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अमेरिका-ग्रीनलैंड विवाद से निवेशक सतर्क, बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना: रिपोर्ट

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नई दिल्ली, 24 जनवरी : एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की प्रस्तावित योजना के कारण निवेशकों की चिंता अभी बनी रह सकती है। इस मुद्दे से जुड़े कारणों की वजह से निकट भविष्य में बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।

बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट में कहा गया है कि निवेशक फिलहाल इस प्रस्ताव से जुड़ी और जानकारी का इंतजार कर रहे हैं। इन जानकारियों से यह तय होगा कि अमेरिका और अन्य देशों के बीच बातचीत सफल होगी या उसमें रुकावट आएगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आगे चलकर निवेशक इस सौदे के बारे में और अधिक जानकारी की प्रतीक्षा करेंगे, क्योंकि इसमें कुछ ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिनकी वजह से बातचीत पटरी से उतर सकती है। इसी कारण बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था अमेरिका और डेनमार्क के बीच 1951 में हुए सुरक्षा समझौते का ही एक नया रूप हो सकती है।

बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री अदिति गुप्ता के अनुसार, आगे होने वाली बातचीत में ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना की मौजूदगी, वहां के खनिज संसाधनों के इस्तेमाल और ग्रीनलैंड की संप्रभुता जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड में अमेरिका की रुचि को राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं से प्रेरित बताया है। हालांकि, ग्रीनलैंड में मौजूद तेल, गैस और दुर्लभ खनिज तत्वों जैसे संसाधन भी अमेरिका के लिए आकर्षण का कारण हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और नाटो के बीच एक फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा से निवेशकों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन इस समझौते की पूरी जानकारी अभी साफ नहीं है।

ग्रीनलैंड को लेकर बयानबाजी तेज होने के बाद भू-राजनीतिक तनाव बढ़ गया और बाजारों में हलचल मच गई। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ग्रीनलैंड को अपने में मिलाने की बात कहने और विरोध करने वाले यूरोपीय देशों पर आर्थिक कदम उठाने की धमकी से हालात और बिगड़ गए।

इसके जवाब में फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन सहित कई यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य तैनाती बढ़ा दी, जिससे तनाव और बढ़ गया।

डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि 1 फरवरी 2026 से ब्रिटेन, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और फिनलैंड से आने वाले सामान पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स लगाया जाएगा। यह टैक्स 1 जून 2026 से बढ़कर 25 प्रतिशत होने वाला था।

हालांकि बाद में दावोस में हुए विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की बैठक के दौरान ट्रंप ने यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी से पीछे हटने का संकेत दिया।

राष्ट्रीय समाचार

लगातार दूसरे दिन सोने की चमक पड़ी फीकी; चांदी में भी छाई सुस्ती

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सोने और चांदी की कीमत में शुक्रवार को लगातार दूसरे दिन गिरावट देखने को मिली। इससे सोने का दाम 1.45 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम और चांदी का दाम 2.32 लाख रुपए प्रति किलो से नीचे आ गया है।

इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का दाम 3,123 रुपए कम होकर 1,44,970 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है, जो कि पहले 1,48,093 रुपए प्रति 10 ग्राम था।

22 कैरेट सोने का दाम 1,35,653 रुपए प्रति 10 ग्राम से कम होकर 1,32,793 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है। 18 कैरेट सोने की कीमत कम होकर 1,08,728 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गई है, जो कि पहले 1,11,070 रुपए प्रति 10 ग्राम थी।

सोने के साथ चांदी की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली है।

चांदी का दाम 8,218 रुपए कम होकर 2,31,93 रुपए प्रति किलो हो गया है, जो कि पहले 2,40,191 रुपए प्रति किलो था।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। कॉमेक्स पर सोना 1.68 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 4,174.47 डॉलर प्रति औंस और चांदी 2.12 प्रतिशत की गिरावट के साथ 64.91 डॉलर प्रति औंस पर थी।

एलकेपी सिक्योरिटीज के जतिन त्रिवेदी ने कहा कि फेडरल रिजर्व की ओर से 2026 में ब्याज दरें एक बार बढ़ाने के संकेत के बाद सोने की कीमतों पर दबाव देखने को मिल रहा है। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ और सोने जैसी बिना रिटर्न वाली संपत्तियों का आकर्षण कम हो गया। फेड के सख्त रुख के कारण बुलियन बाजारों में बड़े पैमाने पर प्रॉफिट बुकिंग देखी गई।

उन्होंने आगे कहा कि फेड की पॉलिसी के ऐलान के बाद पिछले कुछ सेशन में कॉमेक्स गोल्ड की कीमत लगभग 4375 डॉलर प्रति औंस से गिरकर 4150 डॉलर प्रति औंस हो गई है, जबकि एमसीएक्स गोल्ड का दाम लगभग 1,54,000 रुपए से घटकर 1,47,200 रुपए पर आ गया। डॉलर के मजबूत होने की संभावना और ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदों का असर मार्केट सेंटीमेंट पर पड़ रहा है।

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व्यापार

एससी और ओबीसी छात्रों को छात्रवृत्ति के लिए अब नहीं देना होगा डोमिसाइल प्रमाण पत्र

