राष्ट्रीय समाचार
भारत में एथेनॉल आपूर्ति 895 करोड़ लीटर पहुंची, अनाज-आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत: इंडस्ट्री डेटा
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (एआईडीए) द्वारा शनिवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत ने एथेनॉल सप्लाई ईयर (ईएसवाई) 2025-26 के तहत अगस्त 2026 के अंत तक 895 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की है, जिसमें अनाज-आधारित फीडस्टॉक का हिस्सा कुल आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत है।
आंकड़ों के अनुसार, यह इस अवधि के लिए अनुबंधित 1,048 करोड़ लीटर मात्रा का लगभग 85 प्रतिशत है।
एआईडीए के अनुसार, देश की एथेनॉल आपूर्ति व्यवस्था में अब विविधता बढ़ रही है और उत्पादन किसी एक कच्चे माल पर निर्भर नहीं रह गया है। कुल आपूर्ति में अनाज-आधारित फीडस्टॉक का योगदान 624 करोड़ लीटर रहा, जबकि चीनी-आधारित स्रोतों से 271 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई। इस तरह कुल आपूर्ति में लगभग 70 प्रतिशत हिस्सेदारी अनाज-आधारित स्रोतों की रही।
अनाज-आधारित कच्चे माल में मक्का (मकई) सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनकर उभरा। अगस्त के अंत तक मक्का से 345 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की गई। इसके अलावा, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) से प्राप्त अधिशेष चावल से 214 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ, जबकि क्षतिग्रस्त खाद्यान्नों से 64 करोड़ लीटर एथेनॉल तैयार किया गया।
एआईडीए ने कहा कि मक्का और अधिशेष चावल के बढ़ते उपयोग से एथेनॉल उत्पादन क्षमता को स्थिरता मिल रही है और इससे ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ किसानों के लिए भी नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
चीनी-आधारित स्रोतों में गन्ने के रस से सबसे अधिक 149 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई। इसके अलावा, बी-हेवी शीरे से 107 करोड़ लीटर और सी-हेवी शीरे से 15 करोड़ लीटर एथेनॉल उपलब्ध कराया गया।
एआईडीए का कहना है कि विभिन्न स्रोतों से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से आपूर्ति शृंखला अधिक लचीली बनी है और किसी एक फसल या कच्चे माल पर निर्भरता कम हुई है।
एआईडीए की उपमहानिदेशक भारती बालाजी ने कहा कि अब तक आपूर्ति किए गए 895 करोड़ लीटर एथेनॉल में लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अनाज-आधारित स्रोतों से आया है, जिसमें मक्का और एफसीआई का अधिशेष चावल प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। वहीं, चीनी आधारित स्रोत भी अभी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि विभिन्न फीडस्टॉक का उपयोग भारत के एथेनॉल कार्यक्रम को अधिक मजबूत बनाता है, क्योंकि इससे देश की कृषि उपज का बेहतर उपयोग संभव होता है और उत्पादन जोखिम भी कम होता है।
हालांकि एआईडीए ने यह भी कहा कि जैसे-जैसे देश में एथेनॉल उत्पादन क्षमता और आपूर्ति बढ़ेगी, वैसे-वैसे इसके लिए स्थिर और अनुमानित मांग सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा। उद्योग का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो जाएगा।
भारत केवल पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (एफएफवी), कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी), सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (एसएएफ) और अन्य औद्योगिक उपयोगों में भी एथेनॉल की खपत बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
राष्ट्रीय समाचार
गुजरात: 15,000 और सरकारी इमारतों में लगाया जाएगा रूफटॉप सोलर सिस्टम

