व्यापार
स्पेन यात्रा लाभदायक रही, 3,440 करोड़ के निवेश के समझौतों पर हस्ताक्षर किए : स्टालिन
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने बुधवार को कहा कि उनकी आठ दिवसीय स्पेन यात्रा लाभदायक रही। यात्रा के दौरान 3,440 करोड़ रुपये के निवेश के समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।
स्टालिन ने चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उन्हें राज्य में और अधिक निवेश आने की उम्मीद है। जर्मन शिपिंग और कंटेनर परिवहन प्रमुख हापाग-लॉयड एजी ने 2,500 करोड़ रुपये के निवेश के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
तकनीकी शिक्षण, अनुसंधान उपकरण डिजाइन और निर्माण करने वाली स्पेन स्थित एडिबॉन ने 540 करोड़ रुपये के निवेश के लिए एक समझौता भी किया है। स्पेन की सैनिटरी कंपनी रोकाटो राज्य में 400 करोड़ रुपये का निवेश करेगी।
एमके स्टालिन ने कहा कि उन्होंने एक्सिओना, एबर्टिस, गेस्टैम्प और टैल्गो सहित कई अन्य कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग बैठकें कीं और उन्हें उद्योग जगत के नेताओं, स्पेन के वित्त और वाणिज्य मंत्रालयों के अधिकारियों से भी मिलने का अवसर मिला।
2024 के आम चुनाव में एनडीए के 400 सीटें जीतने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान पर एक सवाल के जवाब में स्टालिन ने कहा, यदि प्रधानमंत्री सभी 543 सीटों पर एनडीए की जीत का दावा करें तो आश्चर्य नहीं होगा।”
उन्होंने अभिनेता विजय के राजनीतिक पार्टी बनाने और राजनीति में शामिल होने के फैसले का भी स्वागत किया। उनका कहना है कि जब भी कोई लोगों की सेवा के लिए राजनीति में आता है तो उन्हें खुशी होती है।
व्यापार
30 साल की उम्र में 5 करोड़ रुपए का रिटायरमेंट फंड बनाना है? जानिए हर महीने कितने की करनी होगी एसआईपी

रिटायरमेंट के लिए 5 करोड़ रुपए का फंड तैयार करना सुनने में भले ही एक बड़ा लक्ष्य लगे, लेकिन सही समय पर निवेश शुरू कर दिया जाए और लंबे समय तक नियमित निवेश जारी रखा जाए तो कंपाउंडिंग की ताकत से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। खासतौर पर म्यूचुअल फंड में एसआईपी के जरिए लंबी अवधि का निवेश रिटायरमेंट प्लानिंग का एक प्रभावी तरीका बन सकता है। हालांकि, निवेश शुरू करने की उम्र जितनी कम होगी, उतना अधिक समय कंपाउंडिंग के लिए मिलेगा और हर महीने निवेश की जाने वाली रकम अपेक्षाकृत कम हो सकती है। आज हम आपको कैलकुलेशन के माध्यम से बताते हैं कि अगर कोई 30 साल की उम्र में 5 करोड़ रुपए का रिटायरमेंट फंड बनाना चाहता है तो उसे हर महीने कितने रुपए की एसआईपी करनी पड़ेगी।
अगर कोई व्यक्ति 30 साल की उम्र में निवेश शुरू करता है, तो उसके पास 60 साल की उम्र तक 30 साल का समय होता है। वहीं, 25 साल की उम्र वाले व्यक्ति के पास करीब 35 साल का समय होता है। जबकि 35 साल की उम्र वाले को 25 साल और 40 साल की उम्र में शुरुआत करने वाले निवेशक को केवल 20 साल का समय मिलता है। इसके अलावा मौजूदा आय, भविष्य में वेतन वृद्धि, मासिक खर्च, बच्चों की शिक्षा, ईएमआई, स्वास्थ्य खर्च और रिटायरमेंट के बाद की जरूरतें भी यह तय करती हैं कि वास्तव में कितना रिटायरमेंट फंड चाहिए।
यदि 12 प्रतिशत सालाना औसत रिटर्न और पूरी अवधि के दौरान बिना एसआईपी बढ़ाए एक निश्चित मासिक निवेश का अनुमान लगाया जाए, तो 30 साल की उम्र में निवेश शुरू करने वाले व्यक्ति को 60 साल की उम्र तक 5 करोड़ रुपए का कॉर्पस बनाने के लिए लगभग 14,500 रुपए प्रति माह की एसआईपी करनी पड़ सकती है। 30 साल तक लगातार इस रकम का निवेश करने पर कुल निवेश करीब 52.20 लाख रुपए होगा, जबकि अनुमानित रिटर्न के साथ रिटायरमेंट कॉर्पस लगभग 5.12 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
वहीं, 25 साल की उम्र में निवेश शुरू करने वाले व्यक्ति को लगभग 5 करोड़ रुपए से अधिक का कॉर्पस तैयार करने के लिए करीब 8,000 रुपए प्रति माह की एसआईपी की जरूरत पड़ सकती है। 35 साल तक निवेश करने पर उसका कुल योगदान लगभग 33.60 लाख रुपए होगा और 12 प्रतिशत अनुमानित सालाना रिटर्न के आधार पर कॉर्पस करीब 5.20 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
