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Monday,12-October-2026
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राजनीति

पंजाब में पीएम की सुरक्षा में सेंध, सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई

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पंजाब में एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में सेंध लगने से जुड़ा मामला गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया। शीर्ष अदालत शुक्रवार को मामले की सुनवाई के लिए तैयार हो गई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने पंजाब में पीएम के काफिले में सुरक्षा उल्लंघन की जांच के लिए मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख किया।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने सिंह को याचिका की एक प्रति पंजाब सरकार को देने को कहा और मामले की सुनवाई शुक्रवार को तय की।

सिंह ने कहा कि यह पंजाब सरकार की ओर से एक गंभीर चूक है। प्रधानमंत्री का काफिला सड़क पर फंस गया था, जिससे अस्वीकार्य सुरक्षा उल्लंघन हुआ था।

शीर्ष अदालत ने सिंह से पूछा, वह अदालत से क्या उम्मीद कर रहे हैं? सिंह ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह दोबारा न हो और गहन जांच की जरूरत है।

गृह मंत्रालय (एमएचए) ने कहा था कि बुधवार को पंजाब दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा भंग हुई थी। गृह मंत्रालय ने सुरक्षा उल्लंघन का संज्ञान लेते हुए पंजाब सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

एमएचए ने पंजाब सरकार से इस चूक की जिम्मेदारी तय करने और सख्त कार्रवाई करने को भी कहा।

गृह मंत्रालय (एमएचए) ने एक बयान में कहा, “आज सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बठिंडा पहुंचे जहां से उन्हें हेलीकॉप्टर से हुसैनीवाला में राष्ट्रीय शहीद स्मारक जाना था। बारिश और खराब ²श्यता के कारण, प्रधानमंत्री मौसम साफ होने के लिए लगभग 20 मिनट तक इंतजार किया। जब मौसम में सुधार नहीं हुआ, तो यह तय किया गया कि वह सड़क मार्ग से राष्ट्रीय शहीद स्मारक का दौरा करेंगे, जिसमें दो घंटे से अधिक समय लगेगा। डीजीपी पंजाब पुलिस द्वारा सुरक्षा व्यवस्था के लिए आवश्यक पुष्टि के बाद वह सड़क मार्ग से यात्रा करने के लिए आगे बढ़े।”

हुसैनीवाला में राष्ट्रीय शहीद स्मारक से करीब 30 किमी दूर जब प्रधानमंत्री का काफिला एक फ्लाईओवर पर पहुंचा तो पाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने सड़क को जाम कर दिया था। गृह मंत्रालय ने कहा, “प्रधानमंत्री 15-20 मिनट तक फ्लाईओवर पर फंसे रहे। यह प्रधानमंत्री की सुरक्षा में एक बड़ी चूक थी।”

एमएचए ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम और यात्रा योजना के बारे में पंजाब सरकार को पहले ही बता दिया गया था।

महाराष्ट्र

एमपीएससी में गड़बड़ियों की जांच के लिए महाराष्ट्र सरकार ने बनाई समिति, तुकाराम मुंडे को मिली सचिव की जिम्मेदारी

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महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) में गड़बड़ियों और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर जारी उम्मीदवारों के आंदोलन के बीच राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने आयोग से जुड़े मामलों की जांच और सुधार के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश दिलीप भोसले की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति गठित की है। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंडे को समिति का सचिव नियुक्त किया गया है।

जानकारी के अनुसार राज्य सरकार का यह फैसला रविवार को सामने आया। राज्य मंत्री शिवेंद्रराजे भोसले ने पुणे में एसएम जोशी पुल पर आंदोलन कर रहे उम्मीदवारों से मुलाकात के दौरान समिति के गठन की जानकारी दी। यहां उम्मीदवार पिछले 10 दिनों से महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग में सुधार समेत विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

समिति की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश दिलीप भोसले करेंगे। तुकाराम मुंडे के अलावा इसमें लक्ष्मी गौतम, गणेश पाटील और सेवानिवृत्त न्यायाधीश पी. डी. नाइक को शामिल किया गया है। समिति से महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार और भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी शिकायतों पर विचार करने की अपेक्षा है।

