अंतरराष्ट्रीय समाचार
रिपब्लिकन हिन्दू समूह ने डोनाल्ड ट्रंप के लिए अभियान में लाई कमी
साल 2016 के चुनाव में इस समय तत्कालीन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप हजारों हिन्दू समर्थकों की एक बड़ी रैली को संबोधित कर रहे थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है, बल्कि होने की संभावना भी नहीं है। रिपब्लिकन हिंदू कोऑलिशन (आरएचसी) ने 15 अक्टूबर, 2016 को न्यूजर्सी में उस रैली का आयोजन किया था लेकिन इस साल उन्होंने निर्णय किया है कि जब तक ट्रंप इमीग्रेशन में सुधार करने की गारंटी नहीं देंगे, वो ट्रंप के लिए कोई प्रचार अभियान नहीं करेंगे।
आरएचसी के संस्थापक शलभ कुमार ने आईएएनएस से कहा, “हम अपने समूह के सदस्यों से ट्रंप का समर्थन करने के लिए कहेंगे और हिंदुओं से ट्रंप को वोट देने का आग्रह करेंगे, लेकिन हम 2016 जैसे किसी भी तरह के के प्रचार कार्यक्रम का आयोजन नहीं करेंगे, जिसमें 8,000 लोगों ने हिस्सा लिया था।”
उन्होंने आगे कहा, “पिछली बार हमने ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ का नारा दिया था लेकिन इस बार हम राष्ट्रपति के साथ बैठक की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि ग्रीन कार्ड को लेकर स्थिति की स्पष्टता पा सकें।”
उन्होंने बताया कि आरएचसी में लगभग 50,000 सदस्य हैं, जिनमें पूरी दुनिया के हिन्दू शामिल हैं।
जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन कोविड -19 महामारी के कारण बड़ी रैलियां नहीं कर रहे हैं, वहीं ट्रंप अपने लिए एक हिंदू कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं। उन्होंने ‘हिन्दू वॉइसेस फॉर ट्रंप’ नाम से एक प्रोग्राम लॉन्च किया है, जो अलग से सिखों, मुसलमानों और भारतीय-अमेरिकियों को टारगेट करता है लेकिन उन्होंने हिन्दुओं के लिए कुछ नहीं किया है।
वहीं डेमोक्रेट्स पहली बार राजा कृष्णमूर्ति के प्रतिनिधित्व में ‘हिंदूज फॉर बिडेन’ के जरिए हिन्दुओं तक पहुंच रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी में हुए इस बदलाव को देखते हुए, कुमार ने चुटकी ली, “हमने कम से कम हिन्दू शब्द को लोकप्रिय बना दिया है।”
कुमार जहां इमिग्रेशन सुधारों के जरिए ग्रीन कार्ड के पुराने मामलों का निपटारा (बैकलॉग) चाहता है। क्योंकि करीब 10 लाख लोगों का ग्रीन कार्ड बनना है और वे बहुत परेशानी में हैं। वहीं ट्रंप योग्यता के आधार पर इमिग्रेशन की बात करते हैं।
रिपब्लिकन सीनेटर माइक ली के अनुमान के अनुसार, बैकलॉग को लेकर स्थिति इतनी खराब है कि कुछ भारतीयों को ग्रीन कार्ड पाने में 195 साल लग सकते हैं। ग्रीन कार्ड स्थायी प्रवासी का दर्जा देता है और इसे पाने वालों को पूरी नागरिकता पाने की सूची में शुमार करता है।
कुमार कहते हैं, “हम सुनिश्चित करना चाहते हैं कि इमिग्रेशन के मुद्दे को ध्यान में रखा जाए, चाहे ट्रंप फिर से चुनकर आएं..जैसा कि हम चाहते हैं। लेकिन जमीन पर वास्तविकता को देखते हुए अगर बाइडन राष्ट्रपति बनते हैं तो हम चाहते हैं कि तब भी इस मुद्दे को ध्यान में रखा जाए।”
अंतरराष्ट्रीय समाचार
अमेरिका से बातचीत शांति का विकल्प, लेकिन राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा उत्तर कोरिया: किम यो जोंग

उत्तर कोरिया ने बुधवार को कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत शांति स्थापित करने का एक विकल्प है, लेकिन इसे अपने राष्ट्रीय हितों के लिए वो जरूरी नहीं मानता। उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने यह बयान देते हुए अमेरिका पर प्योंगयांग के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति जारी रखने का आरोप लगाया।
उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी (केसीएनए) के हवाले से योनहाप न्यूज एजेंसी ने बताया कि किम यो जोंग ने कहा कि अमेरिका लगातार ऐसे संकेत दे रहा है, जिनसे उत्तर कोरिया को उसके वास्तविक इरादों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा, ”शांति के विकल्पों में निश्चित रूप से बातचीत भी शामिल है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बातचीत हमारे राष्ट्रीय हितों के बराबर है।”
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी एफबीआई ने दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज बाइनेंस से 6 अरब डॉलर से अधिक की क्रिप्टोकरेंसी चोरी के मामले में उत्तर कोरिया की संलिप्तता का आरोप लगाया है। उत्तर कोरिया ने इस आरोप को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक उकसावे की कार्रवाई बताया है।
किम यो जोंग ने बुधवार को एक बार फिर इस आरोप को अमेरिका की शत्रुतापूर्ण नीति का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि तथाकथित उत्तर कोरियाई क्रिप्टोकरेंसी हैकिंग का मामला अमेरिका की प्योंगयांग विरोधी नीति की वास्तविक प्रकृति की केवल एक झलक है।
उन्होंने दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान के विदेश मंत्रियों की हालिया त्रिपक्षीय बैठक का भी उल्लेख किया। इस बैठक में तीनों देशों ने उत्तर कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। किम ने इन देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यासों को भी उत्तर कोरिया के खिलाफ शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का हिस्सा बताया।
किम यो जोंग ने कहा कि अमेरिका को उत्तर कोरिया के प्रति अपनी शत्रुतापूर्ण नीति छोड़नी होगी। उनके मुताबिक, सभी समस्याओं के समाधान के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वाशिंगटन अपनी टकराव की नीति नहीं बदलता, तब तक प्योंगयांग के पास अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर बैठने का कोई कारण नहीं है।
उन्होंने कहा, “उत्तर कोरिया को ऐसे अविश्वसनीय और शत्रुतापूर्ण लोगों के साथ आमने-सामने बैठने की जरूरत नहीं है, जो अपनी टकराव की नीति छोड़ने को तैयार नहीं हैं।”
यो ने अमेरिका की कथित शत्रुतापूर्ण गतिविधियों के जवाब में उत्तर कोरिया की ओर से जवाबी कदम उठाए जाने की चेतावनी भी दी। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि प्योंगयांग किस तरह की कार्रवाई कर सकता है।
उनका यह बयान उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच संभावित कूटनीतिक संपर्कों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से मुलाकात की इच्छा जता चुके हैं। इस महीने दोनों नेताओं के बीच संभावित मुलाकात को लेकर अटकलें भी लगाई जा रही हैं, हालांकि उत्तर कोरिया की ओर से इस संबंध में कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
जयपुर की बेटी पिया दांडिया ने जीती फ्लोरिडा सीट, संसद पहुंचने वाली दूसरी भारतीय-अमेरिकी महिला

राजस्थान की राजधानी जयपुर से ताल्लुक रखने वाले अप्रवासी भारतीय माता-पिता की बेटी पिया दांडिया ने मंगलवार को हुए फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से जीत हासिल कर ली है। डेमोक्रेटिक पार्टी की पिया अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए निर्वाचित होने वाली दूसरी भारतीय-अमेरिकी महिला बन गई हैं। उनसे पहले प्रमिला जयपाल यह उपलब्धि हासिल कर चुकी हैं।
