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ऑस्ट्रेलिया में जंगलों में लगी आग, कई घर जलकर हुए खाक

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सिडनी, 25 जनवरी। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में जंगलों में लगी आग अब रौद्र रूप धारण कर चुकी है। इस आग की जद में आकर कई घर जलकर खाक हो चुके हैं। लोगों का कहना है कि यहां से उनका निकलना मुश्किल हो चुका है।

मीडिया के अनुसार, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में अधिकारियों ने शनिवार सुबह चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि राज्य के दक्षिण-पश्चिम में दो जंगलों में आग लगी है। आग के कारण निकासी मार्गों पर असर पड़ा है। अब वहां से निकलने का समय बहुत कम है।

पर्थ से 190 किमी दक्षिण-पश्चिम में आर्थर नदी शहर के पास एक जगह आग लग गई। इस आग ने शुक्रवार को गर्म और हवा वाली स्थिति में 11,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन को जला दिया। ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (एबीसी) ने शनिवार को बताया कि आग से दो घर जल गए हैं। इसके साथ ही और घरों को नुकसान होने की आशंका है।

आर्थर नदी और आसपास के शहरों के लोगों को चेतावनी दी गई है। कहा गया है कि अब वहां से निकलने के लिए बहुत देर हो चुकी है। लोग अब अपने घरों में आश्रय ले लें।

अग्निशमन और आपातकालीन सेवा विभाग (डीएफईएस) ने आपातकालीन चेतावनी जारी की। इसमें कहा गया, “अगर आप अभी निकले, तो आपकी जान खतरे में पड़ सकती है। आग आने से पहले आपको सुरक्षित जगह लेनी चाहिए। आग की जद में आकर आप अपनी जान से भी हाथ धो सकते हैं।”

इस संबंध में जारी की गई चेतावनी में निवासियों से कहा गया है कि वे अपने घरों को खाली करने के लिए तैयार रहें। राज्य के दक्षिणी तट पर ब्रेमर बे के पास एक अलग आग की भी चेतावनी दी गई।

डीएफईएस ने कहा, “कृपया इस क्षेत्र को छोड़ने या आने की कोशिश न करें, चाहे आप वाहन से हों या पैदल। अगर आप किसी मजबूत संरचना में सुरक्षित नहीं रह सकते, तो आपको समुद्र तट या खुले मैदान में जाना चाहिए, जहां कोई घास या पेड़ न हों।”

पर्थ से 300 किमी पूर्व में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कम आबादी वाले मध्य क्षेत्र में आग लगी है। यह आग 40,000 हेक्टेयर में फैली हुई है। अब आग के लिए चेतावनियां कम कर दी गई हैं। लेकिन क्षेत्र के लोगों को स्थितियों पर नजर रखने की सलाह दी गई है।

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया कई दिनों से तेज गर्मी झेल रहा है। राज्य में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर है।

अंतरराष्ट्रीय

ईरान के विदेश मंत्री की भारतीय और रूसी समकक्षों के साथ फोन पर बातचीत, युद्ध के हालातों पर हुई चर्चा

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तेहरान, 6 अप्रैल : ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे क्षेत्रीय संघर्ष पर रूस और भारत के विदेश मंत्रियों से बातचीत की।

ईरानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयानों के अनुसार, रविवार को हुई दो अलग-अलग फोन कॉल में अरागची ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ पश्चिम एशिया की ताज़ा स्थिति और अमेरिका व इजराइल के हमलों के सुरक्षा और आर्थिक असर पर चर्चा की।

अरागची ने बताया कि पिछले 37 दिनों में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के लोगों के खिलाफ कई हमले किए हैं। इनमें औद्योगिक ढांचे, फैक्ट्रियों, अस्पतालों, स्कूलों, रिहायशी इलाकों और परमाणु केंद्रों को निशाना बनाया गया है।

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से जुड़े प्रभावशाली देशों से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर जिम्मेदार रवैया अपनाएं।

उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की जनता और उसकी सेना अपने देश के हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका और इजरायल के हमलों का असर पूरे क्षेत्र और दुनिया की स्थिरता और सुरक्षा पर पड़ सकता है।

वहीं, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने नागरिक इलाकों पर हो रहे “गैरकानूनी” हमलों को तुरंत रोकने की जरूरत बताई। उन्होंने खास तौर पर दक्षिणी ईरान के बुशेहर परमाणु संयंत्र पर हमलों का जिक्र किया और कहा कि इस संघर्ष को फैलने से रोकने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करने के प्रयासों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत युद्ध को रोकने के लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही कोशिशों का समर्थन करता है।

यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब 28 फरवरी से अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया है। इसके जवाब में ईरान और उसके सहयोगी देशों ने मध्य पूर्व में अमेरिका और इजराइल से जुड़े ठिकानों पर हमले किए हैं।

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अंतरराष्ट्रीय

एयू की चेतावनी : मध्य-पूर्व का संघर्ष अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए ‘गंभीर खतरा’

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नई दिल्ली, 6 अप्रैल : अफ्रीकी संघ (एयू) और उसके साझेदारों ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।

सिन्हुआ समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, एक संयुक्त रिपोर्ट में एयू, संयुक्त राष्ट्र के अफ्रीका आर्थिक आयोग, अफ्रीकी विकास बैंक और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने कहा कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है और जहाजों के रास्तों, ऊर्जा और खाद (फर्टिलाइजर) की सप्लाई में जितनी ज्यादा बाधा आती है, उतना ही अफ्रीका की आर्थिक वृद्धि पर इसका गंभीर असर पड़ेगा।

