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Wednesday,16-September-2026
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2006 मालेगांव ब्लास्ट केस: बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, चार आरोपी हुए बरी

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2006 के मालेगांव ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। अदालत ने बुधवार को चार आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द कर करते हुए उन्हें बरी कर दिया। मालेगांव में इन धमाकों में 37 लोगों की जान चली गई थी।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रशेखर और जस्टिस श्याम चांदक की डिवीजन बेंच ने आरोपियों की ओर से एक स्पेशल कोर्ट के सितंबर 2025 के उस आदेश के खिलाफ दायर अपीलों पर यह फैसला सुनाया, जिसमें उनके खिलाफ आरोप तय किए गए थे। इस अपील में ट्रायल कोर्ट की ओर से आरोप तय करने के तरीके और मामले में कई सह-आरोपियों को बरी किए जाने पर भी सवाल उठाए गए थे।

फिलहाल, हाईकोर्ट ने जिन चार आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द किया है, उनमें राजेंद्र चौधरी, धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवारिया और लोकेश शर्मा शामिल हैं। हाईकोर्ट के आज के फैसले से इन आरोपियों के खिलाफ मामला बंद हो गया और उनके खिलाफ चल रहा ट्रायल भी खत्म हो गया।

बेंच ने इससे पहले अपील दायर करने में हुई 49 दिन की देरी को माफ कर दिया था, यह देखते हुए कि यह चुनौती राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम (एनआईए अधिनियम) की धारा 21 के तहत एक वैधानिक अपील थी।

मालेगांव मामला 8 सितंबर 2006 का है, जब इस शहर में हुए सिलसिलेवार धमाकों के बाद अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और अन्य कानूनों के तहत मामला दर्ज किया गया था। जांच सबसे पहले महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने की थी, जिसने 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया और दिसंबर 2006 में चार्जशीट दायर की।

इसके बाद फरवरी 2007 में जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी गई और बाद में एनआईए ने इसे अपने हाथ में ले लिया। एनआईए ने आगे की जांच के बाद अन्य आरोपियों के साथ-साथ इन चारों को भी आरोपी बनाया था और एक नई चार्जशीट दायर की थी।

राष्ट्रीय समाचार

भारत का वस्तु निर्यात अगस्त में 26 प्रतिशत बढ़ा, व्यापार घाटे में आई कमी

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भारत का वस्तु निर्यात अगस्त में सालाना आधार पर 26.1 प्रतिशत बढ़कर 43.81 अरब डॉलर हो गया है। यह निर्यात में देश का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। यह इस बात की भी पुष्टि करता है कि देश का निर्यात क्षेत्र लगातार मजबूत प्रदर्शन कर रहा है। यह जानकारी सरकार की ओर से मंगलवार को दी गई।

इस दौरान देश के व्यापार घाटे में भी कमी देखने को मिली है, जो कि अगस्त में 26.86 अरब डॉलर पर रहा है, जो कि एक साल पहले समान अवधि में 27.22 अरब डॉलर पर था। इस साल जुलाई में व्यापार घाटा 32 अरब डॉलर था।

अगस्त में वस्तु आयात सालाना आधार पर 26 प्रतिशत बढ़कर 72.67 अरब डॉलर पर रहा है, जो कि इस साल जुलाई में 76.22 अरब डॉलर था। मासिक आधार पर अगस्त में निर्यात में भी कमी दर्ज की गई है, जो कि जुलाई में 44.24 अरब डॉलर पर था।

वाणिज्य मंत्रालय में सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा, “निर्यात में बढ़ोतरी इंजीनियरिंग के सामान, पेट्रोलियम उत्पादों, केमिकल और टेक्सटाइल की वजह से हुई और इनकी सबसे ज्यादा मांग अमेरिका, ईयू और ब्रिक्स देशों से थी।”

आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अगस्त में सोने का आयात गिरकर 2.3 अरब डॉलर रह गया, जो अगस्त 2025 के 5.4 अरब डॉलर के आंकड़े से आधे से भी कम था।

आरबीआई के इस महीने की शुरुआत में जारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी) 4.2 अरब डॉलर रहा। पश्चिमी एशिया संकट के कारण ग्लोबल मार्केट में तेल, एलपीजी और फर्टिलाइजर की कीमतें बढ़ने के बावजूद यह जीडीपी का 0.5 प्रतिशत बना रहा।

पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में सीएडी का अनुमान जीडीपी का 0.4 प्रतिशत था।

