अंतरराष्ट्रीय
डोनाल्ड ट्रंप का 50 प्रतिशत वाला टैरिफ बम, भारत के लिए ‘अब्बा-डब्बा-जब्बा’
PM MODI
नई दिल्ली, 8 अगस्त। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा रह-रहकर भारत को टैरिफ का दिखाया जा रहा डर अब उनके लिए ही परेशानी का कारण बनता जा रहा है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से अमेरिका भारत के खिलाफ टैरिफ बम फोड़ने की धमकी दे रहा है, उसका माकूल जवाब भारत सरकार की तरफ से दिया जा रहा है।
दरअसल, भारत एक ऐसा वैश्विक बाजार बन चुका है, जिसकी जरूरत दुनिया के देशों को अपना व्यापार चलाने के लिए है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की परचेजिंग पावर पैरिटी है। भारत इस मामले में अमेरिका से आगे है और यही वजह है कि भारत के बाजार पर पूरी दुनिया की नजर है।
पिछले कुछ दिनों में भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा दी जा रही टैरिफ धमकी का जवाब जिस तरह से दिया जा रहा है, वह भारत की वैश्विक ताकत को दिखाता है। एक तरफ जहां भारत के खिलाफ टैरिफ की धमकी अमेरिका के राष्ट्रपति दे रहे हैं तो उनका जवाब भारत की तरफ से देने के लिए विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता सामने आ रहे हैं। मतलब दुनिया के सबसे ताकतवर देश होने का दंभ भरने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति की धमकी का जवाब भी भारत के प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री स्तर के नेता के द्वारा नहीं दिया जा रहा है।
अब एक बार भारत की तरफ से किए गए निश्चय पर ध्यान दें तो आपको पता चल जाएगा कि आखिर भारत अमेरिका की टैरिफ वाली धमकी को इतनी गंभीरता से क्यों नहीं ले रहा है। भारत ने ट्रंप की टैरिफ वाली धमकी पर जो जवाब दिया है, उसका संदेश साफ है। भारत की तरफ से दिए गए जवाब को देखेंगे तो इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिका के टैरिफ की भारत को कोई चिंता नहीं है और इसकी सबसे बड़ी वजह भारत का खुद आत्मनिर्भर बनना है। चाहे वह रक्षा का मामला हो या सुरक्षा का। दूसरी तरफ यह भी देखा जा रहा है कि अमेरिका से डील की किसी डेडलाइन की चिंता भारत में दिख नहीं रही है और सरकार की तरफ से साफ संदेश जा रहा है कि भारत प्रेशर में आने वाला नहीं है, ना ही प्रेशर में आकर कोई डील करेगा। इसके साथ ही भारत ट्रंप की मंशा भी अच्छी तरह से समझ रहा है कि अमेरिका भारत के पूरे बाजार में बेरोकटोक एक्सेस चाहता है जो किसी हाल में भारत देने को तैयार नहीं है।
इसके साथ ही नरेंद्र मोदी सरकार देश के किसानों और छोटे व्यवसायियों को किसी भी हाल में नुकसान होने देने के मूड में नहीं दिख रही है। वहीं, अमेरिका की तरफ से इस टैरिफ धमकी के जरिए इस पर भी दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है कि भारत अपने सबसे पुराने मित्र रूस से अपनी दोस्ती समाप्त कर ले तो भारत का यह संदेश भी स्पष्ट है कि ऐसा कभी होने वाला नहीं है।
भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड’ बताने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी पता है कि भारत का बाजार जिस दिन अमेरिका के लिए बंद हुआ, उस दिन उनकी कई कंपनियों पर ताले लग जाएंगे। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की परचेजिंग पावर पैरिटी है। अब एक बार जानिए कि परचेजिंग पावर पैरिटी है क्या?
