अंतरराष्ट्रीय समाचार
ईरान को साइबर सुरक्षा और निष्क्रिय रक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत: उपराष्ट्रपति रजा आरिफ
ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने कहा कि हमारे दुश्मन साजिशें रचेंगे और देश को नुकसान पहुंचाने का मौका तलाशते रहेंगे। इसलिए देश की साइबर सुरक्षा और निष्क्रिय रक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विरोधियों की साजिशों से निपटने के लिए ईरान को पूरी तरह तैयार रहना होगा।
इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज एजेंसी (आईआरएनए) की रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास मुख्यालय की बैठक में आरिफ ने दुश्मनों की साजिशों को नाकाम करने के लिए देश को साइबर सुरक्षा और निष्क्रिय रक्षा के क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत करनी होगी।
उन्होंने कहा कि शहीद इस्लामी क्रांति के नेता की ओर से तय किए गए विकास दृष्टि कार्यक्रम के तहत ईरान को उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में क्षेत्रीय स्तर पर अग्रणी स्थान हासिल करना चाहिए और वैश्विक स्तर पर भी एक प्रभावशाली भूमिका निभानी चाहिए।
आईआरएनए के अनुसार, उन्होंने कहा कि साइबर सुरक्षा को मजबूत करना एक जरूरी रणनीति है, क्योंकि दुश्मन ईरानी जनता के सामने हाल की अपनी हार के बावजूद साजिशें रचना बंद नहीं करेगा और हमारे देश को नुकसान पहुंचाने का मौका तलाशता रहेगा। हमें पूरी तरह तैयार रहते हुए विरोधियों की साजिशों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए और निष्क्रिय रक्षा पर भी ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
मोहम्मद रजा आरिफ ने कहा कि अमेरिका और इजराइल ने जून 2025 में ईरान के खिलाफ अपना पहला युद्ध शुरू किया था, जो 12 दिन तक चला। इसके बाद उनका दूसरा सैन्य हमला इस वर्ष 2026 में 28 फरवरी को शुरू हुआ और 40 दिन के बाद अप्रैल की शुरुआत में रुक गया।
मोहम्मद रजा आरिफ ने दावा किया कि दोनों युद्धों में ईरान के मजबूत प्रतिरोध और जवाबी सैन्य अभियानों ने विरोधियों को युद्धविराम स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
नेपाल में नारायणी नदी खतरे के निशान से ऊपर, गंडक ने भी बढ़ाई चिंता

नेपाल के दक्षिणी चितवन और नवलपरासी जिलों के कुछ हिस्सों में नारायणी नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। जलस्तर लगातार बढ़ने के बाद स्थानीय प्रशासन ने बाढ़ को लेकर अलर्ट जारी किया है।
भारत में गंडक के नाम से जानी जाने वाली इस सीमा-पार नदी में बाढ़ आने से पड़ोसी देश के निचले इलाकों पर भी असर पड़ सकता है।
नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीआरआरएमए) ने रविवार सुबह बाढ़ की चेतावनी जारी की और नारायणी नदी के किनारे रहने वाले लोगों से अपील की कि वे जान-माल के खतरे को देखते हुए नदी से दूर और ऊंचे इलाकों में चले जाएं।
सेंटर ऑफ हाइड्रोलॉजी एंड वॉटर रिसोर्सेज रिसर्च (सीएचडब्ल्यूआरआर) द्वारा रविवार सुबह 7:45 बजे जारी बाढ़ फोरकास्ट (पूर्वानुमान) और एडवाइजरी बुलेटिन के अनुसार, नारायणी नदी का जलस्तर बढ़कर लगभग 11 मीटर हो गया था, जो 9 मीटर के तय खतरे के निशान से काफी ऊपर है।
सीएचडब्ल्यूआरआर ने कहा कि चितवन जिले के देवघाट बाढ़ निगरानी स्टेशन पर जलस्तर के रविवार दोपहर तक बढ़ते रहने की उम्मीद है और ये लगभग 13 मीटर के उच्चतम स्तर पर पहुंच सकता है।
सीएचडब्ल्यूआरआर ने कहा, “इस बात की आशंका है कि शाम तक जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बना रहेगा।” साथ ही उन्होंने कहा कि दोपहर तक नारायणी की सहायक नदियों में भी तेज बहाव जारी रहने की उम्मीद है।
