राजनीति
कोरोना के खिलाफ मध्य प्रदेश में अनोखा अभियान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर कोरोना के खिलाफ जन आंदोलन चल रहा है। मध्य प्रदेश में भी इस अभियान को गति दी जा रही है। लोग मास्क का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करें, इसके लिए धार जिले में अनोखा तरीका अपनाया गया है और यहां चौक-चौराहों पर संदेशों के साथ बड़े-बड़े मास्क लगाए गए हैं। कोरोना संक्रमण की चेन को तोड़ना बड़ी चुनौती है और इसी के लिए आमजन को सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क का उपयोग और बार-बार हाथ धोने का परामर्श दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कोरोना के खिलाफ जन आंदोलन का आह्वान किया, उसी के चलते सरकारी महकमे से लेकर कई संगठन आगे आए हैं।
धार जिले में जिला प्रशासन के साथ बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था यूनिसेफ ने अनोखा अभियान शुरू किया है, इसके तहत मास्क के आकार के बड़े-बड़े बैनर लगाए गए हैं और उन पर जीवन को सुरक्षित रखने के साथ कोरोना से बचने के तरीकों को भी बताया गया है।
धार जिले के जिलाधिकारी आलोक सिंह इस अभियान को गति देने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इसी सिलसिले में तमाम धर्मगुरुओं से लेकर समाज के जिम्मेदार प्रतिनिधियों के साथ बैठक भी हुई है और उनसे इस अभियान में सहयोग करने का आह्वान भी किया गया।
धार जिले के चौक-चौराहों से लेकर किले की प्राचीर पर लगा मास्क आकार का बैनर हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचता है और इस पर लिखा गया संदेश लोगों पर असर डाल रहा है। लोगों को इन संदेशों के जरिए यह बताया जा रहा है कि कोरोना से बचने का रास्ता मास्क है क्योंकि जब तक वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक मास्क ही वैक्सीन है, वहीं दूसरी ओर पुलिस ऐसे वाहन चालकों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है जो बगैर मास्क के वाहन चलाते पाए जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
ईरान का विश्वास हासिल करना ही अमेरिका के लिए मौजूदा स्थिति से निकलने का रास्ता: बाकेर कालिबाफ

ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर क़ालिबाफ ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए मौजूदा स्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका यह है कि वह अपना निर्णय ले और ईरानी राष्ट्र का विश्वास हासिल करे।
उन्होंने यह टिप्पणी पाकिस्तान की अपनी यात्रा से ईरान लौटते समय पत्रकारों को संबोधित करते हुए की, जहां उन्होंने अपने साथ आए प्रतिनिधिमंडल के साथ अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ शांति वार्ता में भाग लिया था।
क़ालिबाफ ने कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी जनता का ऋणी है और उसे इसकी भरपाई के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।”
उन्होंने कहा, “अगर वे लड़ेंगे, तो हम भी लड़ेंगे और अगर वे तर्क के साथ आगे आते हैं, तो हम तर्क से जवाब देंगे। हम किसी भी धमकी के सामने झुकेंगे नहीं। वे हमारी इच्छाशक्ति को एक बार फिर परख सकते हैं और हम उन्हें और बड़ा सबक सिखाएंगे।”
क़ालिबाफ ने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई वार्ता को “बहुत गहन, गंभीर और चुनौतीपूर्ण” बताया। उन्होंने कहा कि सक्षम विशेषज्ञों के सहयोग और व्यापक व विविध दृष्टिकोण के साथ, ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने देश की सद्भावना दिखाने के लिए “बेहतरीन पहल” तैयार कीं, “जिससे बातचीत में प्रगति हुई।”
उन्होंने जोर देकर कहा, “हमने शुरू से ही घोषणा की थी कि हमें अमेरिकियों पर भरोसा नहीं है। हमारे अविश्वास की दीवार 77 साल पुरानी है। यह ऐसे समय में है जब 12 महीनों से भी कम समय में उन्होंने बातचीत के दौरान दो बार हम पर हमला किया। इसलिए, उन्हें ही हमारा विश्वास जीतना होगा।”
क़ालिबाफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ हालिया धमकियों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी धमकियों का ईरानी जनता पर कोई असर नहीं पड़ता।
ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडलों ने शनिवार और रविवार तड़के इस्लामाबाद में लंबी बातचीत की। ये वार्ताएं किसी समझौते पर नहीं पहुंच सकीं। यह बातचीत 40 दिनों की लड़ाई के बाद बुधवार को ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच युद्धविराम की घोषणा के बाद हुई थी।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
ईरान ने बातचीत विफल होने के लिए यूएस को ठहराया दोषी, अमेरिका पर शर्तों को बदलने का लगाया आरोप

ईरान ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि उसने एक संभावित समझौते को अंतिम चरण में आकर पटरी से उतार दिया। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के मुताबिक, बातचीत के दौरान अमेरिका ने ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाने, बार-बार शर्तें बदलने (गोलपोस्ट शिफ्ट करने) और नाकाबंदी जैसी रणनीतियों का सहारा लिया, जिससे सहमति बनने की प्रक्रिया बाधित हो गई।
