राजनीति
फिलिस्तीन के लिए कांग्रेस का समर्थन मुस्लिम वोटों को लुभाने की कोशिश : सीवोटर सर्वे
इजरायल और हमास के बीच चल रहे संघर्ष पर सीवोटर के एक विशेष सर्वे से पता चलता है कि अधिकांश भारतीयों को लगता है कि कांग्रेस फिलिस्तीन के खुले समर्थन में सामने आई है क्योंकि उसे उम्मीद है कि इसके परिणामस्वरूप आगामी चुनाव में उसे मुस्लिम वोट मिलेंगे।
सर्वे के दौरान उत्तरदाताओं से पूछा गया : आप फिलिस्तीन के लिए कांग्रेस पार्टी के एकतरफा समर्थन को कैसे देखते हैं?
प्रत्येक 10 उत्तरदाताओं में से 3 से अधिक को लगता है कि पार्टी वास्तव में फिलिस्तीन की स्वतंत्रता का समर्थन करती है।
लगभग 54 प्रतिशत उत्तरदाताओं की राय है कि यह रुख भारत में मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए है।
दिलचस्प बात यह है कि विपक्षी समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा (42 प्रतिशत) सोचता है कि कांग्रेस केवल मुस्लिम वोटों को लुभा रही है। जबकि, 40 प्रतिशत को लगता है कि पार्टी वास्तव में फिलिस्तीन की परवाह करती है।
एनडीए समर्थकों के बीच कोई मतभेद नहीं है। एनडीए समर्थक के रूप में खुद की पहचान करने वाले हर चार उत्तरदाताओं में से लगभग तीन को लगता है कि कांग्रेस मुस्लिम वोटों का पीछा कर रही है।
बता दें कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष ने 7 अक्टूबर को भयावह रूप ले लिया, जब 1,000 से अधिक हमास आतंकवादियों ने गाजा सीमा के पास एक संगीत समारोह और इजरायली इलाकों पर हमला कर दिया।
राष्ट्रीय समाचार
विदेश मंत्री जयशंकर स्वतंत्रता दिवस समारोह से पहले ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में हुए शामिल

देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस से पहले ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में देशभर से लोग जुड़ रहे हैं। इसी कड़ी में विदेश मंत्री एस जयशंकर भी गुरुवार को इस अभियान का हिस्सा बने।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आवास पर लहराते राष्ट्रीय ध्वज के साथ एक तस्वीर ‘एक्स’ पर शेयर की। तस्वीर के साथ उन्होंने कैप्शन में लिखा “हर घर तिरंगा।”
विदेश मंत्रालय ने भी जयशंकर की पोस्ट को रीशेयर करते हुए लिखा, “हर दिल में तिरंगा, हर घर में तिरंगा।”
‘हर घर तिरंगा’ अभियान आजादी का अमृत महोत्सव के तहत शुरू किया गया था। इसका मकसद नागरिकों को अपने घरों में राष्ट्रीय ध्वज लगाने और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराने के लिए प्रोत्साहित करना है।
अभियान की सोच यह थी कि अब तक लोगों का राष्ट्रीय ध्वज से रिश्ता ज्यादा औपचारिक और संस्थागत रहा है। इसे व्यक्तिगत गर्व और सम्मान की अभिव्यक्ति बनाने के लिए लोगों को घर-घर तिरंगा लाने के लिए कहा गया। इससे तिरंगा देश से व्यक्तिगत जुड़ाव का प्रतीक बने और साथ ही राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता के प्रति सामूहिक संकल्प को भी दर्शाए।
इस साल ‘हर घर तिरंगा 2026’ को ‘वंदे मातरम के 150 साल’ की भावना को समर्पित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को देशवासियों से 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने और स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की थी।
इंस्टाग्राम रील में पीएम मोदी ने कहा था, “15 अगस्त को गौरव के साथ मनाएं, स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दें, विकसित भारत का संकल्प लें। हर घर तिंरगा, घर घर तिंरगा, हर मन तिंरगा।” उन्होंने कैप्शन में लिखा था, “आइए, हर घर तिरंगा को हर घर का उत्सव बनाएं।”
वहीं, ‘एक्स’ पर पीएम मोदी ने लिखा था, “हमारा तिरंगा हमारा गर्व है और देश के लिए हमेशा सर्वश्रेष्ठ देने की प्रेरणा का स्रोत है।” उन्होंने कहा था, “आइए ‘हर घर तिरंगा’ आंदोलन में उत्साह से भाग लें और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के अपने सामूहिक संकल्प को दोहराएं।”
अंतरराष्ट्रीय समाचार
मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप का बड़ा संकेत, मतदाता पहचान के लिए लगा सकते हैं राष्ट्रीय आपातकाल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह संकेत दिया है कि वह अमेरिका के मध्यावधि चुनावों से पहले मतदाता पहचान और नागरिकता सत्यापन को अनिवार्य बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल घोषित करने की संभावना पर विचार कर सकते हैं।
