्टी गवर्नर

भारतीय रुपया 31 मार्च, 2025 से 16 सितंबर, 2026 तक संचयी रूप से 13.1 प्रतिशत (प्वाइंट-टू-प्वाइंट आधार पर) कमजोर हुआ है। ऐसे में भारतीय मुद्रा के मौजूदा स्तर से न केवल स्थिर होने, बल्कि मजबूत होने की भी पर्याप्त जगह है। यह बयान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने दिया।
उन्होंने कहा, “अगर कुछ कहा जाए तो ऐसा लगता है कि रुपए के मौजूदा स्तर से केवल स्थिर होने ही नहीं, बल्कि शायद मजबूत होने की भी पर्याप्त गुंजाइश है। जब पूंजी प्रवाह से जुड़े उपाय पहली बार घोषित किए गए थे, तब बाजार विश्लेषकों ने भी इसी तरह की उम्मीद जताई थी।”
उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में चालू खाते का घाटा (सीएडी) और कम होना चाहिए। इसकी वजह अर्थव्यवस्था की पारंपरिक मजबूती के साथ-साथ नई ताकतों का उभरना है, जिसमें वस्तुओं के निर्यात में बढ़ती सफलता भी शामिल है।
गुप्ता ने मुंबई में एसबीआई के एक सम्मेलन में कहा, “आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित परिस्थितियां सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और उसके पास कई दशकों के सीएडी या भुगतान संतुलन (बीओपी) के शुद्ध घाटे को पूरा करने की क्षमता है।”
भारत परंपरागत रूप से चालू खाते में मामूली घाटा और पूंजी खाते में बड़ा अधिशेष दर्ज करता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप भुगतान संतुलन (बीओपी) सकारात्मक रहा है।
जीडीपी के प्रतिशत के रूप में भारत का सीएडी समय के साथ कम हुआ है, जिससे भुगतान संतुलन को मजबूती मिली है।
गुप्ता ने विस्तार से बताया, “इसके अलावा, सीएडी का स्तर उन स्तरों से काफी नीचे रहा है, जिन्हें आमतौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए उचित माना जाता है। शुद्ध सेवा निर्यात और प्रेषण भारत की बड़ी संरचनात्मक ताकत बने हुए हैं। दोनों मिलकर इतने बड़े और मजबूत हैं कि वस्तुओं के व्यापार घाटे को संतुलित कर सकें और सीएडी को जीडीपी के 1 प्रतिशत से नीचे बनाए रख सकें।”
हाल में तेल और सोने की कीमतों में आए झटकों ने अस्थायी रूप से सीएडी को बढ़ा दिया है। इसके अलावा, पिछले दो वर्षों में पूंजी खाते का अधिशेष सीएडी से कम रहा है। इसके परिणामस्वरूप 2024-25 में करीब 5.0 अरब डॉलर और 2025-26 में 23.6 अरब डॉलर का नकारात्मक बीओपी दर्ज हुआ।
उन्होंने आगे कहा कि वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल और देश में अपने तेल भंडार खोजने के प्रयासों के चलते भारत की आयातित तेल पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है। इससे जीडीपी के प्रतिशत के रूप में तेल की मांग में लंबे समय से जारी गिरावट की प्रवृत्ति को और मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कहा, “यह उस स्थिति के अतिरिक्त होगा जब संघर्ष समाप्त होने के साथ ही तेल की कीमतें भी स्थिर हो जाएंगी। साथ ही हाल के मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के सकारात्मक प्रभाव सामने आने और अनुकूल विनिमय दर के साथ यह मजबूती आगे भी जारी रहेगी।”
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