मनोरंजन
‘सा रे गा मा पा’: अल्बर्ट काबो लेप्चा ने जीती ट्रॉफी, बतायी हिंदी भाषा के चलते मुश्किल सफर की कहानी
सिंगिंग रियलिटी शो ‘सा रे गा मा पा 2023’ के ग्रैंड फिनाले में अल्बर्ट काबो लेप्चा को विजेता घोषित किया गया। अल्बर्ट पश्चिम बंगाल के कलिम्पोंग के रहने वाले है। उन्होंने हिंदी भाषा के चलते अपने संघर्षों के बारे में खुलकर बात की और बताया कि यह उनके लिए बहुत मुश्किल था।
27 वर्षीय अल्बर्ट ने कभी म्यूजिक के लिए प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं ली। टॉप-5 फाइनलिस्ट अल्बर्ट, निष्ठा शर्मा, स्नेहा भट्टाचार्य, रानिता बनर्जी और सोनिया गजमेर थे। निष्ठा और रणिता सीजन के फर्स्ट और सेकंड रनर अप बने।
आईएएनएस से बात करते हुए, अल्बर्ट ने अपने ट्रेनिंग पीरियड के बारे में बताया: ”मुझे हिंदी उच्चारण के कारण बहुत संघर्ष करना पड़ा। मैंने रटा और गाया। मैं बार-बार गाने सुनता था तो मुझे गाने के सही उच्चारण पता चल जाते थे।”
उन्होंने कहा, “चूंकि मैंने कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली है, इसलिए मुझे बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ी और यह मेरे लिए कठिन था।”
अल्बर्ट ने शेयर किया, ”मैं जो भी करता हूं, दिल से करता हूं। और किसी तरह मुझे इसके अच्छे परिणाम मिलते हैं।”
वह सोशल मीडिया के भी आभारी हैं और उन्होंने कहा, ‘इसने मुझे बहुत प्यार दिया है। लोग मेरे वीडियो शेयर करते हैं और मैं उनका आभारी हूं। इसने मुझे बहुत महत्व दिया है।”
अल्बर्ट ने कहा कि वह अगले पांच सालों में एक अच्छा इंसान और एक अच्छा सिंगर बनना चाहते हैं।
मनोरंजन
कभी महज 50 रुपए महीने कमाते थे शम्मी कपूर, थिएटर से शुरु किया था बॉलीवुड के ‘याहू स्टार’ बनने तक का सफर

अभिनेता शम्मी कपूर ने अपनी खूबसूरत मुस्कान, गजब की फुर्ती, अलग तरह के डांस और पर्दे पर बेफिक्र अंदाज से लोगों के दिलों में खास पहचान बनाई। लोग उन्हें ‘याहू’ स्टार और ‘इंडिया का एल्विस प्रेस्ली’ कहते थे। उन्होंने करियर की शुरुआत अपने पिता पृथ्वीराज कपूर की थिएटर कंपनी से की थी, और उस समय उन्हें हर महीने सिर्फ 50 रुपए मिलते थे।
शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को बंबई में हुआ था। उनका पूरा नाम शमशेर राज कपूर था। वह मशहूर अभिनेता और रंगमंच कलाकार पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर व शशि कपूर के भाई थे। उनका मन पढ़ाई से ज्यादा अभिनय की दुनिया में था, जिसके चलते वह साल 1948 में अपने पिता की थिएटर कंपनी पृथ्वी थिएटर्स से जुड़ गए। यहां उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर काम शुरू किया। उनकी शुरुआती तनख्वाह 50 रुपए महीना थी। वह 1952 तक थिएटर से जुड़े रहे और जब उन्होंने इसे छोड़ा तो उनकी आखिरी तनख्वाह 300 रुपए थी।
थिएटर के बाद शम्मी कपूर ने फिल्मों का रुख किया। उन्होंने महेश कौल के निर्देशन में कारदार फिल्म कंपनी के साथ ‘जीवन ज्योति’ में बतौर हीरो काम किया। उनकी पहली हीरोइन चांद उस्मानी थीं। शुरुआती दौर आसान नहीं था। 1952 से 1955 के बीच उन्होंने ‘रेल का डिब्बा’, ‘लैला मजनू’, ‘ठोकर’, ‘शमा परवाना’, और ‘हम सब चोर हैं’ जैसी कई फिल्मों में काम किया लेकिन इनमें से ज्यादातर फिल्में उम्मीद के मुताबिक लोगों के दिलों में जगह नहीं बना सकीं।
