राष्ट्रीय समाचार
ऑपरेशन सिंदूर का स्पष्ट संदेश, आतंकियों का कोई भी ठिकाना सुरक्षित नहीं
ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि संभवत भारत की सामरिक यात्रा का एक निर्णायक क्षण था। भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर यह संदेश दिया है। सेना के मुताबिक इस अभियान को भारत ने बेहद सोच-समझकर और स्पष्ट रणनीतिक दृष्टि के साथ शुरू किया। नियंत्रण रेखा तथा पाकिस्तान के साथ लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार मौजूद आतंकवादी ढांचों को निशाना बनाया।
भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने बताया कि हमलें का समय पूरी तरह सटीक था, ऑपरेशन सिंदूर ने पूर्ण आश्चर्य उत्पन्न किया और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर तथा पाकिस्तान के भीतर स्थापित आतंकवादी ठिकानों को भारी क्षति पहुंचाई। इस ऑपरेशन से यह स्पष्ट संदेश गया कि अब आतंकियों का कोई भी ठिकाना सुरक्षित नहीं बचा है। इसके साथ ही पाकिस्तान द्वारा भारत के सैन्य ढांचे और ठिकानों को निशाना बनाने के सभी प्रयास एक सुविचारित और मजबूत वायु रक्षा संरचना के कारण विफल हो गए।
भारत ने अत्यंत कम समय में एक जटिल बहु-आयामी अभियान की योजना बनाई, उसे क्रियान्वित किया और सफलतापूर्वक पूरा भी किया। इस पूरे अभियान ने भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता को भी प्रदर्शित किया। इस्तेमाल किए गए हथियार प्रणालियों, गोला-बारूद, रॉकेट, मिसाइलों, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों का बड़ा हिस्सा भारत में विकसित और निर्मित था। ब्रह्मोस, आकाश, उन्नत निगरानी एवं लक्ष्यीकरण प्रणालियों के साथ स्वदेशी गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स ने इस अभियान में निर्णायक भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर तीनों सेनाओं का संयुक्त अभियान था। इसमें थल, वायु और समुद्री क्षमताओं का एकीकृत उपयोग किया गया। इसमें साझा परिस्थितिजन्य जागरूकता, सामान्य परिचालन एवं खुफिया तस्वीर तथा वास्तविक समय में निर्णय लेने की क्षमता शामिल थी। कुल नौ स्टैंडऑफ प्रिसीजन स्ट्राइक की गईं, जिनमें सात भारतीय सेना और दो भारतीय वायु सेना द्वारा अंजाम दी गईं।
उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत केवल एक नारा नहीं, बल्कि वास्तव में एक फोर्स मल्टीप्लायर है। आज भारत के 65 प्रतिशत से अधिक रक्षा उपकरण देश में ही निर्मित किए जा रहे हैं। सटीकता, अनुपातिकता और उद्देश्य की स्पष्टता के साथ यह अभियान एक राष्ट्र के संकल्प, जिम्मेदारी और रणनीतिक संयम का प्रतीक बनकर सामने आया।
लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने बताया कि शुरुआत से ही सरकार ने सशस्त्र बलों को स्पष्ट उद्देश्य दिए। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक ऑपरेशनल लचीलापन भी प्रदान किया। तय लक्ष्य थे-आतंकवादी तंत्र को नष्ट और कमजोर करना, दुश्मन द्वारा योजना बनाने की क्षमता को बाधित करना तथा इन ठिकानों से भविष्य में होने वाली आक्रामकता को रोकना। ऑपरेशन सिंदूर में ये लक्ष्य पूरी स्पष्टता के साथ निर्धारित किए गए थे। वहीं सशस्त्र बलों को इस अभियान की योजना बनाने और उसे क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक संसाधन और स्वतंत्रता सौंपी गई।
लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने बताया कि शीर्ष स्तर पर दृढ़ दिशा और परिचालन स्तर पर पेशेवर स्वायत्तता तथा लचीलापन, यही पिछले वर्ष हमारी सफलता की महत्वपूर्ण कुंजी साबित हुआ। उन्होंने बताया कि इससे सेना को तेजी से परिस्थितियों के अनुसार ढलने, विभिन्न अभियानों के बीच तालमेल स्थापित करने, समन्वय बढ़ाने और बहु-आयामी युद्धक्षेत्र में निर्णायक प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिली।
उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत के विकसित हो रहे ‘समग्र दृष्टिकोण’ को भी रेखांकित किया, जो युद्धक्षेत्र में अत्यंत सटीक समन्वय के साथ दिखाई दिया। सरकार के सर्वोच्च कार्यालयों और मंत्रालयों, खुफिया एजेंसियों, साइबर एवं सूचना अभियान संस्थानों तथा सीमा सुरक्षा बल जैसी सीमा-रक्षक अर्धसैनिक इकाइयों ने सशस्त्र बलों के साथ मिलकर कार्य किया। परिणामस्वरूप यह अभियान सैन्य और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से विश्व स्तर पर एक गोल्ड स्टैंडर्ड के रूप में देखा जाने लगा।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर में लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों के इस दौर में भारत ने तीव्र और सटीक प्रहार किए, अपने स्पष्ट रूप से निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त किया और उसके बाद शत्रु के बातचीत के लिए विवश होने तथा संघर्ष विराम का अनुरोध करने पर सैन्य कार्रवाई रोकने का निर्णय लिया। इन उद्देश्यों को एक संतुलित, सीमित लेकिन तीव्र सैन्य कार्रवाई के माध्यम से प्राप्त किया गया। दुश्मन की जोखिम उठाने की क्षमता को बदल दिया गया और उसकी कमान एवं नियंत्रण प्रणाली को बाधित कर दिया। यह सब कुछ भारत को बिना किसी लंबे युद्ध या संघर्ष में उलझाए किया गया।
उन्होंने कहा कि आज दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों के दुष्परिणाम हम देख ही रहे हैं। भारत का यह संतुलित दृष्टिकोण हमारी रणनीतिक संस्कृति की परिपक्वता और सशस्त्र बलों की पेशेवर क्षमता को दर्शाता है। अंतत इस अभियान ने प्रत्येक क्षेत्र की बड़ी जिम्मेदारी तय की। खुफिया एजेंसियों ने वह सटीक जानकारी उपलब्ध कराई जो प्रिसीजन टार्गेटिंग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध इकाइयों ने सूचना क्षेत्र में बढ़त बनाए रखी।
उन्होंने कहा कि सरकार ने अंतरराष्ट्रीय माहौल, आंतरिक सुरक्षा और जनता के विश्वास को प्रभावी ढंग से संभाला। वहीं सशस्त्र बलों ने अत्यधिक अनुशासन, सटीकता और न्यूनतम सहायक क्षति के साथ अभियान के सैन्य चरण को अंजाम दिया। सेना का मानना है कि यह बहु-एजेंसी और बहु-आयामी समन्वय भविष्य के अभियानों के लिए एक आदर्श मॉडल बना रहेगा।
सेना के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर अंत नहीं था बल्कि यह केवल शुरुआत थी। भारत की आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई जारी रहेगी। एक वर्ष बाद आज हम केवल उस अभियान को ही नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित सिद्धांत को भी याद करते हैं। भारत अपनी संप्रभुता, अपनी सुरक्षा और अपने नागरिकों की रक्षा दृढ़ता, पेशेवर क्षमता और सर्वोच्च जिम्मेदारी के साथ करता रहेगा।
राष्ट्रीय समाचार
भारत का मानसून बेहतर हुआ, खरीफ फसलों को नुकसान की आशंका आई कमी : रिपोर्ट

भारत में मानसून की स्थिति हाल के महीनों में काफी बेहतर हुई है, जिससे खरीफ फसलों को व्यापक नुकसान की आशंका कमी आई है। हालांकि, बारिश का वितरण अभी भी एक महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है, जिस पर नजर रखना जरूरी है। यह जानकारी एक रिपोर्ट में दी गई।
वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मैक्वायरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 19 अगस्त तक संचयी बारिश की कमी घटकर 12.6 प्रतिशत रह गई है, जो जून में 35 प्रतिशत थी।
रिपोर्ट में कहा गया, “स्थिति में सुधार हो रहा है, हालांकि यह पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।” मानसून में सुधार का असर खरीफ फसलों की बुवाई पर भी देखने को मिला है। सीजन की कमजोर शुरुआत के बाद बुवाई में काफी सुधार हुआ है।
ब्रोकरेज के अनुसार, 14 अगस्त तक कुल खरीफ बुवाई पिछले साल के स्तर से 2 प्रतिशत कम थी, जबकि जून के अंत में यह कमी 21 प्रतिशत थी।
इसके अलावा, धान का रकबा पिछले साल की तुलना में 3.7 प्रतिशत कम रहा, जबकि मक्का का रकबा 4 प्रतिशत घटा।
इसके विपरीत, दलहन, तिलहन, गन्ना और कपास का रकबा पिछले साल के स्तर से करीब 1 प्रतिशत के दायरे में रहा।
मैक्वायरी ने कहा कि बुवाई में बची हुई कमी मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा फसलों तक सीमित है और यह व्यापक स्तर पर नहीं है।
