राजनीति
धांधली से खड़गे को जिताया गया कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव, भाजपा का आरोप
कांग्रेस के नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर उनके निर्वाचन से पहले ही भाजपा नेता लगातार हमला बोल रहे थे और उनके चुनाव जीतने के बाद भी भाजपा लगातार उन्हें रबर स्टैंप कह कर गांधी परिवार पर निशाना साध रही है। भाजपा के मुताबिक खड़गे को अध्यक्ष बनाया ही इसलिए गया है ताकि उन्हें रिमोट बनाकर गांधी परिवार पार्टी को चला सके, कंट्रोल कर सके। लेकिन इस बीच, भाजपा आईटी सेल के नेशनल हेड अमित मालवीय ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव की पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाते हुए यह आरोप लगाया है कि धांधली के जरिए मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जिताया गया है।
मालवीय ने ट्वीट कर इसे तमाशा बताते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में जानबूझकर इतनी सटीकता के साथ धांधली कराई गई ताकि खड़गे को 88 प्रतिशत के लगभग ही वोट मिल सके। भाजपा नेता ने कहा कि जानबूझकर खड़गे को 90 प्रतिशत से थोड़ा कम वोट दिलवाया गया क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो अध्यक्ष पद के दूसरे उम्मीदवार शशि थरूर जोरदार तरीक से गड़बड़ी की औपचारिक शिकायत कर सकते थे। उन्हें इस पैंतरेबाजी से भी मना कर दिया गया।
आपको बता दें कि, नतीजे आने के बाद शशि थरूर ने खड़गे को जीत की बधाई दी लेकिन मतगणना के दौरान थरूर खेमे ने चुनाव में गड़बड़ी का आरोप भी लगाया।
जाहिर है कि गैर गांधी के अध्यक्ष बनने के बावजूद गांधी परिवार अभी भी भाजपा के निशाने पर है और भाजपा नेताओं के बयानों से यह साफ-साफ नजर भी आ रहा है कि वो लगातार और बार-बार इस मुद्दे को जनता के बीच भी उठाएंगे कि गांधी परिवार ने कांग्रेस के साथ भी मनमोहन सिंह वाले अपने पुराने यूपीए सरकार के प्रयोग को ही दोहराने का काम किया है।
राजनीति
204 पूर्व अधिकारियों ने लिखा खुला पत्र; संसद में राहुल गांधी के व्यवहार पर सवाल उठाए, माफी की मांग

नई दिल्ली, 17 मार्च : देश के 204 पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों और गणमान्य नागरिकों ने संसद की गरिमा को लेकर चिंता जताते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं। इन हस्ताक्षरकर्ताओं में 116 सेवानिवृत्त सशस्त्र बल अधिकारी, 84 सेवानिवृत्त नौकरशाह (जिनमें 4 राजदूत शामिल हैं) और 4 वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं।
जारी पत्र में कहा गया है कि भारत की संसद देश की संवैधानिक व्यवस्था का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है, जहां जनता की आवाज को अभिव्यक्ति मिलती है, कानून बनाए जाते हैं और गणराज्य की बुनियाद मजबूत होती है। ऐसे में संसद की गरिमा केवल परंपरा का विषय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का अहम हिस्सा है।
संसद भवन के भीतर सांसदों का आचरण उच्चतम मानकों के अनुरूप होना चाहिए। लोकसभा और राज्यसभा के कक्षों के साथ-साथ संसद परिसर के अन्य हिस्से (जैसे सीढ़ियां, गलियारे और लॉबी) भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं और वहां भी उसी गरिमा का पालन किया जाना चाहिए।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने 12 मार्च की घटना पर विशेष चिंता जताई। उनके अनुसार, उस दिन माननीय स्पीकर द्वारा संसद परिसर में किसी भी तरह के प्रदर्शन या विरोध पर स्पष्ट रोक लगाने के बावजूद विपक्ष ने इस निर्देश की अनदेखी की। खुले पत्र में आरोप लगाया गया है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष ने जानबूझकर इस आदेश का उल्लंघन किया, जो न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि संसदीय परंपराओं के प्रति अनादर भी दर्शाता है।
पत्र में यह भी कहा गया कि राहुल गांधी और कुछ अन्य सांसद संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय और बिस्कुट लेते हुए दिखाई दिए, जो देश की सर्वोच्च विधायी संस्था के सदस्यों के अनुरूप आचरण नहीं है। संसद की सीढ़ियां किसी प्रदर्शन या राजनीतिक मंचन का स्थान नहीं हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह व्यवहार अहंकार और विशेषाधिकार की भावना को दर्शाता है और संसद जैसी संस्था के प्रति सम्मान की कमी को उजागर करता है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है, जहां जनप्रतिनिधि गंभीर मुद्दों पर चर्चा के लिए आते हैं, लेकिन इस तरह के व्यवहार से उसकी गरिमा को ठेस पहुंचती है।