दरअसल, क्रय-शक्ति समता (परचेजिंग पावर पैरिटी- पीपीपी) अंतरराष्ट्रीय विनिमय का एक सिद्धांत है। जिसको आसान भाषा में समझिए कि यह एक-दूसरे देश में जीवन शैली पर किए गए व्यय के अनुपात को दर्शाता है। इसके अनुसार विभिन्न देशों में एकसमान वस्तुओं की कीमत समान रहती है। मतलब परचेजिंग पावर पैरिटी विभिन्न देशों में कीमतों का माप है, जो देशों की मुद्राओं की पूर्ण क्रय शक्ति की तुलना करने के लिए विशिष्ट वस्तुओं की कीमतों का उपयोग करती है।
यानी प्रत्येक देश में सामान और सेवाएं खरीदने के लिए एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा में परिवर्तित करना होता है। अब इसे ऐसे समझें कि भारत के मध्यम वर्ग के लिए एक साल का बजट अगर 25 लाख का होता है, तो अमेरिका के मध्यम वर्गीय परिवार के लिए यही बजट यहां की मुद्रा के अनुसार 80 लाख से ज्यादा होता है।
अब भारत ने अमेरिका के उस दोहरे रवैये को भी उजागर कर दिया है, जिसमें अमेरिका भारत को रूस से दोस्ती और व्यापार खत्म करने के लिए धमकी दे रहा है। वहीं, वह खुद रूस से भारी मात्रा में तेल, गैस और फर्टिलाइजर खरीदता है।
हालांकि, भारत का विपक्ष अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत के ‘डेड’ इकोनॉमी वाले दावे पर सरकार को घेरने की कोशिश तो कर रहा है। लेकिन, विपक्ष के शशि थरूर, मनीष तिवारी और राजीव शुक्ला के साथ कई अन्य नेता भी हैं, जो ट्रंप के इस दावे को भद्दा मजाक तक बता दे रहे हैं। मतलब भारत में तो ट्रंप के दावे को भी मजाक में ही लिया जा रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की सत्ता में वापसी के बाद दुनिया के 70 से ज्यादा देशों पर टैरिफ बम फोड़ रखा है और उसे भी यह पता है कि इससे अमेरिका को भी बड़ा नुकसान होने वाला है। इसको सबसे पहले टेस्ला के मालिक एलन मस्क ने समझा और उन्होंने सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति का विरोध करते हुए उनका साथ छोड़ दिया। ट्रंप के टैरिफ बम वाले दिखावे की वजह से अमेरिका के उद्योगपति भी घबराए हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप के साथ जिन देशों ने ट्रेड डील करने का दावा किया, उन्हें भी इस टैरिफ के मामले में नहीं बख्शा गया है। अब पाकिस्तान को हीं देख लें, जिस देश का सेना प्रमुख डोनाल्ड ट्रंप के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग कर रहा है, उस पर भी ट्रंप ने 19 प्रतिशत टैरिफ ठोंक रखा है।
वैसे भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की व्यापक सफलता के बाद से भारत में निर्मित हथियारों की दुनिया में तेजी से मांग बढ़ी है। ऐसे में अमेरिका, जो अपने आप को आधुनिक हथियारों का सबसे बड़ा डीलर मानता है, उसकी चिंता ज्यादा बढ़ गई है।
दूसरा, भारत तेल की खरीदारी भी भारी मात्रा में रूस से करता है, जबकि अमेरिका इस पर भी नजरें गड़ाए बैठा है कि भारत रूस को छोड़कर उससे तेल का सौदा करे। लेकिन, इस सब के बीच जैसे ही ट्रंप ने भारत के खिलाफ 50 प्रतिशत टैरिफ की बात कही, उससे पहले पीएम मोदी के चीन दौरे और फिर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे की खबर ने उसकी बेचैनी बढ़ा दी है। अमेरिका जानता है कि रूस, चीन और भारत अगर एक बेस पर आ गए तो अमेरिका के लिए यह बड़ा महंगा पड़ सकता है। डोनाल्ड ट्रंप भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत के खिलाफ जो उनका टैरिफ बम है, वह उनके देश की सेहत को भी नुकसान पहुंचाएगा। अमेरिका में दवाएं, ज्वेलरी, गोल्ड प्लेटेड गहने, स्मार्टफोन, तौलिये, बेडशीट, बच्चों के कपड़े तक महंगे हो जाएंगे।