सरकार के इस फैसले को आंदोलन कर रहे उम्मीदवारों की मांगों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, आयोग के अध्यक्ष विवेक भीमनवार को पद से हटाने की मांग पर सरकार ने क्या निर्णय लिया है, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं हुआ है।

आंदोलनकारी उम्मीदवारों की मांगों में केवल महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार ही शामिल नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने आंदोलन में शामिल कुछ प्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने, अगले तीन वर्षों में 70 हजार पदों पर भर्ती करने और जनवरी में प्रस्तावित ग्रुप-सी परीक्षा में पदों की संख्या बढ़ाने की मांग भी उठाई है।

इसके अलावा, उम्मीदवारों ने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सचिव की नियुक्ति से पहले उनकी पृष्ठभूमि की जांच सुनिश्चित करने की मांग की है। राज्य मंत्री शिवेंद्रराजे भोसले ने प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि उनकी अन्य मांगों पर भी ध्यान दिया जाएगा।

महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग उम्मीदवारों के आंदोलन का समर्थन कर रहे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के विधायक रोहित पाटील ने समिति में तुकाराम मुंडे को शामिल किए जाने का स्वागत किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि समिति को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलेगा। सरकार की ओर से समिति गठित किए जाने के बाद महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष विवेक भीमनवार के जांच पूरी होने तक छुट्टी पर जाने की भी खबर है।

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राष्ट्रीय समाचार

अधूरे इश्क ने उठवाई कलम, अल्फाज ऐसे कि लाखों दिलों की आवाज बन गए निदा फाजली

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शायरी करना आसान हो सकता है लेकिन ऐसे अल्फाज लिखना बहुत मुश्किल है, जिन्हें पढ़कर किसी को अपना दर्द याद आ जाए, किसी को मोहब्बत का एहसास हो और किसी को जिंदगी जीने का नया नजरिया मिल जाए। हिंदी और उर्दू साहित्य में निदा फाजली एक ऐसा ही नाम हैं, जिनकी शायरी सीधे दिल तक पहुंचती है। उन्होंने आम आदमी की जिंदगी, उसके संघर्ष, रिश्तों, मोहब्बत और इंसानियत को इतने सरल शब्दों में बयां किया कि उनके शेर लोगों की जुबान पर चढ़ गए। आज भी उनकी शायरी पढ़ते हुए लगता है, जैसे उन्होंने हमारे ही मन की बात कह दी हो।

निदा फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। उनका असली नाम मुक्तदा हसन था। बचपन ग्वालियर में बीता और वहीं उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। उनके पिता मुर्तुजा हसन भी शायरी करते थे, इसलिए साहित्य से उनका परिचय बचपन से ही हो गया था। हालांकि, निदा की शायरी की आवाज धीरे-धीरे जिंदगी के अनुभवों से निखरी।

कॉलेज के दिनों में उन्हें एक लड़की से लगाव हो गया था। वह लड़की उनके आगे की पंक्ति में बैठा करती थी। फिर एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर खबर मिली कि एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गई। यह खबर निदा के लिए गहरा सदमा थी। उनके भीतर जो दर्द उमड़ा, उसे बयां करने के लिए उनके पास शब्द ही नहीं थे। यही एहसास उन्हें अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें अल्फाज देने की तरफ ले गया।

कहा जाता है कि एक सुबह निदा फाजली मंदिर के पास से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने सूरदास का भजन सुना— ‘मधुबन तुम क्यौं रहत हरे?’ कृष्ण के वियोग में दुखी राधा और गोपियों की भावनाओं को व्यक्त करने वाला यह भजन उनके दिल में उतर गया। उन्हें लगा कि विरह और बिछड़ने का दर्द केवल उनका निजी अनुभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और बाबा फरीद जैसे रचनाकारों को पढ़ा। गालिब और मीर की शायरी से भी प्रेरणा ली। इन सबका असर उनके लेखन पर दिखाई दिया। उन्होंने ऐसी भाषा में लिखना शुरू किया, जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ सके और अपने जीवन से जोड़ सके।

