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Thursday,08-October-2026
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भारत-नेपाल संबंध : देउबा-मोदी मुलाकात के बाद क्या लौट आएगी आपसी संबंधों की गर्माहट

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नेपाल और भारत के बीच परेशानियों और बकाया मुद्दों में से एक सीमा विवाद है, जिसने कुछ समय के लिए काठमांडू और नई दिल्ली के बीच बड़ी गलतफहमियां पैदा कर दी थीं। दरअसल, साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत ने कालापानी में अपनी सैना तैनात कर दी थी, जिस पर ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के तत्कालीन शासकों के बीच सुगौली संधि (1816) के बाद से नेपाल का कब्जा था। इसका ठीक से पता नहीं है कि ये नेपाल सरकार का निर्णय था या भारत ने कालापानी में अपनी सेना रखने की अनुमति मांगी थी, लेकिन इसका सामरिक महत्व है, क्योंकि यह नेपाल, भारत और चीन के बीच स्थित है।

जब भारत ने नवंबर 2019 के पहले सप्ताह में अपने नए राजनीतिक मानचित्र का अनावरण किया, तब कालापानी विवाद फिर से शुरू हो गया और नेपाल ने इस मुद्दे को हल करने के लिए बातचीत के लिए भारत में राजनयिकों को भेजकर निर्णय का विरोध किया। भारत ने तब कहा था कि इस मामले को कूटनीतिक तरीके से सुलाझाया जाना चाहिए।

भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हिमालय में लिपुलेख के माध्यम से एक नई 8 किमी लंबी सड़क का उद्घाटन करने के बाद यह मुद्दा तीव्र हो गया, जिसे नेपाल भी अपना क्षेत्र मानता है। तब तत्कालीन के.पी. शर्मा ओली सरकार ने सड़क के विस्तार का विरोध किया और भारत पर नेपाल के साथ पूर्व परामर्श के बिना यथास्थिति को बदलने का आरोप लगाया।

सड़क भारत को तिब्बत से जोड़ने और मानसरोवर जाने के इच्छुक भारतीय तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए थी। नेपाल ने भारत और चीन के बीच लिपुलेख के रास्ते सड़क का विस्तार करने के 2015 के फैसले का पहले ही विरोध किया था।

भारत और चीन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान लिपुलेख के माध्यम से व्यापार गलियारे विकसित करने का फैसला किया था, लेकिन नेपाल सरकार ने इसका विरोध किया था।

साल 2020 में राजनाथ सिंह ने नई सड़क का उद्घाटन किया, तब यह मुद्दा फिर से तेज हो गया।

लिपुलेख के रास्ते सड़क बनाने के भारत के एकतरफा फैसले का विरोध करते हुए नेपाल ने भारत में कुछ राजनयिक भेजे और समझौते के लिए बातचीत की मांग की। लेकिन तब भारत ने कोरोना महामारी के कारण बातचीत को टाल दिया था।

भारत की प्रतिक्रिया के बाद ओली सरकार ने कालापानी और लिपुलेख को अपने क्षेत्र में शामिल करते हुए नेपाल के एक नए राजनीतिक मानचित्र का अनावरण किया। फिर, दोनों पक्षों के बीच ‘काटरेग्राफिक युद्ध की स्थिति’ बन गई थी।

नेपाल सरकार ने संशोधित आधिकारिक नक्शा जारी किया, जिसमें भारतीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों को शामिल किया गया है। तब भारत के विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था, ‘यह एकतरफा कार्य ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है।’

इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। हालांकि, प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की हाल की भारत यात्रा के दौरान सीमा विवाद तीन साल के अंतराल के बाद फिर से सामने आया। उन्होंने मोदी के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के दौरान इस मुद्दे को उठाया।

मशहूर नेपाल के मानचित्रकार और सर्वेक्षण विभाग के पूर्व महानिदेशक बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने आईएएनएस को बताया कि “अब भारत के साथ आगे की बातचीत के लिए दरवाजा खुल गया है, जिस तरह से हमारे प्रधानमंत्री ने भारत के साथ इस मामले को उठाया है, हमें उम्मीद है कि जल्द ही कुछ प्रगति होगी।”