ट्रंप ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। उनके इस बयान ने चुनावी नियमों, मतदाता अधिकारों और संघीय सरकार की शक्तियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
ट्रंप ने ‘रियल अमेरिकाज वॉयस’ पर वेन एलिन रूट को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “इससे भी ज्यादा असामान्य चीजें पहले हो चुकी हैं। फिलहाल मैं इतना ही कहूंगा।”
रूट ने ट्रंप से कहा कि अगर सीनेट ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को मंजूरी नहीं देती, तो उन्हें आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए। रूट ने सुझाव दिया कि ऐसी शक्तियों के जरिए फोटो पहचान पत्र, नागरिकता का प्रमाण अनिवार्य किया जा सकता है और डाक के जरिए भेजे जाने वाले मेल-इन बैलेट पर भी सीमाएं लगाई जा सकती हैं।
ट्रंप ने इस प्रस्ताव का साफ तौर पर समर्थन नहीं किया, लेकिन उन्होंने बार-बार कहा कि मध्यावधि चुनावों से पहले चुनावी नियमों पर सीनेट को कार्रवाई करनी चाहिए।
ट्रंप ने कहा, “सीनेट को ‘सेव अमेरिका एक्ट’ पर आगे बढ़ना होगा। मुझे सच में लगता है कि ऐसा होना चाहिए, क्योंकि लोग इसकी उम्मीद कर रहे हैं और यह जरूरी भी है।”
उन्होंने आगे कहा कि हम चाहते हैं कि नागरिकता का प्रमाण हो। और मतदाता पहचान पत्र भी होना चाहिए।
ट्रंप ने दावा किया कि कुछ रिपब्लिकन सीनेटर इन उपायों का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने हाउस स्पीकर माइक जॉनसन की तारीफ की और कहा कि प्रतिनिधि सभा इस कानून को पांच बार मंजूर कर चुकी है, लेकिन यह हर बार सीनेट में जाकर अटक जाता है।
राष्ट्रपति ने डाक से मतदान की व्यवस्था की भी फिर से आलोचना की। उन्होंने बिना कोई सबूत दिए दावा किया कि यह प्रणाली धोखाधड़ी के लिए संवेदनशील है और खास तौर पर कैलिफोर्निया की चुनावी व्यवस्था पर निशाना साधा। ट्रंप ने कहा कि मेल-इन बैलेट्स बहुत भ्रष्ट हैं।
उन्होंने कहा कि कैलिफोर्निया चुनावों के मामले में सबसे भ्रष्ट जगहों में से एक है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि कुछ क्षेत्रों में रिपब्लिकन मतदाताओं को मतपत्र प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
रूट ने ट्रंप से कहा कि चुनाव संबंधी यह कानून शायद सीनेट से मंजूरी न पा सके। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस इसे पारित कर भी दे, तब भी इसे तुरंत कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
इसके बाद रूट ने ट्रंप से आग्रह किया कि वे अगले एक महीने के भीतर राष्ट्रीय सुरक्षा आपातकाल घोषित करें। रूट का दावा था कि इससे प्रशासन सीनेट की मंजूरी का इंतजार किए बिना फोटो पहचान पत्र, नागरिकता प्रमाण की अनिवार्यता और मेल-इन वोटिंग पर सीमाएं लागू कर सकेगा।
ट्रंप की प्रतिक्रिया ने इस संभावना को जिंदा रखा, लेकिन उन्होंने अपनी सरकार की ओर से इस रास्ते को अपनाने की कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं जताई। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस इस कानून को पारित कर देती है तो इसे अदालत में चुनौती देना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।
इंटरव्यू में जिस चुनावी प्रस्ताव पर चर्चा हुई, वह रिपब्लिकन पार्टी के उस व्यापक प्रयास का हिस्सा है जिसके तहत संघीय चुनावों में वोटर पंजीकरण करवाते समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देना अनिवार्य किया जाए।
समर्थकों का कहना है कि इससे चुनावी सुरक्षा और मजबूत होगी। वहीं विरोधियों का तर्क है कि जिन योग्य नागरिकों के पास जरूरी दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें वोटर पंजीकरण कराने में परेशानी हो सकती है।
अमेरिकी संघीय कानून पहले से ही गैर-नागरिकों को संघीय चुनावों में मतदान करने से रोकता है। अमेरिका में चुनाव मुख्य रूप से राज्य और स्थानीय प्रशासन की ओर से कराए जाते हैं, जो अमेरिकी संविधान और संघीय कानूनों द्वारा तय ढांचे के तहत काम करते हैं।
राजनीति
