राष्ट्रीय समाचार
कमाल के कलाम : गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि वाले ‘मिसाइल मैन’, जिनके फैसलों ने सरकार को सोच में डाला
‘भारत रत्न’ से सम्मानित एपीजे अब्दुल कलाम को सिर्फ भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया एक महान वैज्ञानिक के तौर पर जानती है। इसमें कोई दोराय नहीं कि ‘मिसाइल मैन’ कहलाए अब्दुल कमाल के नेतृत्व में ही भारत एक परमाणु हथियार संपन्न देश बन पाया। हालांकि अब्दुल कमाल की भविष्य को देखने वाली उस ‘वैज्ञानिक’ सोच का जिक्र बहुत सीमित होता है, जब देश के राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने अपने फैसलों से सरकारों को भी हैरानी में डाल दिया था।
15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे एपीजे अब्दुल कलाम 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति बने। वे ऐसे राष्ट्रपति थे, जिनकी कोई राजनीतिक या कानूनी पृष्ठभूमि नहीं थी लेकिन उनके फैसले राष्ट्रहित में रहे। कलाम ने संवैधानिक प्रमुख के तौर पर, न सिर्फ राजनीति में काम करने का नया नजरिया पेश किया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि उनका गैर-राजनीतिक और गैर-कानूनी बैकग्राउंड असल में राष्ट्रपति भवन की पुरानी परंपराओं को तोड़ने में मददगार साबित हो सकता है। उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वे महज ‘रबर स्टैम्प’ जैसे संवैधानिक प्रमुख नहीं हैं।
उसी सोच को दर्शाता किस्सा यह है कि अनुच्छेद 111 का इस्तेमाल हुआ, जब उन्होंने ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल’ को दोबारा विचार के लिए संसद को लौटा दिया था। संविधान का अनुच्छेद 111, संसद की ओर से पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति की सहमति से संबंधित होता है। यह राष्ट्रपति के तौर एपीजे अब्दुल कलाम की ओर से 30 मई को इसके महत्व को समझने तक एक सामान्य प्रावधान बना रहा।
2006 में अलग-अलग पार्टियों के 43 सदस्यों को संसद से अयोग्य ठहराए जाने का डर था और राज्य विधानसभाओं के 200 अन्य सदस्यों पर भी यही खतरा मंडरा रहा था, इसलिए कानून मंत्री रहे एचआर भारद्वाज पर जल्दबाजी में बिल का मसौदा तैयार करने का सभी पार्टियों की ओर से दबाव था।
राष्ट्रपति को दी गई कई याचिकाओं के जरिए सत्ताधारी वर्ग के प्रभावशाली प्रतिनिधियों, जिनमें वाम मोर्चा के 11 सांसद भी शामिल थे, की विधायी सदस्यता को चुनौती दी गई थी। कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 103(2) के तहत इन मामलों को चुनाव आयोग को भेजने में काफी दिलचस्पी दिखाई थी। कई लेखों में इसका जिक्र मिलता है।
भारद्वाज ने ‘अयोग्यता निवारण अधिनियम 1959’ में संशोधन किया और बदले हुए बिल को संसद के पिछले सत्र में पास कर दिया गया। 25 मई को कलाम को यह बिल मिला लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों से चर्चा करने के बाद उन्होंने अपनी मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। यह राष्ट्रपति की ओर से शक्ति के स्वतंत्र प्रयोग की संवैधानिक मान्यता का एक दुर्लभ उदाहरण था।
यह भी सब जानते हैं कि एपीजे अब्दुल कमाल और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच रिश्ता बेहद गहरा था। हालांकि, वाजपेयी सरकार और एपीजे अब्दुल कलाम के बीच कुछ ऐसे प्रमुख ऐतिहासिक प्रसंग रहे, जब कलाम ने वाजपेयी के प्रस्ताव या सिफारिश को तुरंत स्वीकार नहीं किया था।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1998 में एनडीए सरकार में एपीजे अब्दुल कलाम को मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन कलाम ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इसके चार साल बाद 2002 में वे राष्ट्रपति बने। पूर्व राष्ट्रपति ने किताब ‘टर्निंग पॉइंट्स: ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज’ में इसका जिक्र किया था।
एक और किस्सा यह था कि फरवरी 2004 में लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले उसे भंग करने की तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सिफारिश को स्वीकार करना। बहुत कम लोग जानते थे कि कलाम ने उस सिफारिश को तुरंत स्वीकार नहीं किया था।
