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2028 तक चांद पर वापसी का लक्ष्य, ‘नासा’ ने तय किए तीन बड़े मिशन

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अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) ने आने वाले वर्षों के लिए अपनी नई स्पेस रणनीति के तीन बड़े लक्ष्य तय किए हैं, जिनमें 2028 तक इंसानों को फिर से चंद्रमा पर भेजना, वहां स्थायी बेस बनाना और लो-अर्थ ऑर्बिट में कमर्शियल गतिविधियों का विस्तार करना शामिल हैं।

नासा के प्रशासक जेरेड आइजकमैन ने कहा कि यह रणनीति अमेरिका की राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति के अनुरूप है और तेजी से बदलते वैश्विक प्रतिस्पर्धी माहौल में अमेरिका की लीडरशिप को मजबूत करने के लिए बनाई गई है।

आइजकमैन ने साफ शब्दों में कहा, “हमारा लक्ष्य चंद्रमा पर वापसी करना, लॉन्च की संख्या बढ़ाना और 2028 तक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की सतह पर उतारना है।” उन्होंने बताया कि यह नासा के निकट भविष्य के मिशनों का मुख्य फोकस है।

उन्होंने आगे कहा कि एजेंसी सिर्फ चंद्रमा तक पहुंचने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वहां लंबी अवधि के लिए इंसानी मौजूदगी स्थापित करने की योजना बना रही है। इसके लिए सरकार और निजी कंपनियां मिलकर काम करेंगी। इस योजना में लैंडर, रोवर, पावर सिस्टम और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी जैसी जरूरी चीजें शामिल होंगी, ताकि चंद्रमा पर लगातार ऑपरेशन संभव हो सके।

नासा की रणनीति का तीसरा अहम हिस्सा लो-अर्थ ऑर्बिट में कमर्शियल गतिविधियों को बढ़ाना है। इसके तहत प्राइवेट स्पेस स्टेशन को बढ़ावा दिया जाएगा और उद्योगों के लिए नए अवसर तैयार किए जाएंगे। आइजकमैन ने कहा, “हम उद्योग के साथ मिलकर कमर्शियल एस्ट्रोनॉट मिशन और उससे जुड़ी कमाई के अवसरों को बढ़ाना चाहते हैं।”

उन्होंने यह भी बताया कि नासा अब अपने संसाधनों के इस्तेमाल के तरीके में बदलाव कर रहा है। एजेंसी बड़े और महंगे प्रोजेक्ट्स से हटकर छोटे, फोकस्ड और परिणाम देने वाले निवेश पर ध्यान दे रही है। उन्होंने माना कि पहले कई मिशनों में लागत बढ़ने और देरी जैसी समस्याएं सामने आई हैं, जिससे सुधार की जरूरत महसूस हुई।

आइजकमैन ने कहा, “हम ऐसे प्रोग्राम नहीं बना सकते जो इतने बड़े हों कि फेल न हो सकें, लेकिन इतने महंगे भी हों कि सफल ही न हो पाएं।” उन्होंने कहा कि नासा को खर्च के बजाय परिणामों पर ध्यान देना होगा।

उन्होंने लॉन्च की संख्या बढ़ाने का भी जिक्र किया और कहा कि मिशनों के बीच ज्यादा अंतराल प्रगति को धीमा कर देता है। हाल ही में हुए आर्टेमिस II मिशन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब कार्यक्रम सही तरीके से लागू होते हैं, तो बड़े परिणाम सामने आते हैं। इस मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के चारों ओर घुमाकर सुरक्षित वापस लाया गया था।

उन्होंने कहा, “हमने दुनिया को फिर से चंद्रमा दिखाया और इंसानियत को पृथ्वी का नया नजरिया दिया।”

नई योजना के तहत नासा सैटेलाइट लॉन्च और अर्थ ऑब्जर्वेशन जैसे कामों के लिए निजी कंपनियों पर ज्यादा निर्भर करेगा, जबकि खुद डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन और न्यूक्लियर प्रोपल्शन जैसे जटिल मिशनों पर ध्यान केंद्रित करेगा।