ब्लूमबर्ग के डेटा के अनुसार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) या एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट स्कीम की वजह से डॉलर के इनफ्लो में जबरदस्त बढ़ोतरी के बाद, भारत दुनिया में विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला चौथा सबसे बड़ा देश बन गया है।

डेटा से पता चलता है कि 4 सितंबर को खत्म हुए हफ्ते में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 44.9 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 785.7 अरब डॉलर हो गया, जिससे भारत ने रूस को चौथे स्थान से हटा दिया और अब वह चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद चौथे स्थान पर है।

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राष्ट्रीय समाचार

किसानों के लिए वरदान हैं ये 3 सरकारी योजनाएं, मिलता है सालाना 6,000 रुपए से लेकर 5 लाख तक लोन का लाभ

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किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार कई योजनाएं संचालित कर रही है। इनमें कुछ ऐसी योजनाएं भी हैं जो किसानों को सीधे वित्तीय सहायता, वृद्धावस्था में पेंशन और खेती के लिए आसान ऋण जैसी सुविधाएं प्रदान करती हैं। हालांकि, जानकारी के अभाव में आज भी कई पात्र किसान इन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे में अगर आप खेती करते हैं, तो आज हम आपको सरकार की तीन ऐसी योजनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपके बहुत काम आ सकती हैं।

दरअसल, हम किसानों से संबंधित जिन योजनाओं की बात कर रहे हैं वो हैं-प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना और किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी), जो आपके लिए बड़े काम की साबित हो सकती हैं।

सबसे पहले बात करते हैं पीएम किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना की। पीएम-किसान देश की सबसे लोकप्रिय किसान योजनाओं में शामिल है। इस योजना के तहत पात्र भूमिधारक किसानों को हर वर्ष 6,000 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है। यह राशि किसानों के बैंक खातों में 2,000 रुपए की तीन समान किस्तों में सीधे हस्तांतरित की जाती है।

योजना का उद्देश्य किसानों को खेती और घरेलू जरूरतों के लिए अतिरिक्त आर्थिक मदद उपलब्ध कराना है। इसका लाभ उन किसानों को मिलता है जिनके नाम पर खेती योग्य जमीन दर्ज है। योजना का पैसा प्राप्त करने के लिए ई-केवाईसी, आधार से बैंक खाते की लिंकिंग और भूमि रिकॉर्ड का सत्यापन अनिवार्य है।

पीएम-किसान योजना का लाभ केवल पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को दिया जाता है। संस्थागत भूमिधारक इसके पात्र नहीं होते। इसके अलावा, जिन परिवारों में कोई सदस्य आयकरदाता है, उन्हें भी इस योजना का लाभ नहीं मिलता।

डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट और आर्किटेक्ट जैसे पंजीकृत पेशेवर भी योजना की अपात्र श्रेणी में आते हैं। इसलिए आवेदन से पहले पात्रता की शर्तों को समझना जरूरी है।

दूसरी योजना है-प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना। छोटे और सीमांत किसानों को बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार यह योजना संचालित करती है। इस योजना के तहत 60 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद पात्र किसानों को प्रति माह 3,000 रुपए पेंशन दी जाती है।

योजना से जुड़ने के समय किसान की उम्र 18 से 40 वर्ष के बीच होनी चाहिए और उसके पास अधिकतम 2 हेक्टेयर तक खेती योग्य भूमि होनी चाहिए। किसान को अपनी उम्र के अनुसार हर महीने 55 रुपए से 200 रुपए तक का योगदान करना होता है। खास बात यह है कि किसान जितनी राशि जमा करता है, उतनी ही राशि केंद्र सरकार भी उसके पेंशन खाते में योगदान के रूप में जमा करती है।

इस योजना में पारिवारिक पेंशन का भी प्रावधान है। यदि पेंशन प्राप्त कर रहे किसान का निधन हो जाता है, तो उसके जीवनसाथी को नियमों के अनुसार पेंशन राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा पारिवारिक पेंशन के रूप में दिया जाता है। इससे परिवार को भी आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

तीसरी योजना है-किसान क्रेडिट कार्ड। खेती के दौरान किसानों को बीज, खाद, सिंचाई, कीटनाशक, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों के लिए बड़ी राशि की आवश्यकता होती है। ऐसे में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) किसानों को सस्ती और आसान ऋण सुविधा उपलब्ध कराता है।

