मनोरंजन
दिग्गज कन्नड़ अभिनेता शिवराम का निधन
ग्गज कन्नड़ अभिनेता शिवराम का 83 वर्ष की आयु में शनिवार को बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वरिष्ठ अभिनेता को 30 नवंबर को उनके आवास पर पूजा करते समय गिरने और ब्रेन हैमरेज होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
उनकी बढ़ती उम्र को देखते हुए डॉक्टर उनकी सर्जरी नहीं कर सके। बाद में उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। दिग्गज अभिनेता शिवराम ने छह दशकों की अपनी शानदार सिनेमा यात्रा में अभिनेता, हास्य अभिनेता आदि भूमिकाओं के रूप में काम किया।
उन्होंने एक सहायक निर्देशक के रूप में अपना करियर शुरू किया और पुट्टन्ना कनागल, संगीतम श्रीनिवास राव और सीताराम शास्त्री जैसे महान निर्देशकों के साथ काम किया। ‘नागरहावु’ और ‘शुभमंगला’ में उनकी भूमिकाएं अभी भी कन्नड़ दर्शकों के बीच पसंद की जाती हैं।
शिवराम ने 1972 में फिल्म ‘हृदय संगम’ का निर्देशन किया और कन्नड़ और तमिल में कुछ फिल्मों का निर्माण किया, जिसमें सुपरस्टार रजनीकांत की ‘धर्म दुरई’ भी शामिल है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने वरिष्ठ अभिनेता के निधन पर शोक व्यक्त किया है और कहा है कि यह जानकर दुख हुआ। उन्होंने कहा, “यह कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी क्षति है।”
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समय रैना समेत 5 कॉमेडियन को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, दिव्यांगों पर टिप्पणी मामले में एफआईआर रद्द करने का आदेश

दिव्यांग लोगों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर टिप्पणी मामले में समय रैना और उनके साथ जुड़े चार अन्य कॉमेडियन को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ी राहत दी। अदालत ने समय रैना, विपुल गोयल, बलराज परमजीत सिंह घई, सोनाली ठक्कर और निशांत जगदीश तंवर के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि समय रैना और बाकी चार लोगों ने अदालत के पहले दिए गए निर्देशों का पालन किया। दरअसल, अदालत ने पहले उन्हें दिव्यांग लोगों के लिए जागरूकता बढ़ाने वाले कार्यक्रम करने और इलाज के लिए पैसे जुटाने की दिशा में काम करने का आदेश दिया था, जिसके बाद इन्होंने कई कार्यक्रम किए और दिव्यांग लोगों से जुड़े मुद्दों को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह दी। इसी आधार पर कोर्ट ने इन पांचों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया।
यह विवाद समय रैना के कॉमेडी शो ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ से शुरू हुआ था। इस शो में कही गई कुछ बातों के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में शिकायतें और एफआईआर दर्ज हुई थीं। बाद में दिव्यांग लोगों से जुड़े एक संगठन क्योर एसएमए ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। संगठन का कहना था कि शो में गंभीर शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों और दिव्यांगों को लेकर ऐसी बातें कही गईं, जो उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाती है।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के मजाक को बेहद गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा था कि किसी व्यक्ति का मजाक उड़ाना या उसे नीचा दिखाना सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने समय रैना और अन्य कॉमेडियन को दिव्यांग लोगों के लिए काम करने और उनके इलाज के लिए पैसे जुटाने से जुड़े कार्यक्रम करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने कहा था कि ऐसे कार्यक्रमों में दिव्यांग लोगों को शामिल किया जाए। उनकी जिंदगी की मुश्किलों के साथ-साथ उनकी उपलब्धियों और सफलता की कहानियों को भी सामने लाया जाए, ताकि लोगों के बीच दिव्यांगों को लेकर सही सोच बने।
इसी मामले में एक समय सुप्रीम कोर्ट ने समय रैना समेत पांच कॉमेडियन को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश भी दिया था। कोर्ट ने मुंबई पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया था कि उन्हें नोटिस जारी कर अगली सुनवाई में उनकी मौजूदगी सुनिश्चित की जाए। उस वक्त अदालत ने चेतावनी दी थी कि अगर वे पेश नहीं हुए तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
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करिश्मा कपूर ने बताया ‘महबूब मेरे’ का मजेदार किस्सा, कहा- गाने में मैं ऋतिक रोशन को ढूंढ रही थीं

अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने 90 के दशक से हिंदी सिनेमा में राज किया है और अभी भी उनके प्रति दीवानगी लोगों के दिलों में कायम हैं। अभिनेत्री ने हाल ही में फिल्म ‘फिजा’ के मशहूर गाने ‘महबूब मेरे’ की अनकही कहानी बताई।
अभिनेत्री ने बताया कि फिल्म में उन्हें गाने की सिचुएशन काफी अजीब लगी थी, जब सुष्मिता सेन गाने पर डांस कर रही थीं, जबकि वह खुद फिल्म में ऋतिक रोशन को ढूंढ रही थीं।
अभिनेत्री ने इस बात का खुलासा डांस रियलिटी शो ‘इंडियाज बेस्ट डांसर सीजन 5’ में किया था। शो के स्पेशल एपिसोड में कंटेस्टेंट वैदेही और रोमशा ने ‘महबूब मेरे’ समेत कुछ टाइमलेस बॉलीवुड गानों पर दमदार परफॉर्मेंस दी थी। परफॉर्मेंस के बाद करिश्मा ने इस गाने से जुड़ा अपना अनुभव शेयर किया और फिल्म ‘फिज़ा’ से जुड़ा एक कम जाना-पहचाना किस्सा भी बताया।
करिश्मा ने कहा, “आप लोगों को शायद ये पता नहीं होगा, लेकिन इस गाने में भी हूं। ये सिचुएशन बहुत अलग थी और मुझे भी बहुत अजीब लग रहा था कि सुष्मिता डांस कर रही थीं और मैं गाने के बीच में ऋतिक को ढूंढ रही थी। ये फिल्म ‘फिजा’ का गाना है। तो हां, मेरे लिए ये एक बहुत ही अनोखी सिचुएशन थी।”
सॉन्ग ‘महबूब मेरे’ वर्ष 2000 में रिलीज हुई बॉलीवुड फिल्म ‘फिजा’ का एक बेहद लोकप्रिय और सदाबहार गाना है। इस गाने में अभिनेत्री सुष्मिता सेन ने एक स्पेशल अपीयरेंस (कैमियो) में शानदार डांस किया था, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया।
सुष्मिता सेन वाला यह गाना उस समय के यादगार डांस नंबर्स में से एक बन गया, जबकि ‘फिजा’ में ऋतिक रोशन, करिश्मा कपूर और डिंपल कपाड़िया ने अहम रोल निभाए थे।
‘फिजा’ एक बेहतरीन हिंदी ड्रामा और क्राइम थ्रिलर फिल्म है, जिसे खालिद मोहम्मद ने लिखा और निर्देशित किया है। इस फिल्म में करिश्मा कपूर, ऋतिक रोशन और जया बच्चन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।
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कभी महज 50 रुपए महीने कमाते थे शम्मी कपूर, थिएटर से शुरु किया था बॉलीवुड के ‘याहू स्टार’ बनने तक का सफर

अभिनेता शम्मी कपूर ने अपनी खूबसूरत मुस्कान, गजब की फुर्ती, अलग तरह के डांस और पर्दे पर बेफिक्र अंदाज से लोगों के दिलों में खास पहचान बनाई। लोग उन्हें ‘याहू’ स्टार और ‘इंडिया का एल्विस प्रेस्ली’ कहते थे। उन्होंने करियर की शुरुआत अपने पिता पृथ्वीराज कपूर की थिएटर कंपनी से की थी, और उस समय उन्हें हर महीने सिर्फ 50 रुपए मिलते थे।
शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को बंबई में हुआ था। उनका पूरा नाम शमशेर राज कपूर था। वह मशहूर अभिनेता और रंगमंच कलाकार पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर व शशि कपूर के भाई थे। उनका मन पढ़ाई से ज्यादा अभिनय की दुनिया में था, जिसके चलते वह साल 1948 में अपने पिता की थिएटर कंपनी पृथ्वी थिएटर्स से जुड़ गए। यहां उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर काम शुरू किया। उनकी शुरुआती तनख्वाह 50 रुपए महीना थी। वह 1952 तक थिएटर से जुड़े रहे और जब उन्होंने इसे छोड़ा तो उनकी आखिरी तनख्वाह 300 रुपए थी।
थिएटर के बाद शम्मी कपूर ने फिल्मों का रुख किया। उन्होंने महेश कौल के निर्देशन में कारदार फिल्म कंपनी के साथ ‘जीवन ज्योति’ में बतौर हीरो काम किया। उनकी पहली हीरोइन चांद उस्मानी थीं। शुरुआती दौर आसान नहीं था। 1952 से 1955 के बीच उन्होंने ‘रेल का डिब्बा’, ‘लैला मजनू’, ‘ठोकर’, ‘शमा परवाना’, और ‘हम सब चोर हैं’ जैसी कई फिल्मों में काम किया लेकिन इनमें से ज्यादातर फिल्में उम्मीद के मुताबिक लोगों के दिलों में जगह नहीं बना सकीं।
कई फिल्मों की असफलता के बाद 1957 में ‘तुमसा नहीं देखा’ ने उनकी किस्मत बदल दी। इसके बाद ‘दिल देके देखो’ ने उनकी नई छवि को मजबूत किया। 1961 में ‘जंगली’ आई और शम्मी कपूर देखते ही देखते बड़े स्टार बन गए। इसी फिल्म ने उन्हें ‘याहू’ स्टार का टैग दिलाया। इसके बाद ‘प्रोफेसर’, ‘चाइना टाउन’, ‘कश्मीर की कली’, ‘ब्लफ मास्टर’, ‘जानवर’, ‘राजकुमार’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘एन इवनिंग इन पेरिस’, ‘ब्रहमचारी’ और ‘अंदाज’ जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया।
शम्मी कपूर अपने डांस के लिए मशहूर हुए और पर्दे पर उनकी एनर्जी ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई। ‘तीसरी मंजिल’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फिल्मों में उनका अंदाज आज भी याद किया जाता है लेकिन जब उनकी उम्र बढ़ी तो उन्होंने हीरो के बजाय सहायक भूमिकाएं करना शुरू किया। ‘विधाता’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी।
‘ब्रहमचारी’ के लिए शम्मी कपूर को 1969 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला। इसके अलावा, उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट जैसे सम्मान भी मिले।
14 अगस्त 2011 को 79 साल की उम्र में शम्मी कपूर का मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया था। वह लंबे समय से किडनी की बीमारी से परेशान थे और डायलिसिस पर थे। उनकी मौत किडनी फेल होने के कारण हुई थी।
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