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Wednesday,21-October-2026
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नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बच्चों के लिए पार्ट टाइम जूडो ट्रेनर बनी आईटीबीपी

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ITBP-turns

 नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) की 41वीं बटालियन के जवान अपनी ड्यूटी के साथ ही स्कूली बच्चों के लिए अंशकालिक (पार्ट टाइम) जूडो प्रशिक्षक की भूमिका भी निभा रहे हैं।

आईटीबीपी के जवानों का यह नक्सली गतिविधियों और विपरीत परिस्थिति के बीच रहने वाले स्थानीय लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने का एक बेहतरीन प्रयास है।

2016 में शुरू हुई आईटीबीपी की इस पहल ने न केवल इन बच्चों को राष्ट्रीय स्तर के टूनार्मेंट और प्रतियोगिताओं में विभिन्न पदक दिलाने में मदद की है, बल्कि उनके परिवारों के सोचने के तरीके में भी बदलाव लाया है, जिसका नक्सलवाल के प्रति झुकाव था।

मार्शल आर्ट के तहत आत्मरक्षा (सेल्फ डिफेंस) ने छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले में रहने वाले कई आदिवासियों की मानसिकता को बदल दिया है, जो राज्य की राजधानी रायपुर से लगभग 180 किलोमीटर दूर एक हार्ड-कोर नक्सलवादी बेल्ट है।

कोंडागांव, जो 24 जनवरी 2012 को बस्तर जिले से अलग किया गया था, ज्यादातर अपने बेल मेटल क्राफ्ट और अन्य जनजातीय कला रूपों के लिए प्रसिद्ध है।

आईटीबीपी द्वारा प्रशिक्षित होने के बाद स्कूली बच्चों ने अब तक 112 पदक जीते हैं। आईटीपीबी 90,000 की मजबूत संख्या बल के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा की रक्षा करने के साथ ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षा भी प्रदान करती है।

41वीं बटालियन के दो आईटीबीपी कर्मी, हेड कांस्टेबल जय प्रकाश और कांस्टेबल जहीर हसन चार बैचों में लगभग 200 स्थानीय लड़के और लड़कियों को लगभग छह घंटे तक रोजाना प्रशिक्षण दे रहे हैं।

यह पहल 2016 में शुरू हुई थी, जब 41वीं बटालियन को इस क्षेत्र में पहली बार तैनात किया गया था।

आईटीबीपी के दो अधिकारी तब से आधुनिक जापानी मार्शल आर्ट में स्कूली बच्चों को तैयार और प्रशिक्षित कर रहे हैं, जो एक लड़ाकू और ओलंपिक खेल के रूप में विकसित हुआ है।

200 प्रशिक्षित बच्चों में से समूह में पांच वर्ष से 25 वर्ष तक के बच्चे और युवा शामिल हैं।

112 राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पदकों में से बच्चों ने 2017 में 15 (चार स्वर्ण, तीन रजत और आठ कांस्य) जीते; 2018 में 39 (15 स्वर्ण, 15 रजत और नौ कांस्य); 2019 में 58 (17 स्वर्ण, 23 रजत और 18 कांस्य) पदकों पर कब्जा किया।

इन पदकों में, बच्चों ने तीन राष्ट्रीय स्तर के पदक जीते – 2018 में एक कांस्य और 2019 में दो (एक स्वर्ण और एक कांस्य)।

आईटीबीपी प्रशिक्षित 161 स्कूली बच्चों ने अब तक विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लिया है।

योगेश सोरी ने 2018 में अंडर-14 राष्ट्रीय जूडो में 35 किलोग्राम अंडर-14 भार वर्ग में कांस्य पदक जीता था।

अनिल कुमार ने 2019 में इम्फाल में राष्ट्रीय जूडो में 40 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता था, जबकि शिवानी ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 2019 में अंडर -14 श्रेणी में स्वर्ण पदक जीता था।

हेड कांस्टेबल प्रकाश ने आईएएनएस को बताया कि जूडो प्रशिक्षण के कारण बच्चों ने आत्मरक्षा सीखी है और अब वे अधिक आत्मविश्वास से भरे हुए हैं।

कांस्टेबल हसन ने अक्टूबर 2016 में कमांडेंट सुरिंदर खत्री के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण शुरू किया। उस समय केवल 15 से 16 बच्चों के साथ प्री-मैट्रिक बॉयज हॉस्टल बिल्डिंग के एक कमरे में उपलब्ध बुनियादी संसाधनों के साथ नि: शुल्क प्रशिक्षण सुविधा शुरू की गई थी।

