व्यापार
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और बेहतर तिमाही नतीजों से घरेलू बाजार ने दर्ज की लगातार दूसरी हफ्ते बढ़त, निवेशकों का भरोसा मजबूत
कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट और वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के उम्मीद से बेहतर कॉरपोरेट नतीजों ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया, जिसके चलते भारतीय शेयर बाजार ने लगातार दूसरे सप्ताह बढ़त दर्ज की है। हालांकि सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन मुनाफावसूली देखने को मिली, फिर भी प्रमुख सूचकांक साप्ताहिक आधार पर सकारात्मक बढ़त के साथ बंद हुए।
सप्ताह के दौरान निफ्टी 0.77 प्रतिशत मजबूत हुआ, लेकिन शुक्रवार को इसमें 0.27 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 24,570 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं सेंसेक्स 455 अंक यानी 0.58 प्रतिशत गिरकर 78,499 पर बंद हुआ। इसके बावजूद पूरे सप्ताह में सेंसेक्स ने 0.52 प्रतिशत की बढ़त हासिल की।
वहीं, व्यापक बाजार ने मुख्य सूचकांकों से बेहतर प्रदर्शन किया। सप्ताह के दौरान निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.87 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 2.73 प्रतिशत उछल गया। यह दर्शाता है कि निवेशकों का रुझान बड़े शेयरों के साथ-साथ मध्यम और छोटी कंपनियों की ओर भी बढ़ रहा है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, स्मॉल-कैप शेयरों का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा। मजबूत तिमाही नतीजों और कंपनियों से जुड़े सकारात्मक घटनाक्रमों के चलते निवेशकों का रुझान इस श्रेणी की कंपनियों की ओर बना रहा। दूसरी ओर, पीएसयू बैंकिंग शेयरों में बेहतर बुनियादी स्थिति और मजबूत वित्तीय प्रदर्शन के कारण अच्छी खरीदारी देखने को मिली।
मेटल सेक्टर को देश में मजबूत मांग और आर्थिक विकास की बेहतर संभावनाओं का फायदा मिला। वहीं ऑटोमोबाइल कंपनियों के शेयरों में भी तेजी रही, क्योंकि बाजार को उम्मीद है कि आगामी त्योहारी सीजन में वाहनों की मांग मजबूत रहेगी।
सप्ताह की शुरुआत कुछ उतार-चढ़ाव के साथ हुई थी, जिसका कारण फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफएंडओ) सेगमेंट में नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (सीएएस) व्यवस्था का लागू होना था। हालांकि निवेशकों और बाजार प्रतिभागियों के नई व्यवस्था के अनुरूप ढलने के बाद बाजार में स्थिरता लौट आई।
विश्लेषकों का कहना है कि बाजार की धारणा को सबसे अधिक समर्थन कच्चे तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट से मिला। तेल सस्ता होने से भारत के लिए महंगाई और आयात लागत संबंधी चिंताओं में कमी आई है। इससे आर्थिक परिदृश्य बेहतर हुआ और निवेशकों का विश्वास बढ़ा।
वैश्विक स्तर पर भी बाजार को सहारा मिला। अमेरिका के श्रम बाजार से जुड़े अपेक्षाकृत नरम आंकड़ों के बाद निकट भविष्य में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की संभावना कम हुई है। इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर दोनों में नरमी आई, जिससे उभरते बाजारों, विशेषकर भारत, के लिए निवेश माहौल बेहतर हुआ।
घरेलू मोर्चे पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया। केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति में कोई बदलाव नहीं किया, साथ ही विकास दर (जीडीपी ग्रोथ) का अनुमान थोड़ा बढ़ाया और महंगाई का अनुमान कुछ कम किया, जिससे यह संदेश गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में बनी हुई है।
इसके अलावा, जारी तिमाही नतीजों के सीजन ने भी बाजार को मजबूती दी है। अधिकांश कंपनियों के परिणाम बाजार की अपेक्षाओं से बेहतर रहे हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में खरीदारी बढ़ी और निवेशकों का विश्वास मजबूत हुआ।
आगे की दिशा को लेकर बाजार की नजर अब अमेरिका के रोजगार और महंगाई आंकड़ों पर रहेगी, जिनसे फेडरल रिजर्व की आगामी नीतियों के बारे में संकेत मिल सकते हैं। वहीं घरेलू स्तर पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई), थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) और बैंक ऋण वृद्धि (क्रेडिट ग्रोथ) के आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति और महंगाई के रुख को समझने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं और कंपनियों के नतीजे मजबूत बने रहते हैं, तो आने वाले हफ्तों में भारतीय शेयर बाजार को और समर्थन मिल सकता है।
राष्ट्रीय समाचार
33.60 लाख करोड़ रुपए की 1,731 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर सरकार की नजर, कनेक्टिविटी क्षेत्र को सबसे ज्यादा प्राथमिकता: सरकार