कई फिल्मों की असफलता के बाद 1957 में ‘तुमसा नहीं देखा’ ने उनकी किस्मत बदल दी। इसके बाद ‘दिल देके देखो’ ने उनकी नई छवि को मजबूत किया। 1961 में ‘जंगली’ आई और शम्मी कपूर देखते ही देखते बड़े स्टार बन गए। इसी फिल्म ने उन्हें ‘याहू’ स्टार का टैग दिलाया। इसके बाद ‘प्रोफेसर’, ‘चाइना टाउन’, ‘कश्मीर की कली’, ‘ब्लफ मास्टर’, ‘जानवर’, ‘राजकुमार’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘एन इवनिंग इन पेरिस’, ‘ब्रहमचारी’ और ‘अंदाज’ जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया।
शम्मी कपूर अपने डांस के लिए मशहूर हुए और पर्दे पर उनकी एनर्जी ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई। ‘तीसरी मंजिल’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फिल्मों में उनका अंदाज आज भी याद किया जाता है लेकिन जब उनकी उम्र बढ़ी तो उन्होंने हीरो के बजाय सहायक भूमिकाएं करना शुरू किया। ‘विधाता’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी।
‘ब्रहमचारी’ के लिए शम्मी कपूर को 1969 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला। इसके अलावा, उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट जैसे सम्मान भी मिले।
14 अगस्त 2011 को 79 साल की उम्र में शम्मी कपूर का मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया था। वह लंबे समय से किडनी की बीमारी से परेशान थे और डायलिसिस पर थे। उनकी मौत किडनी फेल होने के कारण हुई थी।
मनोरंजन
पांच दशक तक राज करने वाले दिलीप कुमार को अमिताभ ने बताया हिंदी सिनेमा का पिलर

भारतीय सिनेमा के ‘अभिनय सम्राट’ और ‘ट्रेजेडी किंग’ के रूप में प्रसिद्ध दिलीप कुमार ने हिंदी फिल्मों में पांच दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। आम दर्शक से लेकर मनोरंजन जगत में भी उनकी अदाकारी का हर कोई कायल रहता है। इसी कड़ी में मेगास्टार अमिताभ बच्चनलेजेंड दिलीप कुमार की तारीफ करने से पीछे नहीं हटे।
अभिनेता ने क्विज शो ‘कौन बनेगा करोड़पति सीजन 18’ के लेटेस्ट एपिसोड के दौरान दिलीप कुमार के बेमिसाल योगदान पर रोशनी डाली। शो के लेटेस्ट एपिसोड में अभिनेता अमिताभ बच्चन कंटेस्टेंट मंजीत सिंह से दिलीप कुमार के बेमिसाल योगदान के बारे में बताया।
उन्होंने कहा, “जब भी हिंदी सिनेमा का इतिहास लिखा जाएगा, तो हमेशा यही लिखा जाएगा ‘दिलीप कुमार जी से पहले’ और ‘दिलीप कुमार जी के बाद’।” कंटेस्टेंट मंजीत ने भी इस मौके का फायदा उठाकर अमिताभ बच्चन की तारीफ करते हुए कहा, “सर, दिलीप कुमार जी के बाद अमिताभ बच्चन हैं।”
इस बात पर ऑडियंस ने खूब तालियां बजाईं लेकिन अमिताभ ने फिर से हिंदी सिनेमा के इतिहास में दिलीप कुमार की बेमिसाल जगह पर जोर दिया और कहा, “अरे नहीं-नहीं सर, बिफोर दिलीप कुमार जी और आफ्टर दिलीप कुमार जी।”
अभिनेता ने आगे बातचीत में दिलीप कुमार को हिंदी सिनेमा का एक ऐसा पिलर भी बताया जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता। उन्होंने कहा, “वह हिंदी सिनेमा का स्तंभ हैं और वे एक ऐसा स्तंभ हैं, जिसे कोई पीछे नहीं कर सकता है।” ‘कौन बनेगा करोड़पति सीजन 18’ सोमवार से शुक्रवार, रात 9:00 बजे, सिर्फ़ सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन और सोनी लीव पर आता है।
दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन 1982 में रमेश सिप्पी के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘शक्ति’ में साथ नजर आए थे। इस फिल्म में दिलीप कुमार ने एक सख्त पुलिस अधिकारी पिता की भूमिका निभाई थी और अमिताभ बच्चन ने उनके बागी बेटे का किरदार निभाया था। इस दमदार अभिनय के लिए फिल्म को उस साल का सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था और दिलीप कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था।
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वंशज सिंह ने ‘अलायंस’ से बाहर होने पर कहा-‘मुझे हार का कोई अफसोस नहीं, अभी बहुत आगे जाना है’

रियलिटी शो ‘अलायंस’ में नजर आए अभिनेता वंशज सिंह ने शो में अपने सफर और मुंबई में पहचान बनाने के लिए किए गए संघर्ष के बारे में खुलकर बात की। उनका कहना है कि उन्हें शो में हारने का दुख जरूर है, लेकिन इस हार को लेकर उनके मन में कोई पछतावा नहीं है। अभी आगे बहुत कुछ हासिल करना बाकी है।
आईएएनएस से वंशज ने अपने प्रतिस्पर्धी स्वभाव के बारे में बात करते हुए कहा, ”मुझे हारना पसंद नहीं है। अगर आप किसी काम या प्रोजेक्ट का हिस्सा बनते हैं, तो उसे जीतने या सफल बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए। ‘अलायंस’ को लेकर भी मेरे मन में यही सोच थी। मुझे पूरा भरोसा था कि मैं शो के फाइनल तक जरूर जाऊंगा। मैंने शो में अच्छा प्रदर्शन किया और अपनी तरफ से काफी योगदान भी दिया, लेकिन नतीजे मेरे पक्ष में नहीं रहे।”
उन्होंने कहा, ”शो का हर फैसला मेरे हाथ में नहीं था। इसी वजह से मैं अपनी हार को लेकर खुद को दोषी नहीं मानता। मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है कि मैं शो नहीं जीत पाया। मेरे लिए यह सिर्फ एक पड़ाव था और अब मेरा ध्यान आगे बढ़ने पर है।”
वंशज ने कहा, ”मैं अभी अपनी किसी भी उपलब्धि से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं। मेरे लिए ‘अलायंस’ जीतना भी अंतिम लक्ष्य नहीं होता। अगर मैं शो जीत भी जाता, तब भी पूरी तरह संतुष्ट महसूस नहीं करता। मैं हमेशा अगली उपलब्धि और अगले लक्ष्य के बारे में सोचता रहता हूं। मैं लगातार बड़े सपने देखता हूं और उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करता हूं।”
अपने बारे में बात करते हुए वंशज ने कहा, ”मैं दिन में ही नहीं, बल्कि सोते समय भी सपने देखता हूं। मेरे लिए सपने देखना बेहद जरूरी है और यही चीज मुझे आगे बढ़ने की ताकत देती है। मैं मानता हूं कि जिंदगी में सिर्फ एक उपलब्धि हासिल कर रुक जाना मेरे स्वभाव में नहीं है। मैं लगातार कुछ नया हासिल करना चाहता हूं और खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करता रहता हूं।”
वंशज ने अपने मुंबई तक के सफर के बारे में भी विस्तार से बताया। उन्होंने कहा, ”मैं देहरादून से आता हूं और करीब चार साल पहले मुंबई पहुंचा था। मेरे लिए इस शहर में अपनी जगह बनाना बेहद मुश्किल था। इंडस्ट्री में मेरे कोई खास संपर्क नहीं थे और मैं किसी को नहीं जानता था। ऐसे में शुरुआत से खुद को स्थापित करना मेरे लिए बड़ी चुनौती थी।”
उन्होंने बताया कि मुंबई में पहचान धीरे-धीरे बनती है। पहले सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स बढ़ते हैं, फिर ब्रांड्स के साथ काम करने के मौके मिलते हैं। इसके बाद कुछ जाने-पहचाने लोग आपको पहचानने लगते हैं। उनसे मुलाकात होती है और अगर साथ काम करने का मौका मिले तो वह भी मिलता है। इस तरह छोटे-छोटे कदमों के जरिए कलाकार अपनी पहचान बनाता है।
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