राजनीति
पश्चिमी यूपी में भारत जोड़ो यात्रा को मिल रहा समर्थन
उत्तर प्रदेश के बागपत में भारत जोड़ो यात्रा की शुरूआत हो चुकी है। इस दौरान राहुल से मिलने के लिए किसान फूलों की भरी ट्राली लेकर पहुंचे। यात्रा के दौरान कुछ ढोल बजाते तो कोई घंटा बजाते नजर आए। इसके बाद बुधवार को पैदल ही सीधे मवीकलां गांव में पहुंचे। वहां से फिर रैली के साथ पैदल बागपत, बड़ौत की ओर कूच करेंगे। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा को जहां रालोद ने समर्थन दिया है, वहीं भाकियू पहले ही यात्रा में साथ रहने का ऐलान कर चुकी है। भाकियू नेताओं ने यात्रा में साथ रहने का कारण बताया कि कांग्रेस ने किसानों के लिए काफी काम किए है, इसलिए वे उनके साथ यात्रा में जुड़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त यात्रा का जगह-जगह भाकियू नेता द्वारा स्वागत भी किया गया। वहीं, किसानों के दूसरे संगठन भाकियू भानू गुट ने भारत जोड़ो यात्रा पर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस यात्रा का मकसद नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो की अपील करना है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने हमेशा धर्म और जाति के नाम पर लोगों को लड़ाकर तोड़ने का काम किया है। उसके विपरीत कार्य करने के लिए यह यात्रा निकल रही है। जिससे देश में रहने वाला हर व्यक्ति जोड़ा जा सके।
कांग्रेस के प्रवक्ता अंशू अवस्थी ने बताया कि यात्रा के दौरान सेना भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं ने राहुल गांधी से मुलाकात की, युवाओं ने अग्निवीर योजना के खिलाफ अपनी बात रखी। प्रसिद्ध राष्ट्रीय हास्य कलाकार राजीव निगम ने भारत जोड़ो यात्रा में शिरकत कर राहुल गांधी के साथ कदमताल की। सिविल सोसायटी के लोगों में विश्विद्यालय के प्रोफेसर, डॉक्टर्स भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
उन्होंने बताया कि राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा पूरे देश से गुजरती हुई कल 3 जनवरी को उत्तर प्रदेश पहुंची जहां पर लाखों लाख के जनसमूह ने दिल खोलकर राहुल गांधी का स्वागत किया और भारत जोड़ो यात्रा को अपना समर्थन दिया।
राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकर्ताओं-नेताओं ने अपने झंडे लहराकर भारत जोड़ो यात्रा का स्वागत किया। उन्होंने बताया कि सिविल सोसायटी के लोगों ने भी भारत जोड़ो यात्रा में शिरकत की और राहुल गांधी से मुलाकात कर उनके इस प्रशंसनीय कार्य के लिए शुभकामनाएं दी। सिविल सोसाइटी में प्रमुख रूप से विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर डॉक्टर एवं अन्य सामाजिक संगठन के सदस्य शामिल रहे।
ज्ञात हो कि भारत जोड़ो यात्रा उत्तर प्रदेश में 3 जनवरी से 5 जनवरी तक रहेगी और इसके बाद पुन: हरियाणा में प्रवेश कर श्रीनगर की तरफ बढ़ेगी।
राजनीति
क्या यूपी में भी बिहार जैसी सफलता दोहरा पाएंगे असदुद्दीन ओवैसी?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की कोशिशों को झटका लगता दिख रहा है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या ओवैसी बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी अपनी चुनावी मौजूदगी से विपक्ष के समीकरण बिगाड़ सकते हैं?
