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Saturday,24-October-2026
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आईसीआईसीआई बैंक ने आरबीआई की एफसीएनआर(बी) स्वैप सुविधा के तहत 17.88 अरब डॉलर जुटाए

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आईसीआईसीआई बैंक ने बुधवार को एक्सचेंज फाइलिंग में बताया कि उसने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की विशेष डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत विदेशी मुद्रा अनिवासी (एफसीएनआर(बी)) जमा के जरिए करीब 17.88 अरब डॉलर जुटाए हैं।

बैंक ने बताया कि जुटाई गई राशि में से ऐसी जमाओं के बदले बैंक की अंतरराष्ट्रीय शाखाओं और सहायक कंपनियों द्वारा दिए गए ऋण की राशि करीब 9 अरब डॉलर रही। वहीं, ऐसी जमाओं से समर्थित ऋण के बदले बैंक द्वारा अन्य ऋणदाताओं को जारी किए गए स्टैंडबाय लेटर ऑफ क्रेडिट (एसबीएलसी) करीब 3.63 अरब डॉलर के रहे।

हालांकि, रिपोर्टों में दावा किया गया है कि आरबीआई की डॉलर जमा योजना के जरिए 100 अरब डॉलर से अधिक की राशि जुटाई गई है।

इसके अलावा, आईसीआईसीआई बैंक ने बताया कि उसने जुलाई और अगस्त 2026 के दौरान कुल 3.55 अरब डॉलर के अमेरिकी डॉलर-मूल्य वाले बॉन्ड जारी किए हैं।

आरबीआई ने रुपए पर दबाव के बीच विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने के लिए 8 जून को यह सुविधा शुरू की थी।

केंद्रीय बैंक के अनुसार, 21 अगस्त तक अधिकृत डीलर बैंकों ने इस योजना के तहत 72.848 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह जुटाया था। इसमें एफसीएनआर(बी) जमा की हिस्सेदारी 65.397 अरब डॉलर थी।

वहीं, 21 अगस्त तक इस सुविधा के तहत ईसीबी और ओएफसीबी के जरिए 7.451 अरब डॉलर का अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्रवाह आया था। ईसीबी और ओएफसीबी के लिए यह सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक खुली रहेगी।

सरकार ने अगस्त में कहा था कि इस योजना से विदेशी मुद्रा के प्रवाह में तेज वृद्धि हुई है और इसे भारत द्वारा अब तक की गई सबसे बड़ी और सबसे तेज विदेशी मुद्रा जुटाने की कवायद बताया था। यह 2013 की एफसीएनआर(बी) स्वैप योजना के स्तर को भी पार कर गई है।

आरबीआई ने शुरुआत में घोषणा की थी कि एफसीएनआर(बी) विंडो 30 सितंबर तक खुली रहेगी, लेकिन उत्साहजनक प्रतिक्रिया और पर्याप्त विदेशी मुद्रा जुटाए जाने का हवाला देते हुए इसे 31 अगस्त को ही बंद कर दिया गया।

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वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी भारत की आर्थिक वृद्धि दर लगातार मजबूत बनी हुई है: रिपोर्ट

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वैश्विक स्तर पर आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने की आशंकाओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव, व्यापारिक अनिश्चितताओं और सख्त वित्तीय परिस्थितियों के बावजूद भारत ने मजबूत आर्थिक वृद्धि बनाए रखी है और वह दुनिया की प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे बना हुआ है।

तंजानिया के समाचार प्रकाशन द गार्जियन (आईपीपी मीडिया) में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, प्रमुख वैश्विक संस्थानों द्वारा भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमानों में लगातार ऊपर की ओर संशोधन किया जाना इस बात का संकेत है कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण ग्रोथ इंजन बन चुका है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि निर्यात विविधीकरण, डिजिटल परिवर्तन, राजकोषीय अनुशासन और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कारक भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत कर रहे हैं और दीर्घकालिक तथा समावेशी आर्थिक विकास को समर्थन दे रहे हैं।

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत की विकास दर का अनुमान 2026 और 2027 दोनों वर्षों के लिए बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करता दिखाई देता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रदर्शन मजबूत घरेलू मांग और बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता का परिणाम है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसका विशाल और विविधतापूर्ण घरेलू बाजार है। घरेलू उपभोग, निजी निवेश और बुनियादी ढांचे पर सार्वजनिक खर्च मिलकर आर्थिक गतिविधियों का व्यापक आधार तैयार करते हैं। यही कारण है कि जब वैश्विक मांग कमजोर होती है या अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ती है, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत सुरक्षित बनी रहती है।

