राजनीति
मानसून सत्र के हंगामे पर रिजिजू ने विपक्ष को घेरा, कहा-सवाल पूछ सकते हैं पर संसद को ठप नहीं कर सकते
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार को मानसून सत्र के दौरान संसद में बार-बार हो रहे हंगामे को लेकर विपक्ष पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि संविधान उन्हें सरकार से सवाल पूछने का अधिकार तो देता है लेकिन जब उनकी राजनीतिक मांगें नहीं मानी जातीं, तो बार-बार कार्यवाही में बाधा डालने की शक्ति नहीं देता।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपे एक लेख में रिजिजू ने कहा कि संसद भारत के लोगों की है न कि राजनीतिक दलों की। उन्होंने कई ऐसे उदाहरण दिए जिनमें सरकार ने अहम मुद्दों और कानूनों पर विपक्ष के साथ बातचीत की जबकि विपक्षी नेताओं पर व्यवस्थित बहस के मौकों को ठुकराने और फिर सदन के कामकाज में कमी के लिए सरकार को दोषी ठहराने का आरोप लगाया।
रिजिजू ने मानसून सत्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि लोकसभा अपने निर्धारित समय के केवल 15 प्रतिशत हिस्से में ही चली, जबकि राज्यसभा 33 प्रतिशत समय चली। लोकसभा में ‘प्रश्नकाल’ अपने तय समय के बमुश्किल एक प्रतिशत और राज्यसभा में 12 प्रतिशत समय ही चल पाया।
रिजिजू ने कहा, “इसलिए विपक्ष का गणित बहुत ही नकारात्मक है। पहले यह सुनिश्चित करना कि संसद न चल पाए और फिर समय की बर्बादी को सरकार के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल करना।”
उन्होंने कहा कि विपक्ष को सरकार से जवाब मांगने का संवैधानिक अधिकार है लेकिन वे संसदीय बहस की जगह सदन की कार्यवाही में बाधा डालने का तरीका नहीं अपना सकते।
रिजिजू ने कहा, “संविधान विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने, आलोचना करने, विरोध करने, संशोधन लाने और सरकार के खिलाफ वोट करने का पूरा अधिकार देता है। यह विपक्ष को कोई ‘रिमोट कंट्रोल’ नहीं देता जिससे वे अपनी राजनीतिक मांगें न माने जाने पर संसद को बंद कर सकें।”
उन्होंने कहा कि सरकार ने विपक्ष की चिंताओं को सुना, कानूनों पर बातचीत की, प्रावधानों में बदलाव किए और जायज मांगों को माना। हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार जनता से मिले जनादेश को ऐसे विपक्ष के सामने नहीं झुकाएगी जो संसद को ठप कर देता है और फिर उससे पैदा हुई बाधा को तानाशाही का सबूत बताता है।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई पर चर्चा की विपक्ष की मांग का भी जिक्र किया। रिजिजू के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मांग के लिए सहमत हो गए थे और बहस के लिए एक खास समय भी तय किया था।
हालांकि, उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
उन्होंने कहा, “विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया कि विपक्ष को गृह मंत्री के ‘लेक्चर’ में कोई दिलचस्पी नहीं है। अगर किसी नेता को सच में बहस से रोका जाता है, तो वह 24 घंटे के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लेता है। वह उसे ‘लेक्चर’ कहकर खारिज नहीं करता। कोई पूरी संसदीय चर्चा से इनकार नहीं कर सकता और फिर यह शिकायत नहीं कर सकता कि संसद की आवाज दबा दी गई है।”
रिजिजू ने राहुल गांधी के संसदीय कामकाज के रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए और कहा कि 17वीं लोकसभा में उनकी भागीदारी को देखते हुए यह विरोधाभास और भी अहम हो जाता है। उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी की उपस्थिति 51 प्रतिशत थी। उन्होंने राष्ट्रीय औसत 46.7 के मुकाबले आठ बहसों में हिस्सा लिया, औसत 210 के मुकाबले 99 सवाल पूछे और कोई भी ‘प्राइवेट मेंबर बिल’ पेश नहीं किया।
रिजिजू ने कहा, “फिर भी अब वे कहते हैं कि सरकार ने ‘हमारे लोकतंत्र को खत्म कर दिया है’। वे यूके, जर्मनी और अमेरिका जाते हैं और भारत में लोकतंत्र की कमी की शिकायत करते हैं लेकिन उनमें संसद में आकर जवाबदेही मांगने की हिम्मत नहीं है। न तो वे और न ही कांग्रेस पार्टी लोकतंत्र के रक्षक हैं। वे राजनीतिक नाटकबाजी में माहिर हैं जो पैरोडी जैसी लगती है।”
केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष के इस आरोप को भी खारिज कर दिया कि सरकार बात नहीं सुनती। उन्होंने कहा कि संसदीय रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। उन्होंने ‘विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक’ का उदाहरण देते हुए कहा कि विपक्ष की चिंताओं के बाद इस कानून को एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था।