इस योजना के तहत किसान खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए बैंक से ऋण प्राप्त कर सकते हैं। केवल फसल उत्पादन ही नहीं, बल्कि पशुपालन, डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों से जुड़े पात्र लाभार्थी भी केसीसी के माध्यम से ऋण सुविधा का लाभ उठा सकते हैं।

किसान क्रेडिट कार्ड के तहत मिलने वाली ऋण सीमा किसान की जमीन, फसल पैटर्न, उत्पादन लागत और वित्तीय जरूरतों के आधार पर तय की जाती है। बैंक सभी पहलुओं का मूल्यांकन करने के बाद क्रेडिट लिमिट निर्धारित करते हैं।

योजना के तहत पात्र किसानों को 5 लाख रुपए तक का लोन मिल सकता है, जिससे कृषि कार्यों के लिए पूंजी जुटाना आसान हो जाता है और किसानों की साहूकारों पर निर्भरता कम होती है।

इसतरह, ये तीनों योजनाएं किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा, आय सहायता और वित्तीय सशक्तिकरण का मजबूत आधार बनकर उभरी हैं।

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राजनीति

ब्र‍िक्‍स सम‍िट में भारत की नेतृत्व भूमिका पर उरुग्वे के विदेश मंत्री बोले- ग्लोबल साउथ में भारत प्रमुख नेताओं में से एक

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भारत की अध्‍यक्षता में आयोज‍ित ब्र‍िक्‍स शिखर सम्मेलन का नतीजा बेहद सफल रहा। हमने एक बहुत गंभीर, ठोस और आम सहमति वाला ‘फाइनल डिक्लेरेशन’ हासिल किया है। यह बात उरुग्वे के विदेश मंत्री मारियो लुबेटकिन ने साथ हुई व‍िशेष बातचीत में कही।

विदेश मंत्री लुबेटकिन ने अपनी भारत की यात्रा को लेकर आईएएनएस को बताया क‍ि मैं अपनी इस यात्रा में कई लक्ष्य हासिल करना चाहता था। सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण, मैं भारत सरकार के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करना चाहता था। दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य ब्रिक्स शिखर सम्मेलन था और तीसरा, मैं भारत और मर्कोसुर के बीच संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता था।

आईए जानते हैं इस दौरान उन्‍होंने और कौन-कौन से मुद्दों पर चर्चा की।

विदेश मंत्री लुबेटकिन पूछा गया क‍ि आप ब्रिक्स में भारत की नेतृत्व भूमिका को कैसे देखते हैं?

उन्‍होंने कहा, मेरे विचार से इस शिखर सम्मेलन का नतीजा बेहद सफल रहा। सम्मेलन की तैयारी के दौरान कई सवाल थे और बहुत कम लोगों को पता था कि आखिरकार क्या परिणाम निकलेंगे। लेकिन अंत में हम एक ऐसे संयुक्त घोषणा पत्र (डिक्लेरेशन) तक पहुंचे जो गंभीर, व्यावहारिक और सभी की सहमति पर आधारित था। इसमें कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनी।

उन्‍होंने कहा क‍ि दुनिया में चल रहे कुछ युद्धों और संघर्षों में अलग-अलग पक्ष शामिल हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बैठक के अध्यक्ष के रूप में भारत के राष्ट्रपति और भारत सरकार ने सभी पक्षों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने और सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह दिखाता है कि आज के समय में खासकर ग्लोबल साउथ में भारत प्रमुख नेताओं में से एक है।

उन्‍होंने कहा क‍ि सिर्फ बातें करने के बजाय हमें नतीजों को देखना चाहिए और समझना चाहिए कि भारत ने इस सम्मेलन में क्या हासिल किया।

सवाल: भारत और उरुग्वे के संबंधों का भविष्य आप कैसे देखते हैं?

जवाब: मैं पूरी तरह उम्मीद से भरा हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि हमारे दोनों देश कई मायनों में एक-दूसरे के पूरक हैं। कई मुद्दों पर हमारी लोकतांत्रिक सोच भी मिलती-जुलती है और ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां हम साथ मिलकर काम कर सकते हैं।

उन्‍होंने कहा क‍ि मुझे लगता है कि हमारे रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए तीन अलग-अलग रास्ते हैं, जो एक साथ चल सकते हैं।

पहला रास्ता द्विपक्षीय संबंधों का है। इसमें अर्थव्यवस्था, संस्कृति, फिल्म और ऑडियो-विजुअल सहयोग (जिसमें बॉलीवुड भी शामिल है), खेल और कई अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा सकता है।

