राजनीति
कॉकरोच जनता पार्टी ने राष्ट्रीय और जोनल नेतृत्व टीम का किया विस्तार, नई संगठनात्मक नियुक्तियों का ऐलान
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने अपने संगठनात्मक ढांचे के बड़े विस्तार की घोषणा करते हुए नई राष्ट्रीय नेतृत्व टीम और जोनल कोऑर्डिनेशन कमेटियों का गठन किया है। पार्टी ने कहा कि इन नियुक्तियों का उद्देश्य जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करना, राज्यों और क्षेत्रों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और स्थानीय नेतृत्व का व्यापक नेटवर्क तैयार करना है।
पार्टी के अनुसार, नए संगठनात्मक ढांचे में देश के विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। इससे सीजेपी की फील्ड स्तर की गतिविधियों को मजबूती मिलेगी और आम नागरिकों की आवाज को अधिक प्रभावी ढंग से उठाया जा सकेगा।
संगठन संयुक्त सचिव के रूप में रेखा शर्मा, अक्षय शिंदे, प्रेम आकाश, अनाम उज्जमा और बालकृष्ण शुक्ला को नियुक्त किया गया है। वहीं, राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर सुधीर सांगवान और सिद्धांत भारद्वाज को नियुक्त किया गया है।
जोनल कॉर्डिनेशन कमिटी में पूर्वी जोन: शेख मारुफ उद्दीन, देदीप्या गांगुली, शेख अब्दुल हाफिज, प्रकृति साहू, राकेश रंजन सामल, स्वप्निल मिश्रा, आशुतोष रंजन, खुशबू वहाब चौधरी, मयंक पांडेय, सतीश यादव, असलम खान, रसिका खरे, सचिन बरवाल, कृतिका कश्यप, मोहन यादव और रमन दीप। पश्चिमी जोन: डॉ. नितिन दिघे, एडवोकेट जयसिंह शेरे, दुर्गेश कुहिके, नीलाक्षी वानखेड़े, सरोश शेख, रोहित पटेल, अनिकेत शिवहरे, राम पटेल, वेद त्रिवेदी और प्रितेश चावड़ा। उत्तरी जोन: आदेश प्रधान गुर्जर, आजाद मोहित, मोहम्मद फरहान खान, विशेष कंवल, उज्ज्वल पांडेय, पूजा सेंटिस, आफताब सिंह विक, अर्चदीप सिंह कोचर, जाहिद अहमद माले, मेहविश अली, श्रेष्ठ सिंह खेड़ा, अजय देशवाल, डॉ. विवेक सांगवान, मुकेश ऑलराउंडर, राम शाखड़, हर्ष कार्तिकेय सिंह और एडवोकेट आरुषि चाई को शामिल किया गया है।
पार्टी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि नई नियुक्तियां संगठन की पहुंच को देशभर में विस्तार देने, राज्यों और क्षेत्रों के बीच समन्वय मजबूत करने और एक अधिक संगठित जमीनी जनआंदोलन तैयार करने में अहम भूमिका निभाएंगी।
सीजेपी ने कहा, “इन समर्पित टीमों के माध्यम से हम अपने मिशन को सीधे जमीनी स्तर तक ले जा रहे हैं। हमारा उद्देश्य आम लोगों के लिए एक मजबूत आंदोलन खड़ा करना, स्थानीय नेतृत्व को सशक्त बनाना और ऐसा राष्ट्र बनाना है, जहां हर आवाज मायने रखे।”
पार्टी के मुताबिक, यह विस्तार देशभर में अपनी संगठनात्मक मौजूदगी मजबूत करने और आम नागरिकों की चिंताओं व आकांक्षाओं पर आधारित जन-आंदोलन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
महाराष्ट्र
15वीं विधानसभा में मुंबई के विधायकों द्वारा पूछे गए सवालों में 72% की गिरावट: प्रजा फाउंडेशन रिपोर्ट

मुंबई, 25 अगस्त 2026 — प्रजा फाउंडेशन द्वारा जारी ‘मुंबई विधायक रिपोर्ट कार्ड 2026’ के अनुसार, महाराष्ट्र विधानसभा में मुंबई के विधायकों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या में 12वीं विधानसभा की तुलना में 72% की भारी गिरावट आई है।
यह रिपोर्ट शीतकालीन सत्र 2024 से मानसून सत्र 2025 के दौरान मुंबई के 33 विधायकों की उपस्थिति, विधायी कार्य प्रणाली, प्रश्नों की गुणवत्ता और भागीदारी के आकलन पर आधारित है। रिपोर्ट में कुल 33 विधायकों में से केवल तीन ने 80% से अधिक अंक प्राप्त किए हैं, और शीर्ष तीनों स्थानों पर कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि रहे हैं।
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले विधायक
पहला स्थान: अमीन पटेल (कांग्रेस) — अंक: 82.89
दूसरा स्थान: अस्लम शेख (कांग्रेस) — अंक: 80.58
तीसरा स्थान: ज्योति गायकवाड़ (कांग्रेस) — अंक: 80.30