हालांकि, इस रणनीति पर सांसदों ने कुछ चिंताएं भी जताई हैं। सुनवाई के दौरान बताया गया कि प्रस्तावित बजट में पिछले साल की तुलना में करीब 23 प्रतिशत की कटौती की गई है, जिससे इन लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

स्पेस कमेटी के चेयरमैन ब्रायन बैबिन ने चेतावनी दी कि कम फंडिंग से अमेरिका की स्पेस प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है, खासकर ऐसे समय में जब चीन तेजी से अपने चंद्र मिशनों को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा, “नासा को कम फंड देना समझदारी नहीं है।”

वहीं, रैंकिंग मेंबर जो लोफग्रेन ने कहा कि इस योजना से विज्ञान और तकनीक के कई अहम प्रोग्राम प्रभावित हो सकते हैं, खासकर वे क्षेत्र जो मानव अंतरिक्ष मिशनों से जुड़े नहीं हैं।

अन्य लॉमेकर्स ने वर्कफोर्स, अर्थ साइंस मिशन और एरोनॉटिक्स रिसर्च पर पड़ने वाले असर को लेकर भी सवाल उठाए, साथ ही निजी कंपनियों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर चिंता जताई।

इस पर आइजकमैन ने जवाब दिया कि नासा हमेशा कानून के अनुसार काम करेगा और संसाधनों के इस्तेमाल में पारदर्शिता रखेगा। उन्होंने भरोसा जताया कि कम संसाधनों में भी बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं, बशर्ते बेकार खर्च को खत्म कर मुख्य लक्ष्यों पर फोकस किया जाए।

1958 में स्थापित नासा लंबे समय से अंतरिक्ष खोज में दुनिया का नेतृत्व करता रहा है, चाहे वह अपोलो कार्यक्रम के तहत चंद्रमा पर लैंडिंग हो या इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का निर्माण। हाल के वर्षों में, खासकर चीन के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण, चंद्रमा मिशनों और पृथ्वी से बाहर मानव मौजूदगी पर फिर से जोर बढ़ा है।

इसी दिशा में आर्टेमिस कार्यक्रम एक अहम पहल है, जिसका उद्देश्य 1972 के बाद पहली बार इंसानों को चंद्रमा पर वापस भेजना है।

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‘ईरान के खिलाफ युद्ध में भागीदारी के ल‍िए यूरोप की जवाबदेही तय होनी चाह‍िए’, नाटो महासचिव के बयान पर बाघेई

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ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने कहा कि नाटो महासचिव मार्क रुटे के बयान ने साफ कर द‍िया है क‍ि यूरोप ने अमेरिका-इजरायल के साथ ईरान के खिलाफ युद्ध में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया है।

उन्होंने ईयू और नाटो देशों की जवाबदेही तय करने और रुटे की भूमिका की जांच की मांग की है।

ईरान के व‍िदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता इस्‍माइल बाघेई ने सोशल मीड‍िया प्‍लेटफॉर्म ‘एक्‍स’ पर मार्क रुटे का एक वीडियो पोस्‍ट करते हुए ल‍िखा, ”यह नाटो के महासचिव मार्क रुटे की ओर से एक और साफ स्वीकारोक्ति है कि यूरोप ने ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के हमले वाले युद्ध में जानबूझकर और सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था, जबकि पूरे युद्ध के दौरान बार-बार इससे इनकार किया जाता रहा।”

उन्‍होंने पोस्‍ट में कहा क‍ि यूरोपीय संघ (ईयू), उसके सदस्य देशों और नाटो के सदस्य देशों की इस मामले में भूमिका के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसमें किसी भी तरह की राजनीतिक, सैन्य, लॉजिस्टिक या दूसरी मदद शामिल है, जिसने जान-माल के नुकसान में योगदान दिया। साथ ही उन नतीजों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए जिनका असर आज भी महसूस किया जा रहा है।

