राजनीति
येदियुरप्पा के करीबी पर आईटी की छापेमारी में 750 करोड़ रुपये बरामद
बेंगलुरु और अन्य जगहों पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की हालिया छापेमारी पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के करीबी सहयोगी बी.आर. उमेश व अन्य भाजपा के दिग्गज नेता के लिए झटका हैं। पार्टी सूत्रों ने इसकी जानकारी दी। तलाशी व जब्ती के दौरान करीब 750 करोड़ रुपये की अघोषित आय मिली है। इसमें से 487 करोड़ रुपये की राशि को संबंधित समूह की संस्थाओं ने अपनी अघोषित आय के रूप में स्वीकार किया है। 7 अक्टूबर को शुरू हुई तलाशी 4 राज्यों में फैले 47 परिसरों में की गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि येदियुरप्पा के करीबी सहयोगियों पर केवल उन्हें ‘चेकमेट’ देने और उन्हें वश में करने के इरादे से आईटी छापे मारे गए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया, “येदियुरप्पा और विपक्ष के नेता सिद्धारमैया ने कर्नाटक में बीजेपी को कमजोर करने की योजना बनाने के लिए मैसूर में मुलाकात की। कम सामान्य ज्ञान वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि येदियुरप्पा और उनके बेटे विजयेंद्र के करीबी सहयोगियों को आईटी विभाग ने क्यों निशाना बनाया है। यह भाजपा द्वारा येदियुरप्पा पर ब्रेक लगाने के लिएइरादे से किया जा रहा है।”
उन्होंने कहा, “मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है। बीजेपी येदियुरप्पा को नियंत्रित करना चाहती है।” हालांकि, छापेमारी के निष्कर्षों ने घटनाओं को एक गंभीर मोड़ दिया है क्योंकि अब इस गड़बड़ी की गहन जांच किए जाने की उम्मीद है।
तलाशी के दौरान 4.69 करोड़ रुपये की बेहिसाब नकदी, 8.67 करोड़ रुपये के बेहिसाब आभूषण, सर्रार्फा और 29.83 लाख रुपये मूल्य की चांदी की वस्तुएं जब्त की गई हैं।
आयकर विभाग ने बेंगलुरु के बाहर स्थित तीन प्रमुख ठेकेदारों के मामले में तलाशी और जब्ती अभियान चलाया, येदियुरप्पा के सहयोगी उमेश 7 अक्टूबर से तीन दिन के लिए बीआर सहित सिंचाई और राजमार्ग परियोजनाओं के निष्पादन में लगे हुए हैं।
सूत्रों ने बताया कि येदियुरप्पा तक पहुंचने की पूरी संभावनाएं हैं क्योंकि छापे जल संसाधन मंत्रालय के तहत सिंचाई विभाग की परियोजनाओं पर केंद्रित थे, जिसमें 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की विभिन्न परियोजनाओं के कार्यान्वयन शामिल थे।
आईटी विभाग ने आगे दावा किया कि समूहों में से एक ने 382 करोड़ रुपये के श्रम खर्च को बढ़ाने में लिप्त होने की बात स्वीकार की है। इसके अलावा, एक अन्य समूह ने गैर-मौजूदा पेपर कंपनियों से 105 करोड़ रुपये की आवास प्रविष्टियां ली हैं, जिन्हें इस समूह द्वारा स्वीकार किया गया है।
सूत्रों के अनुसार, इन भारी हेराफेरी की भविष्य में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जांच की जाएगी। सूत्रों ने कहा कि येदियुरप्पा, जिन्होंने मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद खुद को मुखर करना शुरू कर दिया है, उनके पास अब पार्टी के फरमान के मुताबिक चलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होगा।
येदियुरप्पा, शीर्ष पद से हटने के लिए कहे जाने के बावजूद, एक जन नेता बने हुए हैं और भाजपा विधायकों पर उनकी अच्छी पकड़ है।
येदियुरप्पा अगले विधानसभा चुनावों में कर्नाटक में भाजपा पार्टी के प्रॉस्पेक्टस को नुकसान पहुंचाने की पूरी क्षमता रखते हैं। चूंकि भाजपा आलाकमान चाहता है कि उनका समर्थन सत्ता में वापस आए, लेकिन साथ ही वह उनकी छाया में नहीं रहना चाहते। सूत्रों का कहना है कि आईटी छापों के साथ, पार्टी इन लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहती थी और आईटी छापों के निष्कर्षों ने पार्टी का काम आसान कर दिया।
इस बीच, आईटी अधिकारियों ने ‘डिजाइन बॉक्स’ कंपनी के कार्यालय और एक होटल के कमरे पर छापेमारी की है, जहां कंपनी के मालिक नरेश अरोड़ा रहते हैं। कंपनी बेंगलुरु में शक्तिशाली राजनेताओं के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का प्रबंधन करती है और राजनेताओं की ब्रांडिंग भी करती है। छापेमारी मंगलवार की आधी रात तक जारी रही। पहले कहा जाता था कि कंपनी का मालिकाना हक कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार के पास है। हालांकि शिवकुमार ने इससे इनकार किया है।