दूसरा रास्ता भारत और मर्कोसुर के बीच संबंधों का है। आज मैंने व्यापार मंत्री के साथ मिलकर भारत और मर्कोसुर के बीच बातचीत के अगले चरण को शुरू करने पर सहमति बनाई है। यह सिर्फ उरुग्वे के लिए ही नहीं, बल्कि अर्जेंटीना, ब्राजील और पराग्वे जैसे अन्य मर्कोसुर देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रक्रिया है।

तीसरा रास्ता क्षेत्रीय सहयोग का है। फिलहाल उरुग्वे मर्कोसुर की अध्यक्षता कर रहा है और साथ ही ‘सेलाक’ की भी अध्यक्षता कर रहा है। ‘सेलाक’ एक ऐसा समूह है जिसमें लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के 33 देश शामिल हैं।

इससे भारत और ‘सेलाक’ के बीच संबंधों को मजबूत करने का एक और महत्वपूर्ण अवसर मिलता है।

इसी संदर्भ में कुछ दिनों बाद न्यूयॉर्क में भारत के विदेश मंत्री और ‘सेलाक’ के तहत लैटिन अमेरिका तथा कैरेबियाई देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक होगी। उस बैठक का उद्देश्य यह चर्चा करना होगा कि भारत और पूरे क्षेत्र के बीच संबंधों को और कैसे मजबूत किया जाए।

सवाल: आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक वैश्विक नेता के रूप में कैसे देखते हैं?

जवाब: जैसा कि मैंने पहले कहा, इस शिखर सम्मेलन की सफलता भारत की सफलता थी और यह प्रधानमंत्री मोदी की भी सफलता थी।

शनिवार और रविवार के दौरान आपने देखा होगा कि प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के कई महत्वपूर्ण नेताओं के साथ किस तरह बातचीत कर रहे थे। और सभी उनकी बात ध्यान से सुन रहे थे और उन्हें एक अहम और भरोसेमंद नेता के रूप में देख रहे थे।

मैं उन द्विपक्षीय बैठकों का हिस्सा नहीं था, लेकिन अंदरूनी बैठकों में यह माहौल स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। बैठक के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की कि ‘सभी मुद्दों पर सहमति’ बन गई है।

उन्‍होंने कहा क‍ि मेरे हिसाब से यह बात बताती है कि इस समय वैश्विक स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी की क्या भूमिका और महत्व है।

सवाल: एशिया और व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साथ उरुग्वे के संबंधों के लिए भारत कितना महत्वपूर्ण है?

जवाब: मैंने अपने कुछ यूरोपीय सहयोगियों से भी कहा है कि उरुग्वे के लिए यह भारत का समय है।

जब मैं कहता हूं कि यह भारत का समय है, तो मेरा मतलब है कि आज भारत पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत है। 20 या 10 साल पहले भी शायद हमने इसकी कल्पना नहीं की थी। इस वजह से आज एक बिल्कुल नई स्थिति पैदा हुई है।

मुझे पूरा विश्वास है कि अगर हम आर्थिक, सांस्कृतिक, खेल, सामाजिक और कुछ अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ठोस समझौते कर पाते हैं, तो उनका फायदा भारत और उरुग्वे दोनों को होगा।

उन्‍होंने कहा क‍ि आज की दुनिया में कोई भी देश अकेले आगे नहीं बढ़ सकता। यह वह समय है जब हमें ठोस समझौते करने चाहिए और ऐसे दौर में आगे बढ़ना चाहिए जहां दुनिया विभाजन, मतभेदों और संघर्षों का सामना कर रही है।

ऐसे देशों के बीच सहमति बनाने का समय है जिनकी सोच और दृष्टिकोण काफी हद तक मिलते-जुलते हैं। साथ ही हमें व्यावहारिक नतीजों पर ध्यान देना चाहिए।

मेरा मानना है कि यही हमारे भविष्य के सहयोग का आधार होगा।

उन्‍होंने कहा क‍ि इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने पहली बार अपने इतिहास में उरुग्वे में दूतावास खोला है।

दोनों देशों के युवा राजनयिकों की पीढ़ी के सदस्य के रूप में मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाले महीनों में भारत का विदेश मंत्रालय उरुग्वे आएगा, दूतावास का औपचारिक उद्घाटन करेगा और हमारे साथ मिलकर यह तय करेगा कि हम अपने समझौतों को जमीन पर कैसे उतार सकते हैं।

सवाल: क्या आपकी विदेश मंत्री एस. जयशंकर से भी मुलाकात हुई? वह बैठक कैसी रही?