बाघेई ने कहा क‍ि यूरोप के नागरिकों को अपनी सरकारों से यह जवाब मांगने का पूरा अधिकार है कि उन्होंने इस हमले का समर्थन करने या इसमें शामिल होने के फैसले क्यों लिए।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने खास तौर पर जिक्र किया कि इस गैरकानूनी युद्ध की वजह से ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और लोगों के सामने आई दूसरी मुश्किलों को भी इस नजरिए से देखा जाना चाहिए कि यूरोपीय सरकारों ने इस युद्ध को संभव बनाने और उसका समर्थन करने में क्या भूमिका निभाई।

उन्‍होंने कहा क‍ि नाटो महासचिव के तौर पर मार्क रुटे की भूमिका और उनके अधिकार में उठाए गए कदमों की भी जांच और समीक्षा होनी चाहिए।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

मिल्वौकी में जुटेंगे जी20 के व्यापार मंत्री, जबरन मजदूरी से लेकर वैश्विक व्यापार नियमों तक होगी चर्चा

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अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर अगले हफ्ते अमेरिका के मिल्वौकी में जी20 देशों के व्यापार मंत्रियों की मेजबानी करेंगे। इस बैठक में जबरन मजदूरी, खाने-पीने की चीजों का व्यापार, जरूरत से ज्यादा औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक व्यापार व्यवस्था के एक अहम नियम में संभावित बदलाव जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) की ओर से शुक्रवार को जारी कार्यक्रम के मुताबिक, यह मंत्रिस्तरीय बैठक 29 सितंबर से एक अक्टूबर तक चलेगी।

ग्रीर वैश्विक सप्लाई चेन से जबरन मजदूरी को खत्म करने और जरूरत से ज्यादा उत्पादन तथा औद्योगिक क्षमता से जुड़ी समस्याओं पर बातचीत की अगुवाई करेंगे। इस बैठक में भारत की ओर से वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल हिस्सा लेंगे।

मंत्री ‘मोस्ट-फेवर्ड-नेशन’ के सिद्धांत को अपडेट करने पर भी चर्चा करेंगे। इसके अलावा खाने-पीने की चीजों के व्यापार को दबाव बनाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के मुद्दे पर भी बातचीत होगी, जिसे यूएसटीआर व्यापार का हथियार बनाना बताया है।

‘मोस्ट-फेवर्ड-नेशन’ सिद्धांत के तहत विश्व व्यापार संगठन (डब्‍ल्‍यूटीओ) के किसी सदस्य देश को अगर वह किसी दूसरे सदस्य देश को कोई खास व्यापारिक फायदा देता है, तो आमतौर पर वही फायदा दूसरे डब्‍ल्‍यूटीओ सदस्य देशों को भी देना होता है। हालांकि, डब्‍ल्‍यूटीओ के नियमों के तहत इसके कुछ अपवाद भी हैं।

यूएसटीआर की ओर से जारी जानकारी में यह नहीं बताया गया कि अमेरिका एमएफएन सिद्धांत में किस तरह के बदलाव का प्रस्ताव मिल्वौकी की बैठक में रख सकता है।

कार्यक्रम की शुरुआत मंगलवार शाम ‘बिज़नेस राउंडटेबल’ और ‘नेशनल एसोसिएशन ऑफ मैन्युफैक्चरर्स’ की ओर से आयोजित स्वागत कार्यक्रम से होगी। बुधवार सुबह औपचारिक कार्यक्रम की शुरुआत ‘ग्लोबल फोरम ऑन स्टील एक्सेस कैपेसिटी’ की मंत्रिस्तरीय बैठक से होगी।

स्टील उत्पादन और जरूरत से ज्यादा औद्योगिक क्षमता हाल के समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े विवादों में शामिल रही है। अमेरिका बार-बार कहता रहा है कि जरूरत से ज्यादा उत्पादन से उसके घरेलू उद्योगों और कामगारों पर दबाव पड़ता है।