राजनीति
पश्चिम बंगाल में डीजीपी की नियुक्ति पर पेंच, यूपीएससी ने सुप्रीम कोर्ट जाने की दी सलाह

कोलकाता, 6 जनवरी: पश्चिम बंगाल में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को लेकर जटिलता बढ़ती नजर आ रही है। मौजूदा डीजीपी राजीव कुमार का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त होने वाला है, लेकिन उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति पर अब तक स्थिति साफ नहीं हो पाई है।
इसी बीच, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से आवश्यक अनुमति लेने की सलाह दी है।
यूपीएससी के निदेशक नंद किशोर कुमार ने पश्चिम बंगाल की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को पत्र लिखकर कहा है कि राजीव कुमार के उत्तराधिकारी की नियुक्ति के लिए राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट का रुख करना चाहिए। यूपीएससी ने राज्य सरकार द्वारा भेजी गई आईपीएस अधिकारियों की सूची भी लौटा दी है, जिनमें से किसी एक को नया डीजीपी बनाए जाने की सिफारिश की गई थी।
नियमों के अनुसार, किसी भी राज्य सरकार को डीजीपी पद के लिए राज्य में कार्यरत तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की सूची यूपीएससी को भेजनी होती है। इसके बाद यूपीएससी इन तीन नामों में से एक नाम को अंतिम रूप से मंजूरी देता है, लेकिन पश्चिम बंगाल के मामले में यह प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाई।
इस पूरे विवाद की जड़ दिसंबर 2023 में तत्कालीन डीजीपी मनोज मालवीय के सेवानिवृत्त होने से जुड़ी है। उस समय राज्य सरकार को उनके उत्तराधिकारी के लिए तीन आईपीएस अधिकारियों का पैनल भेजना था, लेकिन ऐसा करने के बजाय राज्य सरकार ने राजीव कुमार को कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त कर दिया। राज्य सरकार ने बाद में उनके स्थायी उत्तराधिकारी के लिए आईपीएस अधिकारियों का पैनल भेजा, जिसे यूपीएससी ने स्वीकार नहीं किया।
यूपीएससी के निदेशक ने मुख्य सचिव को लिखे पत्र में सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2018 के आदेश का हवाला दिया है। इस आदेश के अनुसार, किसी भी राज्य सरकार को मौजूदा डीजीपी के सेवानिवृत्त होने से कम से कम तीन महीने पहले नए डीजीपी के लिए आईपीएस अधिकारियों का पैनल भेजना अनिवार्य है।
इस आधार पर यूपीएससी का कहना है कि पश्चिम बंगाल सरकार को सितंबर 2023 में ही पैनल भेज देना चाहिए था, क्योंकि मनोज मालवीय दिसंबर 2023 में सेवानिवृत्त हुए थे। पत्र में यह भी बताया गया है कि इस मामले में आयोग ने भारत के अटॉर्नी जनरल से भी सलाह ली थी। अटॉर्नी जनरल ने भी यही राय दी है कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेकर ही राजीव कुमार के उत्तराधिकारी की नियुक्ति करनी चाहिए।
महाराष्ट्र
फुटपाथ से उठाकर विधायक बनाया, लेकिन पार्टी के लिए कुछ नहीं किया: अबू आसिम आज़मी का रईस शेख पर बड़ा हमला

मुंबई: (कमर अंसारी) समाजवादी पार्टी महाराष्ट्र में अंदरूनी गुटबाज़ी अब खुलकर सामने आ गई है। महाराष्ट्र समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अबू आसिम आज़मी ने एक निजी यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में पार्टी के भिवंडी से विधायक रईस शेख पर तीखा हमला बोला है। आज़मी ने दावा किया कि उन्होंने रईस शेख को “फुटपाथ से उठाकर समाजवादी पार्टी की सीट पर विधायक बनाया”, लेकिन रईस शेख ने कभी भी पार्टी के हित में कोई काम नहीं किया।
अबू आसिम आज़मी ने आरोप लगाया कि रईस शेख लगातार समाजवादी पार्टी के खिलाफ काम कर रहे हैं और उन्हें नैतिकता के आधार पर खुद ही पार्टी से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने कहा कि रईस शेख ने भिवंडी महानगरपालिका और मुंबई महानगरपालिका चुनावों के लिए उम्मीदवारों के इंटरव्यू खुद लिए और टिकट वितरण में भी दखल दिया। इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को हराने के लिए उनके सामने कांग्रेस के उम्मीदवार उतारे गए।
आज़मी के मुताबिक, जब पार्टी ने रईस शेख के भाई को टिकट देने से इनकार कर दिया, तो इसी नाराज़गी के चलते उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ अपने समर्थकों को कांग्रेस की टिकट पर चुनाव मैदान में उतार दिया। अबू आसिम आज़मी ने यह भी आरोप लगाया कि रईस शेख परिवारवाद को बढ़ावा देना चाहते थे, जिसका पार्टी ने विरोध किया और इसी कारण टिकट देने से मना कर दिया गया।
