महाराष्ट्र
ईडी ने पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख को फिर पूछताछ के लिए तलब किया
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के वरिष्ठ नेता अनिल देशमुख को पद का दुरुपयोग और रिश्वत के आरोप के मामले में एकबार फिर नोटिस जारी किया है। घटनाक्रम से जुड़े ईडी के एक अधिकारी ने कहा, “हां, हमने देशमुख को पूछताछ के लिए समन भेजा है।”
मामले के सिलसिले में ईडी द्वारा एनसीपी नेता को यह पांचवां समन है।
ताजा समन सुप्रीम कोर्ट द्वारा देशमुख को अंतरिम राहत देने से इनकार करने के एक दिन बाद आया है, जिन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा मांगी थी।
देशमुख पर कथित तौर पर मनी-लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया गया है, और ईडी मुंबई में ऑर्केस्ट्रा बार के एक समूह से कथित जबरन वसूली के मामले की जांच कर रही है।
पूर्व मंत्री के खिलाफ 11 मई को मामला दर्ज किया गया था और 25 जून को ईडी ने देशमुख के नागपुर, मुंबई और तीन अन्य स्थानों पर आवासों पर छापेमारी की थी।
इस मामले में सीबीआई ने अप्रैल में देशमुख के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर उनके चार परिसरों पर छापेमारी की थी।
मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परम बीर सिंह ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखे अपने पत्र में आरोप लगाया था कि देशमुख ने ‘कदाचार’ किया है और वजे को हर महीने 100 करोड़ रुपये इकट्ठा करने के लिए कहा था।
महाराष्ट्र
मुंबई के सरकारी अस्पतालों में मरीज़ों के लिए दवाओं की कमी और एमआरआई मशीन भी खराब चिंताजनक स्थिति पैदा, अबू आसिम ने अस्पतालों में सुविधाएँ उपलब्ध कराने की मांग की।

मुंबई; अबू आसिम आज़मी ने मुंबई महाराष्ट्र विधानसभा में अस्पतालों में मेडिकल सुविधाओं की कमी और खराब व्यवस्था और बिगड़ते हालात पर चिंता जताई और सरकार का ध्यान इन ज़रूरी मुद्दों की ओर दिलाया। उन्होंने सदन को बताया कि सरकारी और नगर निगम के अस्पतालों में मरीज़ों की हालत बहुत खराब है। यहां मरीज़ों को इलाज के साथ दवाइयां भी नहीं दी जातीं, जिससे मरीज़ों को बाहर से दवाइयां मंगवानी पड़ती हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में खराब व्यवस्थाओं की वजह से हालात और भी खराब हैं। मुंबई के जेजे अस्पताल में एक मरीज़ को हर दिन 5 से 6 हज़ार रुपये दिए जाते थे और ये दवाएं अस्पताल में नहीं मिलती थीं, उन्हें प्राइवेट क्लीनिक से खरीदना पड़ता था। जब मैंने इस बारे में डीन से शिकायत की तो उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी। इस पर डीन ने कहा कि मरीज़ को सारी दवाएं यहीं से दी जाएंगी। उन्होंने मुझसे पूछा कि मरीज़ ने मुझसे इस बारे में शिकायत क्यों नहीं की? जिस पर आज़मी ने कहा कि डॉक्टर मरीज़ों को विज़िट के दौरान किसी भी डॉक्टर से बात करने से मना करते हैं। अस्पताल में एमआरआई मशीन न होने की वजह से भी बहुत दिक्कतें होती हैं। जेजे हॉस्पिटल में हर दिन तीन हज़ार मरीज़ इलाज के लिए आते हैं, जिनमें से सिर्फ़ चालीस मरीज़ों की ही एमआरआई मशीन से जांच हो पाती है। बाकी मरीज़ों की बीमारी का पता कब चलेगा? दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाकों से मुंबई आने वाले मरीज़ों के लिए एमआरआई, सोनोग्राफी और दूसरे टेस्ट कितने दिनों में तय किए जाएंगे, यह तय किया जाना चाहिए? आज़मी ने सदन का ध्यान इस ओर दिलाया और कहा कि मुंबई के वाडिया हॉस्पिटल में एक बच्चे को इलाज के लिए लाया गया था। मैंने उसे बुलाया और उससे 300 रुपये का फॉर्म लिया और फिर उसे भर्ती नहीं किया गया और हॉस्पिटल से निकलने के बाद बच्चे की मौत हो जाती है। अस्पतालों की यही हालत है। अस्पतालों में खराब इंतज़ाम समेत सुविधाओं की कमी है। आज़मी ने कहा कि नायर और दूसरे अस्पतालों में एमआरआई और दूसरी जांच मशीनें बंद हैं। जिन अस्पतालों में मशीन बंद है। जिन अस्पतालों में मेडिकल कॉलेज हैं, वहां भी मशीन बंद है, तो मेडिकल के छात्र इन मशीनों पर पढ़ाई कैसे कर सकते हैं? राज्य मंत्री मेघा स्कोरेकर बोर्डेकर ने कहा कि अस्पतालों में ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे। इस पर आज़मी ने पूछा कि नए अस्पताल शुरू हुए हैं, तो अब तक अस्पतालों में इंतज़ाम क्यों नहीं किए गए? आजमी की मांग पर उस महिला ने कहा कि वह आजमी के साथ एक दिन अचानक अस्पताल का दौरा करेगी। मंत्री ने कहा कि जून तक चार अस्पतालों केएम, साइन, कूपर नायर में एमआरआई मशीन शुरू कर दी जाएगी। इसके सिस्टम के लिए दो महीने चाहिए। अक्टूबर में चार अस्पतालों में एमआरआई मिल जाएगी। दूसरी जगहों पर सरकारी फीस पर एमआरआई मिल रही है। 16 अस्पतालों में पीपी मॉडल में एमआरआई मशीन और दूसरी मशीनें लगाई जाएंगी, जिसके बाद सरकारी फीस पर टेस्टिंग की जाएगी। मंत्री ने अस्पतालों में ज़रूरी कदम उठाने का भी भरोसा दिया।