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
सवालों की संख्या में भारी कमी: 15वीं विधानसभा (शीतकालीन 2024 से मानसून 2025) में विधायकों द्वारा कुल 2,213 प्रश्न पूछे गए, जो 12वीं विधानसभा (2009-2010) के 7,955 प्रश्नों के मुकाबले 72% कम हैं।
प्रश्नों की गुणवत्ता में गिरावट: विधायकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों की गुणवत्ता का औसत स्कोर 12वीं विधानसभा के 50% से घटकर 15वीं विधानसभा में 33% रह गया है।
कम कार्य दिवस: 15वीं विधानसभा के पहले वर्ष में सदन की बैठक केवल 40 कार्य दिवसों के लिए हुई, जबकि 12वीं और 13वीं विधानसभाओं में यह बैठक क्रमशः 47 और 50 दिनों तक चली थी।
औसत प्रदर्शन स्कोर: मुंबई के विधायकों का कुल औसत प्रदर्शन स्कोर 12वीं विधानसभा में 61 था, जो 14वीं विधानसभा में घटकर 54 हुआ और 15वीं विधानसभा में थोड़ा बढ़कर 55 दर्ज किया गया।
बढ़ती औसत आयु: मुंबई के विधायकों की औसत उम्र समय के साथ बढ़ी है—12वीं विधानसभा में 52 वर्ष, 13वीं में 51 वर्ष, 14वीं में 53 वर्ष और 15वीं विधानसभा में 57 वर्ष हो गई है।
विधायी जवाबदेही पर चिंता
प्रजा फाउंडेशन के सीईओ मिलिंद म्हस्के ने कहा कि आंकड़े यह दर्शाते हैं कि निर्वाचित प्रतिनिधि नागरिकों द्वारा उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारी को कितनी प्रभावी ढंग से निभा रहे हैं। वहीं, प्रजा फाउंडेशन के प्रबंधक आसिफ खान के अनुसार, यदि विचार-विमर्श के दिन कम हो रहे हैं और सवाल कम पूछे जा रहे हैं, तो इससे नागरिक सरकार से जवाबदेही मांगने का महत्वपूर्ण साधन खो देते हैं।
मनोरंजन
‘संस्कृति और परंपराएं दिलों में होती हैं, कपड़ों में नहीं’, कृति सेनन का कंगना रनौत को करारा जवाब

बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन इन दिनों एक रक्षाबंधन विज्ञापन को लेकर लगातार चर्चा में हैं। दरअसल, ज्वेलरी ब्रांड के एक विज्ञापन में कृति का इंडो-वेस्टर्न लुक कुछ लोगों को पसंद नहीं आया। सोशल मीडिया पर उनके पहनावे को लेकर सवाल उठाए गए। इसके बाद अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी बिना नाम लिए विज्ञापन की स्टाइलिंग पर निशाना साधा।
अब कृति ने पूरे मामले पर चुप्पी तोड़ी है और इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए अपनी बात रखी है। कृति ने साफ किया कि किसी महिला के कपड़ों को देखकर उसकी संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान तय नहीं किया जा सकता।
कृति सेनन ने इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा, ”त्योहारों का मतलब आपके पहने हुए कपड़ों में नहीं है, बल्कि उन परंपराओं के प्रति भावनाओं और उनके महत्व में है। रक्षाबंधन का त्योहार सुरक्षा और प्यार के रिश्ते का प्रतीक है। मैं और मेरी बहन एक-दूसरे को राखी बांधती हैं और एक-दूसरे की सुरक्षा, अच्छी सेहत, खुशी और लंबी उम्र की कामना करती हैं।”
कृति ने पोस्ट में आगे लिखा, ”मेरे लिए यह प्यार, प्रार्थना और एक-दूसरे की देखभाल का रिश्ता हमारे डॉग्स तक भी पहुंचता है, क्योंकि वे भी हमारे परिवार का हिस्सा हैं।”
इसके बाद कृति ने पोस्ट में पूछा, ”हम महिलाओं को यह बताना आखिर कब बंद करेंगे कि उन्हें क्या पहनना चाहिए? समय के एथनिक फैशन में भी काफी बदलाव आया है, लेकिन आज भी किसी महिला के कल्चर के प्रति सम्मान को उसके कपड़ों से मापा जाता है। संस्कृति और परंपराएं महिला के दिल में होती हैं, नेकलाइन में नहीं।”
कृति के इस पोस्ट को कंगना रनौत की टिप्पणी से जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल, पूरा विवाद एक रक्षाबंधन विज्ञापन से शुरू हुआ। ज्वेलरी ब्रांड के एक विज्ञापन में कृति सेनन ने ऑफ-व्हाइट कलर का इंडो-वेस्टर्न आउटफिट पहना हुआ है। इसमें ब्रालेट स्टाइल ब्लाउज, ड्रेप्ड स्कर्ट और केप शामिल है। विज्ञापन सामने आने के बाद कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके कपड़ों को त्योहार के हिसाब से सही नहीं बताया।