जवाब: जी हां, विदेश मंत्री के साथ मेरी मुलाकात बहुत महत्वपूर्ण रही। हमारे सामने जो चुनौतियां हैं, उनमें से एक यह है कि अब भारत और उरुग्वे के रिश्तों को और गहरा और व्यापक बनाने का समय आ गया है। मेरा मानना है कि भारत और उरुग्वे के विदेश मंत्रालय इस सोच पर पूरी तरह एकमत हैं।

असल में, यह बात 2025 में रियो डी जेनेरियो में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और उरुग्वे के राष्ट्रपति यामांडू ओर्सी की मुलाकात से जुड़ी हुई है। कई वर्षों बाद दोनों नेताओं की यह पहली मुलाकात थी।

उस बैठक में दोनों नेताओं ने भारत और उरुग्वे के संबंधों को लंबे समय तक मजबूत बनाने की दिशा में चर्चा की थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने मुझे काफी प्रभावित किया। वह उस बैठक में अपने साथ एक कागज लेकर आए थे, जिस पर उन्होंने अगले 10 से 15 वर्षों में भारत-उरुग्वे संबंधों को लेकर अपना विजन लिखा हुआ था। यह एक दीर्घकालिक सोच और योजना थी।

अब हमारे दोनों विदेश मंत्रालयों के सामने यह जिम्मेदारी है कि पिछले साल प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच जो समझ और सहमतियां बनी थीं, उन्हें जमीन पर उतारा जाए।

हमारी लगभग आधे घंटे की बैठक के दौरान हमने एक बहुत दिलचस्प अभ्यास किया और अगले एक साल के लिए भारत-उरुग्वे संबंधों का एक रोडमैप तैयार किया।

हम कोशिश कर रहे हैं कि दोनों नेताओं के बीच हुई व्यापक और रणनीतिक चर्चाओं को वास्तविक कार्यों में बदला जाए।

आने वाले एक साल में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें हम मिलकर काम कर सकते हैं, जैसे आर्थिक सहयोग, राजनीतिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और कई अन्य क्षेत्र।

मुझे उम्मीद है कि अक्टूबर 2027 तक हम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल कर लेंगे। फिलहाल उरुग्वे के राष्ट्रपति यामांडू ओर्सी की भारत यात्रा पर विचार किया जा रहा है।

उस दौरान उनकी फिर से प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात हो सकती है। दोनों नेता यह समीक्षा कर सकते हैं कि 2025 के बाद से क्या प्रगति हुई है और भारत-उरुग्वे संबंधों को मजबूत करने के लिए हम क्या-क्या हासिल कर पाए हैं।

इसके बाद हम आगे के दीर्घकालिक कदमों पर भी चर्चा कर सकेंगे।

मेरा मानना है कि यह एक बेहद गंभीर और सोच-समझकर चलाया जा रहा प्रयास है। हमें साफ पता है कि हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है, और भारत तथा उरुग्वे की सरकारों के बीच इस बात पर काफी अच्छी समझ और सहमति है कि दोनों देशों के रिश्तों को किस तरह आगे ले जाना चाहिए।

सवाल: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर अमेरिका-ईरान विवाद पर आपका क्या कहना है?

जवाब: उरुग्वे एक शांतिप्रिय देश है और हम इन संघर्षों में शामिल नहीं हैं। लेकिन यह सच है कि दुनिया भर में संघर्ष और टकराव तेजी से बढ़ रहे हैं।

हम यूक्रेन-रूस युद्ध की बात कर सकते हैं या मध्य पूर्व की स्थिति की, लेकिन इसके अलावा भी दुनिया में कई ऐसे संघर्ष चल रहे हैं जिनमें हजारों लोग, खासकर महिलाएं और बच्चे, अपनी जान गंवा रहे हैं। यह आज की दुनिया के लिए बहुत दुखद और चिंताजनक स्थिति है।

उन्‍होंने कहा क‍ि मेरा पूरा विश्वास है कि इन संघर्षों का समाधान सिर्फ सैन्य कार्रवाई या युद्ध के जरिए नहीं निकाला जा सकता। जब तक हम गंभीर राजनीतिक बातचीत और ठोस वार्ता की दिशा में प्रयास नहीं करेंगे, तब तक इन समस्याओं का समाधान मुश्किल है।

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