राजनीति
बाला साहेब ठाकरे: चुनाव नहीं लड़ा, पर सरकारें बनाईं-गिराईं; सत्ता का अनोखा सम्राट
नई दिल्ली, 22 जनवरी : 23 जनवरी… एक ऐसी तारीख है, जिसने महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति को एक ऐसा चेहरा दिया, जिसे नजरअंदाज करना अपने आप में बेईमानी होगी। यही वह दिन है, जब पुणे की धरती पर बाला साहेब ठाकरे का जन्म हुआ। बाला साहेब ठाकरे एक ऐसा नाम है, जो सत्ता में नहीं रहने के बाद भी सत्ता की दिशा तय करते थे। बाला साहेब ने कोई चुनाव नहीं लड़ा, इसके बावजूद सरकारें बनाईं और गिराईं।
बाला साहेब ठाकरे नौ भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनके पिता केशव ठाकरे सामाजिक कार्यकर्ता थे और आजादी के बाद मराठी राज्य की मांग को लेकर चले आंदोलनों में सक्रिय रहे। यही वैचारिक विरासत बाला साहेब को मिली। मीनाताई ठाकरे से विवाह के बाद उनके तीन बेटे हुए, बिंदुमाधव ठाकरे, जयदेव ठाकरे और उद्धव ठाकरे। उनका सार्वजनिक जीवन राजनीति से नहीं, बल्कि कला और पत्रकारिता से शुरू हुआ।
1950 के दशक की शुरुआत में वे मुंबई के फ्री प्रेस जर्नल में कार्टूनिस्ट बने। उनकी रेखाएं सिर्फ अखबारों तक सीमित नहीं रहीं। वह जापान के असाही शिंबुन और न्यूयॉर्क टाइम्स के संडे एडिशन तक पहुंचीं। लेकिन, जल्द ही उनकी कलम में राजनीति उतर आई। 1960 के दशक में उन्होंने अपने भाई के साथ मराठी साप्ताहिक ‘मार्मिक’ शुरू किया। यहीं से ‘मराठी माणुस’ के सवाल, बाहरी लोगों का विरोध और क्षेत्रीय अस्मिता का स्वर तेज हुआ।
19 जून 1966 को उसी विचारधारा ने संगठन का रूप लिया, नाम रखा गया शिवसेना। संगठक का मकसद साफ था- ‘महाराष्ट्र फॉर महाराष्ट्रीयन्स’। शुरुआत मराठी भाषा, संस्कृति और स्थानीय अधिकारों की बात से हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीति आक्रामक हिंदुत्व की ओर बढ़ती चली गई। बाला साहेब ठाकरे का व्यक्तित्व भी इसी तरह था। बेबाक, टकराव से बेखौफ और बयानबाजी में किसी की परवाह न करने वाला।
बाला साहेब ठाकरे ने कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला, न ही चुनाव लड़ा, लेकिन दशकों तक उन्हें महाराष्ट्र का सबसे ताकतवर व्यक्ति माना गया। उन्हें ‘हिंदू हृदयसम्राट’ का नाम दिया गया। आलोचक भी उन्हें ‘महाराष्ट्र का गॉडफादर’ बताते थे। उनकी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1990 के दशक में शिवसेना के सत्ता में आते ही बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई कर दिया गया।
विवाद बाला साहेब ठाकरे की राजनीति का स्थायी हिस्सा रहे। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे के गिराए जाने के बाद जब देशभर में नेता जिम्मेदारी से बचते दिखे, तब बाला साहेब ठाकरे खुलकर बोले- मस्जिद शिवसैनिकों ने गिराई है। यह हमारे लिए गर्व की बात है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। बाबरी मस्जिद के नीचे जो हमारा मंदिर था उसे हमने ऊपर लाया। उसी दौर में मुंबई में 1992-93 के सांप्रदायिक दंगों ने शहर को झकझोर दिया, जिनमें लगभग एक हजार लोगों की मौत हुई। उन पर हिंसा भड़काने के आरोप लगे थे। लेकिन, उन्होंने कभी इन आरोपों से दूरी नहीं बनाई।
उनकी राजनीति में विरोधाभास भी कम नहीं थे। इमरजेंसी के दौरान विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने इंदिरा गांधी का समर्थन किया। बाद के वर्षों में प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी जैसे राष्ट्रपति उम्मीदवारों के समर्थन में उन्होंने गठबंधन की सीमाओं को भी तोड़ा। 1987 में उन्होंने नारा दिया- ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं।’ 2002 में उनका यह बयान कि हिंदुओं को आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए, उनकी उग्र हिंदुत्व राजनीति का उदाहरण माना गया। इन्हीं बयानों के चलते चुनाव आयोग ने उन पर दिसंबर 1999 से दिसंबर 2005 तक छह साल का प्रतिबंध लगाया। वे न वोट कर सकते थे, न चुनाव लड़ सकते थे।
राजनीतिक संगठन के तौर पर शिवसेना का विस्तार तेजी से हुआ। 1989 में ‘सामना’ अखबार की शुरुआत हुई। 1995 में भाजपा के साथ गठबंधन कर शिवसेना सत्ता में आई। सरकार बनी और कहा गया कि सरकार का रिमोट कंट्रोल मातोश्री से चलता है। बाला साहेब ठाकरे ने विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री और सांसद तो कई बनाए, लेकिन खुद हमेशा पर्दे के पीछे रहे। उत्तराधिकार का सवाल उनके जीवन के आखिरी वर्षों में सबसे पीड़ादायक रहा। 2004 में उद्धव ठाकरे को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और 2006 में उन्हें पार्टी की कमान सौंपी गई। इसके बाद राज ठाकरे ने अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई। यह विभाजन आखिरी वक्त तक बाला साहेब को टीस देता रहा।