बिहार में एआईएमआईएम नेताओं ने दावा किया था कि उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन के साथ सीट बंटवारे को लेकर बातचीत की थी, लेकिन उन्हें सकारात्मक जवाब नहीं मिला। इसके बाद पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और मुस्लिम बहुल सीमावर्ती इलाकों में पांच सीटों पर जीत दर्ज की।
ओवैसी ने कथित तौर पर एक बार फिर भाजपा विरोधी दलों के साथ काम करने की इच्छा जताई है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) के नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर से उन्हें फिलहाल दूरी का सामना करना पड़ रहा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव एआईएमआईएम को औपचारिक गठबंधन में शामिल करने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि सपा अपने मुस्लिम मतदाता आधार में एआईएमआईएम की राजनीतिक पकड़ मजबूत होने से बचना चाहती है।
इससे पहले एआईएमआईएम ने 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ा था। रिपोर्टों के मुताबिक, ओवैसी गठबंधन के विकल्प तलाश रहे हैं, जबकि सपा और कांग्रेस ने उनसे दूरी बना रखी है।
बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों में एक बड़ा अंतर है। बिहार के सीमांचल क्षेत्र में एआईएमआईएम को मुस्लिम मतदाताओं का एक मजबूत और भौगोलिक रूप से केंद्रित आधार मिला है। इसी आधार पर पार्टी ने 2020 में पांच विधानसभा सीटें जीती थीं और 2025 में भी अपना प्रदर्शन दोहराया।
सीमांचल में किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिले शामिल हैं। यहां पार्टी ने खुद को उन मुस्लिम मतदाताओं के लिए एक विकल्प के तौर पर पेश किया, जिन्हें राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की शिकायत थी। हालांकि, आलोचकों ने ओवैसी पर विपक्षी वोटों को बांटने का आरोप लगाया। वहीं, एआईएमआईएम का कहना रहा कि वह केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व के खालीपन को भर रही है। बाद में राजनीतिक विश्लेषकों ने भी माना कि सीमांचल के कुछ इलाकों में एआईएमआईएम की मौजूदगी से विपक्षी वोटों का बंटवारा हुआ और महागठबंधन के लिए मुस्लिम मतों को एकजुट करना मुश्किल हुआ।
उत्तर प्रदेश में स्थिति अलग है। यहां मुस्लिम मतदाता किसी एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में केंद्रित होने के बजाय रोहिलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध के कुछ हिस्सों और पूर्वी जिलों में फैले हुए हैं। इसके अलावा, 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सपा भाजपा विरोधी मुस्लिम मतदाताओं के लिए प्रमुख राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरी है।
कई मुस्लिम मतदाता राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ चुनावी जीत की संभावनाओं को भी प्राथमिकता देते हैं। इससे सपा के पक्ष में रणनीतिक मतदान की प्रवृत्ति मजबूत हुई है। ऐसे में ओवैसी के सामने यह चुनौती होगी कि वह मतदाताओं को कैसे भरोसा दिलाते हैं कि एआईएमआईएम को वोट देने से प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, न कि विपक्ष की चुनावी संभावनाएं कमजोर होंगी।
इसके बावजूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश और नेपाल तथा बिहार की सीमा से सटे उन जिलों में त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिल सकते हैं, जहां मुस्लिम आबादी अच्छी संख्या में है और एआईएमआईएम मजबूत उम्मीदवार उतारती है।
इस बीच, मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ एआईएमआईएम के संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चा है। इसे कथित ‘दलित-मुस्लिम’ या ‘भीम-मीम’ फॉर्मूले से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक मायावती इस तरह के गठबंधन को लेकर अब तक अनिच्छुक दिख रही हैं। बसपा की ओर से संकेत मिले हैं कि पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना पसंद करेगी।
यदि दोनों दलों के बीच कोई चुनावी समझ बनती भी है, तो उसका दलित वोटों पर कितना असर होगा, इसको लेकर सवाल हैं। बसपा का मूल जाटव वोट बैंक ऐतिहासिक रूप से गठबंधन सहयोगियों के बजाय मायावती के प्रति अधिक वफादार रहा है।
अतीत में दलित-मुस्लिम गठजोड़ के प्रयोगों से भी बड़े पैमाने पर वोटों का एक-दूसरे के पक्ष में हस्तांतरण देखने को नहीं मिला है। वहीं, गैर-जाटव दलित समुदायों के मतदान व्यवहार में हाल के चुनावों में बदलाव देखने को मिला है और इनके कुछ वर्गों का झुकाव भाजपा की ओर भी रहा है।