अभी ये तो भारत की बात थी, लेकिन देखिए कैसे अमेरिका के खिलाफ दुनिया के और देश आगे आए हैं। भारत की वैश्विक ताकत का अंदाजा इससे लगाइए कि अभी कुछ दिन पहले विदेशी मीडिया की खबरों के अनुसार ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने अमेरिकी टैरिफ के मुद्दे को सुलझाने के लिए ट्रंप से बात करने के सवाल पर साफ कह दिया कि उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके बजाय वे भारत के पीएम नरेंद्र मोदी को कॉल कर लेंगे, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को कॉल कर लेंगे, लेकिन वे ट्रंप को कॉल नहीं करेंगे।
लूला ने जो कहा उसके अनुसार, ”मैं ट्रंप को कॉल नहीं करूंगा क्योंकि वे बात ही नहीं करना चाहते हैं, मैं शी जिनपिंग को कॉल करूंगा, मैं पीएम मोदी को कॉल करूंगा, मैं पुतिन को इस समय कॉल नहीं करूंगा क्योंकि वे अभी यात्रा करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन मैं कई और राष्ट्रपतियों को कॉल करूंगा।”
लूला के इस बयान से ट्रंप को कैसी मिर्ची लगी होगी, यह तो सभी जानते हैं। उधर, पीएम मोदी का जिस अंदाज में लूला ने नाम लिया, वह भी ट्रंप के लिए चुभने वाला है। लूला ने तो ट्रंप की नीतियों को “ब्लैकमेल” बताते हुए साफ कर दिया कि अमेरिका ब्राजील पर टैरिफ लगाकर देखे, ब्राजील भी इसका जवाब शुल्क लगाकर देगा।
इसके साथ ही भारत और रूस की दोस्ती ही केवल अमेरिकी राष्ट्रपति की घबराहट की वजह नहीं है। दरअसल, भारत-पाकिस्तान और कंबोडिया और थाइलैंड के बीच सीजफायर को लेकर ट्रंप ने जैसे अपनी पीठ बिना किसी बात के थपथपाई वही कोशिश वह रूस-यूक्रेन के बीच भी सीजफायर होने के बाद करना चाह रहे थे। लेकिन, यूक्रेन-रूस की जंग रोकने के लिए ट्रंप ने जितने हथकंडे अपनाए सब फेल हो गए। पुतिन को ट्रंप ने हाई टैरिफ की धमकी भी दी, लेकिन रूस पर फिर भी कोई असर नहीं पड़ा तो ट्रंप बैखला गए। इसके बाद ट्रंप ने रूस के मित्र देशों और उनके साथ व्यापार करने वालों को निशाना बनाना शुरू किया। इसमें सबसे पहले ट्रंप के निशाने पर भारत, चीन और ब्राजील आए, लेकिन तीनों ही देशों पर ट्रंप की धमकी का वैसा ही असर पड़ा, जैसा रूस पर पड़ा था। अब ट्रंप गुस्से से आग बबूला होकर लगातार बयानबाजी कर रहे हैं।
वहीं, ट्रंप ब्रिक्स देशों के फाउंडर रहे भारत के खिलाफ तो टैरिफ की धमकी दे ही रहे हैं। वह ब्रिक्स में शामिल अन्य देशों के खिलाफ भी 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दे चुके हैं। ब्रिक्स दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का समूह है, जिसमें, ब्राजील, रूस, भारत, चीन, साउथ अफ्रीका, ईरान, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात शामिल है। इन ब्रिक्स देशों की तरफ से एक-दूसरे से अपनी करेंसी में ट्रेड किया जाता है, वहीं इस समूह ने एक प्रपोजल भी दिया था कि इन देशों के बीच ट्रेड के लिए एक इंटरनेशनल करेंसी तैयार की जाए, ऐसे में डॉलर पर बड़े देशों या कहें कि उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों की निर्भरता कम हो जाने से अमेरिका का विश्व में प्रभुत्व बरकरार रखने पर भी खतरा मंडराएगा। ट्रंप को यह चिंता भी सता रही है।
जिस तरह से भारत डोनाल्ड ट्रंप की तमाम धमकियों के बाद भी अपने रुख पर अड़ा हुआ है और भारतीय बाजार को अमेरिका के लिए उसकी शर्तों पर खोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। इससे भी ट्रंप के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ उभर आई हैं। ऐसे में अब ट्रंप को भारत से जिस भाषा में जवाब मिल रहा है, वह स्पष्ट संकेत दे रहा है कि अमेरिका की टैरिफ धमकी भारत के लिए ‘अब्बा-डब्बा-जब्बा’ जैसी है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