देश के बंटवारे के समय निदा फाजली के माता-पिता पाकिस्तान चले गए लेकिन उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया। परिवार से दूर रहकर अपनी जिंदगी बनाना आसान नहीं था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी और लेखन के क्षेत्र में संघर्ष किया।

साल 1964 में वह बंबई चले गए। वहां उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान बनने लगी और 1969 में उनका उर्दू कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ। उनकी शायरी में बनावट नहीं थी। वे जिंदगी को जैसा देखते और महसूस करते थे, उसे वैसे ही शब्दों में उतार देते थे।

निदा फाजली ने साहित्य के साथ हिंदी फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई। फिल्म रजिया सुल्तान से उनके फिल्मी गीतों के सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद उन्होंने कई यादगार गीत लिखे। फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता का गीत ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ और सरफरोश का ‘होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है’ आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं।

उन्होंने अपने अनुभवों और भावनाओं को शायरी में ढाला लेकिन उनकी रचनाएं केवल उनकी अपनी कहानी बनकर नहीं रह गईं। वे लाखों लोगों के दिलों की आवाज बन गईं।

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राजनीति

सीजेपी प्रदर्शन रोकना लोकतंत्र का काला दिन, सौरभ भारद्वाज बोले-बदलाव नहीं रोक पाएगी भाजपा

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दिल्ली में सीजेपी के विरोध प्रदर्शन को लेकर आम आदमी पार्टी ने पुलिस और केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आम आदमी पार्टी दिल्ली के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि पुलिस ने सरकार के निर्देश पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बेरहमी से कार्रवाई की। आप नेता गोपाल राय ने प्रदर्शन पर रोक लगाने, मेट्रो और रेल सेवाएं प्रभावित होने तथा भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती को देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन बताया।

सीजेपी के विरोध प्रदर्शन को लेकर आम आदमी पार्टी दिल्ली के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने से बात करते हुए कहा कि पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान उनके पार्टी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया, घसीटा और थानों में ले गई। कई लोगों को दो दिनों से हिरासत में रखा गया है।

भारद्वाज ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस दक्षिणपंथी तत्वों को बचा रही है। यदि पुलिस ऐसे लोगों को संरक्षण दे रही है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि पर भी पड़ सकता है।

सौरभ भारद्वाज ने कांग्रेस की भूमिका पर कहा कि पार्टी को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह उसका अपना निर्णय है. हालांकि उन्होंने कहा कि जब भी युवा सीजेपी, वामपंथी छात्र संगठनों या आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन के आह्वान पर विरोध प्रदर्शन करते हैं तो विभिन्न विपक्षी दलों के नेता और कार्यकर्ता इसमें शामिल होते हैं।

उन्होंने इसे जनता का आंदोलन बताते हुए कहा कि प्रदर्शन को व्यापक समर्थन मिल रहा है। भारी पुलिस तैनाती, रेल और मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों, सीमाओं को सील करने तथा इंटरनेट सेवाएं रोकने के बावजूद करीब 7,000 युवा गिरफ्तारी देने के लिए तैयार थे। उन्होंने इसे देश में बदलाव का संकेत बताया और कहा कि भाजपा इस बदलाव को रोक नहीं पाएगी।

आप नेता गोपाल राय ने प्रदर्शन पर रोक लगाए जाने की आलोचना करते हुए कहा कि यह भारत के राजनीतिक इतिहास का काला दिन था। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर देश में ‘ब्लैक इमरजेंसी’ थोपने का आरोप लगाया।

गोपाल राय ने कहा कि यह देश और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। उनके मुताबिक निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए वोटों की सुरक्षा जरूरी है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, उनके खिलाफ कार्रवाई और एसआईआर प्रक्रिया समाप्त करने की मांग की। साथ ही, उन्होंने निष्पक्ष चुनाव कराने पर जोर दिया।

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