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची का दावा है कि प्रस्तावित “इस्लामाबाद समझौता” (एमओयू) लगभग तैयार था और दोनों पक्ष अंतिम सहमति के बेहद करीब थे।
उनका कहा है कि इन परिस्थितियों के चलते 21 घंटे तक चली गहन और मुश्किल बातचीत आखिरकार बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। तेहरान ने यह भी संकेत दिया कि अगर बातचीत के दौरान शर्तों में लगातार बदलाव न किए जाते, तो यह डील संभव हो सकती थी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि तेहरान ने 47 सालों में वॉशिंगटन के साथ अपनी सबसे ऊंचे स्तर की सीधी बातचीत ईमानदारी और चल रहे झगड़े को खत्म करने में मदद करने के इरादे से की है। अराघची ने दुख जताया कि “कोई सबक नहीं मिला”।
अराघची ने एक्स पर लिखा, “47 सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर हुई गहरी बातचीत में, ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए अमेरिका के साथ अच्छी नीयत से बातचीत की। लेकिन जब ‘इस्लामाबाद एमओयू’ से बस कुछ इंच दूर थे, तो हमें गोलपोस्ट बदलने और ब्लॉकेड का सामना करना पड़ा। कोई सबक नहीं मिला। अच्छी नीयत से अच्छी नीयत पैदा होती है। दुश्मनी से दुश्मनी पैदा होती है।”
ईरानी विदेश मंत्री का यह कहना कि दोनों पक्ष एक समझौते को फाइनल करने से कुछ ही दूर थे, यह दिखाता है कि आखिरी स्टेज पर तनाव तेजी से बढ़ने से पहले अमेरिका और ईरान के बीच हुई बातचीत सफलता के कितने करीब आ गई थी।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कहा कि अमेरिका के साथ डिप्लोमैटिक ब्रेकथ्रू की संभावना अभी भी है, बशर्ते वॉशिंगटन अपना नजरिया बदले। उन्होंने अमेरिका से “सर्वाधिकारवाद” को छोड़ने और ईरान के अधिकारों का सम्मान करने की अपील की। ऐसा बदलाव एक समझौते का रास्ता बना सकता है। बता दें, सर्वाधिकारवाद एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है, जिसमें राज्य सार्वजनिक और निजी जीवन के हर पहलू पर पूर्ण नियंत्रण रखता है।
राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने एक्स पर एक पोस्ट में बातचीत करने वाले डेलिगेशन के सदस्यों की सराहना करते हुए कहा, “अगर अमेरिकी सरकार अपना सर्वाधिकारवाद छोड़ दे और ईरानी देश के अधिकारों का सम्मान करे, तो समझौते तक पहुंचने के रास्ते जरूर मिल जाएंगे।”
इस बीच, अमेरिका ने घोषणा की है कि वह 13 अप्रैल से ईरानी पोर्ट्स में आने-जाने वाले जहाजों पर पूरी तरह से समुद्री नाकाबंदी लागू करना शुरू कर देगा।
राजनीति
असली मुद्दा परिसीमन है, न कि महिला आरक्षण : सोनिया गांधी

कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य सोनिया गांधी ने सोमवार को केंद्र सरकार के प्रस्तावित विशेष सत्र और उससे जुड़े विधेयकों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस समय असली मुद्दा महिला आरक्षण नहीं बल्कि परिसीमन है, जिसे उन्होंने ‘बेहद खतरनाक’ और ‘संविधान पर हमला’ बताया।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जाति जनगणना को टालने और पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, जिस तरह और जिस समय संसद का विशेष सत्र बुलाया जा रहा है, उससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं।
द हिंदू अखबार में प्रकाशित अपने लेख में सोनिया गांधी ने लिखा कि प्रधानमंत्री विपक्षी दलों से उन विधेयकों का समर्थन मांग रहे हैं, जिन्हें सरकार तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के चरम के दौरान विशेष सत्र में जल्दबाजी में पास कराना चाहती है। उन्होंने कहा कि इस असाधारण जल्दबाजी के पीछे केवल एक ही कारण हो सकता है। वह यह कि राजनीतिक फायदा उठाना और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में लाना।
सोनिया गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री हमेशा की तरह पूरी सच्चाई नहीं बता रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष ने कभी भी महिला आरक्षण को जनगणना से जोड़ने की मांग नहीं की थी बल्कि विपक्ष चाहता था कि इसे 2024 के लोकसभा चुनाव से ही लागू किया जाए।
उन्होंने नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 का जिक्र करते हुए बताया कि सितंबर 2023 में विशेष सत्र के दौरान संसद ने इसे सर्वसम्मति से पारित किया था। इस कानून के तहत संविधान में अनुच्छेद 334-ए जोड़ा गया, जिसमें लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है। हालांकि, इसे अगली जनगणना और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन के बाद लागू करने की शर्त रखी गई।
सोनिया गांधी ने कहा कि यह शर्त विपक्ष की मांग नहीं थी। उन्होंने बताया कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि महिला आरक्षण 2024 के चुनाव से ही लागू होना चाहिए लेकिन सरकार ने इसे नहीं माना।
उन्होंने सवाल उठाया कि अब जब सरकार यह संकेत दे रही है कि अनुच्छेद 334-ए में संशोधन कर महिला आरक्षण को 2029 से लागू किया जा सकता है तो इसमें 30 महीने का समय क्यों लगा? और कुछ हफ्ते इंतजार कर सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुलाई जा सकती थी।