दांडिया ने रिपब्लिकन पार्टी के कारोबारी उम्मीदवार केसी असकर को पराजित किया। डिसीजन डेस्क मुख्यालय और सीबीएस न्यूज के अनुमानों के मुताबिक, उन्होंने यह मुकाबला अपने नाम किया। एनबीसी न्यूज ने भी उन्हें इस सीट का संभावित विजेता घोषित किया। करीब 99 प्रतिशत मतों की गिनती पूरी होने के बाद दांडिया लगभग 52 प्रतिशत वोट के साथ आगे थीं, जबकि असकर को करीब 48 प्रतिशत मत मिले। एनबीसी न्यूज के अनुसार, 2024 के राष्ट्रपति चुनाव की तुलना में इस सीट पर डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में करीब 14 प्रतिशत का रुझान बदला।
पाम बीच काउंटी में जन्मीं और पली-बढ़ीं दांडिया का बचपन जुपिटर में बीता। उनके माता-पिता 1980 के दशक में राजस्थान के जयपुर से अमेरिका पहुंचे थे और यहीं बस गए। अमेरिका आने के बाद उनके पिता डॉ. रोहित दांडिया ने बतौर डॉक्टर सेवाएं जारी रखीं, जबकि उनकी मां ने 40 वर्ष की उम्र में जुपिटर में एक मोंटेसरी स्कूल की स्थापना की। इस स्कूल की शुरुआत भी मुख्य रूप से पिया की शिक्षा को ध्यान में रखकर की गई थी।
दांडिया का पालन-पोषण भारतीय संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं से जुड़े माहौल में हुआ। उनके माता-पिता बचपन में उन्हें भारत भेजते थे, ताकि वह अपने चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ समय बिता सकें और अपनी जड़ों को समझ सकें।
अगस्त 2025 में न्यू इंडिया अब्रॉड को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था, “मेरे माता-पिता बहुत छोटी उम्र से ही मुझे अकेले भारत भेजते थे, ताकि मैं अपने भाई-बहनों के साथ समय बिता सकूं। ये यात्राएं मेरे जीवन को बदलने वाली साबित हुईं और मेरी पहचान को आकार देने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनसे मुझे समझने का मौका मिला कि अलग-अलग लोकतंत्र किस तरह काम करते हैं और दुनिया में असमानता किस तरह मौजूद है।”
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पहले वर्ष की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने गर्मी की छुट्टी दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने में बिताई। वह आशा कोऑपरेटिव सोसायटी के साथ जुड़ी थीं और सात से 17 वर्ष की उम्र के बच्चों को पढ़ाती थीं।
इस अनुभव को याद करते हुए उन्होंने कहा था, “वंचित बच्चों को पढ़ाते हुए मैंने सीखा कि लोगों के बीच वास्तव में अंतर उनकी क्षमताओं का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का होता है जिनमें उन्हें जीवन बिताना पड़ता है।”
2025 में इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट फंड की ओर से समर्थन मिलने पर दांडिया ने अपने राजनीतिक सफर और पारिवारिक पृष्ठभूमि का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था, “मेरा जन्म और पालन-पोषण इसी क्षेत्र में हुआ। मेरे माता-पिता अमेरिकी सपने को पूरा करने की उम्मीद लेकर इस देश आए थे। मैंने अपना करियर यह सुनिश्चित करने के लिए समर्पित किया है कि यह सपना अधिक से अधिक परिवारों की पहुंच में हो।”
दांडिया ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से गवर्नमेंट विषय की पढ़ाई की और बोस्टन विश्वविद्यालय से शिक्षा में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने बोस्टन में ‘टीच फॉर अमेरिका’ कार्यक्रम के तहत अध्यापन किया। इसके बाद महज 28 वर्ष की उम्र में वह न्यूयॉर्क के हार्लेम में डेमोक्रेसी प्रेप एंड्योरेंस हाई स्कूल की संस्थापक प्रिंसिपल बनीं।
