राजनीति
महाराष्ट्र राजनीतिक संकट: SC ने 7-न्यायाधीशों की बड़ी बेंच को संदर्भित करने के लिए शिवसेना के मामले को सुरक्षित रखा
नई दिल्ली: मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को महाराष्ट्र में पिछले साल जून में शिवसेना में विभाजन के कारण उत्पन्न राजनीतिक संकट पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, चाहे इसे 7-न्यायाधीशों की एक बड़ी बेंच को भेजा जाए या नहीं। अयोग्यता दलीलों को संभालने के लिए विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों पर 2016 के नागम रेबिया के फैसले के संदर्भ में। पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी चाहते थे कि एक बड़ी बेंच फैसला करे क्योंकि रेबिया का फैसला भी 5-न्यायाधीशों की बेंच द्वारा किया गया था। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और पूर्व मुख्यमंत्री ठाकरे की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनने के लिए खंडपीठ अपराह्न 1.45 बजे तक बैठी। न्यायमूर्ति एम आर शाह, कृष्ण मुरारी, हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की खंडपीठ की ओर से सीजेआई ने कहा, “पक्षों के वकील को सुना। नबाम रेबिया को एक बड़ी पीठ को भेजे जाने के सवाल पर दिए गए तर्क। आदेश सुरक्षित रखा गया।”
अरुणाचल प्रदेश का नबाम रेबिया मामला
2016 में, पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अरुणाचल प्रदेश के नबाम रेबिया मामले का फैसला करते हुए कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष विधायकों की अयोग्यता की याचिका पर आगे नहीं बढ़ सकते हैं, अगर स्पीकर को हटाने की पूर्व सूचना सदन में लंबित है। . यह फैसला एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले बागी विधायकों के बचाव में आया था, जो अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं। ठाकरे गुट ने यह देखते हुए उनकी अयोग्यता की मांग की थी कि सदन में डिप्टी स्पीकर को हटाने की मांग का एक पूर्व नोटिस लंबित था। मौजूदा मामले में, शिंदे समूह ने डिप्टी स्पीकर नरहरि ज़िरवार को हटाने की मांग की थी, जिनकी ठाकरे समूह के प्रति निष्ठा थी, उन्होंने कहा कि जब उनके निष्कासन का नोटिस लंबित है तो वह किसी को भी अयोग्य घोषित नहीं कर सकते हैं।
‘विधायिका में हेरफेर’
सिब्बल ने अदालत से विनती की कि शिंदे समूह की तरह चुनी हुई सरकारों को गिराने की अनुमति न दी जाए क्योंकि यह लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में जो किया गया वह विधायिका में हेरफेर था, इस बात पर जोर देते हुए कि “ऐसा होगा और यह पहले ही हो चुका है।” उन्होंने कहा कि 50 में से 40 के प्रचंड बहुमत से विद्रोह करने पर भी उन्हें संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अध्यक्ष या उपाध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराया जा सकता है। दलबदलुओं का किसी अन्य दल में विलय ही उन्हें अयोग्यता से बचा सकता है। उन्होंने और सिंघवी ने महाराष्ट्र विधानसभा के तत्कालीन डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अपने नोटिस में नबाम रेबिया के फैसले का हवाला देते हुए शिंदे समूह का उपहास किया, लेकिन उनके वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे, एन के कौल और महेश जेठमलानी अब रेबिया के फैसले की जांच के लिए एक बड़ी बेंच का विरोध करते हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी 7-न्यायाधीशों की पीठ के संदर्भ का विरोध किया क्योंकि इससे अंतिम निर्णय में देरी होगी।
शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कैसे बने
उन्होंने तर्क दिया कि ठाकरे को राज्यपाल द्वारा 30 जून को बहुमत साबित करने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने एक दिन पहले ही इस्तीफा दे दिया और इसके कारण शिंदे मुख्यमंत्री बने। सिब्बल ने कहा कि शिंदे समूह ने उन्हें पंगु बनाने के लिए तत्कालीन डिप्टी स्पीकर को नोटिस भेजा। उन्होंने शिंदे समूह के वकीलों का उपहास उड़ाते हुए कहा कि यह मुद्दा केवल अकादमिक है, लेकिन तथ्य यह है कि इसने एक नया अध्यक्ष चुन लिया है जिसे अब ठाकरे समूह द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। सिब्बल ने परोक्ष रूप से यह भी संकेत दिया कि कैसे तत्कालीन जस्टिस अरुण मिश्रा ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ राजस्थान के दल-बदल के मामले को लगभग दैनिक आधार पर सुना जबकि गोवा मामले को दो साल के लिए टाल दिया क्योंकि कांग्रेस विधायकों ने सरकार बनाने में मदद करने के लिए भाजपा में विलय कर लिया था।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
इजरायल का दावा, ‘हवाई हमले में हिज्बुल्लाह के वरिष्ठ कमांडर की मौत’

इजरायली सेना ने रविवार को दावा किया कि दक्षिणी लेबनान में किए गए हवाई हमले में हिज्बुल्लाह के बद्र रीजनल डिवीजन के एक वरिष्ठ कमांडर की मौत हो गई। लेबनानी मीडिया के अनुसार इस हमले में 4 लोगों की मौत हुई है।
इजरायली सेना ने एक बयान में कहा कि अबू हसन अला की शनिवार देर रात दीर अल-जहरानी पर हुए हमले में मौत हो गई। इजरायल ने इस हमले को दक्षिणी लेबनान में अपने सैनिकों को निशाना बनाकर किए गए ड्रोन हमलो का “जवाब” बताया। उस हमले में तीन सैनिक घायल हो गए थे।
लेबनान की सरकारी नेशनल न्यूज एजेंसी ने कहा कि इजरायली लड़ाकू विमानों ने दो मंजिला इमारत पर हमला किया, जिसमें चार लोग मारे गए और पांच घायल हो गए।
शनिवार को ही, अंसार गांव पर इजरायली एयरस्ट्राइक में सात लोग मारे गए थे, जो 2024 में हुए सीजफायर के बाद सबसे भीषण हमला था।
इसे लेकर, इजरायल डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) ने एक बयान जारी किया था। कहा था कि उसने दक्षिणी लेबनान में रात भर किए हवाई हमलों में हिज्बुल्लाह की एलीट राडवान फोर्स के एक कमांडर को मार गिराया।
आईडीएफ ने कहा कि मारे गए शख्स की पहचान अली समीर अल-हज हसन के तौर पर हुई है, जो यूनिट में बटालियन कमांडर के पद पर तैनात थे।
इसमें यह भी कहा गया कि नबातिह जिले के अंसार शहर में हिजबुल्लाह हेडक्वार्टर में कमांडर को मार गिराया गया; यह हमला “सिक्योरिटी जोन” में काम कर रही इजरायली सेना के खिलाफ हिजबुल्लाह के हमले के जवाब में किया गया था।
इस बीच, लेबनान में यूनाइटेड नेशंस इंटरिम फोर्स (यूएनआईएफआईएल) की प्रवक्ता कैंडिस अर्दील ने कहा है कि दक्षिणी लेबनान में एक इंटरनेशनल मौजूदगी जरूरी बनी हुई है।
अर्दील ने बताया कि यूएन सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने विचार के लिए तीन विकल्प रखे हैं।
अर्दील ने कहा कि यूएनआईएफआईएल के शांति सैनिक दक्षिणी लेबनान में मौजूद हैं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 को लागू करने में पार्टियों का समर्थन करते रहेंगे, जो उनके अनुसार दक्षिणी लेबनान में स्थिरता की नींव है।
राष्ट्रीय समाचार
साइबर सुरक्षा आकलन में मानवीय निर्णय क्षमता की परीक्षा को एनआईईएलआईटी ने ‘साइबर कुश्ती 2026’ लॉन्च किया