नई दिल्ली में हैदराबाद हाउस में 2 अप्रैल को देउबा और मोदी के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री ने कहा, “हमने सीमा मामलों पर चर्चा की और मैंने उनसे (मोदी) स्थापित तंत्र के माध्यम से उन्हें हल करने का आग्रह किया।”

भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा कि सीमा मुद्दे को सुलझाने पर आम सहमति बनी है। एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर ‘संक्षिप्त चर्चा’ हुई।

उन्होंने कहा, “दोनों पक्षों को हमारे करीबी और मैत्रीपूर्ण संबंधों को ध्यान में रखते हुए चर्चा और बातचीत करने की जरूरत है। ऐसे मुद्दों पर राजनीतिकरण से बचने की जरूरत है।”

लेकिन देउबा-मोदी वार्ता के बाद जारी किए गए एक भारतीय बयान में हालांकि इस मुद्दे पर चुप्पी साधी हुई थी।

सुस्ता और कालापानी में सीमा रेखा से निपटने के लिए नेपाल और भारत के पास विदेश सचिव और तकनीकी स्तर पर तंत्र हैं। सुस्ता और कालापानी को छोड़कर नेपाल और भारत के साथ सीमा कार्यो को पूरा करने के लिए एक अलग सीमा कार्य समूह (बीडब्ल्यूजी) भी अनिवार्य है।

श्रेष्ठ ने कहा कि देउबा की यात्रा से द्विपक्षीय वार्ता के द्वार खुल गए हैं और दोनों पक्षों के लिए मौजूदा तंत्र को पुनर्जीवित करना बेहतर मौका है।

उन्होंने आगे कहा, “नेपाल और भारत के प्रधानमंत्रियों ने 2014 में सीमा विवाद से निपटने और उसे दूर करने के लिए विदेश सचिव स्तर पर एक तंत्र स्थापित किया था। उन्हें विवाद को सुलझाने के लिए तकनीकी स्तर से प्रतिक्रिया और इनपुट प्राप्त करने के लिए कहा गया था। अब समय आ गया है कि नेपाल और भारत सीमा विवाद के समाधान के लिए विदेश सचिव स्तर के तंत्र को पुनर्जीवित करें।”

नेपाल और भारत के बीच नवंबर 2019 में संबंध बिगड़ने लगे, जब दिल्ली ने अपने क्षेत्र में कालापानी सहित एक नया नक्शा जारी किया।

जैसे ही विवाद फिर से शुरू हुआ, तब श्रृंगला ने नवंबर 2020 के अंत में नेपाल की यात्रा की थी और तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने जुलाई 2021 में भारत की यात्रा की थी। लेकिन दोनों यात्राएं तनाव को कम नहीं कर सकीं।

इस साल जनवरी में फिर से भारतीय प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई एक टिप्पणी ने नेपाल में एक नया हंगामा खड़ा कर दिया।

उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने घोषणा की थी कि उनकी सरकार ने लिपुलेख तक एक सड़क का विस्तार किया है और इसे और आगे बढ़ाने की योजना है।

नेपाल के राजनीतिक दलों ने मोदी के बयान पर नाराजगी जताते हुए इसे गैर-जरूरी बताया और उन्होंने मांग की कि देउबा सरकार भारत को जवाब दे।

मुख्य विपक्षी सीपीएन-यूएमएल ने भारत के साथ इस मुद्दे को उठाने में विफल रहने के लिए सरकार की आलोचना की, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन ने भारत के बयान पर आपत्ति जताई।

नेपाल के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर कार्की ने 16 जनवरी को कहा कि सरकार इस तथ्य के बारे में दृढ़ और स्पष्ट है कि महाकाली नदी के पूर्व में लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी क्षेत्र नेपाल का अभिन्न अंग है।

उन्होंने कहा था कि नेपाल सरकार भारत सरकार से नेपाली क्षेत्र से होकर जाने वाली किसी भी सड़क के एकतरफा निर्माण/विस्तार को रोकने का अनुरोध कर रही है।

उन्होंने आगे कहा, “नेपाल सरकार दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना के अनुसार राजनयिक चैनलों के माध्यम से ऐतिहासिक संधियों और समझौतों, तथ्यों, मानचित्रों और साक्ष्य के आधार पर सीमा मुद्दों को हल करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