मामला तब और चर्चा में आया जब कंगना रनौत ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर एक पोस्ट शेयर किया। उन्होंने कृति का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी बातों को इसी विज्ञापन से जोड़कर देखा गया।
कंगना ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा, ”महिला होने के लिए यह शानदार समय है। हमारी अलमारियां कई तरह के कपड़ों से भरी हैं और आज की महिला ग्लोबल महिला है। कॉकटेल ड्रेस से लहंगा चोली, जींस से साड़ी और बिकिनी से सलवार-कमीज तक, आज हमारे पास कपड़ों के इतने विकल्प हैं। फिर आप अपने भाई को बिकिनी या अंडरगारमेंट्स में राखी क्यों बांधेंगी? आपके पास स्टाइलिंग के इतने विकल्प कहां गए? हा हा, यह विज्ञापन जानबूझकर अजीब बनाया गया लगता है।”
राजनीति
मानसून सत्र के हंगामे पर रिजिजू ने विपक्ष को घेरा, कहा-सवाल पूछ सकते हैं पर संसद को ठप नहीं कर सकते

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार को मानसून सत्र के दौरान संसद में बार-बार हो रहे हंगामे को लेकर विपक्ष पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि संविधान उन्हें सरकार से सवाल पूछने का अधिकार तो देता है लेकिन जब उनकी राजनीतिक मांगें नहीं मानी जातीं, तो बार-बार कार्यवाही में बाधा डालने की शक्ति नहीं देता।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपे एक लेख में रिजिजू ने कहा कि संसद भारत के लोगों की है न कि राजनीतिक दलों की। उन्होंने कई ऐसे उदाहरण दिए जिनमें सरकार ने अहम मुद्दों और कानूनों पर विपक्ष के साथ बातचीत की जबकि विपक्षी नेताओं पर व्यवस्थित बहस के मौकों को ठुकराने और फिर सदन के कामकाज में कमी के लिए सरकार को दोषी ठहराने का आरोप लगाया।
रिजिजू ने मानसून सत्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि लोकसभा अपने निर्धारित समय के केवल 15 प्रतिशत हिस्से में ही चली, जबकि राज्यसभा 33 प्रतिशत समय चली। लोकसभा में ‘प्रश्नकाल’ अपने तय समय के बमुश्किल एक प्रतिशत और राज्यसभा में 12 प्रतिशत समय ही चल पाया।
रिजिजू ने कहा, “इसलिए विपक्ष का गणित बहुत ही नकारात्मक है। पहले यह सुनिश्चित करना कि संसद न चल पाए और फिर समय की बर्बादी को सरकार के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल करना।”
उन्होंने कहा कि विपक्ष को सरकार से जवाब मांगने का संवैधानिक अधिकार है लेकिन वे संसदीय बहस की जगह सदन की कार्यवाही में बाधा डालने का तरीका नहीं अपना सकते।
रिजिजू ने कहा, “संविधान विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने, आलोचना करने, विरोध करने, संशोधन लाने और सरकार के खिलाफ वोट करने का पूरा अधिकार देता है। यह विपक्ष को कोई ‘रिमोट कंट्रोल’ नहीं देता जिससे वे अपनी राजनीतिक मांगें न माने जाने पर संसद को बंद कर सकें।”
उन्होंने कहा कि सरकार ने विपक्ष की चिंताओं को सुना, कानूनों पर बातचीत की, प्रावधानों में बदलाव किए और जायज मांगों को माना। हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार जनता से मिले जनादेश को ऐसे विपक्ष के सामने नहीं झुकाएगी जो संसद को ठप कर देता है और फिर उससे पैदा हुई बाधा को तानाशाही का सबूत बताता है।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई पर चर्चा की विपक्ष की मांग का भी जिक्र किया। रिजिजू के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मांग के लिए सहमत हो गए थे और बहस के लिए एक खास समय भी तय किया था।
हालांकि, उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
उन्होंने कहा, “विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया कि विपक्ष को गृह मंत्री के ‘लेक्चर’ में कोई दिलचस्पी नहीं है। अगर किसी नेता को सच में बहस से रोका जाता है, तो वह 24 घंटे के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लेता है। वह उसे ‘लेक्चर’ कहकर खारिज नहीं करता। कोई पूरी संसदीय चर्चा से इनकार नहीं कर सकता और फिर यह शिकायत नहीं कर सकता कि संसद की आवाज दबा दी गई है।”