नारायणी की प्रमुख सहायक नदियों में से एक, काली गंडकी नदी में बहाव खतरे के निशान से काफी ऊपर दर्ज किया गया है, जबकि सेती, माडी, मर्स्यांगडी, डारौंडी और चेपे नदियां अपने चेतावनी स्तर से ऊपर बह रही हैं और उनका जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। बूढ़ी गंडकी और त्रिशूली नदियां भी अपने चेतावनी स्तर के करीब पहुंच गई हैं।
सीएचडब्ल्यूआरआर ने कहा कि तेज बहाव के कारण चितवन और नवलपरासी (पूर्व और पश्चिम) जिलों में नारायणी नदी के किनारे निचले और बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में बाढ़ और जलभराव का खतरा बढ़ गया है। ये तीनों जिले भारत की सीमा से लगे हैं।
नेपाल प्रशासन ने लोगों को नारायणी और उसकी सहायक नदियों के किनारे यात्रा करने से बचने और नदी के किनारों, पुलों, तटबंधों और अन्य संवेदनशील जगहों के पास अनावश्यक रूप से जाने से बचने की सलाह भी दी है। काली गंडकी, सेती, मादी, मर्स्यांगडी, दरौंदी, चेपे, बुढ़ी गंडकी और त्रिशूली नदियों और उनकी सहायक नदियों के किनारे रहने वाले लोगों से शाम तक हाई अलर्ट पर रहने को कहा गया है।
अधिकारियों ने लोगों से कहा है कि वे स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और अन्य संबंधित अधिकारियों द्वारा जारी बाढ़ से जुड़ी जानकारी और निर्देशों का पालन करें।
हाल ही में भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई विनाशकारी बाढ़ झेल चुके नेपास में 24 सितंबर से देश के अलग-अलग हिस्सों में लगातार बारिश हो रही है।
नेपाल पुलिस ने बताया कि पश्चिमी नेपाल के पाल्पा जिले की माथागढ़ी ग्रामीण नगर पालिका के भास्कट्टा में रविवार तड़के बारिश के कारण हुए भूस्खलन में एक घर दब गया, जिसके बाद से तीन लोग लापता हो गए। पुलिस ने बताया कि बचाव अभियान चलाने के लिए एक पुलिस टीम तैनात की गई है।
इस बीच, पुलिस के अनुसार, पर्वत जिले की जलजला ग्रामीण नगर पालिका-8 के फार्से इलाके में काली गंडकी नदी में आई बाढ़ 25 घरों को बहा ले गई। पुलिस ने कहा, “बस्ती में लगभग 80 घरों में से 25 बह गए हैं, जबकि बाकी घर खतरे में हैं।”
पुलिस ने आगे कहा, “किसी के हताहत होने की खबर नहीं है और बस्ती के सभी निवासियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया है।”
अंतरराष्ट्रीय समाचार
यूएनजीए में जयशंकर ने आतंकवाद के खिलाफ आत्मरक्षा के अधिकार पर दिया जोर

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान बड़े स्तर पर शांति की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के अधिकार का इस्तेमाल करेगा। उन्होंने कहा कि गरीब और विकासशील देशों को उन युद्धों और फैसलों की कीमत नहीं चुकानी चाहिए, जिनमें उनकी आवाज या भूमिका बहुत कम होती है।
जयशंकर के भाषण में खाड़ी क्षेत्र और यूक्रेन में चल रहे संघर्षों से लेकर खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे कई मुद्दे शामिल थे।
इन सभी मुद्दों के बीच उनका मुख्य संदेश यह था कि शांति सिर्फ युद्ध खत्म करने से नहीं आती। इसके लिए स्थिरता और जरूरी संसाधनों तक सभी की बराबर और सही पहुंच भी जरूरी है।
जयशंकर के सबसे कड़े शब्द उस देश के लिए थे, जिसका उन्होंने नाम नहीं लिया, लेकिन उसे ‘बार-बार आतंकवाद का इस्तेमाल करने वाला देश’ बताया।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस देश ने एक दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया था। जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद को सामान्य बताने और उसके नतीजों से बचने के लिए भी तर्क दिए गए।
उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के हमारे अधिकार का इस्तेमाल किया जाएगा।
जयशंकर ने उस देश का नाम नहीं लिया और न ही यह बताया कि भारत इस दिशा में किस तरह की कार्रवाई कर सकता है। हालांकि, उनके बयान से यह साफ था कि वह सीमा पार आतंकवाद को सामान्य संबंधों के साथ चलने वाली चीज नहीं मानते।
जयशंकर ने कहा कि दुनिया में चल रहे संघर्ष विकास की रफ्तार धीमी कर रहे हैं। इतना ही नहीं, लड़ाई से बहुत दूर मौजूद देश भी बिना अपनी किसी गलती के इसका असर झेल रहे हैं।
उन्होंने महासभा से कहा कि जो देश इन संकटों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, अक्सर फैसले लेने में उनकी आवाज ही सबसे कम सुनी जाती है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़े तनाव को लेकर जयशंकर ने संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों में जहाजों और नाविकों को निशाना बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत चाहता है कि आम नागरिकों की सुरक्षा हो और ऊर्जा तथा व्यापार की आवाजाही बिना रुकावट जारी रहे।
जयशंकर ने यूक्रेन में चल रही शांति की कोशिशों का समर्थन किया और खाद्य तथा ऊर्जा से जुड़े दबाव को कम करने में भारत की मदद की पेशकश की।
मध्य पूर्व के मुद्दे पर उन्होंने टू-स्टेट सॉल्यूशन, यानी इजरायल और फिलिस्तीन के लिए दो अलग देशों के समाधान को लेकर भारत का समर्थन दोहराया। भारत फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता भी दे रहा है।
इन मुद्दों से भारत की अपनी चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं, क्योंकि जहाजों की आवाजाही, अनाज और ऊर्जा की सप्लाई में रुकावट का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है।
जयशंकर ने कहा कि खाड़ी क्षेत्र और लाल सागर से लेकर काला सागर तक हुए हमलों में भारतीय नाविक भी मारे गए हैं। जयशंकर ने विकासशील देशों के लिए, उन्होंने भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्त से जुड़े ‘4एफ संकट’ का जिक्र किया। जलवायु की स्थिति, उर्वरक की कमी और अनाज की आवाजाही में रुकावटों ने इस दबाव को और बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु से जुड़ी समस्याएं, खाद की कमी और अनाज की आवाजाही में रुकावट इस संकट को और गंभीर बना रही हैं।
जयशंकर ने कहा कि बाजारों तक सीमित पहुंच और सामान्य बाजार के नियमों से अलग तरीके अपनाए जाने की वजह से ग्लोबल साउथ के देशों के लिए अपने उद्योगों को विकसित करना और मुश्किल हो रहा है।
जयशंकर ने उस स्थिति की भी आलोचना की, जिसे उन्होंने ‘हर चीज को हथियार की तरह इस्तेमाल’ करना बताया।
उन्होंने कहा कि फाइनेंस, सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी, संसाधन और कनेक्टिविटी जैसी चीजों का इस्तेमाल भी अब दूसरे देशों पर दबाव डालने के लिए किया जा रहा है।
उनके मुताबिक, देश इन जोखिमों को कम करने के लिए अपने संबंधों और सप्लाई के स्रोतों में बदलाव कर रहे हैं और अलग-अलग विकल्प तलाश रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही दुनिया में आपसी भरोसा भी कम हो रहा है।
जयशंकर ने भारत को एक उदाहरण और साझेदार, दोनों के तौर पर पेश किया। उन्होंने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और देश के अंदर लोगों तक बुनियादी सेवाएं पहुंचाने की व्यवस्था का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत ने 78 देशों में 600 बड़े विकास प्रोजेक्ट किए हैं। इनमें बुनियादी ढांचा, कृषि, सूचना तकनीक और ट्रेनिंग जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
