राजनीति
राजनीतिक भूकंप की संभावना – उद्धव ठाकरे गुट और कांग्रेस में फूट?
मुंबई, प्रतिनिधी : महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल मचाने वाली खबर सामने आई है। शिवसेना शिंदे गुट के नेता और राज्य के उद्योगमंत्री उदय सामंत ने शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और कांग्रेस के नेताओं के बारे में बड़ा दावा किया है। उदय सामंत वर्तमान में दावोस दौरे पर हैं और उन्होंने वहीं से इस राजनैतिक गतिविधियों के बारे में जानकारी दी है।
क्या उद्धव ठाकरे गुट और कांग्रेस के नेता शिंदे के संपर्क में हैं ?
उदय सामंत के मुताबिक, उद्धव ठाकरे गुट के चार विधायक और तीन सांसद पिछले 15 दिनों में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से मिले हैं। इसके अलावा, कांग्रेस के पांच विधायक भी शिंदे के संपर्क में हैं। सामंत ने यह दावा किया है कि आगामी तीन महीनों में उद्धव ठाकरे गुट के दस पूर्व विधायक, कुछ जिलाध्यक्ष, और कांग्रेस के पूर्व विधायक और सांसद शिंदे गुट में शामिल होंगे।
शिवसेना में और फूट ?
यह खबर उद्धव ठाकरे गुट के लिए बड़ा झटका हो सकती है। पहले ही एकनाथ शिंदे के विद्रोह से शिवसेना (उद्धव गुट) को बड़ा नुकसान हुआ था। अगर और विधायक, सांसद और पदाधिकारी शिंदे गुट में शामिल होते हैं, तो उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है।
कांग्रेस में नाराजगी का फायदा ?
कांग्रेस के पांच विधायक भी शिंदे के संपर्क में होने के दावे से कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी और नाराजगी सामने आई है। अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से इस पर प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
दावोस दौरे से बड़ी घोषणा :
उदय सामंत ने बताया कि दावोस दौरे के पहले दिन ही महाराष्ट्र ने 5 लाख करोड़ रुपये की निवेश घोषणा की है। उन्होंने इसे महाराष्ट्र के लिए एक बड़ी आर्थिक अवसर बताया, लेकिन उनकी राजनैतिक टिप्पणी से इस दौरे की सफलता पर सवाल उठने की संभावना है।
राजनीतिक दूरगामी परिणाम :
उदय सामंत की इस टिप्पणी ने महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उद्धव ठाकरे गुट और कांग्रेस इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। आगामी स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनावों के संदर्भ में इन घटनाओं से राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव हो सकता है।
राष्ट्रीय समाचार
कमाल के कलाम : गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि वाले ‘मिसाइल मैन’, जिनके फैसलों ने सरकार को सोच में डाला

‘भारत रत्न’ से सम्मानित एपीजे अब्दुल कलाम को सिर्फ भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया एक महान वैज्ञानिक के तौर पर जानती है। इसमें कोई दोराय नहीं कि ‘मिसाइल मैन’ कहलाए अब्दुल कमाल के नेतृत्व में ही भारत एक परमाणु हथियार संपन्न देश बन पाया। हालांकि अब्दुल कमाल की भविष्य को देखने वाली उस ‘वैज्ञानिक’ सोच का जिक्र बहुत सीमित होता है, जब देश के राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने अपने फैसलों से सरकारों को भी हैरानी में डाल दिया था।
15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे एपीजे अब्दुल कलाम 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति बने। वे ऐसे राष्ट्रपति थे, जिनकी कोई राजनीतिक या कानूनी पृष्ठभूमि नहीं थी लेकिन उनके फैसले राष्ट्रहित में रहे। कलाम ने संवैधानिक प्रमुख के तौर पर, न सिर्फ राजनीति में काम करने का नया नजरिया पेश किया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि उनका गैर-राजनीतिक और गैर-कानूनी बैकग्राउंड असल में राष्ट्रपति भवन की पुरानी परंपराओं को तोड़ने में मददगार साबित हो सकता है। उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वे महज ‘रबर स्टैम्प’ जैसे संवैधानिक प्रमुख नहीं हैं।
उसी सोच को दर्शाता किस्सा यह है कि अनुच्छेद 111 का इस्तेमाल हुआ, जब उन्होंने ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल’ को दोबारा विचार के लिए संसद को लौटा दिया था। संविधान का अनुच्छेद 111, संसद की ओर से पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति की सहमति से संबंधित होता है। यह राष्ट्रपति के तौर एपीजे अब्दुल कलाम की ओर से 30 मई को इसके महत्व को समझने तक एक सामान्य प्रावधान बना रहा।