इसके अलावा, जलाशयों में पर्याप्त जल स्तर भी बारिश की कमी के खिलाफ सुरक्षा कवच प्रदान कर रहा है। महाराष्ट्र और गुजरात में जलाशयों में पानी का भंडारण 10 साल के औसत स्तर के बराबर या उससे अधिक है। वहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में जल भंडारण उनके संबंधित औसत स्तर का करीब 80-100 प्रतिशत है।
हालांकि, बिहार और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर करीबी नजर रखने की जरूरत है।
रिपोर्ट के अनुसार, मानसून में सुधार, कुल बुवाई में सीमित कमी और पर्याप्त सिंचाई भंडार ने मिलकर खरीफ उत्पादन में गिरावट के जोखिम को कम कर दिया है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि मानसून की प्रगति महंगाई के लिहाज से भी सकारात्मक है। जून के स्तर की तुलना में खाद्य आपूर्ति और महंगाई से जुड़े जोखिम कम हो रहे हैं।
राजनीति
यूपी चुनाव: मुस्लिम प्रभावी सीटों पर ओवैसी का फोकस, गठबंधन की राह नहीं बनी तो अकेले मैदान में कूदने की तैयारी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारियों में जुटे हैं। इस बीच आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) भी प्रदेश में अपना सियासी खाता खोलने की कोशिश में जुट गई है। पार्टी की पहली प्राथमिकता गठबंधन है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बनी तो एआईएमआईएम अकेले चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश के चुनावी महत्व को समझते हैं। यही वजह है कि पार्टी उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रही है, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर तराई क्षेत्र के बहराइच तक ओवैसी खुद दौरा कर पार्टी की संभावनाओं का जायजा ले चुके हैं। पार्टी ने फिलहाल प्रयागराज, बहराइच, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर और अमरोहा की कई विधानसभा सीटों पर अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं। इन क्षेत्रों में संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
पार्टी की कोशिश चुनाव से पहले ऐसे इलाकों में अपना सियासी आधार मजबूत करने की है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। गठबंधन को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है। ऐसे में एआईएमआईएम ने अपने विकल्प खुले रखे हैं। पार्टी नेताओं के मुताबिक, यदि किसी दल के साथ गठबंधन नहीं होता है तो एआईएमआईएम अपने दम पर करीब 200 से 250 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकती है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत कहते हैं कि एआईएमआईएम को उत्तर प्रदेश में वर्ष 2023 के निकाय चुनाव के प्रदर्शन से राजनीतिक आधार मजबूत करने का अवसर मिला। पार्टी के कई प्रत्याशियों ने स्थानीय निकाय चुनाव में जीत हासिल कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। अब एआईएमआईएम इसी स्थानीय चुनावी सफलता को विधानसभा चुनाव तक ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर अवध और पूर्वांचल के कई हिस्सों में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका चुनावी नतीजों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में यदि एआईएमआईएम इन क्षेत्रों में अपना जनाधार बढ़ाने में सफल रहती है तो उसका असर केवल उसके वोट प्रतिशत तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि समाजवादी पार्टी के चुनावी समीकरण पर भी पड़ सकता है। हालांकि, पिछले विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम का प्रदर्शन प्रभावी नहीं रहा है और पार्टी अब तक विधानसभा में अपना खाता नहीं खोल सकी है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हुज्जत रजा के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की राजनीति में यदि ओवैसी की एआईएमआईएम गठबंधन से बाहर रहकर चुनाव लड़ती है तो उसका असर मुख्य रूप से विपक्षी मतों के बंटवारे के रूप में सामने आ सकता है, जिसका लाभ भाजपा को मिलने की संभावना रहेगी। वहीं, यदि सपा-कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन एआईएमआईएम को साथ लेता है तो चुनावी तस्वीर अलग हो सकती है और विपक्ष को इसका लाभ मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर आजाद और पल्लवी पटेल जैसे नेताओं और दलों के साथ संभावित तालमेल को भी ‘भीम-मीम’ समीकरण के नजरिए से देखा जा रहा है। हालांकि, अतीक अहमद के परिवार से जुड़े किसी चेहरे को चुनाव मैदान में उतारने की संभावना को लेकर अभी किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
