राजनीति
हमें आत्मनिर्भर बनना चाहिए, चीनी वस्तुओं का बहिष्कार मदद नहीं करेगा : चिदंबरम
चीनी सामानों के बहिष्कार के खिलाफ सलाह देते हुए पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने शनिवार को जोर देकर कहा कि भारत को जितना संभव हो, उतना आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है, लेकिन बाकी दुनिया से रिश्ते भी खत्म नहीं कर सकते हैं।
कांग्रेस नेता ने यहां वीडियो कांफ्रेंस के जरिए मीडिया से कहा कि जब सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों की बात करें तो इसमें बहिष्कार जैसी बातें नहीं आनी चाहिए।
कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत को चीन के सामान का बहिष्कार नहीं करना है और उसे वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बने रहना होगा। उन्होंने कहा कि चीन के साथ जो भी भारत के व्यापारिक रिश्ते हैं, वह चीन के वैश्विक व्यापार का हिस्सा है। चिदंबरम ने कहा कि इसलिए चीन के सामानों का बहिष्कार करने से उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।
चिदंबरम ने कहा कि भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बने रहना चाहिए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमवार रात चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के हमले में लद्दाख की गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों के शहीद होने के मद्देनजर चीनी उत्पादों के बहिष्कार की बढ़ती मांग पर एक सवाल का जवाब दे रहे थे।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
जर्मन विदेश मंत्री ने अमेरिका-इजरायल हमले को बताया सही, तेहरान बोला- शर्मनाक बयान

तेहरान ने जर्मन विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल के उस बयान पर सख्त ऐतराज जताया है जिसमें उन्होंने ईरान पर अमेरिका-इजरायल की संयुक्त कार्रवाई का बचाव किया था। गुरुवार को ईरानी विदेश मंत्रालय ने इसे ‘शर्मनाक और निम्न स्तर का बयान’ करार दिया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पोस्ट के जरिए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने उनकी आलोचना की। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की पुरानी टिप्पणी याद दिलाई।
पोस्ट में लिखा, “एक समय चांसलर मर्ज ने बड़े उत्साह से कहा था कि इजरायल, ईरान पर हमला करके ‘गंदा काम’ कर रहा है। लेकिन कुछ ही महीनों बाद, वही चांसलर अब इस बात पर अफसोस जता रहे हैं कि इस युद्ध की वजह से यूरोपीय अर्थव्यवस्था को 100 अरब यूरो का नुकसान हो रहा है!”
बाघेई ने आगे लिखा, “अब उनके विदेश मंत्री भी ईरान पर हुए सैन्य हमले को सही ठहराने के लिए मजबूर महसूस कर रहे हैं। बाघेई ने आगे कहा कि वे इतनी उदासीनता और गहरे नैतिक पतन का शिकार हैं कि न तो उन्हें इंसानी जानों के नुकसान और युद्ध अपराधों का एहसास है, और न ही वे उस आर्थिक नुकसान को समझ पा रहे हैं जो यह युद्ध उनके अपने देश और पूरे यूरोप को पहुंचा रहा है।”
बाघेई ने एक जर्मन कहावत के जरिए अपनी बात पर विराम लगाया। उन्होंने कहा , “नुकसान उठाने से इंसान समझदार बनता है।” लेकिन ऐसा लगता है कि ‘हंस गुक-इन-दी-लुफ्ट’ (लापरवाह व्यक्ति) को कुछ भी सिखाया नहीं जा सकता।
विदेश मंत्री वाडेफुल का बुधवार को एक पॉडकास्ट प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने सैन्य हमले को सही तो नहीं ठहराया लेकिन साथ ही उन्होंने कहा, “इस टकराव का कारण जाहिर तौर पर ईरान है, जो खुद को परमाणु हथियारों से लैस करने की तैयारी कर रहा है और कई पड़ोसी देशों में ऐसे मिलिशिया समूहों का समर्थन करता है, जो उन देशों की संप्रभुता का सम्मान नहीं करते हैं।” ईरान के मुताबिक उनका ये वक्तव्य अमेरिका और इजरायल के पक्ष में है।
जून में ही जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने इजरायल और अमेरिका के ईरान पर किए गए हमलों को लेकर संतुलित बयान देने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा कि इजरायल हम सब की तरफ से “गंदा काम” कर रहा है।