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईईएलआईटी) ने ‘साइबर कुश्ती 2026’ की शुरुआत की है। यह एक राष्ट्रव्यापी साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) हैकाथॉन है, जिसका उद्देश्य प्रतिभागियों की केवल कमजोरियों की पहचान करने की क्षमता नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा आकलन के दौरान मानवीय निर्णय क्षमता का परीक्षण करना है। इसकी घोषणा रविवार को की गई।
‘साइबर कुश्ती 2026’ को साइबर सुरक्षा, डिजिटल फोरेंसिक और इंटेलिजेंस पर आयोजित तीसरे राष्ट्रीय सम्मेलन (एनसीसीडीएफआई 2026) के आधिकारिक समानांतर तकनीकी ट्रैक के रूप में शुरू किया गया है। इस पहल का आयोजन नेशनल सिक्योरिटी डेटाबेस (एनएसडी) के अंतर्गत इन्फॉर्मेशन शेयरिंग एंड एनालिसिस सेंटर के सहयोग से किया जा रहा है, जबकि सीईआरटी-इन इसमें नॉलेज पार्टनर की भूमिका निभा रहा है।
प्रतियोगिता के लिए पंजीकरण 15 अगस्त से शुरू हो चुका है और 10 सितंबर तक जारी रहेगा। इसमें भाग लेना पूरी तरह निःशुल्क है और तीन सदस्यीय टीमों में छात्र तथा स्वतंत्र शोधकर्ता हिस्सा ले सकते हैं। पारंपरिक साइबर सुरक्षा प्रतियोगिताओं से अलग, जो मुख्य रूप से कमजोरियों की पहचान या ‘कैप्चर द फ्लैग’ (सीटीएफ) चुनौतियों पर केंद्रित होती हैं, ‘साइबर कुश्ती 2026’ को इस प्रकार तैयार किया गया है कि यह प्रतिभागियों की सुरक्षा जोखिमों का मूल्यांकन और प्राथमिकता तय करने की क्षमता की जांच कर सके।
आयोजकों ने कहा कि यह प्रतियोगिता ऐसे पेशेवरों की बढ़ती आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जो स्वचालित प्रणालियों द्वारा उत्पन्न गलत संकेतों (फॉल्स पॉजिटिव) और वास्तविक खतरों के बीच अंतर कर सकें।
प्रतियोगिता के प्रारूप के तहत सभी टीमों को एक समान, जानबूझकर अपूर्ण रखा गया ‘सिक्योरिटी असेसमेंट पैकेज’ प्रदान किया जाएगा। इस पैकेज में एआई द्वारा तैयार निष्कर्ष, सोर्स कोड, एप्लिकेशन लॉग, आर्किटेक्चर दस्तावेज, स्टैटिक एनालिसिस रिपोर्ट, डिपेंडेंसी स्कैन और सीक्रेट्स स्कैन जैसी सामग्री शामिल होगी।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बताया कि प्रतिभागियों की विश्लेषणात्मक क्षमता को परखने के लिए आयोजकों ने जानबूझकर इसमें कुछ गलत, दोहराए गए और वास्तविक निष्कर्ष शामिल किए हैं, जबकि कुछ वास्तविक कमजोरियों को छोड़ा भी गया है। प्रतिभागियों को एक संशोधित और प्राथमिकता-आधारित सुरक्षा आकलन रिपोर्ट तैयार करनी होगी तथा अपने निष्कर्षों और निर्णयों का स्पष्ट औचित्य भी बताना होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिभागियों को केवल वास्तविक सुरक्षा खामियों की पहचान करने के लिए ही नहीं, बल्कि गलत या भ्रामक निष्कर्षों को सही ढंग से खारिज करने के लिए भी पुरस्कृत किया जाएगा।
कार्यक्रम के शुभारंभ पर प्रोफेसर त्रिपाठी ने कहा कि साइबर सुरक्षा का परिदृश्य अब केवल समस्याओं की पहचान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह तय करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि कौन-सी खामियां सबसे गंभीर हैं और किन पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मशीनें बड़े पैमाने पर सुरक्षा संबंधी निष्कर्ष तैयार कर सकती हैं, लेकिन उनकी सत्यता की पुष्टि करने और प्राथमिकता तय करने के लिए मानवीय विवेक और निर्णय क्षमता अब भी अपरिहार्य है।
राष्ट्रीय समाचार
ब्राह्मण चेहरों के अभाव में बसपा 2027 में कैसे साधेगी सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला?