गुजरात प्रशासन 2026-27 के दौरान 15,000 और सरकारी इमारतों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाने की योजना बना रहा है। इस विस्तार से राज्य की मौजूदा रूफटॉप सोलर क्षमता में लगभग 65 मेगावाट की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, जिससे इस प्रोग्राम की कुल क्षमता 160 मेगावाट से ज्यादा हो जाएगी।
यह घोषणा तब की गई है जब इस साल मार्च तक गुजरात में 6,014 सरकारी इमारतों में ग्रिड-कनेक्टेड रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए गए, जिनकी कुल क्षमता 95 मेगावाट है।
2011-12 से क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट के तहत गुजरात एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी द्वारा लागू किए जा रहे इस प्रोग्राम का मकसद रिन्यूएबल एनर्जी के इस्तेमाल को बढ़ाना और पारंपरिक बिजली पर सरकारी खर्च को कम करना है।
क्लाइमेट चेंज मिनिस्टर अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि 2025-26 के दौरान, 1,377 सरकारी इमारतों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए गए, जिससे 17.1 मेगावाट की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जुड़ी। इस विस्तार के साथ मार्च 2026 तक रूफटॉप सोलर सिस्टम वाली सरकारी इमारतों की कुल संख्या 6,014 हो गई, जिससे इस पहल के तहत कुल इंस्टॉल्ड क्षमता 95 मेगावाट तक पहुंच गई।
राज्य ने 2026-27 में इस प्रोग्राम के लिए 314 करोड़ रुपए तय किए हैं। इसमें से 278 करोड़ रुपए सामान्य सरकारी इमारतों के लिए, 3 करोड़ रुपए सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट डिपार्टमेंट के तहत आने वाली इमारतों के लिए और 33 करोड़ रुपए ट्राइबल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट द्वारा मैनेज की जाने वाली इमारतों के लिए आवंटित किए गए हैं।
मोढवाडिया ने कहा कि सरकारी इमारतों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाने का सबसे बड़ा विस्तार इस साल हो रहा है, क्योंकि हम 15,000 सरकारी इमारतों पर इन्हें लगाने की योजना बना रहे हैं। इस प्रस्तावित विस्तार से लगभग 65 मेगावाट सोलर क्षमता जुड़ने की उम्मीद है, जिससे राज्य के पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल और मजबूत होगा।
इस स्कीम के तहत, राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाली इमारतों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिसमें क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट के सालाना बजट आवंटन से 100 प्रतिशत कैपिटल-कॉस्ट सपोर्ट दिया जाता है।
सरकार ने कहा कि इन सिस्टम के लगने से सरकारी दफ्तरों में पारंपरिक बिजली की खपत और बिजली पर होने वाले खर्च में कमी आने की उम्मीद है, साथ ही पारंपरिक बिजली उत्पादन से होने वाले प्रदूषण में भी कमी आएगी।
जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री प्रवीण माली ने कहा कि सोलर इंस्टॉलेशन से कई तरह के पर्यावरण और आर्थिक फायदे होने की उम्मीद है, जैसे पारंपरिक बिजली की खपत में कमी, सरकारी दफ्तरों के बिजली खर्च में कमी और पारंपरिक बिजली उत्पादन से होने वाले प्रदूषण में कमी।
राज्य ने इस साल सरकारी इमारतों पर लगे रिन्यूएबल एनर्जी इंस्टॉलेशन की दूर से निगरानी करने के लिए ‘इंडस्ट्रियल इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ पर आधारित रिन्यूएबल एनर्जी मॉनिटरिंग सिस्टम भी शुरू किया है।
मोढवाडिया ने कहा कि इस सिस्टम का मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर स्मार्ट मीटर, सेंसर और एलओटी गेटवे को जोड़ता है जो जीपीआरएस, 4जी और ईथरनेट के जरिए कनेक्टेड हैं। यह ऑटोमेटेड रिमोट अलर्ट देता है और हर 15 मिनट में परफॉर्मेंस डेटा रिकॉर्ड करता है, जिससे रोजाना 96 रीडिंग मिलती हैं। यह इंटरफेस अभी बड़ी क्षमता की निगरानी करता है, जिसमें 142.5 मेगावाट सोलर और 68.3 मेगावाट विंड पावर जनरेशन शामिल है।
