अंतरराष्ट्रीय
अफगानिस्तान क्रिकेट का भविष्य तय करेगी आईसीसी
अफगानिस्तान में तालिबान के अधिग्रहण और देश की मान्यता के प्रति अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की अनिच्छा के बाद पैदा हुई अनिश्चित परिस्थितियों के बीच खेल, विशेष रूप से क्रिकेट का भविष्य अंधकार में दिखाई दे रहा है।
तालिबान के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महिलाओं को क्रिकेट सहित किसी भी खेल में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी, वहीं अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने अफगानिस्तान में खेल के भविष्य का निर्धारण करने के लिए एक कार्य समूह का गठन किया है।
विश्व शासी निकाय ने कहा कि नवगठित बोर्ड अफगानिस्तान की स्थिति और अफगानिस्तान के क्रिकेट पर इसके प्रभाव पर चर्चा करेगा।
अफगान पुरुष क्रिकेट टीम ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट पर अपनी एक प्रभावी छाप छोड़ी है, लेकिन मौजूदा स्थिति में यह वैश्विक अलगाव के एक बड़े जोखिम का सामना कर रहा है। अफगानिस्तान में इस साल अगस्त में तालिबान के अधिग्रहण के बाद से देश की परिस्थितियों में काफी बदलाव आ गया है, जिससे इसके क्रिकेट के भविष्य पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है।
अफगानिस्तान क्रिकेट से संबंधित प्रमुख मुद्दा महिलाओं के खेल गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध है, जिसमें क्रिकेट भी शामिल है।
यही कारण था कि क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने अफगानिस्तान के खिलाफ होबार्ट में खेले जाने वाले पुरुष टेस्ट मैच को स्थगित कर दिया।
क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि अगर नई तालिबान सरकार ने महिलाओं को खेल खेलने की अनुमति नहीं दी तो वे अफगानिस्तान के साथ क्रिकेट नहीं खेलेंगे।
आईसीसी का कहना है कि वह खेल में आगे बढ़ने के लिए अफगानिस्तान क्रिकेट का समर्थन करने का इरादा रखता है।
आईसीसी के अध्यक्ष ग्रेग बार्ले ने कहा, “आईसीसी बोर्ड पुरुष और महिला क्रिकेट दोनों को आगे बढ़ाने के लिए अफगानिस्तान क्रिकेट का समर्थन जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है।”
उन्होंने कहा, “हमें विश्वास है कि ऐसा होने का सबसे प्रभावी तरीका यह होगा कि हम अपने सदस्य को नई सरकार के साथ अपने संबंधों के माध्यम से इसे प्राप्त करने के प्रयास में समर्थन दें।”
दूसरी ओर, अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) के अध्यक्ष मीरवाइस अशरफ ने कहा, “क्रिकेट 3.5 करोड़ अफगानों के लिए आकांक्षाओं, उत्साह और आशा का स्रोत है। हम अपनी नई सरकार, आईसीसी और अन्य क्रिकेट खेलने वाले देशों के साथ प्रभावी संबंध बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “हम एसीबी की स्थिति के बारे में आईसीसी बोर्ड और अफगानिस्तान के लिए उसके कार्य समूह को पूर्ण सहायता और आश्वासन प्रदान करने के लिए काम कर रहे हैं।”
तालिबान नेतृत्व का दावा है कि वे किसी भी कठोर नियम को दोहराने की योजना नहीं बना रहे हैं जो उनके पिछले शासन काल के दौरान व्यवहार में था। हालांकि यह एक ऐसा दावा है, जिसे अभी भी जमीन पर लागू किया जाना है, खासकर महिलाओं के अधिकारों और रोजगार के अधिकार के संबंध में अभी दावे जमीनी स्तर पर नहीं उतर पाए हैं।
आईसीसी ने अफगानिस्तान के लिए वेट एंड वॉच यानी पहले स्थिति पर नजर रखने और फिर फैसला करने की नीति का विकल्प चुना है और अब यह देखने के लिए अपने कार्यकारी बोर्ड से सिफारिशें मांगेगा कि क्या अफगानिस्तान आईसीसी के पूर्ण सदस्य के रूप में बना रह सकता है या नहीं।
अंतरराष्ट्रीय
यूएन रिपोर्ट में भारत की बड़ी उपलब्धि: बाल मृत्यु दर में भारी गिरावट, पीएम नरेंद्र मोदी ने जताई खुशी

नई दिल्ली, 19 मार्च : संयुक्त राष्ट्र की तरफ से एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें भारत में बाल मृत्यु दर में भारी गिरावट देखने को मिली। संयुक्त राष्ट्र ने बाल मृत्यु दर में गिरावट को लेकर भारत की जमकर सराहना की। वहीं, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है। पीएम मोदी ने लिखा कि यूएन की रिपोर्ट में बच्चों की मौत में तेज गिरावट के लिए भारत की तारीफ की गई।