रिपोर्ट के अनुसार, अफ्रीका के कई देश अभी भी कोविड से पहले वाली विकास दर तक नहीं पहुंच पाए हैं। अगर यह संघर्ष छह महीने से ज्यादा चलता है, तो साल 2026 में अफ्रीका की जीडीपी वृद्धि दर में 0.2 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

संस्थाओं ने कहा कि यह संघर्ष पहले ही व्यापार पर असर डाल चुका है और अब यह महंगाई का संकट भी बन सकता है, क्योंकि ईंधन और खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, जहाजों का किराया, बीमा खर्च, मुद्रा पर दबाव और सख्त राजकोषीय स्थितियां जैसे कारण स्थिति को और खराब कर सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर परिवारों पर पड़ेगा।

रिपोर्ट में बताया गया कि अफ्रीका के कुल आयात का 15.8 प्रतिशत और निर्यात का 10.9 प्रतिशत हिस्सा मध्य पूर्व से जुड़ा है। इससे साफ है कि वहां की स्थिति का अफ्रीका पर सीधा असर पड़ता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ देशों के लिए तेल से ज्यादा बड़ा असर खाद की कमी का हो सकता है। अगर खाड़ी देशों से प्राकृतिक गैस की सप्लाई प्रभावित होती है, तो अमोनिया और यूरिया का उत्पादन घटेगा, जिससे खेती के अहम मौसम (मार्च से मई) में खाद महंगी हो जाएगी।

इसका सीधा असर खाने की कीमतों पर पड़ेगा और गरीब परिवारों के लिए भोजन जुटाना और मुश्किल हो जाएगा। इससे अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा पर भी बुरा असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि इस संघर्ष का असर राजनीति और सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। अगर यह संघर्ष बढ़ता है, तो अफ्रीका में बाहरी देशों के प्रभाव की होड़ तेज हो सकती है। सूडान, सोमालिया और लीबिया जैसे देशों में पहले से ही ऐसे संकेत दिख रहे हैं।

अंत में रिपोर्ट में कहा गया कि इस स्थिति से निपटने के लिए अफ्रीका को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी होगी, सरकारी खर्च की स्थिति को संभालना होगा, ‘अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र’ को तेजी से लागू करना होगा और आर्थिक सुरक्षा के उपाय तैयार करने होंगे, ताकि भविष्य में ऐसे झटकों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।

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अंतरराष्ट्रीय

ट्रंप का दावा: ईरान के साथ ‘गहरी’ बातचीत जारी, सैन्य ऑपरेशन जारी रखने के दिए संकेत

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TRUMP

नई दिल्ली, 6 अप्रैल : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायली मीडिया से कहा कि अमेरिका, ईरान के साथ संघर्ष विराम कराने के लिए “गंभीर” बातचीत कर रहा है। उन्होंने यह भी साफ किया कि अमेरिका इस संघर्ष को बीच में छोड़कर नहीं जाएगा।

ट्रंप ने बताया कि उनकी सरकार ईरान के साथ कई माध्यमों से संपर्क बनाए हुए है। इन कोशिशों की अगुवाई उनके सलाहकार स्टीव विटकॉफ और जैरेड कुशनर कर रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, बातचीत दो तरीकों से हो रही है। पहला, पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देशों के जरिए अप्रत्यक्ष बातचीत। दूसरा, अमेरिकी प्रतिनिधियों और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच सीधे संपर्क।

इन मध्यस्थ देशों की कोशिश है कि दोनों पक्ष ऐसे कदमों पर सहमत हों, जिससे अमेरिका द्वारा तय की गई समय सीमा को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि, हाल ही में हुई फोन पर बातचीत से कोई खास नतीजा नहीं निकला है।

ट्रंप ने चैनल 12 से कहा कि मंगलवार की तय समय सीमा से पहले समझौता होने की “अच्छी संभावना” है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अमेरिका क्षेत्र में “कड़ी कार्रवाई” करेगा।

रविवार को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर “मंगलवार, रात 8:00 बजे (ईस्टर्न टाइम)” लिखा। यह संदेश इस बात का संकेत प्रतीत होता है कि ईरान द्वारा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को फिर से खोलने के लिए दी गई समय-सीमा को संभवतः आगे बढ़ाया जा सकता है।

इससे पहले रविवार को ही ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि मंगलवार ईरान के लिए “पावर प्लांट डे और ब्रिज डे” जैसा होगा, यानी उस दिन कड़ी कार्रवाई हो सकती है। उन्होंने फिर से ईरान से स्ट्रेट खोलने को कहा।

द वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान ने मंगलवार शाम तक स्ट्रेट नहीं खोला, तो अमेरिका उसके सभी पावर प्लांट नष्ट कर सकता है।

ट्रंप ने कहा, “यदि वे बात नहीं मानते, यदि वे इसे बंद ही रखना चाहते हैं, तो उन्हें पूरे देश में मौजूद अपने हर एक पावर प्लांट और अन्य सभी प्लांटों से हाथ धोना पड़ेगा।”

फॉक्स न्यूज से फोन पर बातचीत में ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ चल रहा यह संघर्ष सोमवार तक खत्म करने के लिए समझौता हो सकता है।

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