व्यापार
जी20 व्यापार मंत्रियों ने भोजन को हथियार बनाने की निंदा की, जबरन मजदूरी पर नहीं बनी सहमति

जी20 के व्यापार मंत्रियों ने राजनीतिक या आर्थिक दबाव के लिए भोजन को हथियार बनाने की सर्वसम्मति से निंदा की है। खास बात यह है कि ये इस बैठक में बनी एक दुर्लभ आम सहमति है, क्योंकि जबरन श्रम, औद्योगिक अति-क्षमता और वैश्विक व्यापार नियमों के भविष्य जैसे मुद्दों पर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच मतभेद सामने आए हैं।
यह समझौता अमेरिका की अध्यक्षता में मिल्वौकी में दो दिन तक चली जी20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में हुआ। मंत्रियों ने भोजन को हथियार बनाने का मतलब बताया कि जब कोई सरकार जानबूझकर किसी दूसरे देश से राजनीतिक फायदा लेने के लिए खाने-पीने की चीजों, खेती के सामान या खेती में इस्तेमाल होने वाली चीजों के व्यापार को धीमा कर दे, रोक दे या अपने फायदे के लिए मोड़ दे।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने कहा, “रचनात्मक चर्चा के बाद, जी20 व्यापार मंत्रियों ने भोजन को हथियार बनाने की निंदा करने पर सहमति जताई, क्योंकि यह एक बड़ा मानवीय और आर्थिक खतरा है।”
उन्होंने कहा, “दशकों से, भोजन, कृषि उत्पादों और कृषि इनपुट के व्यापार को आर्थिक या राजनीतिक कारणों से दबाव बनाने के लिए हथियार बनाया गया है। यह लक्षित देशों में लोगों की आजीविका को खतरे में डालता है, प्रतिस्पर्धा को बिगाड़ता है और वैश्विक व्यापार प्रणाली में विश्वास को कमजोर करता है।”
सहमति वाले बयान में कहा गया कि इस तरह की कार्रवाइयां कृषि और खाद्य आपूर्ति शृंखला को बाधित कर सकती हैं, खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल सकती हैं, खासकर कमजोर आबादी के लिए और किसानों की आजीविका को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि मंत्रियों ने दबाव बनाने वाली व्यापारिक कार्रवाइयों और वैध घरेलू उपायों के बीच फर्क किया। समझौते में कहा गया कि उनकी चिंता उन उपायों पर लागू नहीं होती जो पारदर्शी तरीके से अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार अपनाए गए हैं और वैध घरेलू नीतिगत उद्देश्यों (जिसमें खाद्य सुरक्षा भी शामिल है) को आगे बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं। यह फर्क मिल्वौकी चर्चा के मुख्य मुद्दों में से एक था।
मंत्रियों ने खाने के मुद्दे पर सहमति बना ली, वे वैश्विक सप्लाई चेन से जबरन मजदूरी को खत्म करने पर सहमति नहीं बना पाए। अमेरिका, मैक्सिको और अर्जेंटीना ने इसके बजाय जबरन मजदूरी से बने सामानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए एक अलग बयान जारी किया।
जैमीसन ग्रीर ने कहा, “मैं नैतिक और आर्थिक वास्तविकता के साथ खड़े होने और यह मानने के लिए मैक्सिको और अर्जेंटीना के अपने सहयोगियों की सराहना करता हूं कि जबरन मजदूरी का जारी रहना एक घृणित मानवाधिकार मुद्दा है जो वैश्विक सप्लाई चेन को बिगाड़ता है।”
उनके बयान में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुमान का हवाला दिया गया कि 2021 में दुनियाभर में 28 मिलियन लोग जबरन मजदूरी में थे, जो पिछले पांच सालों में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि है। इसमें देशों से जबरन मजदूरी के जरिए पूरी तरह या आंशिक रूप से उत्पादित आयात के खिलाफ सहयोग और उपायों को मजबूत करने का आह्वान किया गया।
