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Saturday,08-August-2026
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महाराष्ट्र सरकार 2006 के मुंबई ट्रेन बम विस्फोटों में बरी होने के मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गई; कल सुनवाई तय

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मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने 7/11 के 2006 के ट्रेन विस्फोट मामले में सभी 12 आरोपियों को बरी करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई 24 जुलाई को तय की है।

11 जुलाई 2006 को हुए विस्फोटों के परिणामस्वरूप मुंबई की उपनगरीय रेल प्रणाली में 180 से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हो गई तथा अनेक अन्य घायल हो गए।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक विशेष अदालत द्वारा 2015 में दिए गए दोषसिद्धि के फ़ैसलों को रद्द कर दिया है, यह दर्शाता है कि अभियोजन पक्ष आरोपों की पुष्टि नहीं कर पाया। न्यायाधीशों ने कहा कि इस्तेमाल किए गए बमों के विशिष्ट प्रकार का निर्धारण नहीं किया गया था, और प्रस्तुत साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त थे।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया और 2015 के विशेष अदालत के फैसले को पलट दिया, जिसमें कई लोगों को दोषी ठहराया गया था, जिनमें से पाँच को मौत की सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ आरोपों के समर्थन में विश्वसनीय सबूत पेश करने में विफल रहने के लिए आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) की आलोचना की। 11 जुलाई, 2006 को हुए बम विस्फोटों में 189 लोग मारे गए और 824 घायल हुए, जिसके बाद एटीएस ने व्यापक जाँच शुरू की।

अपने फैसले में, उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के मामले से जुड़े कई मुद्दों की ओर इशारा किया, खासकर गवाहों की गवाही की विश्वसनीयता और दबाव में लिए गए बयानों की वैधता पर। अदालत ने कहा कि कई गवाह, जैसे टैक्सी चालक और बम विस्फोट देखने का दावा करने वाले व्यक्ति, विश्वसनीय और समय पर सबूत पेश करने में विफल रहे। उदाहरण के लिए, टैक्सी चालकों ने विस्फोटों के महीनों बाद तक अपनी मुठभेड़ों की रिपोर्ट नहीं दी, और उनकी गवाही में विसंगतियों ने उनकी विश्वसनीयता को और कमज़ोर कर दिया।

अदालत ने अभियुक्तों के इकबालिया बयानों को अविश्वसनीय पाया, और यह संकेत दिया कि उन्हें यातना देकर हासिल किया गया था। ज़ब्त किए गए विस्फोटकों को ठीक से संभालने और सील करने में अभियोजन पक्ष की असमर्थता ने सबूतों को कमज़ोर कर दिया, जिससे बम की सामग्री की पहचान नहीं हो पाई। न्यायाधीशों ने दोषसिद्धि से न्याय की झूठी भावना की आलोचना की और कहा कि इसमें व्यापक रूप से अन्य लोगों से उत्पन्न वास्तविक खतरे को नज़रअंदाज़ किया गया।

इस मामले की कमियों में स्वीकारोक्ति पर अत्यधिक निर्भरता और संदिग्ध प्रत्यक्षदर्शी पहचान शामिल थी। प्रक्रियात्मक अनियमितताओं, जैसे अनुचित पहचान परेड, के कारण मामला खारिज कर दिया गया। उच्च न्यायालय ने एक निष्पक्ष न्याय प्रणाली के महत्व पर बल देते हुए, एटीएस को उचित संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहने का फैसला सुनाया। यह मामला साक्ष्य मानकों को बनाए रखने के महत्व और आतंकवाद के मुकदमों में आने वाली चुनौतियों को उजागर करता है, और गहन जाँच और विश्वसनीय साक्ष्य की आवश्यकता पर बल देता है।

राष्ट्रीय समाचार

‘सीएजी रिपोर्ट पर पीएसी की टिप्पणियों को गंभीरता से लें अधिकारी’, विधानसभा अध्यक्ष का विभागों को आदेश