निजी उपभोग ऑटोमोबाइल, आवास, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवा और वित्तीय सेवाओं जैसे कई क्षेत्रों को गति दे रहा है। बढ़ती आय, शहरीकरण, डिजिटल पहुंच और बेहतर कनेक्टिविटी मांग बढ़ाने के साथ-साथ निवेश एवं नवाचार को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के तेजी से विस्तार ने देश की आर्थिक गतिविधियों की प्रकृति बदल दी है। डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और प्रौद्योगिकी आधारित सरकारी सेवाओं ने लेन-देन की लागत घटाई है और बाजार तक पहुंच को आसान बनाया है। इससे छोटे व्यवसायों को भी अपने पारंपरिक भौगोलिक दायरे से बाहर ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिला है।

इसके अलावा परिवहन, लॉजिस्टिक्स, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़े बुनियादी ढांचे में निवेश भारत की आर्थिक मजबूती को और बढ़ा रहा है। इससे लागत कम हो रही है, बाजारों तक पहुंच का विस्तार हो रहा है और वस्तुओं तथा सेवाओं की आवाजाही अधिक कुशल बन रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026-27 में भारत का निर्यात 1 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। साथ ही 2030 तक इसे 2 ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। विनिर्माण क्षेत्र ने भी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 9.2 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने अपनी मजबूत घरेलू आर्थिक बुनियाद और सक्रिय नीतिगत प्रबंधन के दम पर वैश्विक अस्थिरता का सफलतापूर्वक सामना किया है। यही अनुकूलन क्षमता और संरचनात्मक मजबूती आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक विकास की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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एएसटीपीएल और संस्थापक पर सेबी का बड़ा एक्शन, 546 करोड़ रुपए रिफंड के साथ 11.5 करोड़ रुपए का लगाया जुर्माना

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सेबी यानी पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (एसईबीआई) ने अवधूत साठे ट्रेडिंग एकेडमी प्राइवेट लिमिटेड (एएसटीपीएल) और इसके संस्थापक अवधूत साठे के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए निवेशकों और प्रतिभागियों से जुटाए गए 546.17 करोड़ रुपए लौटाने का आदेश दिया है। सेबी ने पाया कि कंपनी और उसके संस्थापक बिना आवश्यक पंजीकरण के निवेश सलाहकार और रिसर्च एनालिस्ट से जुड़ी गतिविधियां संचालित कर रहे थे।

अपने अंतिम आदेश में सेबी ने अवधूत साठे और उनकी कंपनी को प्रतिभूति बाजार से दो वर्षों के लिए या रिफंड संबंधी निर्देशों का पालन होने तक, जो भी अधिक हो, प्रतिबंधित कर दिया है। वहीं कंपनी के निदेशक अवधूत साठे को छह महीने के लिए बाजार से दूर रहने का आदेश दिया गया है।

सेबी ने निर्देश दिया है कि कंपनी और अवधूत साठे आदेश प्राप्त होने के पांच महीने के भीतर पूरी 546.17 करोड़ रुपए की राशि एक विशेष बैंक खाते में जमा करें। इसके साथ ही उन्हें 30 दिनों के भीतर अंग्रेजी, हिंदी और एक व्यापक रूप से प्रसारित स्थानीय भाषा के समाचार पत्र में विज्ञापन प्रकाशित कर निवेशकों को रिफंड प्रक्रिया की जानकारी देनी होगी।

नियामक ने स्पष्ट किया है कि निवेशकों को धनवापसी केवल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर या अन्य बैंकिंग माध्यमों से की जाएगी, ताकि भुगतान का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहे और लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित की जा सके।

यदि सभी दावेदारों को भुगतान के बाद कोई राशि बचती है, तो उसे सेबी को सौंपना होगा। यह राशि एक वर्ष तक एस्क्रो खाते में रखी जाएगी, ताकि पात्र निवेशकों और शिकायतकर्ताओं को भुगतान किया जा सके। इसके बाद भी यदि धन शेष रहता है तो उसे निवेशक संरक्षण एवं शिक्षा कोष (आईपीईएफ) में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

सेबी ने कंपनी, अवधूत साठे और गौरी साठे पर कुल 11.5 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इसमें कंपनी पर 6 करोड़ रुपए, अवधूत साठे पर 4 करोड़ रुपए और गौरी साठे पर 1.5 करोड़ रुपए का दंड शामिल है। यह राशि आदेश प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर जमा करनी होगी।

सेबी ने अपने आदेश में कहा है कि जब तक पूरी राशि जमा नहीं की जाती, तब तक संबंधित पक्षों के बैंक खातों से डेबिट लेनदेन पर रोक रहेगी।