हालांकि, रिजिजू ने दावा किया कि बाद में विपक्ष ने विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की मांग की, जिससे यह पता चलता है कि बातचीत के मामले में विपक्ष के नजरिए में एक बुनियादी समस्या है।
उन्होंने कहा, “इससे असली समस्या का पता चलता है। कुछ विपक्षी दलों के लिए, बातचीत का मतलब यह नहीं है कि सरकार उनकी बात सुने। इसका मतलब है कि सरकार को घुटने टेक देने चाहिए। बहस को तब तक बेकार माना जाता है जब तक कि मंत्री पहले से ही विपक्ष के निष्कर्षों को स्वीकार न कर लें।”
रिजिजू ने नीट परीक्षा के मुद्दे पर विरोध कर रहे छात्रों के साथ सरकार की बातचीत का भी जिक्र किया और कहा कि केंद्र ने प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को समझने और उनका समाधान करने के लिए उनसे बातचीत की थी।
उन्होंने भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के साथ सरकार की बातचीत का भी उदाहरण दिया और कहा कि अधिकारियों ने उनसे बात की और मेडिकल सलाह मानने की अपील की।
रिजिजू ने कहा, “लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गौर करें, विरोध प्रदर्शन हुआ; नागरिक समाज की चिंताओं को सुना गया; केंद्रीय मंत्रियों ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की, लिखित आश्वासन दिए गए; प्रधानमंत्री ने जवाब दिया; संसद में व्यापक बहस हुई; और कानून को और मजबूत बनाया गया।”
उन्होंने कहा, “बातचीत और जवाबदेही की इससे बेहतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कल्पना करना मुश्किल है।” संसद न तो सिर्फ सरकार की है और न ही सिर्फ विपक्ष की बल्कि यह भारत के लोगों की है। उन्होंने कहा कि नागरिकों द्वारा दिए गए चुनावी जनादेश को ऐसी चीज नहीं माना जा सकता जिसे तब रद्द कर दिया जाए जब विपक्षी दल संसदीय बहस के बजाय हंगामा करना चुनें।
रिजिजू ने कहा, “उन्होंने जो जनादेश दिया है, वह कोई सजावटी सर्टिफिकेट नहीं है जिसे तब रद्द कर दिया जाए जब हारने वाले दल बहस के बजाय हंगामा करना चुनें। सदन के बाहर लगाए गए नारों से सदन के अंदर की बहस की जगह नहीं ली जा सकती। जो लोग बहस या वोट के जरिए सरकार को नहीं हरा सकते, उन्हें शोर-शराबे के जरिए संसद को हराने की इजाजत नहीं दी जा सकती।”
राष्ट्रीय समाचार
अधूरे इश्क ने उठवाई कलम, अल्फाज ऐसे कि लाखों दिलों की आवाज बन गए निदा फाजली

शायरी करना आसान हो सकता है लेकिन ऐसे अल्फाज लिखना बहुत मुश्किल है, जिन्हें पढ़कर किसी को अपना दर्द याद आ जाए, किसी को मोहब्बत का एहसास हो और किसी को जिंदगी जीने का नया नजरिया मिल जाए। हिंदी और उर्दू साहित्य में निदा फाजली एक ऐसा ही नाम हैं, जिनकी शायरी सीधे दिल तक पहुंचती है। उन्होंने आम आदमी की जिंदगी, उसके संघर्ष, रिश्तों, मोहब्बत और इंसानियत को इतने सरल शब्दों में बयां किया कि उनके शेर लोगों की जुबान पर चढ़ गए। आज भी उनकी शायरी पढ़ते हुए लगता है, जैसे उन्होंने हमारे ही मन की बात कह दी हो।
निदा फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। उनका असली नाम मुक्तदा हसन था। बचपन ग्वालियर में बीता और वहीं उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। उनके पिता मुर्तुजा हसन भी शायरी करते थे, इसलिए साहित्य से उनका परिचय बचपन से ही हो गया था। हालांकि, निदा की शायरी की आवाज धीरे-धीरे जिंदगी के अनुभवों से निखरी।
कॉलेज के दिनों में उन्हें एक लड़की से लगाव हो गया था। वह लड़की उनके आगे की पंक्ति में बैठा करती थी। फिर एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर खबर मिली कि एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गई। यह खबर निदा के लिए गहरा सदमा थी। उनके भीतर जो दर्द उमड़ा, उसे बयां करने के लिए उनके पास शब्द ही नहीं थे। यही एहसास उन्हें अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें अल्फाज देने की तरफ ले गया।
कहा जाता है कि एक सुबह निदा फाजली मंदिर के पास से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने सूरदास का भजन सुना— ‘मधुबन तुम क्यौं रहत हरे?’ कृष्ण के वियोग में दुखी राधा और गोपियों की भावनाओं को व्यक्त करने वाला यह भजन उनके दिल में उतर गया। उन्हें लगा कि विरह और बिछड़ने का दर्द केवल उनका निजी अनुभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और बाबा फरीद जैसे रचनाकारों को पढ़ा। गालिब और मीर की शायरी से भी प्रेरणा ली। इन सबका असर उनके लेखन पर दिखाई दिया। उन्होंने ऐसी भाषा में लिखना शुरू किया, जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ सके और अपने जीवन से जोड़ सके।