नेपाली राजनयिकों और अधिकारियों का कहना है कि नेपाल और भारत के बीच हालिया घटनाक्रम जहां दोनों पक्षों ने विवाद को सुलझाने के लिए अपनी उत्सुकता दिखाई है, ये स्वागत योग्य है, लेकिन इसमें कुछ और समय लग सकता है।

नेपाल के विदेश मंत्री नारायण खड़का ने भी कहा कि मोदी और देउबा मौजूदा सीमा विवाद को मौजूदा तंत्र, बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाने और उसका समाधान करने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने आगे कहा, “बातचीत के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों ने सीमा मुद्दों पर भी चर्चा की और दोनों नेता मौजूदा तंत्र के माध्यम से और बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ऐसे मुद्दों को हल करने पर सहमत हुए।”

प्रधानमंत्री देउबा द्वारा सार्वजनिक रूप से अपने भारतीय समकक्ष से द्विपक्षीय तंत्र की स्थापना के माध्यम से सीमा मुद्दे को हल करने का आग्रह करने के बाद खड़का का बयान महत्वपूर्ण है।

नेपाल के पूर्व राजदूत और दो प्रधानमंत्रियों के पूर्व विदेश नीति सलाहकार दिनेश भट्टराई ने आईएएनएस को बताया कि कम से कम शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को यह अहसास है कि सीमा विवादों को सुलझाना चाहिए और लंबे समय तक अधर में नहीं रहना चाहिए।

उन्होंने कहा, चूंकि भारतीय विदेश सचिव ने कहा कि इस मुद्दे को संबोधित किया जाना चाहिए। यह दर्शाता है कि भारत ने विवाद को स्वीकार कर लिया है।

भट्टराई ने कहा, “इस मुद्दे को मेज पर लाया गया है और दोनों पक्षों को बैठकर सौहार्दपूर्ण समाधान खोजना चाहिए। इसमें कुछ और समय लग सकता है। हमें कई बार बैठक करनी पड़ सकती है और शायद इसे हल करने के लिए बातचीत में सालों लग सकते हैं लेकिन दोनों पक्षों को स्थिति को भड़काना नहीं चाहिए क्योंकि यह एक संवेदनशील मुद्दा है और इससे कूटनीतिक तरीकों और तंत्रों से निपटा जाना चाहिए।”

राजनीति

जंतर-मंतर जा रहे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के नेता हिरासत में लिए गए

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इंडिया ब्लॉक के नेताओं को बुधवार को जंतर-मंतर जाते समय पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इनमें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी शामिल हैं। विपक्षी नेता लगातार दूसरे दिन मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर प्रदर्शन करने के लिए जंतर-मंतर जा रहे थे।

हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल गांधी ने कहा, “गृह मंत्री अमित शाह, पीएम नरेंद्र मोदी, सीईसी ज्ञानेश कुमार और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ये सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन हम उन्हें न्याय के कटघरे में लाएंगे। यह मेरी गारंटी है कि इन चारों को न्याय के कटघरे में लाया जाएगा। यह सब घबराहट में की गई प्रतिक्रिया है। यह सब डर है।”

पुलिस ने राहुल गांधी समेत कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को धक्का देते हुए बसों में बैठाया। इस दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कस्तूरबा गांधी मार्ग पर हिरासत में लिए गए राहुल गांधी और अन्य नेताओं को ले जा रही बस का टायर कथित तौर पर पंक्चर कर दिया।

इससे पहले प्रियंका गांधी प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों की भारी मौजूदगी के बीच सड़क पर लेट गईं और विपक्षी नेताओं को चुनाव आयोग से मिलने की अनुमति दिए जाने तक वहां से हटने से इनकार कर दिया।

प्रियंका गांधी ने पत्रकारों से कहा, “यह है कि वे सांसदों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, जो सिर्फ चुनाव आयुक्त से मिलने की मांग कर रहे हैं।”