पत्र में आगे कहा गया कि राहुल गांधी पहले भी संसद के भीतर और बाहर इस तरह के ‘नाटकीय’ व्यवहार के जरिए सार्वजनिक संवाद के स्तर को गिराते रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि वे संसद को गंभीर बहस के मंच के बजाय एक राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने यह भी कहा कि ऐसे आचरण से न केवल संसद की कार्यवाही बाधित होती है, बल्कि जनता का समय और संसाधन भी व्यर्थ होते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि नेता प्रतिपक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह का व्यवहार लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि सरकार की आलोचना करने के प्रयास में राहुल गांधी देश और उसके लोकतंत्र की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि सांसदों को यह समझना चाहिए कि उनके हर कदम का प्रतीकात्मक और संस्थागत महत्व होता है। उन्होंने राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के इस व्यवहार को लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाला बताया।
पत्र में राहुल गांधी से देश से माफी मांगने और आत्ममंथन करने की अपील की गई है। इस पत्र के समन्वयक जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद्य हैं, जिन्होंने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा पर जोर दिया है।
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कांग्रेस के काले कारनामों ने भारत के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को किया प्रभावितः निशिकांत दुबे

नई दिल्ली, 17 मार्च : झारखंड के गोड्डा से चौथी बार भाजपा से सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया एक्स पर एक के बाद एक पोस्ट कर कांग्रेस पार्टी को घेरा है।
निशिकांत दुबे ने एक्स पर लिखा है, “आज से एक नया दैनिक दिनचर्या का कार्य आरंभ कर रहा हूं। आजादी के बाद, कांग्रेस के काले कारनामे जिसने भारत के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को प्रभावित किया।” 17 मार्च 1959 को, आज ही के दिन, तिब्बत से दलाई लामा जी भारत आए थे, इसी घटना के विरोध में चीन ने भारत पर 1962 का आक्रमण किया। आज भी हमारी लगभग 78 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन चीन ने इस युद्ध के बाद अपने कब्जे में जबरदस्ती रखी है। चीन हमारा पड़ोसी इसी घटना के बाद बना।”
वहीं, दूसरे पोस्ट में संसद में जारी गतिरोध के बीच सांसद निशिकांत ने विपक्ष के व्यवहार और निलंबन को लेकर लिखा है। उन्होंने पोस्ट में कहा, “आज सभी कांग्रेस पार्टी के सांसदों का निलंबन शायद वापस होगा। पहला समझौता हुआ कि विपक्ष के नेता अनर्गल, बेबुनियाद, तथ्यहीन, बकवास बातें सदन में नहीं करेंगे, उसके बदले मैं शांतिपूर्ण व्यवहार करूंगा। दूसरा, वेल में विपक्ष के सांसद सत्ता पक्ष की तरफ नहीं जाएंगे और कागज नहीं फेंकेंगे। लोकसभा के मेज पर चढ़कर उत्पात नहीं मचाएंगे और लोकसभा के अधिकारियों के साथ अभद्रता नहीं करेंगे। लोकतंत्र की मर्यादा बनी रहे, जनता ने हमें वाद-विवाद के लिए संसद बनाया है, ना कि उत्पात मचाने के लिए।”
इसके अलावा, विदेशी रिपोर्ट और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए निशिकांत ने एक और तीखा हमला बोला है। उन्होंने तीसरे एक्स पोस्ट में लिखा, “विदेशी सोरोस रिपोर्ट से देश को बर्बाद करने की सुपारी लेने वाली कांग्रेस। भाजपा ने कभी भी अपने आंतरिक मामलों में विदेशी रिपोर्ट का सहारा नहीं लिया। 2005 से 2013 तक की सभी विदेशी रिपोर्ट कांग्रेस पार्टी तथा भारत सरकार को बायकॉट करने की बात करती थी। हमने संसद में भी इसकी चर्चा नहीं कराई।”
इसके पहले 13 मार्च को निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी को ‘वोकेशनल लीडर ऑफ प्रोपेगेंडा’ बताया था। उन्होंने कहा था कि राहुल गांधी का मुख्य उद्देश्य पिकनिक मनाना है। इसलिए पिकनिक मनाने वाले को पूरा देश पहचानता है। उन्हें न तो गरीबों की चिंता है और न ही देश की चिंता है, देश उन्हें अच्छी तरह से जानता है।”