सोनिया गांधी ने यह भी बताया कि विपक्षी नेताओं ने तीन बार केंद्र सरकार को पत्र लिखकर 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में चुनाव के अंतिम चरण के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाने का अनुरोध किया था, ताकि सरकार के प्रस्तावों पर विस्तार से चर्चा हो सके। हालांकि सरकार ने इस वाजिब मांग को ठुकरा दिया।
उन्होंने कहा कि इसके बजाय प्रधानमंत्री लेख लिखकर, राजनीतिक दलों से अपील कर और सम्मेलन आयोजित कर अपनी बात आगे बढ़ा रहे हैं, जो ‘एकतरफा रवैया’ और ‘मेरी मर्जी या कुछ नहीं’ जैसी कार्यशैली को दर्शाता है।
सोनिया गांधी ने अधिक संवाद और सहमति आधारित प्रक्रिया की जरूरत पर जोर देते हुए 1993 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इन संशोधनों के जरिए पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण देने से पहले लगभग पांच साल तक व्यापक चर्चा की गई थी। इसका श्रेय उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दिया।
उन्होंने बताया कि आज देश में करीब 15 लाख महिला जनप्रतिनिधि स्थानीय निकायों में कार्यरत हैं, जो कुल का 40 प्रतिशत से अधिक हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी मजबूत आधार पर खड़ा है।
जनगणना में देरी को लेकर भी सोनिया गांधी ने सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि 2021 में होने वाली जनगणना को टाल दिया गया, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत मिलने वाले लाभ से 10 करोड़ से ज्यादा लोग वंचित रह गए। यही कानून प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की आधारशिला है।
उन्होंने कहा कि जनगणना की प्रक्रिया पांच साल की देरी के बाद अब शुरू की गई है। ऐसे में 2027 की जनगणना को लेकर सरकार की जल्दबाजी समझ से परे है। सरकार इसे ‘डिजिटल जनगणना’ बता रही है और अधिकारियों के अनुसार इसके अधिकांश आंकड़े 2027 में ही उपलब्ध हो जाएंगे। ऐसे में विशेष सत्र बुलाने और परिसीमन कराने की जल्दी के पीछे दिए जा रहे तर्क ‘खोखले’ हैं।
सोनिया गांधी ने जाति जनगणना के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि करीब एक साल पहले प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि 2027 की जनगणना में जाति आधारित गणना भी होगी, जबकि इससे पहले सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर और संसद में बयान देकर इसका विरोध कर चुकी थी।
उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री ने जाति जनगणना की मांग करने वाले कांग्रेस नेताओं को ‘अर्बन नक्सल मानसिकता’ से ग्रसित बताया था। उन्होंने कहा कि अब 2027 की जनगणना सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण को मजबूती देने के लिए जाति आधारित आंकड़े जुटाने वाली है।
उन्होंने कहा कि बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों ने महज छह महीने में जाति सर्वे पूरा कर लिया, जिससे यह साफ होता है कि इसमें देरी का कोई ठोस कारण नहीं है। उनके मुताबिक, यह कहना गलत है कि जाति जनगणना से 2027 की जनगणना में देरी होगी बल्कि सरकार का असली इरादा इसे और टालना है।
विशेष सत्र को लेकर उन्होंने कहा कि अब तक सांसदों को यह तक नहीं बताया गया है कि सरकार इस सत्र में कौन-कौन से प्रस्ताव लाने जा रही है। उन्होंने आशंका जताई कि परिसीमन को लेकर कोई नया फॉर्मूला लाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि परिसीमन हमेशा जनगणना के बाद ही होना चाहिए और अगर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो यह केवल गणितीय नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी संतुलित होना चाहिए। परिवार नियोजन में आगे रहे राज्यों और छोटे राज्यों के साथ किसी तरह का अन्याय नहीं होना चाहिए।
उन्होंने बताया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम में ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ का प्रावधान है, जिसके तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। उन्होंने यह भी कहा कि राज्यसभा में विपक्ष ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए भी ऐसा ही प्रावधान करने की मांग की थी।
उन्होंने कहा कि संसद का मानसून सत्र जुलाई के मध्य में प्रस्तावित है और तब तक पर्याप्त समय है कि सरकार सभी दलों से चर्चा कर व्यापक सहमति बनाए।
उन्होंने कहा, “अगर सरकार 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाकर प्रस्तावों पर चर्चा करती है, सार्वजनिक बहस की अनुमति देती है और फिर मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयक लाती है, तो इससे कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा।”
उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि इस तरह जल्दबाजी में इतने बड़े और दूरगामी बदलाव लाना न केवल गलत है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है।
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