उन्होंने सुरक्षाकर्मियों पर सांसदों के साथ मारपीट करने का आरोप लगाते हुए कहा, “पुलिसकर्मियों ने मुझे पूरी तरह खरोंच दिया है। उन्होंने हमें जमीन पर गिरा दिया। अब हम यहां से नहीं हटेंगे। उन्हें अपनी फोर्स वापस बुलाने दीजिए। मैं यहां से नहीं हटूंगी।”

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सुरक्षाकर्मियों पर लाठीचार्ज करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हम कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज बर्दाश्त नहीं करेंगे। राहुल जी और मैं बस में थे। जब राहुल जी बस से नीचे उतरे तो राहुल जी और प्रियंका जी के साथ धक्का-मुक्की शुरू हो गई। उन्होंने गुंडागर्दी की है और गुंडों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।”

कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने कहा, “जब तक हमें अपने सवालों के जवाब नहीं मिलते, हमारी आवाज मजबूत बनी रहेगी।”

वहीं, कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ पुलिस के कथित व्यवहार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि नेताओं को बसों में भरकर पुलिस थानों ले जाया गया और दुर्भाग्य से सुबह उनके खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की गई। उन्होंने सवाल किया कि क्या सार्वजनिक स्थानों पर जाना, धरना देना, विरोध प्रदर्शन करना या मार्च निकालना देश में गैरकानूनी है।

इससे पहले जंतर-मंतर के लिए रवाना होने से पहले राहुल गांधी ने मंगलवार को आकाशवाणी भवन के बाहर नौ घंटे से अधिक समय तक धरना देने के मामले में अपने खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ पहले से ही 45 मामले हैं और उनका “लक्ष्य 100 प्राथमिकी” का है।

मंगलवार को इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी मांगें रखने के लिए प्रदर्शन किया था। बुधवार को भी विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर प्रदर्शन जारी रखा।

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राजनीति

पिंक पास को लेकर सौरभ भारद्वाज बोले- जनता को परेशान करना इनकी आदत

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दिल्ली की बसों में महिलाओं के मुफ्त सफर के लिए पिंक पास को अनिवार्य किए जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने सरकार पर निशाना साधा है। पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि पिंक पास बनवाने के लिए महिलाओं को घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। उनका दावा है कि दिनभर लाइन में लगने के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाओं के पास नहीं बन पा रहे हैं, जिससे उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि जनता को परेशान करना इस सरकार की आदत बन गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले से आसानी से मिल रही सुविधाओं को भी जटिल बना दिया गया है और आम लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए सड़कों पर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि मुख्यमंत्री ने हर आसान काम और पहले से चल रही सुविधा के लिए लोगों को लाइनों में खड़ा कर दिया है।

उन्होंने नोटबंदी, एसआईआर और पिंक पास के साथ-साथ एलपीजी सिलेंडर से जुड़ी परेशानियों का भी उल्लेख किया। उनका आरोप है कि लोगों को इतना परेशान कर दिया जाए कि वे सरकार से किसी नई सुविधा की मांग ही न करें और अपनी रोजमर्रा की परेशानियों में उलझे रहें। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि दिल्ली में पहले सभी महिलाएं बसों में मुफ्त सफर करती थीं और इसके लिए किसी विशेष पास की जरूरत नहीं होती थी।

उनके मुताबिक, अब पिंक पास को अनिवार्य किए जाने से महिलाओं को पास बनवाने के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली में बड़ी संख्या में महिलाओं के वोट काटे गए हैं और ऐसे में उन्हें पिंक पास की सुविधा से वंचित किया जा रहा है। वहीं, जिन महिलाओं को पास मिलने की उम्मीद है, उन्हें भी इसे बनवाने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।

आप नेता ने दिल्ली में रहने वाली दूसरे राज्यों की महिलाओं को लेकर भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित आसपास के राज्यों से दिल्ली आने वाली महिलाएं, जिनमें नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम और सोनीपत से आने वाली महिलाएं शामिल हैं, उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि दिल्ली में रोजगार, शिक्षा और अन्य जरूरी कामों के लिए बड़ी संख्या में महिलाएं पड़ोसी शहरों से आती-जाती हैं। ऐसे में मुफ्त बस यात्रा की सुविधा से जुड़ी किसी भी नई व्यवस्था का सीधा असर इन महिलाओं पर पड़ता है। उन्होंने सरकार से व्यवस्था को सरल बनाने और महिलाओं की परेशानियों को तत्काल दूर करने की मांग की।