जयशंकर ने जलवायु से जुड़ी पहलों, आपात स्थिति में मेडिकल सहायता पहुंचाने और प्राकृतिक आपदाओं के बाद दूसरे देशों को दी गई मदद का भी जिक्र किया। उन्होंने खास तौर पर अफ्रीकी देशों और छोटे विकासशील द्वीपीय देशों के साथ भारत की साझेदारी पर जोर दिया।
यह बात ग्लोबल साउथ के लिए ज्यादा आवाज और भागीदारी की भारत की मांग से भी जुड़ी थी। भारत का कहना है कि वह दूसरे विकासशील देशों के साथ पहले से ही मिलकर काम कर रहा है।
अपने संबोधन के आखिर में जयशंकर ने इन सभी मुद्दों को इस बड़े सवाल से जोड़ा कि बदलती दुनिया के नियम आखिर कौन तय करेगा।
उन्होंने कहा, “1945 के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था अब नई वास्तविकताओं को जगह दे रही है।” उन्होंने वैश्विक फैसले लेते समय ज्यादा देशों से सलाह-मशविरा करने और फैसलों को ज्यादा पारदर्शी बनाने की मांग की। जयशंकर ने कहा कि दुनिया की आबादी के एक बड़े हिस्से को अब वैश्विक फैसले लेने की प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता।
जयशंकर ने अपने संबोधन में भारत की सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़ी चिंताओं को इस बड़े तर्क के साथ जोड़ा कि दुनिया में शांति और विकास के लिए एक ज्यादा समावेशी और बराबरी वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत है।
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‘ईरान के खिलाफ युद्ध में भागीदारी के लिए यूरोप की जवाबदेही तय होनी चाहिए’, नाटो महासचिव के बयान पर बाघेई

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने कहा कि नाटो महासचिव मार्क रुटे के बयान ने साफ कर दिया है कि यूरोप ने अमेरिका-इजरायल के साथ ईरान के खिलाफ युद्ध में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया है।
उन्होंने ईयू और नाटो देशों की जवाबदेही तय करने और रुटे की भूमिका की जांच की मांग की है।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर मार्क रुटे का एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, ”यह नाटो के महासचिव मार्क रुटे की ओर से एक और साफ स्वीकारोक्ति है कि यूरोप ने ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के हमले वाले युद्ध में जानबूझकर और सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था, जबकि पूरे युद्ध के दौरान बार-बार इससे इनकार किया जाता रहा।”
उन्होंने पोस्ट में कहा कि यूरोपीय संघ (ईयू), उसके सदस्य देशों और नाटो के सदस्य देशों की इस मामले में भूमिका के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसमें किसी भी तरह की राजनीतिक, सैन्य, लॉजिस्टिक या दूसरी मदद शामिल है, जिसने जान-माल के नुकसान में योगदान दिया। साथ ही उन नतीजों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए जिनका असर आज भी महसूस किया जा रहा है।
बाघेई ने कहा कि यूरोप के नागरिकों को अपनी सरकारों से यह जवाब मांगने का पूरा अधिकार है कि उन्होंने इस हमले का समर्थन करने या इसमें शामिल होने के फैसले क्यों लिए।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने खास तौर पर जिक्र किया कि इस गैरकानूनी युद्ध की वजह से ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और लोगों के सामने आई दूसरी मुश्किलों को भी इस नजरिए से देखा जाना चाहिए कि यूरोपीय सरकारों ने इस युद्ध को संभव बनाने और उसका समर्थन करने में क्या भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि नाटो महासचिव के तौर पर मार्क रुटे की भूमिका और उनके अधिकार में उठाए गए कदमों की भी जांच और समीक्षा होनी चाहिए।
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