महाराष्ट्र
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सरकार नहीं बल्कि भीड़तंत्र चला रहे: सामना में शिवसेना (यूबीटी)

शिवसेना (यूबीटी) ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साधते हुए उनकी सरकार पर मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे की ‘मिसिंग लिंक’ परियोजना में “भीड़तंत्र” चलाने और “वैश्विक स्तर का भ्रष्टाचार घोटाला” करने का आरोप लगाया है।
पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित एक संपादकीय में मुख्यमंत्री फडणवीस द्वारा विपक्ष के खिलाफ कथित तौर पर इस्तेमाल की गई आक्रामक भाषा की आलोचना की गई। साथ ही आरोप लगाया गया कि मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के घाट खंड को बाईपास करने के लिए बनाई जा रही ‘मिसिंग लिंक’ परियोजना की लागत में करीब 2,500 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है।
संपादकीय के अनुसार, दो सुरंगों, आठ लेन की सड़क और दो पुलों वाली 13 किलोमीटर लंबी इस परियोजना की प्रारंभिक अनुमानित लागत 4,797.55 करोड़ रुपये थी। इसमें दावा किया गया कि सामान्य लागत वृद्धि को ध्यान में रखने पर भी परियोजना की लागत 5,500 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन अंतिम व्यय बढ़कर 7,180 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
संपादकीय में दावा किया गया कि परियोजना की लागत करीब 540 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर बैठती है और इसे “भ्रष्टाचार का विश्व रिकॉर्ड” बताया गया। इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि पहली ही बारिश में परियोजना में भारी रिसाव शुरू हो गया। संपादकीय में टिप्पणी की गई कि यदि कोई इस परियोजना में कथित भ्रष्टाचार पर शोध करे तो वह “कैम्ब्रिज या ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट हासिल कर सकता है।”
संपादकीय में मुख्यमंत्री फडणवीस की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की गई कि उन्होंने कथित तौर पर जनता और विपक्ष को चेतावनी देते हुए कहा था, “हमारे भ्रष्टाचार पर सवाल उठाना महाराष्ट्र की बदनामी है। राज्य की बदनामी करने वालों से मैं सख्ती से निपटूंगा।” इसमें मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में राज्य के खर्च पर सवाल उठाने वाले नागरिकों और विपक्षी नेताओं को “किराए के लोग” और अन्य अपमानजनक शब्दों से संबोधित करने की भी निंदा की गई।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने संपादकीय में कहा कि राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस प्रकार की भाषा किसी जनप्रतिनिधि की नहीं बल्कि “गुंडों” की भाषा है। पार्टी ने सवाल किया कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को चुप कराने की कोशिश की जा रही है।
संपादकीय में आरोप लगाया गया कि इस तरह के भ्रष्टाचार से कमाए गए धन का इस्तेमाल विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त में किया जा रहा है। इसमें दावा किया गया कि मुख्यमंत्री फडणवीस का राज्य से कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं है, बल्कि वे “मुगलों और अंग्रेजों” की तरह व्यवहार कर रहे हैं जिनकी एकमात्र नीति “लूट कर भाग जाना” थी।
संपादकीय में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्रियों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि राज्य में सुसंस्कृत नेतृत्व की परंपरा रही है। इसमें राज्य के पहले मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण की बुद्धिमत्ता, संयम और राजनीतिक परिपक्वता की सराहना की गई।