2006 में अलग-अलग पार्टियों के 43 सदस्यों को संसद से अयोग्य ठहराए जाने का डर था और राज्य विधानसभाओं के 200 अन्य सदस्यों पर भी यही खतरा मंडरा रहा था, इसलिए कानून मंत्री रहे एचआर भारद्वाज पर जल्दबाजी में बिल का मसौदा तैयार करने का सभी पार्टियों की ओर से दबाव था।
राष्ट्रपति को दी गई कई याचिकाओं के जरिए सत्ताधारी वर्ग के प्रभावशाली प्रतिनिधियों, जिनमें वाम मोर्चा के 11 सांसद भी शामिल थे, की विधायी सदस्यता को चुनौती दी गई थी। कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 103(2) के तहत इन मामलों को चुनाव आयोग को भेजने में काफी दिलचस्पी दिखाई थी। कई लेखों में इसका जिक्र मिलता है।
भारद्वाज ने ‘अयोग्यता निवारण अधिनियम 1959’ में संशोधन किया और बदले हुए बिल को संसद के पिछले सत्र में पास कर दिया गया। 25 मई को कलाम को यह बिल मिला लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों से चर्चा करने के बाद उन्होंने अपनी मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। यह राष्ट्रपति की ओर से शक्ति के स्वतंत्र प्रयोग की संवैधानिक मान्यता का एक दुर्लभ उदाहरण था।
यह भी सब जानते हैं कि एपीजे अब्दुल कमाल और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच रिश्ता बेहद गहरा था। हालांकि, वाजपेयी सरकार और एपीजे अब्दुल कलाम के बीच कुछ ऐसे प्रमुख ऐतिहासिक प्रसंग रहे, जब कलाम ने वाजपेयी के प्रस्ताव या सिफारिश को तुरंत स्वीकार नहीं किया था।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1998 में एनडीए सरकार में एपीजे अब्दुल कलाम को मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन कलाम ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इसके चार साल बाद 2002 में वे राष्ट्रपति बने। पूर्व राष्ट्रपति ने किताब ‘टर्निंग पॉइंट्स: ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज’ में इसका जिक्र किया था।
एक और किस्सा यह था कि फरवरी 2004 में लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले उसे भंग करने की तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सिफारिश को स्वीकार करना। बहुत कम लोग जानते थे कि कलाम ने उस सिफारिश को तुरंत स्वीकार नहीं किया था।
कुछ लेखों में जिक्र मिलता है कि एपीजे अब्दुल कलाम ने सिफारिश पर गहराई से सोचा, तत्कालीन अटॉर्नी-जनरल सोली सोराबजी से सलाह ली और फैसला लेने से पहले उन सभी दस्तावेजों को देखा, जिनमें सोराबजी की ओर से उन्हें भेजे गए राष्ट्रपति की शक्तियों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी शामिल थे। उनसे पहले किसी भी राष्ट्रपति ने इस जिम्मेदारी को उनसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया था।
राष्ट्रीय समाचार
भारतीय सेना ने 12वीं पास के लिए 90 पदों पर निकाली वैकेंसी, ऐसे करें अप्लाई, जानें सैलरी

भारतीय सेना में शामिल होकर देश सेवा की भावना रखने वाले युवाओं के लिए एक सुनहरा मौका सामने आया है। इंडियन आर्मी ने टेक्निकल एंट्री स्कीम (टीईएस-57) के तहत 90 (अस्थायी) पदों पर अविवाहित पुरुष उम्मीदवारों से आवेदन एक आधिकारिक अधिसूचना जारी करके आमंत्रित किए हैं।
इन सभी रिक्तियों के लिए ऑनलाइन माध्यम से आवेदन प्रक्रिया 14 अक्टूबर के दोपहर 12 बजे से शुरू हो गई है और अप्लाई करने की अंतिम तिथि 12 नवंबर तक तय की गई है। एप्लीकेशन फॉर्म भरने के इच्छुक उम्मीदवार ज्वाइन इंडियन आर्मी की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर तय अंतिम तिथि के दोपहर 12 बजे तक या उससे पहले अपनी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।
आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के पास किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड या संस्थान से फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स (पीसीएम) में कुल मिलाकर कम से कम 60 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं या उसके बराबर की परीक्षा पास की हो। इसके अलावा, कैंडिडेट्स का जेईई (मेंस) 2026 में शामिल होना जरूरी है।