देश के बंटवारे के समय निदा फाजली के माता-पिता पाकिस्तान चले गए लेकिन उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया। परिवार से दूर रहकर अपनी जिंदगी बनाना आसान नहीं था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी और लेखन के क्षेत्र में संघर्ष किया।
साल 1964 में वह बंबई चले गए। वहां उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान बनने लगी और 1969 में उनका उर्दू कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ। उनकी शायरी में बनावट नहीं थी। वे जिंदगी को जैसा देखते और महसूस करते थे, उसे वैसे ही शब्दों में उतार देते थे।
निदा फाजली ने साहित्य के साथ हिंदी फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई। फिल्म रजिया सुल्तान से उनके फिल्मी गीतों के सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद उन्होंने कई यादगार गीत लिखे। फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता का गीत ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ और सरफरोश का ‘होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है’ आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं।
उन्होंने अपने अनुभवों और भावनाओं को शायरी में ढाला लेकिन उनकी रचनाएं केवल उनकी अपनी कहानी बनकर नहीं रह गईं। वे लाखों लोगों के दिलों की आवाज बन गईं।
राजनीति
सीजेपी प्रदर्शन रोकना लोकतंत्र का काला दिन, सौरभ भारद्वाज बोले-बदलाव नहीं रोक पाएगी भाजपा

दिल्ली में सीजेपी के विरोध प्रदर्शन को लेकर आम आदमी पार्टी ने पुलिस और केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आम आदमी पार्टी दिल्ली के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि पुलिस ने सरकार के निर्देश पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बेरहमी से कार्रवाई की। आप नेता गोपाल राय ने प्रदर्शन पर रोक लगाने, मेट्रो और रेल सेवाएं प्रभावित होने तथा भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती को देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन बताया।
सीजेपी के विरोध प्रदर्शन को लेकर आम आदमी पार्टी दिल्ली के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने से बात करते हुए कहा कि पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान उनके पार्टी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया, घसीटा और थानों में ले गई। कई लोगों को दो दिनों से हिरासत में रखा गया है।
भारद्वाज ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस दक्षिणपंथी तत्वों को बचा रही है। यदि पुलिस ऐसे लोगों को संरक्षण दे रही है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि पर भी पड़ सकता है।
सौरभ भारद्वाज ने कांग्रेस की भूमिका पर कहा कि पार्टी को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह उसका अपना निर्णय है. हालांकि उन्होंने कहा कि जब भी युवा सीजेपी, वामपंथी छात्र संगठनों या आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन के आह्वान पर विरोध प्रदर्शन करते हैं तो विभिन्न विपक्षी दलों के नेता और कार्यकर्ता इसमें शामिल होते हैं।
उन्होंने इसे जनता का आंदोलन बताते हुए कहा कि प्रदर्शन को व्यापक समर्थन मिल रहा है। भारी पुलिस तैनाती, रेल और मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों, सीमाओं को सील करने तथा इंटरनेट सेवाएं रोकने के बावजूद करीब 7,000 युवा गिरफ्तारी देने के लिए तैयार थे। उन्होंने इसे देश में बदलाव का संकेत बताया और कहा कि भाजपा इस बदलाव को रोक नहीं पाएगी।
आप नेता गोपाल राय ने प्रदर्शन पर रोक लगाए जाने की आलोचना करते हुए कहा कि यह भारत के राजनीतिक इतिहास का काला दिन था। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर देश में ‘ब्लैक इमरजेंसी’ थोपने का आरोप लगाया।
गोपाल राय ने कहा कि यह देश और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। उनके मुताबिक निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए वोटों की सुरक्षा जरूरी है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, उनके खिलाफ कार्रवाई और एसआईआर प्रक्रिया समाप्त करने की मांग की। साथ ही, उन्होंने निष्पक्ष चुनाव कराने पर जोर दिया।
राष्ट्रीय समाचार
युवा संगम: उत्तराखंड के युवाओं ने जाना पश्चिम बंगाल का सांस्कृतिक वैभव