आम आदमी पार्टी का कहना है कि पहले से उपलब्ध मुफ्त बस यात्रा की सुविधा को आसान बनाए रखने के बजाय पिंक पास की अनिवार्यता से महिलाओं के सामने नई समस्या खड़ी हो गई है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार को महिलाओं को राहत देने के लिए व्यवस्था को सरल करना चाहिए, न कि उन्हें पास बनवाने के लिए लंबी कतारों में खड़ा करना चाहिए।

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राष्ट्रीय समाचार

पुलिस और आरएएफ के लिए बॉडी कैमरों की एसओपी पर सरकार छह महीने में ले फैसला : दिल्ली हाई कोर्ट

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दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को सरकार को निर्देश दिया कि वह भीड़ को नियंत्रित करने और विरोध-प्रदर्शनों को संभालने के काम में तैनात दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों के लिए बॉडी कैमरों का इस्तेमाल अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को एक ‘रिप्रेजेंटेशन’ (यानी सरकार के सामने रखी गई मांग) के तौर पर ले।

एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अरुण भारद्वाज की बेंच ने सरकार को निर्देश दिया कि वह विरोध-प्रदर्शनों और भीड़ को काबू करने के ऑपरेशन के दौरान पुलिस और आरएएफ कर्मियों द्वारा बॉडी कैमरों के इस्तेमाल के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) बनाने पर छह महीने के भीतर फैसला ले।

हाई कोर्ट ने यह आदेश वकील चाहत राघव द्वारा दायर एक पीआईएल का निपटारा करते हुए दिया। यह पीआईएल जंतर-मंतर पर जुलाई 2026 में हुए प्रदर्शनों के बाद दायर की गई थी, जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक शामिल थे।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील अखिल सिबल ने कहा कि दिल्ली पुलिस का मौजूदा सिस्टम बाहरी वीडियोग्राफरों पर निर्भर है, जो घेरे के बाहर तैनात होते हैं और इसमें भीड़ को काबू करने के लिए तैनात कर्मियों की गतिविधियों की साथ-साथ रिकॉर्डिंग का कोई सही तरीका नहीं है।

उन्होंने तर्क दिया कि बॉडी कैमरों के लिए टेक्नोलॉजी की उपलब्धता भीड़ को काबू करने के ऑपरेशन के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जवाबदेही तय करने में बहुत मददगार साबित हो सकती है।

सीनियर वकील ने तर्क दिया, “अगर टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, तो जरूरत पड़ने पर जवाबदेही तय करने में यह बहुत काम आ सकती है। यह फेशियल रिकग्निशन से अलग है, जिसमें निगरानी (सर्विलांस) को लेकर चिंताएं होती हैं।”

केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि याचिका को एक रिप्रेजेंटेशन (अनुरोध) के तौर पर माना जा सकता है और छह महीने के भीतर फैसला बता दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले और दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों का हवाला देते हुए एएसजी शर्मा ने कहा कि पीआईएल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से पहले संबंधित अधिकारियों के सामने एक रिप्रेजेंटेशन देना जरूरी था।

केंद्र ने यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए पहले से ही गाइडलाइंस मौजूद हैं और मौजूदा सिस्टम में वीडियोग्राफी भी शामिल है। याचिकाकर्ता बॉडी कैमरों के इस्तेमाल के लिए एसओपी बनाने की मांग करते हुए एक रिप्रेजेंटेशन दे सकता है, जिस पर कानून के अनुसार विचार किया जा सकता है।

सरकार द्वारा इस मुद्दे पर रिप्रेजेंटेशन के तौर पर विचार करने और छह महीने के भीतर अपना फैसला बताने पर सहमत होने के बाद, हाई कोर्ट ने पीआईएल का निपटारा कर दिया।

यह याचिका जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों के बाद दायर की गई थी, जिसमें छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ 50 से ज्यादा पुलिस और पैरामिलिट्री कर्मी घायल हो गए थे।

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