राजनीति
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक लड़ाई में ‘बेबी-ममता’ की नजदीकियों से वामपंथियों के बीच बेचैनी बढ़ी

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ पूरे देश में एक गठबंधन बनाने के लिए विपक्ष के बीच दिख रही एकजुटता शायद अभी तक शीर्ष नेतृत्व से नीचे जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुंची है। हाल ही में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीआईएम के महासचिव एमए बेबी और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट के बीच दिखी नजदीकी ने खबरों के अनुसार वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) के कुछ हिस्सों में एक असहज बहस छेड़ दी है।
ऐसा लगता है कि नई दिल्ली में रविवार को ‘इंडिया’ ब्लॉक की रैली की एक तस्वीर सामने आने के बाद यह विवाद और भड़क गया है। इस तस्वीर में ‘बेबी’ (एमए बेबी) ममता बनर्जी के कान में कुछ फुसफुसाते हुए दिख रहे हैं, और ममता मुस्कुराते हुए उनकी बात ध्यान से सुन रही हैं।
कुछ समय पहले तक ऐसी तस्वीर की कल्पना करना भी मुश्किल था, और लोग इसे नापसंद भी करते। ऐसा इसलिए है क्योंकि ममता का एकमात्र राजनीतिक लक्ष्य पश्चिम बंगाल में वामपंथियों (लेफ्ट) के गढ़ को तोड़ना था। उन्होंने 2011 में यह हासिल भी कर लिया—कांग्रेस पार्टी छोड़ने के लगभग 13 साल बाद जब उन्होंने कांग्रेस के राजनीतिक इरादों पर सवाल उठाए थे।
इस विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि क्या वामपंथी दल, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ कड़ा राजनीतिक संघर्ष जारी रखते हुए भाजपा से भी प्रभावी ढंग से लड़ सकते हैं, खासकर पश्चिम बंगाल में?
कम्युनिस्टों के बीच एक विचारधारा यह है कि भाजपा से लड़ने के लिए वामपंथी दलों को अपने ‘दुश्मन के दुश्मन’ के साथ हाथ मिला लेना चाहिए, भले ही वे क्षेत्रीय स्तर पर उनके विरोधी ही क्यों न हों।
इस विचार का समर्थन करने वाले लोग बताते हैं कि वामपंथियों का एकजुट होना तभी संभव हो पाया, जब सीपीआईएम की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था ने ‘सांप्रदायिक ताकतों’ के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस पार्टी को समर्थन देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।
वे यह भी मानते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) से समर्थन वापस लेने के बाद ही वामपंथियों के जनाधार में गिरावट शुरू हुई। हालांकि, इस विचार का कड़ा विरोध भी हो रहा है। विरोध करने वालों का तर्क है कि पश्चिम बंगाल में जब ममता बनर्जी अपने चरम पर थीं, तब कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बावजूद वे उन्हें चुनौती देने में विफल रहे थे।
एक और पहलू यह है कि केरल में वामपंथी गठबंधन का सीधा मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से है। जमीनी स्तर पर हो रही चर्चाओं और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी का एक धड़ा इस नई राजनीतिक दिशा को वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता और पूर्व महासचिव प्रकाश करात की रणनीतिक सोच से दूर जाने के रूप में देख रहा है।
सालों तक, बंगाल के वामपंथी नेताओं का यही मानना रहा है कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वामपंथी नेताओं का तर्क था कि ममता बनर्जी के साथ किसी भी तरह का राजनीतिक समझौता करने से उनकी अपनी स्वतंत्र पहचान कमजोर होगी और उनके कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होगा, खासकर ऐसे राज्य में, जहां पार्टी का आरोप रहा है कि ममता के शासन में उनके समर्थकों पर अत्याचार किए गए हैं। पर्यवेक्षकों का मानना है कि सीपीआईएम प्रमुख बनने के बाद से, बेबी ने ‘भाजपा-विरोधी एकता’ को मजबूत करने पर काफी जोर दिया है। इस दौरान, ‘इंडिया’ ब्लॉक के दायरे में ममता बनर्जी के साथ उनकी बातचीत काफी ‘सौहार्दपूर्ण’ रही है।