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 2007 के विधानसभा चुनाव में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के जरिए यूपी में सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के सामने उस सामाजिक गठजोड़ को फिर से मजबूत करने की चुनौती है।
पिछले कुछ वर्षों में बसपा के कई प्रमुख ब्राह्मण चेहरे पार्टी से अलग हुए या निष्कासित किए गए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मायावती पुराने चेहरों के आभाव के बीच ब्राह्मण समाज और अन्य सामाजिक समूहों को साथ लेकर नया सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला कैसे तैयार करेंगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2007 में बसपा की सत्ता में वापसी में ब्राह्मण मतदाताओं के एक बड़े हिस्से का समर्थन महत्वपूर्ण रहा था। उस समय पार्टी ने दलित आधार के साथ ब्राह्मण समाज को जोड़कर व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार किया था। अब पार्टी के सामने चुनौती केवल नए ब्राह्मण चेहरों को आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि समाज के बीच पुराने भरोसे को दोबारा कायम करने की भी है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत कहते हैं कि बसपा के सामने इस समय कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भरोसा बनाए रखने की चुनौती है। हाल ही में अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को पार्टी से निष्कासित किया गया है। इससे पहले राकेशधर त्रिपाठी, रंगनाथ मिश्रा, रामू द्विवेदी, कुशल तिवारी, विनय शंकर तिवारी, ब्रजेश पाठक और गुड्डू त्रिपाठी जैसे कई प्रमुख ब्राह्मण चेहरे बसपा से अलग हो चुके हैं। रामवीर उपाध्याय का परिवार भी बसपा की राजनीति में सक्रिय रहा है। इनमें से कई नेता बाद में दूसरे राजनीतिक दलों में महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई दिए और कुछ को मंत्री पद भी मिला।
विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत के मुताबिक, वर्तमान में सतीश चंद्र मिश्रा बसपा के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के रूप में पार्टी के साथ मजबूती से जुड़े हुए हैं। ऐसे में 2027 में सत्ता की दावेदारी के लिए मायावती को केवल ब्राह्मण समाज ही नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संतुलन साधते हुए संगठन को भी मजबूत करना होगा।
ब्राह्मण संगठन से जुड़े अभिषेक पांडेय कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण है। कई विधानसभा क्षेत्रों में यह समुदाय चुनावी मुकाबले को प्रभावित करने की स्थिति में रहता है। ऐसे में 2027 से पहले ब्राह्मण समाज का समर्थन हासिल करना किसी भी राजनीतिक दल के व्यापक सामाजिक गठजोड़ की रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।
हालांकि, मायावती का कहना है कि पार्टी से निकाले गए या निजी स्वार्थ के चलते दूसरे दलों में गए नेताओं के राजनीतिक समर्पण का आकलन उनके कार्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे कई लोगों ने बसपा सरकार के दौरान भी अपने निजी और पारिवारिक हितों को प्राथमिकता दी और पार्टी तथा समाज के हित में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई।
मायावती ने यह भी कहा कि पार्टी में लंबे समय से ईमानदार और निष्ठावान वरिष्ठ नेता नए कर्मठ एवं समर्पित कार्यकर्ताओं, खासकर युवाओं को तैयार कर रहे हैं। पार्टी की यह ‘नर्सरी’ लगातार जारी है और नए लोगों को संगठन में आगे बढ़ाने का काम किया जा रहा है।
बसपा से निष्कासित अनंत मिश्रा ने कहा कि 2007 में ब्राह्मण समाज को बसपा से जोड़ने में सतीश मिश्रा के चेहरे, मायावती के प्रति समाज के भरोसे और जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने कहा कि उस समय ब्राह्मण समाज को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी का स्पष्ट संदेश मिला था। लगातार पार्टी के राजनीतिक प्रदर्शन में गिरावट पर नेतृत्व को आत्मचिंतन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अब वह अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के बीच जाकर उनकी राय लेंगे और उनके सुझाव के आधार पर आगे की रणनीति तय करेंगे।
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