कांस्टेबल हसन ने आईएएनएस को बताया, “हमने 15 स्कूली बच्चों के साथ प्रशिक्षित करना शुरू किया था। अब 200 बच्चे हैं, जिनमें 125 लड़कियां शामिल हैं। हम उन्हें सुबह 5.30 बजे से सुबह 8.30 बजे और दोपहर बाद तीन बजे से शाम 6 बजे तक प्रशिक्षण देते हैं।”

उन्होंने कहा, “हमने स्कूलों के स्तर पर इन बच्चों का चयन करना शुरू कर दिया है और अब कई बच्चे तो अपने आप से ही आ रहे हैं। पहले वे हिचकिचा रहे थे, लेकिन उनका व्यवहार अब बदल गया है। इन बच्चों और अन्य स्थानीय लोगों के परिवार के सदस्यों ने बल और उनके प्रति अपना रवैया बदल दिया है। आत्मविश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। उनका झुकाव पहले नक्सलवाद की ओर था।”

यह उल्लेख करते हुए कि लोगों की सोच अब बदल रही है, हेड कांस्टेबल प्रकाश ने आईएएनएस से कहा, “हम इन बच्चों के माता-पिता को बुलाते हैं। वे अब महसूस कर रहे हैं कि केंद्र सरकार उनका कल्याण चाहती है। कोंडागांव जिले में स्थानीय लोगों का व्यवहार पिछले चार वर्षों में पूरी तरह से बदल गया है।”

नक्सल प्रभावित कोंडागांव जिले में आईटीबीपी सबसे आगे रही है। बल नक्सलवादी गतिविधियों से सुरक्षा सुनिश्चित करने के अलावा स्थानीय कार्य योजनाओं के तहत स्थानीय लोगों के साथ घुलने-मिलने और उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने में भी अपनी अहम भूमिका निभा रहा है।

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राजनीति

असम के आदर्श विद्यालयों से बच्चों को मिल रहा ‘बेस्ट’ जैसा माहौल : हिमंता बिस्वा सरमा

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असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि उनकी सरकार ने आदर्श विद्यालय पहल के जरिए राज्य में सरकारी स्कूलों की पूरी सोच ही बदल दी है। इन स्कूलों में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि छात्रों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि आदर्श विद्यालय सिर्फ नई इमारतें नहीं हैं, बल्कि इन्हें एक पूरे शैक्षिक इकोसिस्टम के रूप में विकसित किया गया है, जहां छात्रों को बड़े और नामी स्कूलों जैसी सुविधाएं मिल सकें।

उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा, “हमने असम में सरकारी स्कूल का मतलब ही बदल दिया है। आदर्श विद्यालय सिर्फ नई इमारतें नहीं हैं।”

मुख्यमंत्री ने इन स्कूलों में बनाई जा रही सुविधाओं के बारे में भी बताया। इनमें स्मार्ट क्लासरूम, साइंस और कंप्यूटर लैब, लाइब्रेरी और खेल के मैदान शामिल हैं।

उन्होंने कहा, “स्मार्ट क्लासरूम, साइंस और कंप्यूटर लैब, लाइब्रेरी, खेल के मैदान, एक ऐसा इकोसिस्टम जहां किसी भी ब्लॉक का बच्चा बेस्ट स्कूलों के बच्चों के साथ मुकाबला कर सके।”

उनके मुताबिक इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे चाहे किसी भी ब्लॉक या इलाके से आते हों, उन्हें देश के बेहतरीन शिक्षण संस्थानों के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिले।

आदर्श विद्यालय कार्यक्रम असम सरकार की सरकारी स्कूल शिक्षा को मजबूत करने की कोशिशों में से एक है। इसके तहत बुनियादी ढांचे में सुधार और छात्रों के लिए बेहतर शैक्षणिक माहौल बनाया जा रहा है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में।

इस पहल के तहत मॉडल स्कूल बनाए जा रहे हैं जो आधुनिक पढ़ाई-लिखाई की सुविधाओं से लैस हैं। सिर्फ बिल्डिंग ही नहीं, बल्कि ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जो बच्चों के शैक्षणिक विकास, एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी और उनके एक्सपोजर को बढ़ावा दे।

सरकार राज्य के जिलों में आदर्श विद्यालयों का नेटवर्क लगातार बढ़ा रही है, ताकि स्कूल शिक्षा के बुनियादी ढांचे को अपग्रेड किया जा सके और सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच मिल सके।

यह पहल असम में सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाने और राज्य के अलग-अलग हिस्सों के छात्रों के बीच शिक्षा के अवसरों में जो असमानता है, उसे कम करने के लिहाज से भी अहम है।