संपादकीय में आगे कहा गया कि वसंतराव नाईक, वसंतदादा पाटिल, शरद पवार, विलासराव देशमुख, मनोहर जोशी और उद्धव ठाकरे सहित विभिन्न दलों के पूर्व मुख्यमंत्रियों ने सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा बनाए रखी और विधानसभा के मंच का इस्तेमाल विपक्ष को धमकाने या कथित रूप से भ्रष्ट लोगों का बचाव करने के लिए नहीं किया।
महाराष्ट्र
पुणे बिल्डिंग हादसा: मलबे से एक शव बरामद, 9 लोगों को सुरक्षित निकाला गया, राहत-बचाव अभियान जारी

पुणे के पास पिंपरी-चिंचवड़ के मोशी स्थित कचरा प्रबंधन संयंत्र में इमारत गिरने के बाद गुरुवार को राहत और बचाव अभियान जारी रहा। अधिकारियों ने बताया कि मलबे से अब तक एक शव बरामद किया गया है, जबकि 9 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। कई एजेंसियों की टीमें अब भी मलबे में फंसे लोगों की तलाश में जुटी हैं।
यह तीन मंजिला इमारत वेस्ट-टू-एनर्जी (कचरे से बिजली बनाने वाले) प्लांट के ऊपर बनी हुई थी। बुधवार दोपहर पुराने कचरे (लिगेसी वेस्ट) का बड़ा ढेर इमारत पर गिर गया, जिससे पूरी इमारत ढह गई और करीब 18 लोग मलबे में दब गए।
हादसे के कुछ ही घंटों के भीतर 7 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया था। इसके बाद देर रात 2 और लोगों को बचा लिया गया, जिससे अब तक बचाए गए लोगों की संख्या 9 हो गई है।
बचाव अभियान की जानकारी देते हुए राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) की 5वीं बटालियन के कमांडेंट एसबी सिंह ने बताया कि गुरुवार की सुबह मलबे से एक शव बरामद किया गया है, जबकि दो अन्य का पता भी चल गया है।
उन्होंने कहा, “एनडीआरएफ अपनी पूरी कोशिश कर रही है। हमने हाथों से खुदाई कर एक संकरी जगह बनाई है और उसी रास्ते से अंदर पहुंच रहे हैं। अब तक तीन शवों का पता चल चुका है, जिनमें से एक को बाहर निकाल लिया गया है।”
उन्होंने बताया कि दूसरा शव दूर से दिखाई दे रहा है, लेकिन उसे निकालने में अभी समय लगेगा।
एसबी सिंह ने कहा कि बचाव अभियान बेहद कठिन है, क्योंकि इमारत पूरी तरह अस्थिर हो चुकी है और कभी भी दोबारा गिर सकती है। इससे बचावकर्मियों की जान को भी खतरा बना हुआ है।
उन्होंने कहा, “हमारी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इमारत दोबारा न गिर जाए। अगर ऐसा हुआ तो बचावकर्मी भी मलबे में फंस सकते हैं। हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि अंदर फंसे लोगों पर और मलबा न गिरे।”
उन्होंने बताया कि इमारत करीब 45 डिग्री तक झुक गई है, इसलिए अंदर पहुंचना बेहद मुश्किल है। बचावकर्मियों को संकरे रास्तों से रेंगते हुए अंदर जाना पड़ रहा है।
एनडीआरएफ अधिकारी ने बताया कि भारी मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है, क्योंकि उनसे होने वाले कंपन से इमारत फिर गिर सकती है। इससे मलबे में फंसे लोगों और बचावकर्मियों दोनों की जान खतरे में पड़ सकती है, इसलिए मलबा हाथों से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है।
उन्होंने कहा, “इसमें समय जरूर लगेगा, लेकिन हम पूरी कोशिश कर रहे हैं।”
एसबी सिंह ने यह भी बताया कि लाइफ डिटेक्टर, ध्वनि पहचान उपकरण (अकॉस्टिक सेंसर) और स्निफर डॉग्स जैसे आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन अब तक मलबे के नीचे किसी जीवित व्यक्ति के होने के संकेत नहीं मिले हैं।
अधिकारियों के अनुसार, हादसे के समय एंटनी लारा रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी के कई कर्मचारी इमारत में मौजूद थे। यह कंपनी पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम (पीसीएमसी) के साथ मिलकर 14 मेगावाट के वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट का संचालन करती है।
पीसीएमसी ने शुरुआत में बताया था कि मलबे में 23 लोगों के फंसे होने की आशंका थी। इनमें से 5 लोग बचाव दल के पहुंचने से पहले ही खुद बाहर निकलने में सफल हो गए थे।
राहत और बचाव अभियान में एनडीआरएफ, भारतीय सेना, पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम फायर ब्रिगेड, पुणे महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (पीएमआरडीए) फायर ब्रिगेड और पुलिस की संयुक्त टीमें लगातार काम कर रही हैं।
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