रिजिजू ने राहुल गांधी के संसदीय कामकाज के रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए और कहा कि 17वीं लोकसभा में उनकी भागीदारी को देखते हुए यह विरोधाभास और भी अहम हो जाता है। उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी की उपस्थिति 51 प्रतिशत थी। उन्होंने राष्ट्रीय औसत 46.7 के मुकाबले आठ बहसों में हिस्सा लिया, औसत 210 के मुकाबले 99 सवाल पूछे और कोई भी ‘प्राइवेट मेंबर बिल’ पेश नहीं किया।
रिजिजू ने कहा, “फिर भी अब वे कहते हैं कि सरकार ने ‘हमारे लोकतंत्र को खत्म कर दिया है’। वे यूके, जर्मनी और अमेरिका जाते हैं और भारत में लोकतंत्र की कमी की शिकायत करते हैं लेकिन उनमें संसद में आकर जवाबदेही मांगने की हिम्मत नहीं है। न तो वे और न ही कांग्रेस पार्टी लोकतंत्र के रक्षक हैं। वे राजनीतिक नाटकबाजी में माहिर हैं जो पैरोडी जैसी लगती है।”
केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष के इस आरोप को भी खारिज कर दिया कि सरकार बात नहीं सुनती। उन्होंने कहा कि संसदीय रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। उन्होंने ‘विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक’ का उदाहरण देते हुए कहा कि विपक्ष की चिंताओं के बाद इस कानून को एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था।
हालांकि, रिजिजू ने दावा किया कि बाद में विपक्ष ने विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की मांग की, जिससे यह पता चलता है कि बातचीत के मामले में विपक्ष के नजरिए में एक बुनियादी समस्या है।
उन्होंने कहा, “इससे असली समस्या का पता चलता है। कुछ विपक्षी दलों के लिए, बातचीत का मतलब यह नहीं है कि सरकार उनकी बात सुने। इसका मतलब है कि सरकार को घुटने टेक देने चाहिए। बहस को तब तक बेकार माना जाता है जब तक कि मंत्री पहले से ही विपक्ष के निष्कर्षों को स्वीकार न कर लें।”
रिजिजू ने नीट परीक्षा के मुद्दे पर विरोध कर रहे छात्रों के साथ सरकार की बातचीत का भी जिक्र किया और कहा कि केंद्र ने प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को समझने और उनका समाधान करने के लिए उनसे बातचीत की थी।
उन्होंने भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के साथ सरकार की बातचीत का भी उदाहरण दिया और कहा कि अधिकारियों ने उनसे बात की और मेडिकल सलाह मानने की अपील की।
रिजिजू ने कहा, “लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गौर करें, विरोध प्रदर्शन हुआ; नागरिक समाज की चिंताओं को सुना गया; केंद्रीय मंत्रियों ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की, लिखित आश्वासन दिए गए; प्रधानमंत्री ने जवाब दिया; संसद में व्यापक बहस हुई; और कानून को और मजबूत बनाया गया।”
उन्होंने कहा, “बातचीत और जवाबदेही की इससे बेहतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कल्पना करना मुश्किल है।” संसद न तो सिर्फ सरकार की है और न ही सिर्फ विपक्ष की बल्कि यह भारत के लोगों की है। उन्होंने कहा कि नागरिकों द्वारा दिए गए चुनावी जनादेश को ऐसी चीज नहीं माना जा सकता जिसे तब रद्द कर दिया जाए जब विपक्षी दल संसदीय बहस के बजाय हंगामा करना चुनें।
रिजिजू ने कहा, “उन्होंने जो जनादेश दिया है, वह कोई सजावटी सर्टिफिकेट नहीं है जिसे तब रद्द कर दिया जाए जब हारने वाले दल बहस के बजाय हंगामा करना चुनें। सदन के बाहर लगाए गए नारों से सदन के अंदर की बहस की जगह नहीं ली जा सकती। जो लोग बहस या वोट के जरिए सरकार को नहीं हरा सकते, उन्हें शोर-शराबे के जरिए संसद को हराने की इजाजत नहीं दी जा सकती।”
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