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि फोकस इस बात पर है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा भी बेहतर संसाधनों वाले संस्थानों के छात्रों के बराबर खड़ा होकर मुकाबला करने की सोच सके।

मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब असम सरकार राज्य भर में शिक्षा के बुनियादी ढांचे का विस्तार और आधुनिकीकरण कर रही है। आदर्श विद्यालय मॉडल का मकसद सरकारी स्कूलों को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक शिक्षण सुविधाओं के साथ छात्रों और अभिभावकों के लिए अधिक आकर्षक बनाना है।

सरकार अपनी बड़ी शिक्षा सुधार योजना के तहत स्कूलों में लैब, डिजिटल लर्निंग और दूसरी सुविधाओं को मजबूत करने पर भी ध्यान दे रही है। आदर्श विद्यालय पहल के जरिए सरकार सरकारी स्कूलों को सिर्फ बुनियादी शिक्षा देने वाले संस्थान के बजाय एक आधुनिक लर्निंग स्पेस के रूप में स्थापित करना चाहती है, जो छात्रों को आगे की पढ़ाई और प्रतिस्पर्धी अवसरों के लिए तैयार कर सके।

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राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक बनर्जी के पीए की जमानत याचिका पर सुनवाई, राज्य सरकार ने किया विरोध

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सालबोनी जमीन मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक (पीए) सुमित रॉय से हिरासत में पूछताछ की मांग की है।

सरकार का कहना है कि जांच के दौरान सुमित रॉय से जुड़े खातों में करीब 15 करोड़ नकद जमा होने की जानकारी सामने आई है। अब जांच टीम यह पता करना चाहती है कि यह पैसा कहां से आया और इसका जमीन के मामले से कोई संबंध है या नहीं।

सुमित रॉय की अग्रिम जमानत की मांग वाली याचिका पर गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुमित रॉय से पूछताछ के दौरान बैंक खातों में जमा बड़ी रकम के बारे में सवाल किए गए थे। सरकार के मुताबिक, बैंक रिकॉर्ड और पेन से यह रकम सुमित रॉय से जुड़ी होने की बात सामने आई है।

सरकार ने यह भी बताया कि 17 जून 2021 को करीब 71 लाख जमा किए गए थे। यह वही समय था जब जमीन से जुड़े कथित लेन-देन की जांच चल रही थी। सरकार का कहना है कि इन पैसों के बारे में पूरी जानकारी लेने के लिए सुमित रॉय से हिरासत में पूछताछ जरूरी है।

सुमित रॉय की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने सरकार की दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इन पैसों को लेकर पहले ही सफाई दी जा चुकी है। उनके मुताबिक, यह रकम पार्टी की सदस्यता फीस और चंदे से जुड़ी थी। वकील ने कहा कि सुमित रॉय का काम ही पार्टी से मिलने वाली रकम को जमा करना और उसके चालान को जमा करना था।

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राजनीति

राहुल गांधी पर मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट का जल्द सुनवाई से इनकार, सीजेआई बोले-हमारे सामने सब बराबर

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले में जल्द सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे सामने सब बराबर हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता को मामले की शीघ्र सुनवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन दाखिल करने को कहा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने भरोसा दिया कि आवेदन मिलने के बाद उस पर विचार किया जाएगा।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि राहुल गांधी इस मामले में कोई वीआईपी नहीं हैं और उनकी अपील करीब पांच महीने से सुनवाई के लिए लंबित है।

उन्होंने कहा कि मामला कई बार सूची में आया लेकिन किसी कारण से सुनवाई नहीं हो सकी। गौरव भाटिया ने दलील दी कि बार-बार मामले की सुनवाई टलना संस्थान के लिए भी उचित नहीं है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि मामले में तय प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। आवेदन मिलने के बाद वह उस पर विचार करेगा।

बता दें कि यह मामला दिसंबर 2022 में राहुल गांधी की ओर से दिए गए एक बयान से जुड़ा है। भारत-चीन सीमा पर हुई झड़प को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी ने दावा किया था कि चीनी सैनिक अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के जवानों को पीट रहे हैं। उनके इस बयान पर बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के पूर्व डायरेक्टर उदय शंकर श्रीवास्तव ने शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी का बयान भारतीय सेना के लिए अपमानजनक है और इससे सेना की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। इसी मामले में लखनऊ की अदालत ने राहुल गांधी को पेश होने के लिए समन जारी किया था।

समन को चुनौती देते हुए राहुल गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने पहले मामले में आगे की कार्रवाई पर रोक लगाई थी।

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