कुछ लेखों में जिक्र मिलता है कि एपीजे अब्दुल कलाम ने सिफारिश पर गहराई से सोचा, तत्कालीन अटॉर्नी-जनरल सोली सोराबजी से सलाह ली और फैसला लेने से पहले उन सभी दस्तावेजों को देखा, जिनमें सोराबजी की ओर से उन्हें भेजे गए राष्ट्रपति की शक्तियों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी शामिल थे। उनसे पहले किसी भी राष्ट्रपति ने इस जिम्मेदारी को उनसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया था।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
सऊदी अरब में भारतीयों की तादाद ठीक-ठाक, दूतावास कर रहा हरसंभव मदद : विदेश मंत्रालय

भारत ने सऊदी अरब पर हो रहे मिसाइल हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की है। विदेश मंत्रालय (एमईए) के मुताबिक नागरिक या सार्वजनिक ठिकानों को निशाना बनाना किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। बिगड़ते हालात के भारतीय दूतावास की तरफ से अपने नागरिकों को पहुंचाई जा रही हरसंभव मदद का भी उल्लेख किया।
बुधवार को पाक्षिक प्रेस ब्रीफिंग में एमईए प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रियाद अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर हुए हमले को लेकर कहा, “सऊदी अरब पर कई हमले हुए हैं। कल अरामको मुख्यालय पर भी हमला हुआ। हम सऊदी अरब में आम लोगों के बुनियादी ढांचे पर हुए ऐसे सभी हमलों की निंदा करते हैं। हमारा मानना है कि ये हमले तुरंत बंद होने चाहिए। ये बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं हैं। हम सऊदी अरब की संप्रभुता की रक्षा के लिए वहां की जनता और सरकार के साथ खड़े हैं, और हमें उम्मीद है कि इस इलाके में जल्द ही शांति और सामान्य स्थिति बहाल होगी।”
प्रवक्ता ने वहां रह रहे भारतीयों की मदद के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, “सऊदी अरब में हमारा दूतावास भारतीय समुदाय के लगातार संपर्क में है और उनकी भलाई के लिए एडवाइजरी जारी की है। हवाई अड्डों पर हमलों के कारण उड़ानों के शेड्यूल पर असर पड़ा है, जिससे भारतीय एयरलाइंस, खासकर रियाद, दम्मम, मदीना और जेद्दा से आने-जाने वाली उड़ानें प्रभावित हुई हैं। लेकिन कुछ सऊदी एयरलाइंस आ जा रही हैं। दूतावास यात्रियों और फंसे हुए लोगों को ताजा जानकारी दे रहा है। कह सकते हैं कि विकल्प तो हैं लेकिन साथ में दिक्कतें भी मौजूद हैं।”
हवाई अड्डे हमले में पीड़ितों, भारतीय प्रवासियों और धार्मिक यात्रा को लेकर पूछे सवाल पर जायसवाल ने कहा, “10 अक्टूबर के हमले में 12 लोग घायल हुए थे, जिनमें से एक की दुर्भाग्य से मौत हो गई। परिवार की इच्छानुसार, दूतावास की मदद से रियाद में उनका अंतिम संस्कार किया गया। बाकी 11 घायलों में से तीन को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है, जबकि आठ अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से चार आईसीयू में हैं। दूतावास के अधिकारी लगातार उनसे मिल रहे हैं और पीड़ित परिवारों के संपर्क में हैं। वहां भारतीय प्रवासियों और यात्रियों की संख्या ठीक-ठाक है और हम विदेश में अपने नागरिकों के कल्याण और सुरक्षा की खातिर हर संभव मदद करने को तत्पर हैं।”
राष्ट्रीय समाचार
तिरंगा फहराने पर गिरफ्तारी को लेकर ‘आप’ बोली- क्या अपने ही देश में झंडा फहराना अपराध है?

जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर निशाना साधा है। पार्टी ने दोनों नेताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने पर आपत्ति जताते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बताया। आप नेताओं ने मौजूदा परिस्थितियों की तुलना वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल से की और आरोप लगाया कि सरकार विरोध की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है।
आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया कि क्या अब अपने ही देश में तिरंगा फहराना भी अपराध हो गया है? उन्होंने सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी को हास्यास्पद बताते हुए इस कार्रवाई पर नाराजगी जताई। आप के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने सवाल किया कि क्या देश में अंग्रेजों का शासन चल रहा है, जो तिरंगा फहराने और भारत माता की जय के नारे लगाने पर युवाओं को जेल भेजा जा रहा है?