स्टील से जुड़ी बैठक के बाद ग्रीर और दूसरे देशों के मंत्री मिल्वौकी में ‘रॉकवेल ऑटोमेशन’ की एक फैसिलिटी का दौरा करेंगे। यूएसटीआर के मुताबिक, वे फैक्ट्री के अंदर जाकर कामगारों और उद्योग के अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।

इस दौरे के जरिए ट्रंप प्रशासन अपने इस दावे को सामने रखना चाहता है कि उसकी व्यापार नीति अमेरिका में औद्योगिक उत्पादन को दोबारा बढ़ाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने में मदद कर रही है।

बुधवार दोपहर जी20 व्यापार मंत्रियों की पहली औपचारिक बैठक में ग्रीर शुरुआती संबोधन देंगे। उसी शाम अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय और अमेरिकी कृषि विभाग विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के लिए स्वागत डिनर का आयोजन करेंगे। मुख्य मंत्रिस्तरीय बातचीत गुरुवार को होगी। इसमें सुबह का एक सत्र दोपहर एक बजे तक चलेगा और दूसरा सत्र दोपहर बाद होगा। इन दोनों सत्रों के बीच ग्रीर की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी तय है।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

संयुक्त राष्ट्र महासभा: नेपाल ने भारत-चीन के साथ ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ बनाने का रखा प्रस्ताव

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न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु से जुड़े खतरों से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने के मकसद से नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ बनाने का प्रस्ताव रखा है।

शाह का यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के पहाड़ी इलाकों में कई बस्तियों को बहा दिया था। बाढ़ की भयावहता को देखते हुए कई लोगों ने इसे ‘माउंटेन सुनामी’ या ‘हिमालयन सुनामी’ तक बताया।

नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के मुताबिक, गुरुवार शाम तक इस बाढ़ में 1,453 लोगों की मौत हो चुकी थी जबकि 5,550 लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में 636 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। विशेषज्ञों ने इस आपदा को जलवायु परिवर्तन से जुड़ा बताया है।

शाह ने कहा कि नेपाल, भारत और चीन की यह साझा व्यवस्था सैटेलाइट डेटा और तकनीकी जानकारी साझा करने, खतरनाक ग्लेशियल झीलों पर नजर रखने और क्षेत्रीय स्तर पर समय रहते चेतावनी देने वाले सिस्टम को मजबूत करने पर काम करेगी।

उन्होंने कहा, “आइए, खतरनाक ग्लेशियर झीलों पर नजर रखें। मिलकर चेतावनी देने वाले सिस्टम को मजबूत करें। और जब कोई आपदा आए, तो सीमाओं के पार भी आपसी तालमेल से मदद पहुंचाएं।”

शाह ने कहा कि हिमालय को ऐसी जगह बनना चाहिए, जहां देश एक-दूसरे से अलग-अलग जानकारी रखने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए मिलकर काम करें।

उन्होंने कहा क‍ि हिमालय को बंटी हुई जानकारी की सीमा बनाने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला बनने दें। नेपाल की ओर से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि देश ने अपने करीब आधे क्षेत्र में वन क्षेत्र को फिर से बहाल किया है।

उन्होंने कहा कि नेपाल अपनी हाइड्रोपावर यानी पनबिजली उत्पादन क्षमता भी बढ़ा रहा है, ताकि साफ ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सके और विदेशों में जीवाश्म ईंधन से बनने वाली ऊर्जा की जगह स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा सके।

शाह ने कहा, “हम इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दे रहे हैं और इन्हें अपनाने की हमारी दर यूरोप के कुछ हिस्सों के बराबर है। हम स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने की तैयारी मजबूत कर रहे हैं और आगे भी ज्यादा काम करेंगे, ताकि लगातार ज्यादा गंभीर और बार-बार आने वाली जलवायु आपदाओं का सामना कर सकें।”

