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Sunday,04-December-2022

अनन्य

यूपी : मुहर्रम में जुलूस नहीं निकालेगा कानपुर का मुसलमान समुदाय

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उत्तर प्रदेश के कानपुर में मुस्लिम समुदाय ने किसी भी अप्रिय घटना की संभावना से बचने के लिए इस साल मुहर्रम पर जुलूस नहीं निकालने का फैसला किया है। कोविड-19 महामारी के कारण पिछले दो वर्षो को छोड़कर कई वर्षों से जुलूस को निकाला जा रहा है। हालांकि, इस साल जुलूस निकालने की संभावना थी, लेकिन मुस्लिम समुदाय ने जुलूस नहीं निकालने का फैसला किया है।

जुलूस में ज्यादातर लोग कुर्ता-पायजामा पहनते हैं, युवा पीठ और कंधों के बीच रस्सियों और घंटियों के साथ इमामबाड़ा, कर्बला और इमाम चौक पर जाते हैं और साथ ही ‘हां हुसैन, या हुसैन’ के नारे लगाते हैं।

तंजीम निशान-ए-पाइक कासीद-ए-हुसैन के खलीफा शकील और तंजीम-अल-पाइक कासिद-ए-हुसैन के लोगों से चंदा लेकर हर साल जुलूस निकालते हैं।

जुलूस के वर्तमान प्रभारी कफील कुरैशी ने कहा कि इस साल मुहर्रम के मौके पर जुलूस नहीं निकाला जाएगा।

उन्होंने कहा, “शहर के माहौल को ध्यान में रखते हुए इस साल जुलूस नहीं निकालने का फैसला किया गया है। हमने लोगों से इस मोहर्रम में अपने घरों में नमाज अदा करने और शहर में शांति बनाए रखने में मदद करने की अपील की है।” ऐसा ही फैसला खलीफा शकील ने लिया है।

खलीफा शकील ने कहा, “इस साल जुलूस नहीं निकलेगा। प्रशासन को भी इस बारे में अवगत करा दिया गया है। 3 जून की हिंसा के बाद शहर के माहौल को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। हमने लोगों से कहा है कि वे ऐसे किसी भी काम में शामिल न हों, जिससे शहर की कानून व्यवस्था प्रभावित हो।”

संयुक्त पुलिस आयुक्त आनंद प्रकाश तिवारी ने कहा, “यह निर्णय शहर की शांति के लिए है। दोनों खलीफाओं की पहल का सभी को स्वागत करना चाहिए।”

अनन्य

हाई कोर्ट ने मैला ढोने वाले मृतक के परिजनों को मुआवजे पर दिल्ली सरकार से जवाब मांगा

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delhi high court

नई दिल्ली, 3 दिसम्बर : दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को आम आदमी पार्टी सरकार को निर्देश दिया कि वह हाल ही में हाथ से मैला ढोने के दौरान मारे गए दो सफाई कर्मचारियों को मुआवजे के भुगतान के संबंध में एक हलफनामा दाखिल करे। मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने स्पष्टीकरण मांगा कि क्या दिया गया 10 लाख रुपये का मुआवजा सुप्रीम कोर्ट के आदेश या एक अलग योजना पर था और इस तरह की घटनाओं के कारण मरने वाले प्रत्येक कर्मचारी को दिया जाता है।

आदेश पारित करने से पहले, उच्च न्यायालय ने मीडिया रिपोटरें का स्वत: संज्ञान लिया था, जो मैला ढोने के कारण होने वाली मौतों की संख्या के बारे में था। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव को न्यायमित्र नियुक्त किया गया था। अदालत ने तब दिल्ली नगर निगम और अन्य के खिलाफ नोटिस जारी किया था, जिसका एक सप्ताह में जवाब देने को कहा था।

इससे पहले, दिल्ली विकास प्राधिकरण को बंद सीवर की सफाई के दौरान मारे गए लोगों के परिजनों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने के लिए कहा गया था। हाईकोर्ट ने कहा था, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 75 साल बाद भी लोगों का मैला ढोने वालों के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

प्रारंभ में, केंद्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालय को सूचित किया गया था कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हताहतों की संख्या में कमी आई है और अब वह हाथ से मैला ढोने पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। केंद्र ने पहले 2019 में एडवोकेट अमित साहनी द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जवाब के रूप में अपने सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के माध्यम से एक छोटा हलफनामा प्रस्तुत किया था, जिसमें हाथ से मैला ढोने वालों के रोजगार पर प्रतिबंध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 का कड़ाई से अनुपालन करने की मांग की गई थी।