आवेदकों की न्यूनतम आयु 16.5 वर्ष और अधिकतम आयु 19.5 वर्ष तय की गई है, जिसकी गणना 1 जुलाई 2027 के आधार पर की जाएगी।
योग्य अभ्यर्थियों का चयन आवेदनों की शॉर्टलिस्टिंग, एसएसबी इंटरव्यू, चिकित्सा परीक्षण और मेरिट सूची के आधार पर किया जाएगा, जिसके बाद चयनित कैंडिडेट्स को ट्रेनिंग के दौरान 56,100 रुपए प्रति माह स्टाइपेंड के तौर पर दिए जाएंगे। वहीं, लेफ्टिनेंट के पद पर परमानेंट होने के बाद उनकी शुरुआती सैलरी 56,100 से 177,500 रुपए के बीच होगी। इसके अलावा, कैंडिडेट्स को अन्य लाभ और भत्ते भी दिए जाएंगे।
कैंडिडेट्स ध्यान दें कि ये वैकेंसी प्रोविजनल हैं और इस कोर्स के लिए कैडेट ट्रेनिंग विंग्स (सीटीडब्ल्यू) में ट्रेनिंग की क्षमता के आधार पर इनमें बदलाव किया जा सकता है। उस समय संगठन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इन वैकेंसी की संख्या बढ़ाई या घटाई जा सकती है। वहीं, कोर्स के 4 वर्ष सफलतापूर्वक पूरे होने पर, कैडेट्स को सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर परमानेंट कमीशन दिया जाएगा।
अभ्यर्थियों को भर्ती, योग्यता, चयन प्रक्रिया, आदि से जुड़ी ज्यादा जानकारी के लिए भारतीय सेना की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर संबंधित पोस्ट के लिए जारी विस्तृत नोटिफिकेशन को चेक करने की सलाह दी जाती है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
जेलेंस्की का आरोप, ‘रूस ने उन ऊर्जा ठिकानों को भी बनाया निशाना जो सीजफायर के दायरे में’

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने दावा किया है कि रूस ने रातभर में 39 बैलिस्टिक मिसाइलों और 120 से अधिक हमलावर ड्रोन तथा लोइटरिंग म्यूनिशन से यूक्रेन के ऊर्जा और महत्वपूर्ण केंद्रों को निशाना बनाया। उन्होंने ‘एनर्जी ट्रूस’ को गंभीरता से न लेने का आरोप लगाते हुए कहा कि ये वही ऊर्जा केंद्र थे जो ट्रंप के सीजफायर घोषणा के दायरे में थे। जेलेंस्की के अनुसार, हमलों के कारण कम से कम छह लाख लोग बिजली से वंचित हो गए हैं।
जेलेंस्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन को अतिरिक्त पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर उपलब्ध कराने की अपील करते हुए कहा, “रूसी हमलों में कीव, कीव क्षेत्र और खार्किव के ऊर्जा एवं महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। ऊर्जा केंद्रों पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला जानबूझकर किया गया। यह वही बुनियादी ढांचा है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से घोषित युद्धविराम के दायरे में शामिल किया गया था।”
यूक्रेन के राष्ट्रपति ने माना कि हमलों का पैमाना ‘रूस की ओर से अमेरिका के प्रति खुले अनादर को दर्शाता है।’ उन्होंने आरोप लगाया कि रूस अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों को गंभीरता से नहीं ले रहा है।
यूक्रेनी राष्ट्रपति ने बताया कि हमलों से देश की बिजली व्यवस्था से जुड़े 26 केंद्रों और तेल एवं गैस क्षेत्र की चार सुविधाओं को काफी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने आशंका जताई कि बिजली कटौती का दायरा और बढ़ सकता है।
उन्होंने अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रूस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की अपील करते हुए कहा, “रूस ने तनाव कम करने का अवसर गंवा दिया है और युद्ध जारी रखने का रास्ता चुना है।”
हमेशा की तरह उन्होंने एक बार फिर रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया। उन्होंने अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम विधेयक का उल्लेख करते हुए कहा कि वह हाल में पारित होकर कानून बन चुका है और रूस के खिलाफ ऐसे कदमों को अधिकृत एवं विनियमित करता है।
यूक्रेनी राष्ट्रपति ने कहा, “अमेरिकी राष्ट्रपति के पास दबाव और ताकत के जरिए शांति की दिशा में आगे बढ़ने के प्रभावी साधन मौजूद हैं। अमेरिका, यूरोप और अन्य सहयोगी देशों से अपील है कि यूक्रेन को अतिरिक्त पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर दें।”
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