संयुक्त राष्ट्र बाल मृत्युदर अनुमान अंतर-एजेंसी समूह (यूएनआईजीएमई) की हालिया रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, बच्चों की मौत की दर को कम करने में दुनियाभर में हुई तरक्की में भारत एक अहम योगदान देने वाला देश बनकर उभरा है।
रिपोर्ट में बच्चों के बचने के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए, खासकर नवजात और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले में देश की लगातार और बड़े पैमाने पर की गई कोशिशों पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन नतीजों ने एक मजबूत, केंद्र और राज्यों द्वारा संचालित तथा मानकों पर आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की प्रभावशीलता को उजागर किया है। इसमें यह भी दिखाया गया है कि भारत ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को जमीनी स्तर पर मापने योग्य परिणामों में बदलने के लिए ठोस प्रयास किए हैं।
नवजात शिशु मृत्यु दर में 70 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जो 1990 में 57 से घटकर 2024 में 17 हो गई है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 79 फीसदी की भारी गिरावट देखी गई, जो 1990 में 127 से घटकर 2024 में 27 हो गई है।
पिछले दो दशकों में भारत ने दक्षिण एशिया क्षेत्र में बच्चों की मृत्यु दर को कम करने की कोशिशों में अहम भूमिका निभाई है। 1990 से पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौतों में 76 फीसदी की कमी आई है और 2000 से 68 फीसदी की कमी आई। यह बड़ी कमी मुख्य रूप से भारत जैसे देशों के कारण आई है, जहां लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप, बेहतर संस्थागत डिलीवरी व्यवस्था और टीकाकरण कवरेज में वृद्धि देखने को मिली है।
इस क्षेत्र में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। 2000 में हर 1,000 जीवित जन्मों पर 92 मौतों से घटकर 2024 में लगभग 32 हो गई है, जो बच्चों के स्वास्थ्य के नतीजों में लगातार हो रही बढ़ोतरी को दिखाता है।
भारत के खास दखल ने निमोनिया, डायरिया, मलेरिया और जन्म से जुड़ी दिक्कतों जैसी रोकी जा सकने वाली बीमारियों से होने वाली मौतों को कम करने में मदद की है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि अधिकांश बच्चों की मौतें रोकी या उनका इलाज किया जा सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि भारत में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम, संस्थान-आधारित नवजात देखभाल और नवजात व बचपन की बीमारियों के एकीकृत प्रबंधन जैसे हस्तक्षेपों के विस्तार से मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है।
नवजात शिशु की आवश्यक देखभाल (एनआईसीयू) में भारत के सुधार का खास असर हुआ है। पूरे दक्षिण एशिया में, 2000 से एनआईसीयू वाले बच्चों की मौत के मामले में लगभग 60 फीसदी की कमी आई है और 1-59 महीने के बच्चों की मौत की दर में 75 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है।
हालांकि दक्षिण एशिया में अभी भी दुनियाभर में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की लगभग 25 फीसदी मौतें होती हैं, लेकिन इस इलाके ने दुनिया भर में सबसे तेजी से कमी की है।
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका के सामने एक ही समय में परमाणु शक्ति संपन्न देशों रूस और चीन को रोकने की चुनौती : पेंटागन

वॉशिंगटन, 19 मार्च : वरिष्ठ रक्षा अधिकारियों ने विधायकों को बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका को एक ही समय में दो परमाणु शक्तियों को रोकने की “अभूतपूर्व चुनौती” का सामना करना पड़ रहा है। इस बीच, सैन्य नेताओं ने चीन और रूस से परमाणु, मिसाइल और अंतरिक्ष क्षेत्रों में बढ़ते खतरों के बारे में चेतावनी दी।
हाउस आर्म्ड सर्विसेज की स्ट्रैटेजिक फोर्सेज की सुनवाई में परमाणु निरोधक और रासायनिक व जैविक रक्षा के लिए रक्षा विभाग के सहायक सचिव रॉबर्ट कैडलेक ने कहा कि अमेरिकी रणनीति “एक महत्वपूर्ण मोड़” पर पहुंच गई है।