इसके अलावा, 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर कहा था, मैनुअल स्कैवेंजर्स रोगग्रस्त सीवेज और गड्ढों के संपर्क में आने से अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों के अधीन हैं, जिसमें उक्त मैला ढोने वालों को बिना किसी सुरक्षा के काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। उपरोक्त असुरक्षित काम करने की स्थिति के परिणामस्वरूप या तो मैला ढोने वाले पुरानी या तीव्र बीमारियों या रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं, जिसके लिए कोई चिकित्सा देखभाल सुविधा उपलब्ध नहीं है या इसके परिणामस्वरूप मैला ढोने वालों का दुर्भाग्यपूर्ण और असामयिक निधन हो सकती है, जिसमें अधिकांश मामलों में संबंधित राज्य द्वारा मुआवजा भी अगले परिजनों को नहीं दिया जाता है।

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बिहार में पिछड़ा, अति पिछड़े छात्रों के लिए बनेंगे विज्ञान, साहित्य क्लब

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SCHOOL

बिहार में ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों के समग्र विकास के लिए अब उनके क्लबों का गठन होगा। इन बच्चों को बेहतर अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे ये सामान्य योग्यता हासिल कर संबंधित विषयों के गूढ़ और उसकी मौलिकता जान सकें। शिक्षा विभाग के मुताबिक, पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने राज्य के सभी जननायक कर्पूरी ठाकुर छात्रावास, अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण छात्रावास व अन्य पिछड़ा वर्ग कन्या आवासीय प्लस टू उच्च विद्यालयों में गणित एवं विज्ञान क्लब के साथ-साथ साहित्य और समाजशास्त्र क्लबों के गठन का निर्णय लिया है।

विभाग का मानना है कि साहित्य एवं समाजशास्त्र के सैद्धांतिक विषयों के प्रति भी मौलिक एवं गूढ़ जानकारी काम आती है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चे स्नातक स्तर के सामान्य योग्यता हासिल करने के बावजूद गूढ़ एवं मौलिक विचारों के अभाव में साक्षात्कार व्यक्तित्व परीक्षा के दौरान परेशाने होते हैं। इन बच्चों को उच्च शिक्षा, पीएचडी के प्रति रुझान भी कम होता जाता है, ऐसे में क्लब गठन जरूरी है।

उल्लेखनीय है कि ऐसे बच्चों के लिए जननायक पुस्तकालय एवं डिजिटल अध्ययन केन्द्र की स्थापना की जा चुकी है, जिसमे प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए डिजिटल अध्ययन की व्यवस्था की गई है। साथ ही पुस्तकालय भी स्थापित किये गये हैं।

ग्रामीण परिवेश के पिछड़े वर्ग एवं अति पिछड़े वर्ग के छात्रों में गणित और विज्ञान के प्रति भी झुकाव कम होता है। अब सरकार ने इन बच्चों को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई है। इसके लिए विभाग ने सभी जिलों के पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण पदाधिकारी को पत्र भेजकर इसकी जानकारी दी है।

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दिल्ली हाई कोर्ट ने लॉ इंटर्न के लिए शाहदरा बार एसोसिएशन के नोटिस पर लगाई रोक

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delhi high court

विभिन्न संघों के सभी इंटर्न के लिए एक समान वर्दी निर्धारित करने के मद्देनजर दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को शाहदरा बार एसोसिएशन (एसबीए) के लॉ इंटर्न के लिए ड्रेस कोड के हालिया प्रस्ताव पर रोक लगा दी। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने बार काउंसिल ऑफ दिल्ली से राष्ट्रीय राजधानी में सभी बार संघों और अन्य हितधारकों की एक बैठक आयोजित करने के लिए कहा, ताकि इस बात पर आम सहमति बन सके कि इंटर्न को क्या पहनना चाहिए।

उन्होंने कहा, “बड़ी संख्या में इंटर्न को ध्यान में रखते हुए, सभी हितधारकों की सहमति से एक समान नीति बनाई जानी चाहिए। एक समान वर्दी निर्धारित की जानी चाहिए क्योंकि यदि विभिन्न संघ अलग-अलग वर्दी निर्धारित करते हैं तो इंटर्न को असुविधा होगी।”

अदालत ने आग्रह किया कि बैठक 12 दिसंबर को आयोजित की जाए और कानूनी शिक्षा के नियमों, 2008 को ध्यान में रखते हुए एक सामान्य निष्कर्ष निकाला जाए। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को भी बैठक में शामिल होने के लिए कहा गया है।

यह याचिका अधिवक्ता उज्‍जवल घई, शिवेक राय कपूर, संचित सैनी और अर्पित शर्मा के माध्यम से द्वितीय वर्ष के कानून के छात्र ने दायर की थी।

इंटर्न को वकीलों से अलग करने के लिए, एसबीए ने 24 नवंबर को दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट में इंटर्न को काला कोट पहनने से प्रतिबंधित करने का फैसला पारित किया। उन्हें एक दिसंबर से सफेद शर्ट, नीला कोट और पतलून पहनने को कहा गया था।

एसबीए ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करने में विफल रहने पर इंटर्न को अदालतों में जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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