अगर निवेश की शुरुआत 35 साल की उम्र में की जाती है, तो निवेश की अवधि घटकर 25 साल रह जाती है। ऐसे में 5 करोड़ रुपए के आसपास का रिटायरमेंट फंड बनाने के लिए करीब 26,500 रुपए प्रति माह की एसआईपी करनी पड़ सकती है। इस दौरान कुल निवेश लगभग 79.50 लाख रुपए होगा और अनुमानित कॉर्पस करीब 5.03 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। इसी तरह 40 साल की उम्र में शुरुआत करने वाले व्यक्ति को केवल 20 साल में यह लक्ष्य हासिल करने के लिए करीब 50,000 रुपए प्रति माह की एसआईपी करनी पड़ सकती है। इस स्थिति में कुल निवेश लगभग 1.20 करोड़ रुपए होगा और अनुमानित कॉर्पस करीब 5 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
इन आंकड़ों से साफ है कि रिटायरमेंट प्लानिंग में सबसे बड़ा फायदा जल्दी निवेश शुरू करने से मिलता है। जितनी जल्दी एसआईपी शुरू होगी, उतना ही ज्यादा समय निवेश को कंपाउंडिंग का लाभ मिलेगा और लक्ष्य हासिल करने के लिए मासिक निवेश का बोझ कम हो सकता है। हालांकि, 5 करोड़ रुपए का लक्ष्य तय करते समय महंगाई को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आज जो मासिक खर्च 50,000 रुपए है, वह 25 या 30 साल बाद महंगाई के कारण काफी अधिक हो सकता है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद की जरूरतों का अनुमान हमेशा भविष्य की महंगाई को ध्यान में रखकर लगाना चाहिए।
इसके साथ ही, यह भी समझना जरूरी है कि 12 प्रतिशत सालाना रिटर्न केवल एक अनुमान है, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। इक्विटी और इक्विटी-आधारित म्यूचुअल फंड में बाजार के उतार-चढ़ाव का असर पड़ सकता है और वास्तविक रिटर्न अनुमान से कम या अधिक हो सकता है।
ऐसे में बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि केवल एक निवेश विकल्प पर निर्भर रहने के बजाय जोखिम क्षमता और वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार निवेश को अलग-अलग एसेट क्लास में बांटना बेहतर हो सकता है। पीपीएफ और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्पों के साथ म्यूचुअल फंड, शेयर और ईटीएफ जैसे बाजार से जुड़े निवेश साधनों का संतुलित मिश्रण लंबे समय में रिटायरमेंट पोर्टफोलियो को अधिक मजबूत बना सकता है।
राष्ट्रीय समाचार
मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम से बढ़ेगा स्थानीय उत्पादन और पुर्जों का घरेलू निर्माण: उद्योग जगत

हाल ही में मंजूर की गई मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (एमपीएमएस) भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र को नई गति दे सकती है। उद्योग जगत का मानना है कि यह योजना स्थानीय मूल्य संवर्धन बढ़ाने, आयातित पुर्जों पर निर्भरता कम करने और इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला में बैकवर्ड इंटीग्रेशन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
उद्योग विशेषज्ञों ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ईसीएमएस) के तहत अब योजनाएं केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उत्पादन स्तर तक पहुंच चुकी हैं। अब तक 106 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें से 38 विनिर्माण संयंत्र उत्पादन शुरू कर चुके हैं, जबकि 16 अन्य परियोजनाएं निर्माण के उन्नत चरण में हैं।
सेमी इंडिया और इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन (आईईएसए) के अध्यक्ष अशोक चंदक ने कहा कि उद्योग लंबे समय से उत्पादन क्षमता बढ़ाने, मजबूत डिजाइन टीम विकसित करने, स्थानीय स्रोतों से आपूर्ति बढ़ाने और वैश्विक गुणवत्ता मानकों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दे रहा था। उन्होंने कहा कि मौजूदा आंकड़े दर्शाते हैं कि यह बदलाव अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है।
चंदक ने कहा कि भारत लंबे समय तक मल्टीलेयर पीसीबी, डिस्प्ले मॉड्यूल, सेंसर और रिले जैसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों के लिए आयात पर निर्भर रहा है। लेकिन अब स्थिति बदल रही है और भारत केवल वैश्विक कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादन केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने बताया कि इस बदलाव का प्रमाण इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के तहत हाल ही में 31 नई परियोजनाओं की मंजूरी है, जिनमें लगभग 6,844 करोड़ रुपए का निवेश प्रस्तावित है। इससे पहले पांच महीने के भीतर ही 75 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी, जिनमें 61,671 करोड़ रुपए के निवेश का प्रस्ताव था।
नई परियोजनियों के तहत देश में पहली बार कई महत्वपूर्ण घटकों का घरेलू उत्पादन शुरू होगा, जिनमें फिल्टर, कॉइल, स्पीकर जैसे प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक हिस्सों के साथ-साथ एसीटिलीन ब्लैक और इलेक्ट्रोलाइट एडिटिव्स जैसे आवश्यक कच्चे माल का निर्माण भी शामिल है।