युवा संगम के तहत एक राज्य के विद्यार्थियों और शिक्षकों को दूसरे राज्यों में जाकर वहां की संस्कृति और परंपराओं को जानने का अवसर मिला है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की इस पहल के अंतर्गत अब उत्तराखंड के छात्रों का एक दल पश्चिम बंगाल के दौरे पर है। यहां उत्तराखंड के युवाओं को पश्चिम बंगाल की संस्कृति, परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को करीब से जानने का अवसर मिल रहा है।
इस दौरान दल ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर. एन. रवि से मुलाकात की। यहां युवाओं ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शिक्षा और देश के विभिन्न राज्यों के बीच आपसी संबंध मजबूत करने जैसे विषयों पर चर्चा की। यह दौरा केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की ओर से संचालित युवा संगम कार्यक्रम के तहत आयोजित किया जा रहा है। इसकी शुरुआत विद्यार्थियों और शिक्षकों के दल के पश्चिम बंगाल पहुंचने के साथ हुई। यहां विद्यार्थियों और शिक्षकों का स्वागत किया गया और इसके बाद सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा अनुभव आधारित सीखने की गतिविधियां शुरू हुईं।
पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को करीब से देखने के लिए उत्तराखंड के दल ने 9 अक्टूबर को कोलकाता के प्रिंसेप घाट और सुंदरवन का भ्रमण किया। हुगली नदी के किनारे स्थित प्रिंसेप घाट कोलकाता के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है। यहां युवाओं को शहर के ऐतिहासिक परिवेश, नदी के आसपास के सुंदर दृश्यों और जीवंत वातावरण को अनुभव करने का अवसर मिला। इस भ्रमण ने उनके दौरे को एक यादगार अनुभव दिया। दल ने सुंदरवन का भी दौरा किया। इस तरह युवाओं को पश्चिम बंगाल के विभिन्न स्थलों और वहां की विशिष्ट पहचान से परिचित होने का अवसर मिला। ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत कर रहा युवा संगम युवा संगम कार्यक्रम ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ पहल के तहत संचालित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं के बीच राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करना और विभिन्न राज्यों के लोगों के बीच सीधे संपर्क को बढ़ावा देना है।
उत्तराखंड के इस दल का समन्वयक संस्थान हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय है। वहीं पश्चिम बंगाल में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर इसकी मेजबानी कर रहा है। संस्थान के माध्यम से युवाओं को पश्चिम बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत, स्थानीय परंपराओं तथा शैक्षणिक परिवेश को समझने का अवसर मिल रहा है। राज्यपाल से मुलाकात में शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर चर्चा दौरे के दौरान 8 अक्टूबर को उत्तराखंड के प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर. एन. रवि से मुलाकात की। इस संवाद में सीखने के अवसरों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और देश के अलग-अलग हिस्सों के युवाओं के बीच संबंध मजबूत करने के महत्व पर चर्चा हुई।
मंत्रालय के मुताबिक, इस मुलाकात से विद्यार्थियों और शिक्षकों को राज्यपाल के विचार जानने तथा पश्चिम बंगाल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को समझने का अवसर मिला। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को केवल दूसरे राज्य की संस्कृति से परिचित कराना ही नहीं, बल्कि उनके बीच संवाद और आपसी समझ को भी बढ़ावा देना है। कार्यक्रम के सातवें चरण में 20 जोड़ी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के युवाओं को एक-दूसरे के यहां जाकर वहां की संस्कृति, शैक्षणिक संस्थानों, नवाचार से जुड़े प्रयासों और विकास संबंधी पहलों को समझने का अवसर दिया जा रहा है।
इस पहल के माध्यम से युवा अपने राज्य से बाहर निकलकर दूसरे क्षेत्रों की जीवनशैली, परंपराओं और सामाजिक परिवेश को समझते हैं। साथ ही, उन्हें अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों से मिलने, नए अनुभव हासिल करने और मित्रता के संबंध बनाने का अवसर मिलता है। उत्तराखंड के युवाओं का पश्चिम बंगाल दौरा भी इसी उद्देश्य को आगे बढ़ा रहा है। ऐसे कार्यक्रम देश की विविध सांस्कृतिक विरासत को समझने और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के बीच आपसी सम्मान बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। युवा संगम के माध्यम से केंद्र सरकार एक ऐसे भारत की भावना को मजबूत करने का प्रयास कर रही है, जहां विविधता के बावजूद एकता बनी रहे और साझा अनुभव देशवासियों को एक-दूसरे के करीब लाएं।
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