एक इंटरव्यू में हिटलर की प्रशंसा को लेकर वे फिर विवादों में आए। उन्होंने कहा था कि हिटलर क्रूर था और गलतियां कीं, लेकिन वह कलाकार था और भीड़ को अपने साथ ले जाने की क्षमता रखता था। ऐसी ही बेलौस बातों, तीखे व्यंग्य और आक्रामक राजनीति ने उन्हें समर्थकों में नायक और विरोधियों में विवाद का केंद्र बना दिया।
साल 2012 में 17 नवंबर को मुंबई में उनका निधन हो गया। ठाकरे अक्सर कहते थे कि शिवसेना सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना है।
राष्ट्रीय समाचार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अभिषेक बनर्जी को तीन और एफआईआर में दी अंतरिम राहत, गिरफ्तारी पर रोक

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और डायमंड हार्बर से लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी को तीन और एफआईआर में गिरफ्तारी सहित सख्त पुलिस कार्रवाई से अंतरिम राहत दी है।
अभिषेक बनर्जी को अब राज्य के अलग-अलग थानों में दर्ज कुल 16 एफआईआर में से 11 मामलों में अंतरिम सुरक्षा मिल गई है।
जिन तीन एफआईआर में हाईकोर्ट के सिंगल जज बेंच जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने उन्हें अंतरिम सुरक्षा दी है, उनमें से एक दक्षिण कोलकाता में कोलकाता पुलिस के अधिकार क्षेत्र वाले भवानीपुर थाने में दर्ज है। वहीं, दो अन्य एफआईआर दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर पुलिस जिले के अंतर्गत आने वाले कालीतला और विष्णुपुर थानों में दर्ज हैं। यह अंतरिम सुरक्षा 30 नवंबर तक लागू रहेगी।
अंतरिम सुरक्षा देते हुए जस्टिस भट्टाचार्य की बेंच ने यह भी कहा कि डायमंड हार्बर सांसद को इन तीन एफआईआर में जांचकर्ताओं के साथ सहयोग करना होगा। जस्टिस भट्टाचार्य ने टिप्पणी की कि इन तीन एफआईआर के संबंध में हिरासत में लेकर पूछताछ की कोई जरूरत नहीं है।
फैसले के मुताबिक, अगर जांच एजेंसी समन भेजती है तो अभिषेक बनर्जी को पेश होना होगा। ऐसे में सिंगल बेंच ने कहा कि डायमंड हार्बर सांसद को पेशी से 48 घंटे पहले सूचित करना होगा। अगर वह जांच में सहयोग नहीं करते हैं तो राज्य सरकार इस बारे में अदालत का ध्यान आकर्षित कर सकती है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को तय की गई है।
जस्टिस भट्टाचार्य ने आदेश में यह भी कहा कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ अब तक दर्ज सभी एफआईआर की कॉपी उनके वकील को दी जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि अभिषेक बनर्जी कोर्ट की इजाजत के बिना विदेश यात्रा नहीं कर सकेंगे। हालांकि, जस्टिस भट्टाचार्य ने जोड़ा कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही उन्हें आंखों के इलाज के लिए विदेश यात्रा की अनुमति दे रखी है, इसलिए यह आदेश उस विदेश यात्रा में बाधा नहीं बनेगा।
राजनीति
चाय की कीमत बढ़कर 15 रुपए हो गई, 50 पैसे में चाय पीकर हमारी जिंदगी शुरू हुई है: संजय राउत

चाय की कीमतों में बढ़ोतरी, कंगना रनौत के बयान और मराठी भाषा विवाद पर शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत की प्रतिक्रिया सामने आई है।
नेता संजय राउत ने चाय की बढ़ती कीमतों को लेकर भाजपा पर निशाना साधा। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा, “चाय की कीमत 15 रुपये हो गई है, जबकि बड़े होटलों में यही चाय 200-300 रुपये में मिलती है। हमारी जिंदगी 50 पैसे की चाय से शुरू हुई है।” राउत ने तंज कसते हुए कहा, “अब भाजपा वाले कहेंगे कि चाय मत पियो। चाय पीना अपराध है, देशद्रोह है। राष्ट्रभक्ति के नाम पर कोई आदेश जारी कर देंगे। खुद इथेनॉल पिएंगे। गरीब आदमी को मेहनत करके एक कप चाय नसीब होती है और ये लोग सरकारी चाय पीते हैं।”
कंगना रनौत की ओर से कृति सेनन और तापसी पन्नू पर कटाक्ष करने को लेकर संजय राउत ने कहा, “आप लोग कंगना रनौत को इतनी गंभीरता से क्यों लेते हैं? उनको इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। ये अंधभक्त लोग हैं। उनसे पूछना चाहिए कि चाय क्यों महंगी हो गई है। चीनी बनाने वाला गन्ना इथेनॉल बनाने में चला गया।
महाराष्ट्र में मराठी भाषा बोलने को लेकर संजय राउत ने कहा, “संविधान में जो अधिकार दिया गया है, उसका इस्तेमाल होना चाहिए। चाहे महाराष्ट्र हो या बंगाल, कॉर्पोरेट में स्थानीय भाषा होनी चाहिए। देश की भाषा एक होनी चाहिए, हिंदी। अगर अंग्रेजी गुलामी का लक्षण है तो हिंदी में बात होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और ब्यूरोक्रेट्स को हिंदी में लिखना और बोलना चाहिए। उनको हिंदी में जवाब देने से किसने रोका है?