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केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति (एससी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) छात्रों के छात्रवृत्ति आवेदन प्रक्रिया को ज्यादा आसान बना दिया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाओं के लिए डोमिसाइल (निवास) प्रमाण पत्र जमा करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है।

इस फैसले से छात्रों पर दस्तावेजों का बोझ कम होगा और छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करना पहले की तुलना में अधिक सरल हो जाएगा। खास तौर पर उन हजारों छात्रों को इसका लाभ मिलेगा जो अपने गृह राज्य के बाहर स्थित शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं।

सरकार के अनुसार, एससी और ओबीसी वर्ग के लिए संचालित प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ छात्रों को लाभ मिलता है। डोमिसाइल प्रमाण पत्र की अनिवार्यता हटने से आवेदन प्रक्रिया अधिक छात्र-अनुकूल बनेगी, दस्तावेजी औपचारिकताएं घटेंगी और छात्रों का समय और खर्च दोनों बचेंगे।

डिजिटल गवर्नेंस को मजबूत करने के लिए विभाग ने उमंग प्लेटफॉर्म पर एसईटीयू (शैक्षिक बदलाव और उत्थान के लिए स्कॉलरशिप) भी शुरू किया है। यह छात्रवृत्ति से जुड़ी सभी सेवाओं के लिए एक व्यापक डिजिटल प्लेटफॉर्म है।

इस प्लेटफॉर्म के जरिए पात्र छात्र, संस्थागत नोडल अधिकारी, जिला नोडल अधिकारी और राज्य स्तरीय अधिकारी एक ही जगह पर आवेदन पंजीकरण, आवेदन की निगरानी, सत्यापन और अन्य सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे। इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ेगी।

मंत्रालय ने कहा कि ये पहल सरकार के उस व्यापक लक्ष्य का हिस्सा हैं, जिसके तहत समावेशी विकास को बढ़ावा देना, अनावश्यक प्रक्रियागत बाधाओं को कम करना और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना शामिल है।

विभाग ने यह भी दोहराया कि वह तकनीक आधारित सुधारों के माध्यम से अधिक से अधिक छात्रों तक पहुंच बनाने और उन्हें समय पर सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

वित्त वर्ष 2025-26 में अनुसूचित जाति वर्ग के 75 लाख से अधिक लाभार्थियों को 7,981.47 करोड़ रुपए की सहायता राशि वितरित की गई थी। छात्रवृत्ति योजनाओं पर खर्च में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत 21 प्रतिशत, पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत 11.23 प्रतिशत और टॉप क्लास एजुकेशन छात्रवृत्ति योजना के तहत 13.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

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व्यापार

टाटा मोटर्स ने कमर्शियल वाहनों के दाम 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाए, 1 जुलाई से लागू होंगी नई कीमतें

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टाटा मोटर्स कमर्शियल व्हीकल्स (टीएमसीवी) ने अपने कमर्शियल वाहनों की कीमतों में 2.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है और नई कीमतें 1 जुलाई से लागू होंगी। यह जानकारी गुरुवार को कंपनी की ओर से दी गई।

एक्सचेंज फाइलिंग में कंपनी ने कहा कि इस बढ़ोतरी की वजह कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी होना और लागत का बढ़ना है। यह बढ़ोतरी अलग-अलग मॉडल पर विभिन्न होगी और 2.5 प्रतिशत तक सीमित होगी।

इस बढ़ोतरी से टाटा मोटर्स कमर्शियल व्हीकल्स भी उन कंपनियों में शामिल हो गई है, जिन्होंने मध्य पूर्व संकट के चलते कच्चे माल और लागत में बढ़ोतरी के कारण कीमतों में इजाफा किया है।

इससे पहले, टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल (टीएमपीवी) ने 12 जून को अपनी ईंधन (पेट्रोल, डीजल और सीएनजी) और इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमतों में 1.5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी करने का ऐलान किया। नई कीमतें एक जुलाई से लागू होंगी।

कंपनी की ओर से जारी की गई एक्सचेंज फाइलिंग में कहा गया कि कीमतों में बढ़ोतरी की वजह इनपुट लागत में बढ़ोतरी होना था।

टीएमपीवी ने कहा कि वह लागत में हुई बढ़ोतरी का एक बड़ा हिस्सा खुद वहन कर रही है, जबकि हालिया कीमत संशोधन के जरिए बढ़ोतरी का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल रही है।

कंपनी ने कहा कि कीमत में बढ़ोतरी अलग-अलग मॉडल और वैरिएंट के हिसाब से अलग-अलग होगी। वहीं, मध्य पूर्व तनाव के चलते मारुति सुजुकी और हुंडई मोटर इंडिया जैसी कंपनियां गाड़ियों की कीमतों में बढ़ोतरी कर चुकी हैं।

इसके अतिरिक्त, वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में, टीएमसीवी के मुनाफे में सालाना आधार पर 70 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जबकि आय 22 प्रतिशत बढ़कर 24,452 करोड़ रुपए हो गया। इस दौरान कंपनी का एबिटा मार्जिन 13.90 प्रतिशत रहा है। कंपनी ने प्रति शेयर 4 रुपए का डिविडेंड भी घोषित किया।

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