सरकार ने कहा कि इस मॉनिटरिंग सिस्टम का मकसद रिन्यूएबल एनर्जी इंस्टॉलेशन से रेगुलर परफॉर्मेंस डेटा देना और ऑपरेशन से जुड़ी दिक्कतों के लिए रिमोट अलर्ट की सुविधा देना है।
केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, गुजरात की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 47,178 मेगावाट है और इसने राजस्थान को पीछे छोड़कर रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के मामले में देश का अग्रणी राज्य बनने का मुकाम हासिल किया है। राज्य की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में सोलर और विंड पावर का बड़ा हिस्सा है।
राष्ट्रीय समाचार
आदि कैलाश में 14,400 फीट की ऊंचाई पर मदद के लिए पहुंची भारतीय सेना

आदि कैलाश की बर्फीली और दुर्गम ऊंचाइयों में फंसी एक महिला यात्री की मदद के लिए भारतीय सेना ने त्वरित कार्रवाई की है। जवानों ने यहां एक पल भी गंवाए बिना मोर्चा संभाल लिया। करीब 14,400 फीट की ऊंचाई पर सेना को एक व्यक्ति के बीमार होने की सूचना मिली। यह सूचना मिलते ही सेना की पंचशूल ब्रिगेड के जवान तुरंत बचाव अभियान में जुट गए।
दरअसल यह दुर्गम पहाड़ी इलाका आसान नहीं था। ऊंचाई, कठिन रास्ते और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हर कदम पर मुसीबत परीक्षा ले रही थीं। लेकिन सैनिकों का लक्ष्य बिल्कुल साफ था कि संकट में फंसे व्यक्ति को जल्द से जल्द सुरक्षित निकालना है। पंचशूल ब्रिगेड के जवानों ने कठिन भूभाग की परवाह किए बिना तेजी से कार्रवाई की। बचाव अभियान के दौरान उनकी तत्परता और साहस ने यह दिखाया कि भारतीय सेना के लिए हर जीवन की कीमत है। सेना के जवानों ने महिला को सुरक्षित बचाया और उसे तुरंत आवश्यक मेडिकल सहायता दी गई।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा से लेकर देश के सबसे दुर्गम इलाकों तक, सेना सिर्फ राष्ट्र की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि जरूरत की घड़ी में नागरिकों के साथ भी मजबूती से खड़ी रहती है। 14,400 फीट की ऊंचाई पर मदद की इस पुकार के जवाब में भारतीय सेना की कार्रवाई ने इसे एक बार फिर साबित किया है।
गौरतलब है कि समुद्र के बीच अचानक आई ऐसी एक चिकित्सकीय आपात स्थिति में भारतीय सैन्य बलों ने समय पर कार्रवाई करते हुए एक विदेशी नागरिक की भी जान बचाई है। अंडमान और निकोबार कमान ने समुद्र में घायल हुए वियतनामी नागरिक को सुरक्षित निकालकर उसे आगे के उपचार के लिए कैंपबेल बे पहुंचाया।
यह वियतनामी नागरिक व्यापारी जहाज एमटी सन 09 पर सवार था। एक हादसे में यह विदेशी नागरिक घायल हो गया था। समुद्र में उसकी हालत को देखते हुए चिकित्सकीय सहायता और सुरक्षित निकासी की तत्काल जरूरत थी। सूचना मिलते ही बचाव अभियान शुरू किया। नौसेना के समुद्री घटक का एक जहाज इंदिरा प्वाइंट के आसपास के क्षेत्र में पहुंचा। इसके बाद भारतीय सैन्य दल ने नौका के जरिए घायल व्यक्ति तक पहुंच बनाई। बिना देर किए जख्मी व्यक्ति को सुरक्षित निकालकर जहाज पर लाया गया। जहाज पर ही उसे तत्काल प्राथमिक उपचार दिया गया।
राजनीति
इंदौर जल संकट: गायब दस्तावेजों और प्रशासनिक देरी को लेकर कांग्रेस ने उठाए सवाल

मध्य प्रदेश कांग्रेस ने इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल संकट की न्यायिक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने और प्रशासनिक स्तर पर हुई लंबी देरी पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने कहा कि जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर सरकार को स्पष्ट रूप से जवाबदेही तय करनी चाहिए।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने शुक्रवार को इंदौर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि न्यायिक जांच रिपोर्ट ने केवल पानी के दूषित होने पर ही सवाल नहीं उठाए हैं, बल्कि यह भी सामने आया है कि शहर की जलापूर्ति और सीवरेज व्यवस्था की योजना कैसे बनाई गई, उसका रखरखाव कैसे हुआ और उसकी निगरानी किस तरह की गई।