कैडलेक ने कहा, “चीन के रणनीतिक परमाणु विस्तार का मतलब है कि अब हमें एक साथ दो परमाणु शक्तियों को रोकने की अभूतपूर्व चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यह कोई दूर की समस्या नहीं है। यह आज हमारी रक्षा रणनीति की केंद्रीय चुनौती है।”
उन्होंने कहा कि चीन “अपने इतिहास के सबसे तेज और अस्पष्ट परमाणु विस्तार” में लगा हुआ है जबकि रूस के पास अब भी “दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु भंडार” है और वह दबाव बनाने के लिए परमाणु बलों पर निर्भर बना हुआ है।
कैडलेक ने कहा कि अमेरिका को “कई क्षेत्रों में समन्वित या अवसरवादी आक्रामकता की वास्तविक संभावना” के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि वॉशिंगटन को अपने प्रतिद्वंद्वियों के बराबर “हर वारहेड के बदले वारहेड” रखने की जरूरत नहीं है लेकिन ऐसी क्षमता जरूर होनी चाहिए जो किसी भी स्थिति में “दोनों विरोधियों पर अस्वीकार्य लागत थोप सके।
उन्होंने सेंटिनल अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल, कोलंबिया-श्रेणी की पनडुब्बी, बी-21 बॉम्बर और लॉन्ग रेंज स्टैंड-ऑफ क्रूज मिसाइल के लिए पूर्ण फंडिंग और जहां संभव हो, तेजी लाने की मांग की।
कैडलेक ने थिएटर-रेंज परमाणु विकल्पों की भी वकालत की। उन्होंने कहा, “एसएलसीएम-एन इसका एक उदाहरण है। यह अत्यंत आवश्यक है और किसी समान शक्ति वाले प्रतिद्वंद्वी के साथ संघर्ष में स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है।”
सुनवाई में अंतरिक्ष को लेकर बढ़ती चिंता भी उजागर हुई। यूएस स्पेस कमांड के कमांडर जनरल स्टीफन व्हाइटिंग ने कहा कि अमेरिकी सैन्य अभियान अब काफी हद तक अंतरिक्ष प्रणालियों पर निर्भर हैं और चेतावनी दी कि प्रतिद्वंद्वी उन्हें चुनौती देने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
व्हाइटिंग ने कहा, “कोई गलती न करें, हमारे विरोधी खतरनाक गति से आगे बढ़ रहे हैं और हमें अंतरिक्ष के उपयोग से वंचित करने की क्षमताएं विकसित और तैनात कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि चीन ने अपनी सेनाओं में अंतरिक्ष-आधारित प्रभावों को एकीकृत कर लिया है और ऐसे हथियार विकसित कर रहा है जो “हमारे उपग्रहों को मात देने और नष्ट करने के लिए विशेष रूप से बनाए गए हैं।
रूस के बारे में उन्होंने कहा कि वह अमेरिकी संपत्तियों को बाधित करने वाली क्षमताओं का प्रदर्शन करता रहा है, जिसमें “कक्षा में परमाणु हथियार तैनात करने की संभावित योजना” भी शामिल है।
अंतरिक्ष नीति के लिए रक्षा विभाग के सहायक सचिव मार्क बर्कोविट्ज़ ने अपने बयान में राष्ट्रपति ट्रंप की प्रस्तावित “गोल्डन डोम फॉर अमेरिका” योजना का समर्थन किया और इसे “संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने मौजूद सबसे विनाशकारी खतरों के खिलाफ एक व्यापक अगली पीढ़ी की रक्षा प्रणाली” बताया।
बर्कोविट्ज़ ने कहा, “गोल्डन डोम हमारे देश, नागरिकों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और जवाबी हमले की क्षमता की रक्षा करेगा।” उन्होंने इसे बैलिस्टिक मिसाइलों, हाइपरसोनिक हथियारों और उन्नत क्रूज मिसाइलों से बढ़ते खतरों के प्रति “आवश्यक और व्यावहारिक प्रतिक्रिया” बताया।
डेमोक्रेट्स ने इस कार्यक्रम और व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण दोनों पर तीखी आपत्ति जताई। रैंकिंग सदस्य सेठ मौल्टन ने कहा कि अमेरिका को “ताकत चाहिए, अराजकता नहीं” और “हथियारों की दौड़ को और बढ़ावा देने” के खिलाफ चेतावनी दी।
यूएस नॉर्दर्न कमांड और नोराड के प्रमुख जनरल ग्रेगरी गुइलो ने कहा कि मातृभूमि की रक्षा के लिए कमांडर बदलते खतरे के माहौल के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं।
उन्होंने बताया कि जनवरी 2026 में यूएस नॉर्थ कॉम ने जॉइंट टास्क फोर्स गोल्ड को सक्रिय किया, जो “गोल्डन डोम फॉर अमेरिका के तहत भविष्य की बहु-स्तरीय रक्षा प्रणाली के संचालन के लिए काम करेगा।”
यूएस स्ट्रैटेजिक कमांड के कमांडर एडमिरल रिचर्ड कोरेल ने कहा कि अमेरिका “आधुनिकीकरण और पुनर्निर्माण के इस महत्वपूर्ण दो पीढ़ी वाले दौर” से गुजर रहा है।