उनके चुनाव अभियान के अनुसार, इस स्कूल के करीब 86 प्रतिशत विद्यार्थी कम आय वाले परिवारों से आते थे। इसके बावजूद स्कूल के सभी स्नातक विद्यार्थियों को कॉलेज में प्रवेश मिला।
उन्होंने न्यू इंडिया अब्रॉड से कहा था, “मेरे स्कूल के करीब 86 प्रतिशत विद्यार्थी गरीबी में जीवन बिता रहे थे। लेकिन हमने उन्हें बेहतर भविष्य का भरोसा दिया था। हमने वादा किया था कि यदि वे हमारे स्कूल में पढ़ेंगे तो उनमें से 100 प्रतिशत को कॉलेज में दाखिला मिलेगा।”
वर्ष 2020 में दांडिया को व्हाइट हाउस फेलो चुना गया था। इस दौरान उन्होंने व्हाइट हाउस की घरेलू नीति परिषद और अमेरिकी शिक्षा विभाग में काम किया। बाद में उन्होंने एप्पल में सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़ी पहलों का नेतृत्व किया। इलिनॉय के गवर्नर जेबी प्रित्जकर ने उन्हें राज्य की पी-20 परिषद में भी नियुक्त किया था।
चुनावी राजनीति में यह उनका पहला प्रयास था। शुरुआत में उन्होंने फ्लोरिडा के 21वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल किया था, जहां उनका मुकाबला रिपब्लिकन सांसद ब्रायन मास्ट से होना था। हालांकि, फ्लोरिडा में मध्यावधि परिसीमन के बाद उन्होंने 22वें डिस्ट्रिक्ट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। 18 अगस्त को उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी का प्राइमरी चुनाव जीता।
फ्लोरिडा पॉलिटिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मतदाता पंजीकरण के लिहाज से यह क्षेत्र रिपब्लिकन पार्टी के पक्ष में माना जाता है। यहां करीब 1.85 लाख रिपब्लिकन, 1.46 लाख डेमोक्रेटिक और 1.50 लाख अन्य राजनीतिक संबद्धता वाले मतदाता हैं।
अपने चुनाव प्रचार में दांडिया ने महंगाई, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और बंदूक सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। फ्लोरिडा पॉलिटिक्स से बातचीत में उन्होंने कहा था, “दक्षिण फ्लोरिडा के लोग बढ़ती लागत और वाशिंगटन से निकलने वाली दिखावटी राजनीति से तंग आ चुके हैं।”
इस चुनाव में दोनों उम्मीदवारों के बीच भारी आर्थिक मुकाबला भी देखने को मिला। 14 अक्टूबर तक दांडिया के चुनाव अभियान को करीब 46 लाख डॉलर का चंदा मिला था, जबकि असकर ने लगभग 74 लाख डॉलर जुटाए थे। हालांकि, असकर की इस राशि का बड़ा हिस्सा उनके अपने चुनाव अभियान को दिए गए कर्ज से आया था। संघीय चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने करीब 68 लाख डॉलर स्वयं अपने अभियान में लगाए थे।
फेडरल इलेक्शन कमीशन के दस्तावेजों के मुताबिक, मैगा इंक से वित्त पोषित सुपर पीएसी ‘नो गोइंग बैक पीएसी’ ने 24 अक्टूबर तक दांडिया के खिलाफ करीब 65 लाख डॉलर खर्च किए थे। वहीं, प्रतिनिधि सभा के चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले प्रमुख सुपर पीएसी ‘हाउस मेजॉरिटी पीएसी’ ने असकर के खिलाफ करीब 79 लाख डॉलर खर्च किए।
दांडिया को इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट फंड और सर्व अमेरिका पीएसी के अलावा वेलिंगटन के रिपब्लिकन मेयर माइकल नेपोलियोन का भी समर्थन मिला था। नेपोलियोन ने कहा था, “मैं हमेशा मानता रहा हूं कि पार्टी से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है और पिया ने मेरा सम्मान तथा समर्थन हासिल किया है।”