अध्यक्ष के बयान में कहा गया कि इस प्रस्ताव को कुछ सदस्यों को छोड़कर सभी ने समर्थन दिया, कुछ ने सामूहिक कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ने से इनकार कर दिया।
मंत्रियों ने डब्ल्यूटीओ के मोस्ट-फेवर्ड नेशन (एमएफएन) सिद्धांत में सुधार पर भी चर्चा शुरू की। कई सदस्यों ने एमएफएन को बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली की आधारशिला बताया, जबकि बढ़ती संख्या ने संकेत दिया कि इस सिद्धांत के काम करने के तरीके की जांच करने में ही भलाई है।
यह बैठक 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को अमेरिकी जी20 अध्यक्षता के तहत हुई थी। इसमें चार मुख्य विषयों- भोजन को हथियार बनाना, जबरन मजदूरी, संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता और एमएफएन सिद्धांत में सुधार पर चर्चा हुई। अमेरिका 2027 में जी20 की अध्यक्षता ब्रिटेन को सौंपेगा।
राष्ट्रीय समाचार
भारत और फ्रांस ने व्यापार और निवेश सहयोग को नई गति देने को लेकर की चर्चा, एफटीए से लेकर यूपीआई तक पर हुई अहम बातचीत

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने अमेरिका में आयोजित जी20 व्यापार मंत्रियों की बैठक के दौरान फ्रांस के विदेश व्यापार और आर्थिक आकर्षण मामलों के मंत्री निकोलस फोरिसिएर के साथ मुलाकात कर दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश सहयोग को और मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा की।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए केंद्रीय मंत्री गोयल ने बताया कि बैठक में भारत और फ्रांस के बीच आर्थिक साझेदारी को नई ऊंचाई देने से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। चर्चा का मुख्य फोकस भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (इंडिया-ईयू एफटीए) को आगे बढ़ाने, भारत में एयरोस्पेस विनिर्माण सहयोग का विस्तार करने, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के एकीकरण और संयुक्त नवाचार पहलों को बढ़ावा देने पर रहा।
उन्होंने कहा कि वह इस वर्ष के अंत में फ्रांसीसी मंत्री के भारत दौरे का स्वागत करने के लिए उत्सुक हैं, जहां दोनों देश द्विपक्षीय आर्थिक एजेंडा को आगे बढ़ाने पर और विस्तार से चर्चा करेंगे।
फ्रांस के अलावा पीयूष गोयल ने कनाडा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनींदर सिद्धू के साथ भी बैठक की। इस दौरान दोनों देशों के बीच प्रस्तावित कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (सीईपीए) पर चल रही वार्ताओं की समीक्षा की गई। दोनों पक्षों ने बातचीत को तेज करने और वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने के साझा लक्ष्य को हासिल करने की प्रतिबद्धता दोहराई।
गोयल ने सऊदी अरब के वाणिज्य मंत्री माजिद बिन अब्दुल्ला अल-कसाबी के साथ भी मुलाकात की। इस बैठक में प्रस्तावित भारत-गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) मुक्त व्यापार समझौते और व्यापार एवं निवेश सहयोग बढ़ाने के अवसरों पर चर्चा हुई।
इसके अलावा, दक्षिण कोरिया के व्यापार मंत्री पार्क जंग-सुंग के साथ हुई बैठक में भारत-दक्षिण कोरिया सीईपीए को अपग्रेड करने के मुद्दे पर विचार-विमर्श किया गया। वार्ता के दौरान संतुलित व्यापार वृद्धि, भारतीय कृषि, फार्मास्यूटिकल और समुद्री उत्पादों की बेहतर बाजार पहुंच तथा भारत में दक्षिण कोरियाई विनिर्माण निवेश बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