एआईएमआईएम सेंट्रल जोन के अध्यक्ष शेख ताहिर सिद्दीकी ने कहा कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में अपना खाता खोलने के लक्ष्य के साथ पूरी तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा, ”हम भाजपा को रोकने के लिए सभी विपक्षी दलों के साथ सम्मानजनक हिस्सेदारी वाले गठबंधन के पक्ष में हैं। बसपा के साथ गठबंधन की संभावना हो या चंद्रशेखर आजाद और अन्य दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का विकल्प, हमारा उद्देश्य भाजपा को रोकना है।”
उन्होंने कहा कि सितंबर तक गठबंधन को लेकर तस्वीर साफ नहीं हुई तो एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश की 200 से 250 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी करेगी। पार्टी की बूथ स्तर तक तैयारियां चल रही हैं और पूरे प्रदेश से लगातार चुनाव लड़ने के लिए आवेदन मिल रहे हैं।
राजनीति
तमिलनाडु: दो दिन अवकाश के बाद फिर शुरू होगी विधानसभा की कार्यवाही, छह विभागों के अनुदान पर होगी चर्चा

वीकेंड की दो दिन की छुट्टी के बाद तमिलनाडु विधानसभा सोमवार को फिर से अपनी कार्यवाही शुरू करेगी, जिसमें छह प्रमुख विभागों से जुड़ी अनुदान मांगों पर चर्चा होनी है।
इस बहस में मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के पास मौजूद विभाग भी शामिल हैं। सदन में नगर प्रशासन और जलापूर्ति; सूचना, प्रचार, स्टेशनरी और प्रिंटिंग; स्कूली शिक्षा; तमिल विकास; और उच्च शिक्षा के लिए अनुदान की मांगों पर चर्चा की जाएगी। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के सदस्यों के इस बहस में भाग लेने, नीतियों, खर्च और योजनाओं पर सवाल उठाने की उम्मीद है।
मुख्यमंत्री विजय के पास नगर प्रशासन और जलापूर्ति विभाग भी है। वे विभाग से जुड़े विधायकों के सवालों का जवाब देंगे। सूचना, प्रचार और स्कूली शिक्षा मंत्री राजमोहन और उच्च शिक्षा मंत्री विश्वनाथन भी अपने विभागों से जुड़ी बहस का जवाब देंगे।
चर्चा के आखिर में मंत्रियों की ओर से नई विभागीय पहल की घोषणा करने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री के जवाब और घोषणाओं पर खास ध्यान दिया जा सकता है क्योंकि नगर प्रशासन और पीने के पानी की आपूर्ति सीधे तौर पर तमिलनाडु के शहरों, कस्बों और फैलते शहरी इलाकों को प्रभावित करती है।
विधानसभा में 5 अगस्त को 2026-27 का आम बजट और 6 अगस्त को कृषि बजट पेश किया गया था। इन दो वित्तीय बयानों पर 7, 10 और 11 अगस्त को तीन दिन तक आम चर्चा हुई। वित्त मंत्री मारिया विल्सन और कृषि मंत्री विनोद के जवाब देने के बाद 12 अगस्त को बहस खत्म हुई। इसके बाद स्वतंत्रता दिवस समारोह के कारण विधानसभा की कार्यवाही चार दिन के लिए स्थगित कर दी गई थी।
17 अगस्त को सदन की कार्यवाही फिर शुरू होने पर अनुदान की मांगों पर विभाग-वार चर्चा शुरू हुई। मौजूदा सत्र के दौरान अब तक 18 विभागों की मांगों पर चर्चा की जा चुकी है और उन्हें मंजूरी दी जा चुकी है। शनिवार और रविवार होने की वजह से 22 और 23 अगस्त को कार्यवाही स्थगित रही।
सोमवार को सदन की कार्यवाही फिर शुरू होने पर सबकी निगाहें फिर से विभागीय खर्च की प्राथमिकताओं, शिक्षा, शहरी प्रशासन, जलापूर्ति, सूचना और तमिल विकास के क्षेत्रों में सरकार की नीतिगत दिशा पर केंद्रित रहेगा। मंत्रियों के जवाब के बाद, अनुदान की मांगों को मंजूरी के लिए सदन के सामने रखा जाएगा। उम्मीद है कि योजनाओं के कार्यान्वयन, फंड के आवंटन और 2026-27 वित्तीय वर्ष के लिए प्रशासन की योजनाओं को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विस्तृत चर्चा जारी रहेगी।
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