उन्होंने कहा कि रणनीतिक चुनौती है “कई परमाणु प्रतिद्वंद्वियों को रोकना, साथ ही तेज तकनीकी बदलाव के साथ तालमेल बिठाना।
अंतरराष्ट्रीय
12 अरब और इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों ने ईरान से हमले रोकने की अपील की

नई दिल्ली, 19 मार्च : इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग के बीच कई देशों की हवा बारूद के धुएं से भर गई। इजरायल की ओर से ईरान के सबसे बड़े गैस प्लांट साउथ पार्स फील्ड पर हमले के बाद ईरान ने कतर और संयुक्त अरब अमीरात के गैस प्लांट पर हमला कर दिया। इस बीच 12 अरब और इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों ने ईरान के इस हमले की निंदा की और इन्हें तुरंत रोककर अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करने को कहा।
सऊदी की राजधानी रियाद में गुरुवार को हुई मीटिंग के बाद जारी एक संयुक्त बयान में 12 अरब और इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों ने ईरान से हमले तुरंत रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करने को कहा।
यह बयान अजरबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्किए और संयुक्त अरब अमीरात के मंत्रियों की ओर से जारी किया गया था।
बयान में, मंत्रियों ने खाड़ी देशों-जॉर्डन, अजरबैजान और तुर्किए पर हमलों की निंदा की। विदेश मंत्रियों ने कहा कि ईरान ने रिहायशी क्षेत्रों, नागरिकों के इलाके के ढांचे, जिसमें तेल की फैसिलिटी, डीसेलिनेशन प्लांट, एयरपोर्ट, रेजिडेंशियल बिल्डिंग और डिप्लोमैटिक जगहें शामिल हैं, को टारगेट किया था।
इसके अलावा मंत्रियों ने लेबनान पर इजरायल के हमलों की भी निंदा की और इलाके की सुरक्षा, स्थिरता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए समर्थन दोहराया।यह संयुक्त बयान तब आया, जब ईरान ने खाड़ी में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया और कतर में सुविधाओं में आग लगने और सऊदी अरब में बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने की खबरें आईं।
संयुक्त बयान में विदेश मंत्रियों ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान के साथ संबंधों का भविष्य देशों की संप्रभुता का सम्मान करने और उनके अंदरूनी मामलों में दखल न देने पर निर्भर करता है। साथ ही, किसी भी तरह से उनकी संप्रभुता या उनके इलाकों का उल्लंघन करने से बचना चाहिए और इलाके के देशों को धमकाने के लिए अपनी सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल या विकास नहीं करना चाहिए।
इससे पहले, ईरानी सरकारी मीडिया ने अमेरिका और इजरायल पर उसके तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन सुविधाओं के कुछ हिस्सों पर हमला करने का आरोप लगाया था।
वहीं कतर ने रास लफ्फान इंडस्ट्रियल सिटी को निशाना बनाकर किए गए ईरानी हमले की कड़ी निंदा की है। कतर ने कहा कि यह हमला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2817 का उल्लंघन है। इस हमले के बाद ईरानी दूतावास के सैन्य अटैशे और सुरक्षा अटैशे के साथ-साथ उनके ऑफिस के स्टाफ को भी ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ घोषित कर दिया और उन्हें 24 घंटे के अंदर देश छोड़ने का निर्देश दिया गया। जब कोई देश किसी विदेशी राजनयिक को स्वीकार नहीं करता या उसे देश छोड़ने के लिए कह देता है, तो उसे पर्सोना नॉन ग्राटा घोषित किया जाता है।
एक आधिकारिक बयान में कतर ने इस हमले को देश की आजादी का खुला उल्लंघन और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और इलाके की स्थिरता के लिए सीधा खतरा बताया।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि कतर शुरू से ही इस संघर्ष से खुद को दूर रखने की नीति पर चल रहा है। तनाव बढ़ने से बचने के वादे के बावजूद ईरान ने उसे और पड़ोसी देशों को निशाना बनाना जारी रखा है। यह एक गैर-जिम्मेदाराना तरीका है जो इलाके की सुरक्षा को कमजोर करता है और अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए खतरा है।
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