बीते दिन भी संजय राउत ने अखिलेश यादव के बयान पर कहा था, “अखिलेश यादव ने ऐसा कुछ नहीं कहा। यहां और हर राज्य में एक कानून है कि स्थानीय भाषा बोली जानी चाहिए। अखिलेश ने यही कहा, लेकिन यह कानून सभी पर लागू होना चाहिए। जो लोग कॉर्पोरेट में, ऊंचे पदों पर या ऑफिस में काम करते हैं, वे मराठी क्यों नहीं बोलते? उन्हें भी मराठी आनी चाहिए और उन पर भी मराठी सख्ती से लागू होनी चाहिए। हर राज्य में लोगों को गर्व और आत्म-सम्मान के साथ स्थानीय भाषा बोलनी चाहिए।”
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र : पालघर के आश्रम स्कूल में 7 साल के बच्चे की मौत, 26 अन्य छात्र अस्पताल में भर्ती

महाराष्ट्र के पालघर जिले के एक आवासीय स्कूल में 7 साल के छात्र की तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ के बाद मौत हो गई है। वहीं 26 अन्य छात्रों को सर्दी, खांसी और बुखार के लक्षणों के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अधिकारियों ने मंगलवार को यह जानकारी दी।
मसवण के आश्रम स्कूल में पढ़ने वाले पहली क्लास के छात्र को 22 अगस्त को तेज बुखार आया था। इसके बाद उसे इलाज के लिए स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) ले जाया गया था।
सोमवार को जब उसका बुखार वापस आया तो पीएचसी के डॉक्टर ने देखा कि उसके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिर रहा है। डॉक्टर ने उसे तुरंत एंबुलेंस से मनोर के ग्रामीण अस्पताल में भेजने की सलाह दी।
अस्पताल ले जाने के बाद डॉक्टरों ने बच्चे का ईसीजी किया और फिर उसे मृत घोषित कर दिया। अधिकारी ने बताया कि मौत का सही कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा।
घटना के बाद स्वास्थ्य और प्रशासन के बड़े अधिकारी स्कूल पहुंचे। इस स्कूल में कुल 449 छात्र पढ़ते हैं, जिनमें से 395 छात्र हॉस्टल में रहते हैं। मेडिकल टीम ने स्कूल परिसर में सभी छात्रों की पूरी स्वास्थ्य जांच भी की।
एहतियात के तौर पर सर्दी, खांसी या बुखार के हल्के लक्षण वाले 26 छात्रों को मसवण पीएचसी में निगरानी में रखा गया है। उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है।
एकीकृत आदिवासी विकास परियोजना अधिकारी विशाल खत्री ने स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र का दौरा किया और अस्पताल में भर्ती छात्रों और उनके माता-पिता से मुलाकात की।
यह घटना कुछ हफ्ते पहले गढ़चिरौली जिले के एक आवासीय स्कूल हॉस्टल में हुई घटना के बाद हुई है, जहां तीन आदिवासी लड़कियों की जहरीले सांप के काटने से मौत हो गई थी। बताया गया था कि वे जमीन पर सो रही थीं।
इन मौतों ने महाराष्ट्र के आश्रम स्कूलों में सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी महीने की शुरुआत में अधिकारियों ने बताया था कि पिछले दो सालों में राज्य के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त आवासीय स्कूलों में 584 छात्रों की मौत हुई है। इन मौतों के कारणों में सांप का काटना, सिकल सेल रोग, गंभीर बीमारियां, हादसे और आत्महत्या शामिल हैं।
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