उन्होंने आगे कहा कि यह बदलाव भारत को केवल मोबाइल फोन असेंबली केंद्र से आगे ले जाकर घटक और सामग्री-आधारित विनिर्माण मॉडल की ओर आगे बढ़ा रहा है, जिससे भारतीय बौद्धिक संपदा, भारतीय डिजाइन और भारतीय विनिर्माण क्षमताओं को हर स्तर पर बढ़ावा मिलेगा।
ईवाई इंडिया में दूरसंचार और ग्राहक एवं उद्योग क्षेत्र के प्रमुख प्रशांत सिंघल ने कहा कि नई मोबाइल फोन विनिर्माण योजना पहले की योजनाओं की सफलता को आगे बढ़ाएगी। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2014-15 की तुलना में वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का मोबाइल फोन उत्पादन 33 गुना और मोबाइल निर्यात 165 गुना बढ़ चुका है।
सिंघल ने आगे कहा कि नई योजना भारतीय मोबाइल ब्रांडों को विशेष प्रोत्साहन देगी, जिसमें घरेलू स्तर पर पुर्जों की खरीद और अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन शामिल हैं। इससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और देश में एक मजबूत इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा।
व्यापार
बैंकों ने 21 अगस्त तक जुटाई 72.85 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा; एफसीएनआर(बी) जमा राशि 65.4 अरब डॉलर तक पहुंची: आरबीआई

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शनिवार को बताया कि अधिकृत डीलर बैंकों ने केंद्रीय बैंक की विशेष स्वैप सुविधा के तहत 21 अगस्त तक कुल 72.848 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (बैंक) जमा एफसीएनआर(बी) का रहा, जिसके माध्यम से 65.397 अरब डॉलर जुटाए गए।
आरबीआई के अनुसार, केंद्रीय बैंक की विशेष स्वैप सुविधा के तहत बाह्य वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) और विदेशी मुद्रा उधार (ओएफसीबी) के जरिए भी 7.451 अरब डॉलर की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है।
केंद्रीय बैंक ने 8 जून 2026 को एफसीएनआर(बी) जमा, ईसीबी और ओएफसीबी से आने वाले निवेश के लिए विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी। इस योजना का उद्देश्य रुपए पर दबाव कम करना और देश में विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाना था।
आरबीआई ने कहा कि पहले घोषित कार्यक्रम के अनुसार एफसीएनआर(बी) जमा योजना 31 अगस्त 2026 तक खुली रहेगी, जबकि ईसीबी और ओएफसीबी के लिए यह सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक उपलब्ध रहेगी।
यह बड़ी विदेशी मुद्रा आमद ऐसे समय हुई है जब भारतीय बैंकों ने एफसीएनआर(बी) जमा आकर्षित करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। आरबीआई ने हाल ही में इस योजना की अंतिम तिथि 30 सितंबर से घटाकर 31 अगस्त कर दी थी। केंद्रीय बैंक ने कहा था कि योजना को उम्मीद से बेहतर प्रतिक्रिया मिली है और विदेशी मुद्रा जुटाने का लक्ष्य तेजी से पूरा हो रहा है।
इस सप्ताह जारी एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि एफसीएनआर(बी) योजना के तहत डॉलर जुटाने का लक्ष्य संभवतः पहले ही हासिल किया जा चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त के शेष दिनों में भी 25 से 30 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त प्रवाह आने की संभावना थी, जिससे कुल संग्रह लगभग 85 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि स्वैप सुविधा की लागत कोई बड़ी बाधा नहीं है। एसबीआई रिसर्च के अनुमान के अनुसार, योजना की कुल लागत लगभग 10.5 अरब डॉलर या कुल कोष का लगभग 15 प्रतिशत हो सकती है। हालांकि इसे भारत के विशाल विदेशी मुद्रा भंडार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
इस बीच, देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी तेजी से बढ़ा है। आरबीआई के शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, 14 अगस्त को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 9.905 अरब डॉलर बढ़कर 716.90 अरब डॉलर हो गया। इससे एक सप्ताह पहले भी भंडार में 14.1 अरब डॉलर की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई थी और यह चालू वित्त वर्ष का उच्चतम स्तर था।
एफसीएनआर(बी) योजना के तहत आई बड़ी विदेशी मुद्रा आमद ने न केवल रुपए को समर्थन दिया है, बल्कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को भी मजबूत किया है। इससे वैश्विक अनिश्चितताओं और बाहरी झटकों से निपटने की देश की क्षमता और बेहतर हुई है।
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