केंद्र सरकार वर्तमान में देशभर में चल रही 1,731 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की निगरानी कर रही है, जिनकी संशोधित कुल लागत 33.60 लाख करोड़ रुपए है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) के अनुसार, अगस्त 2026 तक ये परियोजनाएं 17 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के तहत संचालित की जा रही हैं।
मंत्रालय ने बताया कि इन परियोजनाओं पर अब तक 16.33 लाख करोड़ रुपए का खर्च किया जा चुका है, जो कुल संशोधित परियोजना लागत का लगभग 48.59 प्रतिशत है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि विभिन्न क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स) के क्रियान्वयन में लगातार प्रगति हो रही है।
आंकड़ों के अनुसार, बड़ी संख्या में परियोजनाएं उन्नत चरण में पहुंच चुकी हैं। कुल 647 परियोजनाओं ने 80 प्रतिशत से अधिक भौतिक प्रगति हासिल कर ली है, जबकि 312 परियोजनाएं वित्तीय दृष्टि से 80 प्रतिशत से अधिक पूरी हो चुकी हैं। मंत्रालय का कहना है कि परियोजनाएं शुरुआती और अंतिम दोनों चरणों में संतुलित रूप से मौजूद हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि एक तरफ नई परियोजनाएं शुरू हो रही हैं तो दूसरी ओर कई परियोजनाएं पूर्णता के करीब पहुंच चुकी हैं।
सरकार ने बताया कि केंद्रीय क्षेत्र की अवसंरचना परियोजनाओं की निगरानी के लिए पैमाना (पीएआईएमएएनए) प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जा रहा है, जिससे विभिन्न मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय, समय पर समीक्षा और डेटा-आधारित निर्णय लेने में मदद मिल रही है।
क्षेत्रवार आंकड़ों पर नजर डालें तो परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में सबसे अधिक 1,191 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनकी संशोधित अनुमानित लागत 16.05 लाख करोड़ रुपए है, जो दर्शाता है कि सरकार कनेक्टिविटी-आधारित विकास को विशेष प्राथमिकता दे रही है।
कुल 1,731 परियोजनाओं में 715 मेगा परियोजनाएं शामिल हैं, जिनमें प्रत्येक की लागत 1,000 करोड़ रुपए या उससे अधिक है। इनका मूल लागत मूल्य 25.89 लाख करोड़ रुपए है। वहीं 1,016 प्रमुख परियोजनाएं ऐसी हैं जिनकी लागत 150 करोड़ रुपए से 1,000 करोड़ रुपए के बीच है और उनकी कुल लागत 4.83 लाख करोड़ रुपए है।
मंत्रालय के अनुसार, भौतिक और वित्तीय प्रगति के आंकड़े बड़े पैमाने पर एक-दूसरे के अनुरूप हैं। शुरुआती चरण में वित्तीय व्यय अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है क्योंकि परियोजनाओं में प्रारंभिक निवेश अधिक होता है, जबकि अंतिम चरण में भौतिक प्रगति वित्तीय प्रगति से आगे निकल जाती है, जो निर्माण कार्यों के समापन को दर्शाती है।
मंत्रालयवार आंकड़ों में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय सबसे आगे है। इसके अंतर्गत 982 परियोजनाएं (57 प्रतिशत) चल रही हैं, जो कुल परियोजनाओं का लगभग 57 प्रतिशत हैं। इनकी संशोधित लागत 9.52 लाख करोड़ रुपए है, जो कुल लागत का लगभग 28 प्रतिशत है। इससे राष्ट्रीय अवसंरचना विकास में सड़क क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका स्पष्ट होती है।
वहीं रेल मंत्रालय के पास 147 परियोजनाएं (8 प्रतिशत) हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 3.14 लाख करोड़ रुपए (9 प्रतिशत) है। दूसरी ओर कोयला मंत्रालय के तहत 122 परियोजनाएं (7 प्रतिशत) चल रही हैं, जिनकी लागत 2.22 लाख करोड़ रुपए (7 प्रतिशत) है।
व्यापार
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अगस्त में भारत के इंजीनियरिंग निर्यात में करीब 25 प्रतिशत की हुई वृद्धि

भारत के इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात ने चालू वित्त वर्ष में लगातार पांचवें महीने मजबूत वृद्धि दर्ज की है। इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (ईईपीसी) इंडिया ने शुक्रवार को बताया कि अगस्त में देश का इंजीनियरिंग निर्यात सालाना आधार पर 24.86 प्रतिशत बढ़कर 12.32 अरब डॉलर पहुंच गया।
उद्योग संगठन ईईपीसी इंडिया ने कहा कि भारत के इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यात शीर्ष 25 प्रमुख बाजारों में से अधिकांश में बढ़ा है। केवल संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब में निर्यात प्रभावित रहा, जिसका प्रमुख कारण पश्चिम एशिया संकट से पैदा हुई लॉजिस्टिक्स चुनौतियां थीं। इसके बावजूद अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख बाजारों में मांग मजबूत बनी रही।
अमेरिका को इंजीनियरिंग निर्यात अगस्त में 31 प्रतिशत बढ़कर 2.20 अरब डॉलर पहुंच गया। वहीं चीन को होने वाला निर्यात पिछले वर्ष अगस्त के 242.50 मिलियन डॉलर से बढ़कर 424.65 मिलियन डॉलर हो गया, जो लगभग 75 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।