स्थिर रोजगार बाजार ने 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के पीछे की सच्चाई को किया उजागर : शिवसेना (यूबीटी)

शिवसेना (यूबीटी) ने गुरुवार को दावा किया कि सत्तारूढ़ प्रशासन वैश्विक अस्थिरता के बावजूद मजबूत आर्थिक और औद्योगिक विकास को बनाए रखने का बार-बार दावा करता है लेकिन संसद में पेश किए गए सरकार के आधिकारिक आंकड़ों ने इन दावों को गंभीर चुनौती दी है।
शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि सांख्यिकी मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में रोजगार के अवसरों में पिछले एक वर्ष के दौरान न तो बढ़ोतरी हुई और न ही कमी आई। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़े बताते हैं कि देश का रोजगार बाजार पूरी तरह स्थिर बना हुआ है।
शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि मंत्रालय की रिपोर्ट देश में रोजगार की मौजूदा स्थिति से जुड़े कई महत्वपूर्ण संकेतक सामने रखती है। मौजूदा तिमाही में बेरोजगारी दर 5.5 प्रतिशत है जबकि एक साल पहले यह 5.6 प्रतिशत थी। वेतनभोगी कर्मचारियों की हिस्सेदारी जून में 51.4 प्रतिशत रही, जो पिछले वर्ष जून में दर्ज 51.2 प्रतिशत से मामूली अधिक है। महिला श्रमिकों की हिस्सेदारी भी 32 प्रतिशत से बढ़कर 32.7 प्रतिशत हुई है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में लगातार गिरावट जारी है।
संपादकीय में कहा गया कि सरकार के समर्थक जहां स्थिर बेरोजगारी दर को अर्थव्यवस्था की मजबूती और लचीलेपन का संकेत बता रहे हैं, वहीं आलोचक शिक्षित युवाओं के बीच गहराते संकट की ओर ध्यान दिला रहे हैं। इसमें कहा गया कि भारत में स्नातक युवाओं की संख्या बढ़कर 6.30 करोड़ हो गई है। चार दशकों में यह संख्या 13 गुना बढ़ी है, जबकि बेरोजगार स्नातकों की संख्या इसी अवधि में 16 गुना बढ़ गई है। संपादकीय के अनुसार, वर्तमान में हर 10 स्नातक युवाओं में से छह बेरोजगार हैं।
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए संपादकीय में कहा गया कि बेरोजगार युवाओं में से हर तीन में दो के पास डिग्री है। यानी उनके पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता तो है लेकिन रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हैं। इसमें दावा किया गया कि नौकरी की तलाश कर रहे हर 1,000 युवाओं में केवल 12 को स्थायी रोजगार मिल पाता है।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने कहा कि सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़े केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया के हालिया दावे से सीधे तौर पर विरोधाभास पैदा करते हैं। मांडविया ने कहा था कि सरकार ने अपने 12 साल के कार्यकाल में हर साल 1.7 करोड़ नए रोजगार पैदा किए हैं। पार्टी ने कहा कि ताजा आंकड़े प्रयागराज में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी की ओर से युवाओं में बेरोजगारी को लेकर उठाई गई चिंताओं को भी सही ठहराते हैं।
ठाकरे गुट ने आरोप लगाया कि जो सरकार ‘पांच ट्रिलियन’ की अर्थव्यवस्था का दावा करती है, वह पिछले एक वर्ष में एक भी नया रोजगार पैदा करने में विफल रही है। पार्टी ने कहा कि सरकार हर साल दो करोड़ रोजगार पैदा करने के अपने वादे को पूरा करने में नाकाम रही है और इसके कारण लाखों योग्य स्नातकों का भविष्य अनिश्चितता में है।
संपादकीय में कहा गया, “यह मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का ‘आईना’ है और इसे उसी के एक मंत्रालय ने दिखाया है।”
संपादकीय में केंद्रीय गृह मंत्री के उस कथित सुझाव पर भी निशाना साधा गया, जिसमें रोजगार नहीं मिलने पर पकौड़े तलने की बात कही गई थी। साथ ही प्रधानमंत्री की युवाओं को संबोधित करने वाली “हैलो फ्रेंड्स” रील का जिक्र करते हुए कहा गया कि सरकार को इस आईने में खुद को देखना चाहिए।
शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावों के बावजूद रोजगार सृजन के मोर्चे पर जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है और शिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त तथा स्थायी रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती लगातार गहरी होती जा रही है।
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