ये बैठकें जी20 सम्मेलन के दौरान गोयल की अन्य प्रमुख वैश्विक नेताओं के साथ हुई चर्चाओं के बाद हुईं। उन्होंने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर, यूरोपीय संघ के व्यापार आयुक्त मारोस शेफचोविच, ब्राजील के विदेश मंत्री मॉरो विएरा, मेक्सिको के अर्थव्यवस्था सचिव मार्सेलो एब्रार्ड और पोलैंड के वित्त एवं अर्थव्यवस्था मंत्री आंद्रेज डोमांस्की सहित कई नेताओं से भी मुलाकात की।
इन बैठकों में मुक्त व्यापार समझौते, निवेश प्रवाह, बाजार पहुंच, डब्ल्यूटीओ सुधार, तकनीकी सहयोग और वैश्विक आर्थिक साझेदारी जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इससे स्पष्ट है कि भारत प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं और क्षेत्रीय समूहों के साथ अपने आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहा है।
व्यापार
आईओसीएल में अप्रेंटिस के 58 पदों पर आवेदन जारी, युवाओं के पास 18 अक्टूबर तक अवसर

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) में नौकरी करने से अपने शानदार पेशेवर करियर की शुरुआत करने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए एक बेहतरीन मौका सामने आया है। दरअसल, आईओसीएल ने अपनी बोंगाईगांव रिफाइनरी यूनिट में विभिन्न ट्रेड/विषय के आधार पर अप्रेंटिस के कुल 58 पदों पर पात्र उम्मीदवारों की नियुक्ति के लिए एक आधिकारिक अधिसूचना जारी की है।
आईओसीएल की ओर से जारी 58 रिक्तियों में ट्रेड अप्रेंटिस – अटेंडेंट ऑपरेटर (केमिकल प्लांट), डिसिप्लिन – केमिकल के 36; ट्रेड अप्रेंटिस (बॉयलर), विषय – मैकेनिकल के 14 और टेक्नीशियन अप्रेंटिस, विषय – इंस्ट्रूमेंटेशन के 8 पद शामिल हैं।
अप्रेंटिस के इन सभी पदों के लिए ऑनलाइन माध्यम से आवेदन प्रक्रिया 28 सितंबर के सुबह 10 बजे से जारी है और अप्लाई करने की अंतिम तिथि 18 अक्टूबर तक तय की गई है। एप्लीकेशन फॉर्म भरने के इच्छुक उम्मीदवार एनएपीएस/एनएटीएस पोर्टल पर रजिस्टर्ड होने के बाद आईओसीएल की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर तय अंतिम तिथि की शाम 5 बजे तक या उससे पहले अपनी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी कर सकते हैं।
आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान या विश्वविद्यालय से ट्रेड अप्रेंटिस पदों के लिए 3 वर्ष का बीएससी (गणित, भौतिकी, रसायन विज्ञान या औद्योगिक रसायन विज्ञान) और टेक्नीशियन अप्रेंटिस के लिए इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग/इंस्ट्रूमेंटेशन और इलेक्ट्रॉनिक्स/इंस्ट्रूमेंटेशन और कंट्रोल इंजीनियरिंग/एप्लाइड इलेक्ट्रॉनिक्स और इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग में 3 वर्ष का डिप्लोमा होना चाहिए।
आवेदकों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और अधिकतम आयु 24 वर्ष तय की गई है, जिसकी गणना 30 सितंबर 2026 के आधार पर की जाएगी। वहीं, आरक्षित श्रेणी से आने वाले कैंडिडेट्स को नियमानुसार अधिकतम आयु सीमा में छूट दी जाएगी।
योग्य अभ्यर्थियों का चयन आवेदनों की जांच, मेरिट सूची के आधार पर शॉर्टलिस्टिंग, दस्तावेज सत्यापन और मेडिकल फिटनेस के आधार पर किया जाएगा, जिसके बाद चयनित कैंडिडेट्स को स्टाइपेंड आईओसीएल के नियमों के अनुसार दी जाएगी।
कैंडिडेट्स ध्यान दें कि प्रशिक्षण की अवधि पद के अनुसार 12 से 24 माह के बीच होगी। वहीं, दस्तावेज सत्यापन की संभावित तिथि 4 से 6 नवंबर 2026 होगी।
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