सिंघार ने कहा, “महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग रिकॉर्ड आयोग के सामने उपलब्ध नहीं कराए गए। सरकार को बताना चाहिए कि ये रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं थे और इस चूक के लिए किसकी जवाबदेही तय होगी।”
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाले एक सदस्यीय आयोग ने भागीरथपुरा में पानी के दूषित होने, लोगों के बीमार पड़ने और मौतों के कारणों के साथ प्रशासनिक एवं तकनीकी खामियों की जांच की थी। आयोग ने अगस्त में अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी थी।
कांग्रेस के मुताबिक, रिपोर्ट में पाया गया कि भागीरथपुरा में सीवरेज का पानी पेयजल पाइपलाइनों में प्रवेश कर गया था, जिससे लोगों तक पहुंचने वाला पानी दूषित और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो गया।
रिपोर्ट में सीवरेज और गंदे पानी की पाइपलाइन से जुड़े कार्यों में हुई देरी की भी जांच की गई। इसमें टेंडर प्रक्रिया, फाइलों की आवाजाही और काम के क्रियान्वयन से जुड़े पहलुओं को देखा गया। सिंघार ने कहा कि लेआउट प्लान, ब्लूप्रिंट, डिजाइन ड्रॉइंग और पाइपलाइन अलाइनमेंट मैप जैसे तकनीकी दस्तावेज किसी भी शहरी जल नेटवर्क को समझने और उसके रखरखाव के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे दस्तावेजों का उपलब्ध नहीं होना गंभीर विषय है।
कांग्रेस ने सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी एक फाइल में हुई देरी का मुद्दा भी उठाया। सिंघार ने दावा किया कि यह फाइल मेयर के हस्ताक्षर के लिए 66 दिनों तक लंबित रही। उन्होंने पूछा कि फाइल के निस्तारण में इतनी देरी क्यों हुई।
उन्होंने सवाल किया, “देश के सबसे स्वच्छ शहर में दूषित पेयजल के कारण मौतें कैसे हुईं?” हालांकि, मीडिया रिपोर्टों में उद्धृत जांच के निष्कर्षों के अनुसार, केवल इस आधार पर कि फाइल मेयर के हस्ताक्षर के लिए लंबित रही थी, आयोग ने व्यक्तिगत रूप से मेयर की जिम्मेदारी तय नहीं की है। कांग्रेस की ओर से उठाया गया सवाल प्रशासनिक स्तर पर हुई देरी और उसकी जवाबदेही से संबंधित है।
जांच आयोग ने कुल 36 मौतों की जांच की थी। सिंघार द्वारा उद्धृत रिपोर्ट के विवरण के अनुसार, इनमें 22 मौतों को दूषित पानी से संबंधित माना गया। हालांकि, इस घटना से जुड़ी मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं।
सिंघार ने प्रभावित परिवारों और मरीजों के लिए आयोग की सिफारिशों को लागू करने की भी मांग की। आयोग ने मृतकों के परिवारों को 10 लाख रुपये और प्रभावित मरीजों के लिए आर्थिक एवं चिकित्सकीय सहायता की सिफारिश की है।
सिंघार ने कहा, “भागीरथपुरा के लोगों को पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय मिलना चाहिए।” उन्होंने सरकार से पूछा कि आयोग की सिफारिशें कब लागू की जाएंगी और प्रभावित परिवारों को मुआवजा कब जारी किया जाएगा।
भागीरथपुरा जल त्रासदी दिसंबर 2025 में सामने आई थी। उस समय दूषित पानी पीने के बाद बड़ी संख्या में स्थानीय लोग बीमार पड़ गए थे। न्यायिक आयोग ने पानी के नमूनों में ई. कोली और टोटल कोलीफॉर्म समेत बैक्टीरिया पाए जाने की बात कही थी। रिपोर्ट के अनुसार, दूषित पानी के कारण गैस्ट्रोएंटेराइटिस, उल्टी, दस्त और डिहाइड्रेशन जैसी जलजनित बीमारियां हुईं।
जांच में यह भी कहा गया कि क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को समय पर बदल दिया जाता तो इस त्रासदी को रोका जा सकता था। ऐसे में प्रशासनिक देरी का मुद्दा जांच के प्रमुख पहलुओं में शामिल रहा।
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