संजय सिंह के अनुसार, सीजेपी नेताओं सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्या शिंदे ने जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराया और भारत माता की जय के नारे लगाए थे। उन्होंने कहा कि देश के युवा आगे भी भारत माता की जय बोलेंगे और तिरंगा फहराएंगे। उन्होंने कहा कि सौरव दास और आशुतोष रांका को जेल भेजकर सरकार युवाओं की आवाज दबाने में सफल नहीं होगी। संजय सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि ऐसी कार्रवाइयों से लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों पर जनता की आवाज को रोका नहीं जा सकता।
आप के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने इस पूरे घटनाक्रम की तुलना वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल से की। उन्होंने कहा कि उस समय भी चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप, छात्र और मजदूर आंदोलन, आर्थिक संकट तथा राजनीतिक अस्थिरता जैसे मुद्दे चर्चा में थे। उनके मुताबिक, मौजूदा समय में भी चुनावी धांधली के आरोपों, युवाओं के आंदोलनों और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर असंतोष देखने को मिल रहा है।
सौरभ भारद्वाज ने दावा किया कि सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि विरोध करने वाले युवाओं के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई से लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ती हैं। उन्होंने आगे कहा कि 1975 के आपातकाल के दौरान राज नारायण और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं समेत कई लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।
भारद्वाज के अनुसार, मौजूदा समय में भी विपक्षी नेताओं और सरकार की आलोचना करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की आशंका बनी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार औपचारिक रूप से आपातकाल घोषित किए बिना भी ऐसे कदम उठा सकती है, जिनसे लोकतांत्रिक गतिविधियां प्रभावित हों। सौरभ भारद्वाज ने देश की आर्थिक स्थिति, विदेश नीति और भाजपा के आंतरिक राजनीतिक हालात को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा।
उन्होंने दावा किया कि देश आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और चीन की ओर से लद्दाख पर किए जा रहे दावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए। भारद्वाज ने भाजपा के भीतर नेतृत्व को लेकर कथित मतभेदों का भी जिक्र किया। तिरंगा फहराने के मामले में सीजेपी नेताओं की गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत को लेकर आम आदमी पार्टी ने इसे नागरिक अधिकारों तथा लोकतांत्रिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सरकार की आलोचना की है।
राष्ट्रीय समाचार
भारतीय सेना ने 12वीं पास के लिए 90 पदों पर निकाली वैकेंसी, ऐसे करें अप्लाई, जानें सैलरी

भारतीय सेना में शामिल होकर देश सेवा की भावना रखने वाले युवाओं के लिए एक सुनहरा मौका सामने आया है। इंडियन आर्मी ने टेक्निकल एंट्री स्कीम (टीईएस-57) के तहत 90 (अस्थायी) पदों पर अविवाहित पुरुष उम्मीदवारों से आवेदन एक आधिकारिक अधिसूचना जारी करके आमंत्रित किए हैं।
इन सभी रिक्तियों के लिए ऑनलाइन माध्यम से आवेदन प्रक्रिया 14 अक्टूबर के दोपहर 12 बजे से शुरू हो गई है और अप्लाई करने की अंतिम तिथि 12 नवंबर तक तय की गई है। एप्लीकेशन फॉर्म भरने के इच्छुक उम्मीदवार ज्वाइन इंडियन आर्मी की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर तय अंतिम तिथि के दोपहर 12 बजे तक या उससे पहले अपनी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।
आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के पास किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड या संस्थान से फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स (पीसीएम) में कुल मिलाकर कम से कम 60 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं या उसके बराबर की परीक्षा पास की हो। इसके अलावा, कैंडिडेट्स का जेईई (मेंस) 2026 में शामिल होना जरूरी है।
आवेदकों की न्यूनतम आयु 16.5 वर्ष और अधिकतम आयु 19.5 वर्ष तय की गई है, जिसकी गणना 1 जुलाई 2027 के आधार पर की जाएगी।
योग्य अभ्यर्थियों का चयन आवेदनों की शॉर्टलिस्टिंग, एसएसबी इंटरव्यू, चिकित्सा परीक्षण और मेरिट सूची के आधार पर किया जाएगा, जिसके बाद चयनित कैंडिडेट्स को ट्रेनिंग के दौरान 56,100 रुपए प्रति माह स्टाइपेंड के तौर पर दिए जाएंगे। वहीं, लेफ्टिनेंट के पद पर परमानेंट होने के बाद उनकी शुरुआती सैलरी 56,100 से 177,500 रुपए के बीच होगी। इसके अलावा, कैंडिडेट्स को अन्य लाभ और भत्ते भी दिए जाएंगे।
कैंडिडेट्स ध्यान दें कि ये वैकेंसी प्रोविजनल हैं और इस कोर्स के लिए कैडेट ट्रेनिंग विंग्स (सीटीडब्ल्यू) में ट्रेनिंग की क्षमता के आधार पर इनमें बदलाव किया जा सकता है। उस समय संगठन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इन वैकेंसी की संख्या बढ़ाई या घटाई जा सकती है। वहीं, कोर्स के 4 वर्ष सफलतापूर्वक पूरे होने पर, कैडेट्स को सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर परमानेंट कमीशन दिया जाएगा।
अभ्यर्थियों को भर्ती, योग्यता, चयन प्रक्रिया, आदि से जुड़ी ज्यादा जानकारी के लिए भारतीय सेना की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर संबंधित पोस्ट के लिए जारी विस्तृत नोटिफिकेशन को चेक करने की सलाह दी जाती है।
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