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महाराष्ट्र: ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ विधेयक विधानसभा से पास, विधान परिषद में आज बिल पर चर्चा

मुंबई, 17 मार्च : महाराष्ट्र विधानसभा में सोमवार देर रात तगड़ी बहस के बाद धर्म स्वतंत्रता विधेयक-2026 पारित किया गया। सत्तारूढ़ महायुति सरकार ने गैरकानूनी और जबरन धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए विधेयक की जरूरत पर जोर दिया। शिवसेना (यूबीटी) ने भी इस विधेयक का समर्थन किया। जिससे महा विकास अघाड़ी में मतभेद दिखाई दिया। कांग्रेस, एनसीपी (एसपी) और समाजवादी पार्टी सहित अन्य सहयोगी पार्टियों ने इस विधेयक का विरोध किया।
बता दें कि विधेयक में सामान्य मामलों में 7 साल तक की जेल और 1-5 लाख रुपये जुर्माना,महिला/नाबालिग/एसी-एसटी मामलों में 10 साल तक जेल और 7 लाख तक जुर्माने का प्रावधान है। धर्म परिवर्तन के लिए 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित नोटिस देना अनिवार्य होगा, और बाद में घोषणा भी। अवैध धर्मांतरण से हुई शादी निरस्त मानी जा सकती है।
विधानसभा से पारित होने के बाद अब यह विधेयक पारित करने के लिए विधान परिषद को भेजा गया है। मंगलवार को विधान परिषद में इस पर चर्चा है। विधानसभा में चर्चा के दौरान सीएम देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि यह विधेयक किसी खास वर्ग के खिलाफ नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इसे केवल जबरदस्ती, धोखाधड़ी या प्रलोभन के माध्यम से किए जाने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए लाया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने विधानसभा में सरकार के रुख को स्पष्ट किया। ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026’ नाम का यह विधेयक शुक्रवार को गृह राज्य मंत्री (ग्रामीण) डॉ. पंकज भोयर ने सदन में पेश किया। जिसका उद्देश्य प्रलोभन, छल या बल के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण पर अंकुश लगाना है।
मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और राजस्थान सहित कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून पहले से ही लागू हैं। इसी को देखते हुए महाराष्ट्र ने भी ऐसा ही कानून लागू करने का निर्णय लिया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सभी को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार। हालांकि, किसी को जबरदस्ती धर्मांतरित करना, धोखाधड़ी, दबाव, बल प्रयोग या प्रलोभन देना स्वतः ही गलत है, इसलिए ऐसे मामलों को रोकने के लिए यह कानून आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। उन्हें धर्म परिवर्तन के बारे में अधिकृत अधिकारियों को सूचित करना होगा। सक्षम अधिकारी स्वीकृति देने से पहले यह सत्यापित करेंगे कि धर्म परिवर्तन वास्तव में स्वैच्छिक है।
इस विधेयक का समर्थन करते हुए शिवसेना (यूबीटी) के भास्कर जाधव ने कहा कि इसका उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना और अवैध धर्मांतरण को रोकना है। यह व्यापक है और अफवाहों या गलतफहमियों के बावजूद किसी विशेष धर्म को निशाना नहीं बनाता है। इसका उद्देश्य अनैतिक प्रथाओं और धर्म के दुरुपयोग पर रोक लगाना है।
जाधव ने कहा कि मीडिया में झूठे दावे किए जा रहे हैं कि यह विधेयक किसी विशेष धर्म को निशाना बनाता है; यह गलत है। यह विधेयक सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है, और इसका उद्देश्य धर्मांतरण में जबरदस्ती या प्रलोभन को रोकना है।
बहस के दौरान, एनसीपी (एसपी) विधायक जितेंद्र आव्हाड ने महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक-2026 पर बोलते हुए विधानसभा में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। अपने भाषण में, आव्हाड ने विभिन्न ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला दिया। हालांकि, जब उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का विशेष रूप से उल्लेख किया, तो सदन में हंगामा मच गया। अध्यक्ष राहुल नरवेकर ने आव्हाड से खेद व्यक्त करने का निर्देश दिया। जिसके बाद उन्होंने ने सदन से माफी मांगी।
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