यह कार्रवाई सेबी की जांच के बाद की गई, जिसमें पाया गया कि एएसटीपीएल और उसके संस्थापक केवल शेयर बाजार की शिक्षा देने तक सीमित नहीं थे, बल्कि निवेशकों को विशिष्ट शेयरों में खरीद और बिक्री की सलाह भी दे रहे थे। जांच में सामने आया कि कंपनी कथित तौर पर एंट्री और एग्जिट स्तर, स्टॉप लॉस और शेयरों की कीमतों की दिशा से जुड़े सुझाव दे रही थी, जबकि इसके लिए आवश्यक नियामकीय पंजीकरण उसके पास नहीं था।

सेबी ने यह भी पाया कि कंपनी अपने प्रचार सामग्री में चुनिंदा लाभदायक सौदों को प्रमुखता से दिखा रही थी और प्रतिभागियों को ऊंचे रिटर्न का दावा कर आकर्षित कर रही थी। मार्च 2024 में प्रशासनिक चेतावनी मिलने के बाद भी इन गतिविधियों में बदलाव नहीं किया गया, जिसके बाद नियामक ने सख्त कार्रवाई का फैसला लिया।

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एलआरएस के तहत अगस्त में विदेशी बाजारों में भारतीयों का निवेश हुआ दोगुना, 321 मिलियन डॉलर के पार पहुंचा: आरबीआई डेटा

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विदेशी शेयर और बॉन्ड बाजारों में निवेश को लेकर भारतीयों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अक्टूबर 2026 बुलेटिन के अनुसार, उदारीकृत प्रेषण योजना (एलआरएस) के तहत अगस्त 2026 में भारतीयों द्वारा विदेशी इक्विटी और डेट बाजारों में किया गया निवेश सालाना आधार पर 111 प्रतिशत बढ़कर 321.53 मिलियन डॉलर पहुंच गया, जो एक वर्ष पहले अगस्त 2025 में 152.18 मिलियन डॉलर था।

हालांकि मासिक आधार पर इस श्रेणी में निवेश में 7 प्रतिशत की मामूली गिरावट दर्ज की गई। इससे पहले जून 2026 में विदेशी इक्विटी और डेट में निवेश 460 मिलियन डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया था।

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान एलआरएस के तहत कुल बाहरी प्रेषण 28.98 अरब डॉलर रहा। अगस्त 2026 में विदेशी इक्विटी और डेट निवेश कुल एलआरएस प्रेषण का लगभग 11.7 प्रतिशत हिस्सा रहा, जबकि एक वर्ष पहले इसकी हिस्सेदारी केवल 5.8 प्रतिशत थी। इससे स्पष्ट है कि वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारतीय निवेशकों की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है।

कुल एलआरएस प्रेषण अगस्त 2026 में बढ़कर 2.74 अरब डॉलर हो गया, जो अगस्त 2025 में 2.64 अरब डॉलर था। यह सालाना आधार पर 3.6 प्रतिशत और जुलाई 2026 की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत अधिक है। जुलाई 2026 में कुल बाहरी प्रेषण 2.58 अरब डॉलर दर्ज किया गया था।

यात्रा अब भी एलआरएस के तहत सबसे बड़ा खर्च का क्षेत्र बना हुआ है। अगस्त 2026 में विदेश यात्रा पर भारतीयों का खर्च 1.63 अरब डॉलर रहा, जो कुल बाहरी प्रेषण का करीब 59 प्रतिशत था। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1 प्रतिशत अधिक और जुलाई की तुलना में 11.4 प्रतिशत ज्यादा रहा।

विशेष रूप से कारोबारी यात्रा पर होने वाला खर्च जुलाई के 10.9 मिलियन डॉलर से बढ़कर अगस्त में 51 मिलियन डॉलर पहुंच गया, यानी इसमें लगभग पांच गुना उछाल दर्ज किया गया।

अन्य प्रमुख श्रेणियों में उपहार के रूप में भेजी गई राशि बढ़कर 215.72 मिलियन डॉलर हो गई, जबकि निकट संबंधियों के भरण-पोषण के लिए भेजी गई राशि 275.43 मिलियन डॉलर रही। विदेशों में अचल संपत्ति की खरीद के लिए 39.59 मिलियन डॉलर भेजे गए, जबकि विदेशी बैंकों में जमा (डिपॉजिट) के लिए 50.78 मिलियन डॉलर का प्रेषण दर्ज किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, चिकित्सा उपचार के लिए विदेश भेजी गई राशि में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अगस्त 2026 में मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए प्रेषण 21.3 प्रतिशत बढ़कर 4.84 मिलियन डॉलर पहुंच गया।

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