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन में नेपाल का योगदान बेहद कम है। उनके मुताबिक, दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में हिमालयी देश नेपाल की हिस्सेदारी 0.1 प्रतिशत से भी कम है।

शाह ने कहा क‍ि हमने यह संकट पैदा नहीं किया लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत हम चुका रहे हैं। हमारे ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, पहाड़ी ढलान अस्थिर हो रहे हैं, हमारी नदियों के व्यवहार का अंदाजा लगाना मुश्किल होता जा रहा है और हर बड़ी आपदा वर्षों में हुए विकास को मिटाने का खतरा पैदा करती है।

उन्होंने कहा कि नेपाल के लिए जलवायु से जुड़ी ऐसी आपदाएं सिर्फ मानवीय संकट नहीं हैं बल्कि देश के विकास के लिए भी बड़ी चुनौती हैं। यह सड़कें, पुल, स्कूल, घर, खेत और लोगों की रोजी-रोटी बर्बाद कर देती है। यह साफ ऊर्जा से जुड़े उस बुनियादी ढांचे को भी नष्ट करती है, जिसकी हमें अपने भविष्य के लिए जरूरत है। और फिर एक गरीब देश को उस नुकसान की मरम्मत के लिए कर्ज लेना पड़ता है, जिसे उसने खुद पैदा नहीं किया।

शाह ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था की कमजोरियों की वजह से और गंभीर हो रहे जलवायु संकट का मुकाबला करने के लिए नेपाल अकेले अपने दम पर पर्याप्त तैयारी नहीं कर सकता।

उन्होंने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्रों में बाढ़ से हुई भारी तबाही का भी जिक्र किया। बाढ़ कई बस्तियों, पुलों और सड़कों को बहा ले गई और स्कूलों, घरों तथा लोगों की रोजी-रोटी को नुकसान पहुंचा। इस आपदा से उबरने में नेपाल की मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एकजुट होकर सहयोग करने की अपील की।

नेशनल प्लानिंग कमीशन और नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी की संयुक्त तकनीकी टीम की ओर से तैयार ‘रैपिड डिजास्टर नीड्स असेसमेंट'(आरडीएनए) की रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया बाढ़ से करीब 2.69 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है।

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित बुनियादी ढांचे और दूसरी संपत्तियों के पुनर्निर्माण और हालात सामान्य करने के लिए करीब 4.77 अरब डॉलर की जरूरत होगी। यह रकम नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब 10 प्रतिशत के बराबर है।

प्रधानमंत्री शाह ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा कि जलवायु आपदाओं के बाद सिर्फ राहत और पुनर्निर्माण पर ध्यान देना काफी नहीं है। उनके मुताबिक, जिम्मेदारी, नुकसान की भरपाई और भविष्य की आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा क‍ि इस महासभा को छह शब्दों पर ध्यान देना चाहिए राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण और साथ ही जिम्मेदारी, नुकसान की भरपाई और मुश्किल हालात से निपटने की क्षमता।

शाह के मुताबिक, पहली तीन चीजें किसी आपदा के तुरंत बाद जरूरी होती हैं, जबकि बाद की तीन चीजें इसलिए जरूरी हैं, ताकि कमजोर देशों के लिए आपदाएं हमेशा बनी रहने वाली समस्या न बन जाएं।

उन्होंने जलवायु संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित विकासशील देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग्रांट यानी ऐसी आर्थिक मदद बढ़ाने की मांग की, जिसे कर्ज की तरह वापस न करना पड़े।

प्रधानमंत्री शाह ने आपदाओं से निपटने की क्षमता मजबूत करने के लिए ज्यादा फंड देने और बीमा व नई तकनीकों में निवेश करने की अपील की। उन्होंने जलवायु संकट से निपटने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा और संस्थाएं बनाने की जरूरत भी बताई। साथ ही उन्होंने कार्बन उत्सर्जन कम करने पर जोर दिया।

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