ब्रिटेन को इंजीनियरिंग निर्यात में 28.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दक्षिण कोरिया को निर्यात दोगुने से अधिक बढ़कर 466 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। वहीं इंडोनेशिया को निर्यात में 182 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि दर्ज करते हुए यह 292.30 मिलियन डॉलर रहा।
ओमान को होने वाला इंजीनियरिंग निर्यात लगभग चार गुना बढ़कर 198 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। उद्योग संगठन के अनुसार, जून 2026 में लागू हुए भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा।
अगस्त के दौरान इंजीनियरिंग क्षेत्र के 34 में से 31 उत्पाद समूहों ने सालाना आधार पर सकारात्मक वृद्धि दर्ज की, जो निर्यात वृद्धि के व्यापक आधार को दर्शाता है।
ईईपीसी इंडिया के अध्यक्ष पंकज चड्ढा ने कहा, “प्रमुख व्यापार मार्गों में व्यवधान और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद हाल के महीनों में इंजीनियरिंग निर्यात का प्रदर्शन यह दिखाता है कि वैश्विक बाजारों में ‘ब्रांड इंडिया’ पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है।”
उन्होंने कहा कि यह सुधार इस बात का संकेत है कि वैश्विक मांग की परिस्थितियां भारतीय इंजीनियरिंग निर्यातकों के लिए अधिक अनुकूल हो रही हैं। ऐसे में भारत को अपने प्रमुख बाजारों में उपस्थिति और मजबूत करनी चाहिए, नए निर्यात गंतव्यों की तलाश करनी चाहिए और सप्लाई चेन को अधिक लचीला बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
अप्रैल से अगस्त 2026-27 की अवधि में भारत का कुल इंजीनियरिंग निर्यात 58.70 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 49.10 अरब डॉलर था। इस प्रकार पांच महीनों में इंजीनियरिंग निर्यात में 19.55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
व्यापार
मिश्रित वैश्विक संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार हरे निशान में खुला; सेंसेक्स 73,700 के करीब

भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में हल्की मजबूती के साथ खुला। सुबह 9:17 पर सेंसेक्स 151 अंक या 0.20 प्रतिशत की तेजी के साथ 73,725 और निफ्टी 26 अंक या 0.11 प्रतिशत की बढ़त के साथ 23,091 पर था।
शुरुआती कारोबार में सूचकांकों में भी मिलाजुला कारोबार हो रहा था। निफ्टी रियल्टी और निफ्टी ऑटो टॉप गेनर्स थे। इसके अलावा, निफ्टी प्राइवेट बैंक, निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज, निफ्टी पीएसयू बैंक, निफ्टी मेटल, निफ्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग और निफ्टी मीडिया भी हरे निशान में थे। दूसरी तरफ निफ्टी आईटी, निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, निफ्टी ऑयल एंड गैस और निफ्टी कमोडिटीज लाल निशान में थे।
लार्जकैप के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप भी हल्की तेजी के साथ कारोबार कर रहे थे। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 10 अंक की मजबूती के साथ 61,001 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 5 अंक की मामूली तेजी के साथ 19,688 पर था।
सेंसेक्स पैक में एलएंडटी, एक्सिस बैंक, एमएंडएम, पावर ग्रिड, एसबीआई, बजाज फाइनेंस, आईसीआईसीआई बैंक, इंडिगो, एशियन पेंट्स, भारती एयरटेल, बजाज फिनसर्व, कोटक महिंद्रा बैंक, मारुति सुजुकी, एचसीएल टेक और टाइटन गेनर्स थे। इन्फोसिस, टीसीएस, टेक महिंद्रा, एचयूएल, इटरनल, एनटीपीसी, टाटा स्टील, सन फार्मा, ट्रेंट और आईटीसी लूजर्स थे।
वैश्विक बाजार में मिलाजुला कारोबार हो रहा था। टोक्यो और बैंकॉक हरे निशान में थे, जबकि ऑस्ट्रेलिया और जकार्ता लाल निशान में थे। अमेरिकी शेयर बाजार गुरुवार को लाल निशान में बंद हुए थे, जिसमें मुख्य सूचकांक डाओ जोन्स 0.31 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ।
जानकारों के मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और लगातार बनी हुई महंगाई के कारण अक्टूबर में फेड द्वारा ब्याज दरें फिर से बढ़ाने की संभावना बढ़ गई है। इससे बाजार के लिए मुश्किलें बढ़ रही हैं, जिससे बाजार में बड़ी तेजी आने की संभावना कम हो गई है। अब बाजार में तेजी तभी आ सकती है जब कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आए। इसलिए, कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले बदलावों पर नजर रखें। लंबे समय के लिए निवेश करने वाले निवेशक बाजार की मौजूदा कमजोरी का फायदा उठाकर अच्छे फंडामेंटल वाले शेयरों—खासकर लार्जकैप शेयरों—को धीरे-धीरे खरीद सकते हैं, जो अभी आकर्षक कीमतों पर मिल रहे हैं।
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