पूर्व अमेरिकी परिवहन मंत्री पीट बटिगिएग ने 26 अक्टूबर को उनके समर्थन में चुनाव प्रचार भी किया था।
डेमोक्रेटिक कांग्रेसनल कैंपेन कमेटी ने एक्स पर दांडिया की जीत और उनके चुनाव प्रचार की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने दक्षिण फ्लोरिडा के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। इनमें महंगाई और जीवनयापन की बढ़ती लागत का संकट दूर करना तथा हर व्यक्ति को अमेरिकी सपना पूरा करने का अवसर देना शामिल था।
भारतीय-अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल ने भी उनकी जीत पर बधाई दी। उन्होंने एक्स पर लिखा, “कांग्रेस का चुनाव जीतने के लिए पिया दांडिया को बधाई! मैं सदन में तीसरी दक्षिण एशियाई-अमेरिकी महिला का स्वागत करने को लेकर बेहद उत्साहित हूं।”
दांडिया पाम बीच गार्डन्स में अपने पति नवनीत अलग और बेटे साहिब के साथ रहती हैं।
उनकी जीत के साथ अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भारतीय-अमेरिकी सांसदों के अनौपचारिक समूह ‘समोसा कॉकस’ की मौजूदगी भी बरकरार रहेगी।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
रूस के साथ मौजूद भारतीय नागरिकों की वापसी का मुद्दा भारत लगातार उठा रहा: एमईए

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि भारत रूस के साथ विभिन्न स्तरों पर उन भारतीय नागरिकों की रिहाई का मुद्दा उठाना जारी रखेगा, जो अभी भी रूस के पास है। उन्होंने बताया कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जी20 बैठक के दौरान रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात की और यूरोप तथा मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों पर चर्चा की।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “विदेश मंत्री ने जी20 बैठक के दौरान कई द्विपक्षीय बैठकें कीं। इनमें से एक बैठक रूस के विदेश मंत्री के साथ थी, जिसमें यूरोप और मध्य पूर्व के मौजूदा संघर्षों पर चर्चा हुई।”
विदेश मंत्री जयशंकर ने शनिवार को अटलांटा में आयोजित जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान लावरोव से मुलाकात की थी। बैठक के बाद जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा था कि उन्होंने रूस के विदेश मंत्री के साथ यूक्रेन संघर्ष, खाड़ी क्षेत्र की स्थिति और बहुपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नई दिल्ली और उससे पहले बिश्केक में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ इस मुद्दे पर बातचीत की थी। उन्होंने बताया कि वह स्वयं भी मॉस्को गए थे और वहां लावरोव से चर्चा की थी। इसके अलावा वह इस दौरान कीव भी गए थे।
रूस के साथ मौजूद भारतीय नागरिकों की वापसी के बारे में रणधीर जायसवाल ने कहा, “जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं, यह ऐसा मुद्दा है जिसे हम लगातार विभिन्न स्तरों पर रूसी पक्ष के साथ उठा रहे हैं।”
पिछले महीने विदेश मंत्रालय ने बताया था कि करीब 259 भारतीय नागरिकों की भर्ती रूसी सेना में हुई थी। इनमें से 139 लोगों को भारत सरकार के प्रयासों से सेवा से मुक्त कराकर वापस भारत लाया जा चुका है, जबकि 69 अन्य भारतीयों की वापसी को लेकर मॉस्को के साथ बातचीत जारी है।
मंत्रालय ने कहा कि वह यह नहीं बता सकता कि इनमें से कितने लोगों ने रूसी नागरिकता ले ली है, क्योंकि उसके रिकॉर्ड केवल भारतीय नागरिकों से संबंधित हैं।
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