भारतीय राजनीति में भाजपा एक प्रमुख ताकत बनी हुई है, लेकिन संसद में सीपीआईएम की मौजूदगी अब पहले की तुलना में बहुत कम रह गई है। ऐसे हालात में पार्टी के भीतर कई लोगों का मानना है कि विपक्ष की एकता अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक रणनीतिक जरूरत बन गई है, लेकिन पार्टी के कट्टर समर्थकों को डर है कि इन तस्वीरों और संदेशों से यह संकेत जा सकता है कि सीपीआईएम तृणमूल के प्रति अपना विरोध नरम कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
अमेरिका से बातचीत शांति का विकल्प, लेकिन राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा उत्तर कोरिया: किम यो जोंग

उत्तर कोरिया ने बुधवार को कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत शांति स्थापित करने का एक विकल्प है, लेकिन इसे अपने राष्ट्रीय हितों के लिए वो जरूरी नहीं मानता। उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने यह बयान देते हुए अमेरिका पर प्योंगयांग के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति जारी रखने का आरोप लगाया।
उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी (केसीएनए) के हवाले से योनहाप न्यूज एजेंसी ने बताया कि किम यो जोंग ने कहा कि अमेरिका लगातार ऐसे संकेत दे रहा है, जिनसे उत्तर कोरिया को उसके वास्तविक इरादों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा, ”शांति के विकल्पों में निश्चित रूप से बातचीत भी शामिल है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बातचीत हमारे राष्ट्रीय हितों के बराबर है।”
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी एफबीआई ने दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज बाइनेंस से 6 अरब डॉलर से अधिक की क्रिप्टोकरेंसी चोरी के मामले में उत्तर कोरिया की संलिप्तता का आरोप लगाया है। उत्तर कोरिया ने इस आरोप को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक उकसावे की कार्रवाई बताया है।
किम यो जोंग ने बुधवार को एक बार फिर इस आरोप को अमेरिका की शत्रुतापूर्ण नीति का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि तथाकथित उत्तर कोरियाई क्रिप्टोकरेंसी हैकिंग का मामला अमेरिका की प्योंगयांग विरोधी नीति की वास्तविक प्रकृति की केवल एक झलक है।
उन्होंने दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान के विदेश मंत्रियों की हालिया त्रिपक्षीय बैठक का भी उल्लेख किया। इस बैठक में तीनों देशों ने उत्तर कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। किम ने इन देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यासों को भी उत्तर कोरिया के खिलाफ शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का हिस्सा बताया।
किम यो जोंग ने कहा कि अमेरिका को उत्तर कोरिया के प्रति अपनी शत्रुतापूर्ण नीति छोड़नी होगी। उनके मुताबिक, सभी समस्याओं के समाधान के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वाशिंगटन अपनी टकराव की नीति नहीं बदलता, तब तक प्योंगयांग के पास अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर बैठने का कोई कारण नहीं है।
उन्होंने कहा, “उत्तर कोरिया को ऐसे अविश्वसनीय और शत्रुतापूर्ण लोगों के साथ आमने-सामने बैठने की जरूरत नहीं है, जो अपनी टकराव की नीति छोड़ने को तैयार नहीं हैं।”
यो ने अमेरिका की कथित शत्रुतापूर्ण गतिविधियों के जवाब में उत्तर कोरिया की ओर से जवाबी कदम उठाए जाने की चेतावनी भी दी। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि प्योंगयांग किस तरह की कार्रवाई कर सकता है।
उनका यह बयान उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच संभावित कूटनीतिक संपर्कों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से मुलाकात की इच्छा जता चुके हैं। इस महीने दोनों नेताओं के बीच संभावित मुलाकात को लेकर अटकलें भी लगाई जा रही हैं, हालांकि उत्तर कोरिया की ओर से इस संबंध में कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है।
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