दूसरी ओर, रईस शेख अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि वे वास्तव में किस पार्टी के साथ हैं। एक तरफ उनके समर्थन से कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव लड़ते नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने समाजवादी पार्टी से औपचारिक रूप से इस्तीफा नहीं दिया है। अबू आसिम आज़मी ने कहा कि जल्द ही जनता के सामने रईस शेख का “दोहरा चेहरा” उजागर हो जाएगा। उन्होंने महानगरपालिका चुनावों के बाद रईस शेख के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के संकेत भी दिए हैं।
वहीं, रईस शेख का कहना है कि कई राजनीतिक पार्टियां उनकी अनुमति के बिना उनके फोटो का इस्तेमाल कर वोट हासिल करने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि समाजवादी पार्टी के टिकट वितरण के किसी भी फैसले में वे शामिल नहीं थे और पार्टी ने उन्हें पहले ही साइडलाइन कर दिया था। रईस शेख के अनुसार, जो उम्मीदवार कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे हैं, उन्हें टिकट कांग्रेस पार्टी ने ही दिया है और इसका उनसे कोई लेना-देना नहीं है।
इस पूरे विवाद के बीच समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोटर असमंजस की स्थिति में हैं। वे यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि रईस शेख के समर्थन से उतरे कांग्रेस उम्मीदवारों को वोट दें या समाजवादी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों को, क्योंकि इस चुनाव में यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि आखिर कौन किसके साथ है।
राष्ट्रीय समाचार
दिल्ली हाईकोर्ट में होगी दुष्यंत गौतम के मानहानि मामले की सुनवाई, 2 करोड़ रुपए का हर्जाना मांगा

नई दिल्ली, 6 जनवरी: दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार को भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम द्वारा दायर मानहानि मामले पर सुनवाई होने जा रही है। यह मामला उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़ा है, जिसमें सोशल मीडिया पर दुष्यंत गौतम का नाम उछाला गया था।
दुष्यंत गौतम का कहना है कि बिना किसी आधार के उनका नाम इस मामले से जोड़ा गया, जिससे उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा है। दुष्यंत गौतम की ओर से वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने दिल्ली हाईकोर्ट से मामले की जल्द सुनवाई की मांग की थी।
उनका तर्क था कि सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों के जरिए लगातार आपत्तिजनक और मानहानिकारक बातें फैलाई जा रही हैं, जिनका तुरंत संज्ञान लिया जाना जरूरी है। कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
दुष्यंत गौतम ने दिल्ली हाईकोर्ट में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राजनीतिक लाभ लेने के लिए कुछ दलों और नेताओं ने जानबूझकर सोशल मीडिया पर उनका नाम उछाला और उन्हें अंकिता भंडारी हत्याकांड से जोड़ने की कोशिश की। दुष्यंत गौतम का कहना है कि उनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी उन्हें बदनाम किया गया।
अपनी याचिका में दुष्यंत गौतम ने कोर्ट से मांग की है कि उनके खिलाफ डाले गए सभी मानहानिकारक कंटेंट को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से तुरंत हटाया जाए। इसके अलावा उन्होंने दो करोड़ का हर्जाना भी मांगा है। उनका कहना है कि इस तरह के झूठे आरोपों से न सिर्फ उनकी राजनीतिक साख को नुकसान पहुंचा है, बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर भी उन्हें परेशानी झेलनी पड़ी है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड के सबसे चर्चित मामलों में से एक रहा है। सितंबर 2022 में 19 साल की अंकिता भंडारी, जो एक होटल में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करती थी, की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में बीजेपी के पूर्व नेता के बेटे पुलकित आर्य को मुख्य आरोपी बनाया गया था। निचली अदालत ने इस मामले में पुलकित आर्य और दो अन्य आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है।
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