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दिल्ली विधानसभा के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने शुक्रवार को सरकारी खर्च में जवाबदेही पर जोर देते हुए दिल्ली सरकार के विभागों को आवश्यक निर्देश दिए। स्पीकर ने कहा कि विभाग पिछले साल की सीएजी (नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक) रिपोर्ट पर पीएसी (पब्लिक अकाउंट्स कमिटी) की टिप्पणियों पर ध्यान दें और तय समय के अंदर ‘एक्शन टेकन नोट्स’ (की गई कार्रवाई की रिपोर्ट) जमा करें।

आठवीं दिल्ली विधानसभा के छठे सत्र के पहले दिन एक बयान में स्पीकर गुप्ता ने कहा, “पिछले साल से, पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) लगातार उन सीएजी रिपोर्टों की जांच कर रही है, जिन्हें पिछली सरकारों के कार्यकाल के दौरान सदन के सामने पेश नहीं किया गया था।”

उन्होंने कहा, “कमेटी ने अब उन सीएजी रिपोर्टों पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, जो पिछले साल पेश की गई थीं।”

उन्होंने कहा, “मुझे भरोसा है कि इस साल पेश की गई सीएजी रिपोर्टों की जांच भी साल के आखिर तक पूरी हो जाएगी। मैंने विधानसभा सचिवालय को निर्देश दिया है कि वे इन रिपोर्टों को संबंधित विभागों को भेजें ताकि जल्द से जल्द ‘एक्शन टेकन नोट्स’ मिल सकें।”

स्पीकर ने आगे कहा, “जैसा कि मैंने पहले कहा है, सीएजी की टिप्पणियां केवल कुछ मामलों की जांच पर आधारित होती हैं। इसलिए, संबंधित विभागों को इन टिप्पणियों को एक चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए और भविष्य में ऐसी कमियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, ताकि सरकार के सीमित संसाधनों का सबसे अच्छे तरीके से इस्तेमाल हो सके।”

उन्होंने कहा कि ये रिपोर्टें सिर्फ कमियों का ब्योरा नहीं हैं, बल्कि सुधार का रास्ता भी दिखाती हैं। मैं सभी विभागों से आग्रह करता हूं कि वे इन निष्कर्षों को पूरी गंभीरता से लें, तय समय के भीतर अपने ‘एक्शन टेकन नोट्स’ जमा करें और जरूरी सुधारात्मक कदम उठाएं ताकि जनता के पैसे का एक-एक रुपया सिर्फ उसी मकसद के लिए इस्तेमाल हो जिसके लिए वह है।

इससे पहले, शुक्रवार को आठवीं दिल्ली विधानसभा का छठा सत्र शुरू हुआ। मानसून सत्र में 10 और 11 अगस्त को कम से कम दो और बैठकें होने की उम्मीद है।

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राष्ट्रीय समाचार

हर घर तिरंगा अभियान: जौनपुर में 300 महिलाओं ने संभाली झंडा बनाने की जिम्मेदारी

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स्वतंत्रता दिवस नजदीक आने के साथ ही जौनपुर के ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की महिलाएं ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। केंद्र प्रायोजित राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत 62 स्वयं सहायता समूहों की लगभग 300 महिलाओं ने ‘हर घर तिरंगा’ और ‘तिरंगा यात्रा’ अभियान में सरकार के विशाल राष्ट्रव्यापी ध्वजारोहण अभियान से पहले राष्ट्रीय ध्वज बनाने का कार्य अपने हाथ में लिया है।

जिले के लिए पांच लाख झंडे तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है और इन झंडों को सभी ब्लॉकों में 62 स्वयं सहायता समूहों की लगभग 300 महिलाएं तैयार कर रही हैं। बजरंग स्वयं सहायता समूह की महिला विजयलक्ष्मी मौर्या ने समाचार एजेंसी आईएएनएस को बताया कि उसके समूह को 17 हजार झंडे बनाने का लक्ष्य मिला है। हमने छह हजार झंडों की सिलाई पूरी करके उन्हें आगे ब्लॉक कार्यालय में भेज दिया है।

विजयलक्ष्मी मौर्या ने बताया कि समूह में 10 से अधिक महिलाएं हैं, जो इस कार्य को कर रही हैं। हम लोग झंडों की सिलाई का कार्य कर रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस कार्य में उन्हें 30 से 40 हजार रुपए की कमाई होगी।

स्वतः रोजगार उपायुक्त जितेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि इस बार हमारे जनपद को पांच लाख झंडे बनाने का लक्ष्य मिला है। मुख्य कार्य संकुल स्तरीय स्वयं सहायता समूह से किया जा रहा है। सरकार के ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के लक्ष्य सरकार की ओर से दिए गए लक्ष्य को पूरा कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि एक झंडे पर डेढ़ से दो रुपया समूह की महिलाओं को मिल जाता है, क्योंकि यह महिलाएं सिर्फ सिलाई करती हैं। मुख्य रूप से संकुल को एक झंडा बनाने के लिए 20 रुपए दिया जा रहा है और स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को एक झंडे पर 2 से 3 रुपए तक जरूर मिल जाएगा।

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राजनीति

राहुल गांधी को महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए : रिजिजू

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं की आजादी और भागीदारी पर बयान दिया। उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा कि जब तक महिलाएं खुलकर अपनी बात नहीं रख पाएंगी, तब तक कोई भी देश पूरी तरक्की नहीं कर सकता।

राहुल गांधी के इस बयान पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रतिक्रिया देते हुए ‘एक्स’ पोस्ट में कहा कि कांग्रेस को अब संसद में महिला आरक्षण विधेयक का बिना शर्त समर्थन करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

दरअसल, राहुल गांधी ने शुक्रवार को ‘एक्स’ पर एक वीडियो पोस्ट कर में अपनी बात रखी। गुरुवार को भी ‘आस्क मी एनीथिंग’ सत्र में भी उन्होंने इसी मुद्दे पर बात की थी।

उन्होंने ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा, “मैं सोच रहा था कि भारत की महिलाओं की ऊर्जा फंसी हुई है, उसे व्यक्त करने की इजाजत नहीं है, कल्पना करने की आजादी नहीं है। मेरे लिए कोई भी देश तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वहां की महिलाएं खुद को व्यक्त न कर सकें।”

वीडियो में राहुल गांधी ने कहा कि महिलाओं की आवाज दबने से देश की तरक्की पर असर पड़ता है। मेरी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा यही है कि लोग समझें कि महिलाओं की अभिव्यक्ति के बिना हमारा देश अधूरा और पिछड़ा है।

राहुल गांधी ने कहा कि महिला सशक्तीकरण सिर्फ बिजनेस या राजनीति तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह सिर्फ इस बारे में नहीं है कि महिलाएं बिजनेस या राजनीति में अच्छा करें, बल्कि यह भी है कि वे अपने घरों में, परिवार में और सार्वजनिक जगहों पर खुलकर बोल सकें और सड़कों पर आराम से चल सकें।

उन्होंने आगे कहा, “महिलाओं को यह आजादी होनी चाहिए कि वे दूसरों से अलग राय रख सकें, अपने माता-पिता, पति, भाई-बहन से सवाल कर सकें। भारत को सच में विकसित होना है तो पितृसत्ता और पुरुषों के कड़े नियंत्रण से महिलाओं को थोड़ी आजादी मिलनी ही चाहिए।”

राहुल गांधी के इस वीडियो बयान पर किरेन रिजिजू ने कहा कि यह कांग्रेस के नजरिए में सकारात्मक बदलाव का संकेत है।

यह कांग्रेस पार्टी का सकारात्मक संदेश लगता है। राहुल गांधी के दिल में महिलाओं को लेकर बदलाव दिख रहा है। अब मुझे उम्मीद है कि कांग्रेस महिला आरक्षण विधेयक का बिना शर्त समर्थन करेगी।

महिला आरक्षण विधेयक, जिसे संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 या नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी कहा जाता है, एक ऐतिहासिक कानून है। इसके तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं। फिलहाल महिला आरक्षण को लेकर सियासी बहस तेज है और सभी की नजर संसद के अगले कदम पर है।

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