कुल मिलाकर, बिहार का चुनावी अनुभव बताता है कि एआईएमआईएम को किसी पूरे राज्य में बड़ी राजनीतिक ताकत बनने की जरूरत नहीं है। किसी सीमित भौगोलिक क्षेत्र में मजबूत और केंद्रित वोट आधार भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। उत्तर प्रदेश में पार्टी ऐसा आधार तैयार कर पाती है या नहीं, यह 2027 के चुनाव में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
राष्ट्रीय समाचार
जम्मू-कश्मीर निजी विश्वविद्यालय नियम-2026 लागू, सीएम उमर अब्दुल्ला ने शिक्षा मंत्री को दी बधाई

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शिक्षा मंत्री शमीम फिरदौस को जम्मू-कश्मीर निजी विश्वविद्यालय नियम, 2026 (प्राइवेट यूनिवर्सिटीज रूल्स, 2026) की अधिसूचना जारी होने पर बधाई दी है। उन्होंने इसे क्षेत्र में उच्च शिक्षा की पहुंच बढ़ाने और शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नए नियम जम्मू-कश्मीर में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना और संचालन के लिए एक व्यापक नियामक ढांचा प्रदान करते हैं। इससे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों के लिए जम्मू-कश्मीर में अपने परिसर स्थापित करने का अनुकूल माहौल बनेगा।
उन्होंने कहा कि 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच (स्क्रूटनी) सहित सरल अनुमोदन प्रक्रिया उच्च शिक्षा क्षेत्र में निवेश करने के इच्छुक संस्थानों के लिए व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाएगी। साथ ही, यह ढांचा जवाबदेही, गुणवत्ता आश्वासन और निर्धारित शैक्षणिक मानकों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी निगरानी की भी व्यवस्था करता है।
मुख्यमंत्री ने स्थानीय हितों की रक्षा पर जोर देते हुए कहा कि छात्र प्रवेश, शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों में जम्मू-कश्मीर के निवासियों के लिए कम से कम 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान स्थानीय युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के अधिक अवसर सुनिश्चित करेगा।
उन्होंने कहा कि नियमों में प्रवेश प्रक्रिया, फीस ढांचे और शैक्षणिक मानकों की निगरानी के लिए एक समर्पित नियामक व्यवस्था का भी प्रावधान है। नियमों के उल्लंघन, अनियमित प्रवेश, अधिक फीस वसूली, अमान्य डिग्री जारी करने, योग्य शिक्षकों की कमी तथा अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसी गड़बड़ियों पर कड़ी कार्रवाई और दंड का प्रावधान किया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नए नियमों से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम), चिकित्सा, कानून, बिजनेस स्टडीज और लिबरल आर्ट्स जैसे विभिन्न क्षेत्रों में नए संस्थानों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा। इससे छात्रों को अधिक शैक्षणिक विकल्प मिलेंगे, अंतर्विषयक (इंटरडिसिप्लिनरी) शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा और शिक्षण, अनुसंधान तथा नवाचार के नए अवसर पैदा होंगे।
उन्होंने विश्वास जताया कि प्रतिष्ठित संस्थानों के आने से स्थानीय छात्रों को अपने क्षेत्र में ही वैश्विक मानकों वाली गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होगी। साथ ही, इससे देश और विदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को आकर्षित करने तथा अनुसंधान सहयोग और संस्थागत साझेदारी को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने दोहराया कि सरकार एक पारदर्शी, पूर्वानुमेय और निवेशक-अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, जो जिम्मेदार निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ छात्रों के हितों की रक्षा और उच्च शैक्षणिक गुणवत्ता को सुनिश्चित करे।
उन्होंने स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री सकीना इट्टू के योगदान की भी सराहना की। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब इस वर्ष बजट सत्र के दौरान जम्मू-कश्मीर विधानसभा में निजी विश्वविद्यालय विधेयक पारित हुआ था, तब शिक्षा विभाग का कार्यभार उनके पास था और उन्होंने विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इन नियमों की अधिसूचना उच्च शिक्षा के विकास और आधुनिकीकरण के लिए शुरू किए गए विधायी प्रयासों को प्रभावी संस्थागत ढांचे में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
शी चिनफिंग ने ऑस्ट्रिया के चांसलर क्रिश्चियन स्टॉकर से मुलाकात की

चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 6 नवंबर को पेइचिंग में स्थित जन वृहद भवन में ऑस्ट्रिया के चांसलर क्रिश्चियन स्टॉकर से मुलाकात की, जो चीन की आधिकारिक यात्रा पर हैं।
इस दौरान, शी चिनफिंग ने कहा कि इस वर्ष चीन और ऑस्ट्रिया के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 55वीं वर्षगांठ है। तब से, दोनों पक्षों ने आपसी सम्मान, खुलेपन और समावेशिता तथा पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों को कायम रखते हुए, राजनीतिक आपसी विश्वास को निरंतर सुदृढ़ किया है और व्यावहारिक सहयोग में फलदायी परिणाम प्राप्त किए हैं, जिससे दोनों देशों के लोगों को ठोस लाभ प्राप्त हुए हैं। विश्वास और मित्रता चीन-ऑस्ट्रिया संबंधों के अनमोल गुण हैं, जो सामाजिक व्यवस्थाओं, ऐतिहासिक संस्कृतियों और विकास के विभिन्न चरणों में व्याप्त अंतरों से परे हैं।
शी चिनफिंग ने चीन और ऑस्ट्रिया के बीच राजनीतिक आपसी विश्वास को मजबूत करते हुए उच्च स्तरीय आदान-प्रदान की सकारात्मक गति को जारी रखने, आदान-प्रदान के माध्यम से विश्वास का निर्माण करने और संदेह को दूर करने पर जोर दिया, उद्देश्य है कि भविष्य के सहयोग के लिए एक ठोस राजनीतिक आधार तैयार हो सके।
उन्होंने कहा कि चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-2030) के दौरान, देश का लक्ष्य उभरते उद्योगों को बढ़ावा देना, पारंपरिक उद्योगों का उन्नयन करना और सेवा क्षेत्र पर विशेष ध्यान देते हुए अपने खुलेपन को और अधिक विस्तारित करना है। “चीन अवसर 2.0” से न केवल बाजार लाभ प्राप्त होंगे, बल्कि नवाचार लाभ भी मिलेंगे। चीन, ऑस्ट्रिया के साथ नई ऊर्जा वाहनों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डिजिटल अर्थव्यवस्था और हरित विकास जैसे उभरते क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग का विस्तार करने के लिए तत्पर है, जिससे आर्थिक और व्यापारिक विकास के नए इंजन तैयार होंगे। उन्होंने कहा कि चीन-ऑस्ट्रिया मित्रता का एक व्यापक सामाजिक आधार है, दोनों पक्षों को सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना चाहिए, लोगों के बीच आदान-प्रदान को सुगम बनाना चाहिए और दोनों देशों के लोगों के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित करने की आवश्यकता है।
इसके अलावा, मुलाकात में शी चिनफिंग ने जोर देते हुए कहा कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय स्थिति जटिल और अस्थिर है, जिसमें एकतरफावाद और संरक्षणवाद को बल मिल रहा है। चीन और ऑस्ट्रिया को मिलकर वास्तविक बहुपक्षवाद का अभ्यास करना चाहिए, मुक्त व्यापार का समर्थन करना चाहिए और अधिक न्यायपूर्ण और समान वैश्विक शासन प्रणाली के निर्माण में योगदान देना चाहिए। उनका कहना है कि बढ़ता और मजबूत होता चीन यूरोप की समस्याओं का मूल कारण नहीं है, बल्कि एक ऐसा सहयोगी और सहयात्री है जो यूरोप को इन समस्याओं को हल करने में मदद कर सकता है। चीन और यूरोप को सहयोग पर ध्यान केंद्रित करते हुए संवाद और परामर्श के माध्यम से व्यापारिक मतभेदों को सुलझाने के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए और पारस्परिक लाभ, सभी पक्षों के लिए लाभकारी परिणाम और साझा विकास प्राप्त करना चाहिए।
वहीं, स्टॉकर ने कहा कि ऑस्ट्रिया-चीन संबंध अच्छी तरह से विकसित हो रहे हैं, और राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद से पिछले 55 वर्षों में दोनों देशों ने लगातार एक-दूसरे पर भरोसा और समर्थन दिखाया है। ऑस्ट्रिया, ऑस्ट्रिया-चीन मैत्रीपूर्ण रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है, एक-चीन नीति का पालन करता है, और व्यापार, निवेश, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, नवाचार आदि क्षेत्रों में चीन के साथ व्यापक सहयोग को मजबूत करने, सांस्कृतिक और जन-समुदाय आदान-प्रदान को बढ़ावा देने और वर्षों से स्थापित सहयोग और विश्वास के आधार पर द्विपक्षीय संबंधों में नए विकास को गति देने के लिए तत्पर है।
इसके साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि ऑस्ट्रिया यूरोपीय संघ-चीन संबंधों के विकास का सक्रिय रूप से समर्थन करता है और आशा करता है कि दोनों पक्ष स्पष्ट संवाद और परामर्श के माध्यम से आर्थिक और व्यापारिक मतभेदों का समाधान करेंगे। ऑस्ट्रिया बहुपक्षवाद को कायम रखते हुए बहुपक्षीय समन्वय को मजबूत करने, सतत विकास को बढ़ावा देने, जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का समाधान करने और वैश्विक समृद्धि और स्थिरता की रक्षा के लिए चीन के साथ मिल कर काम करने को तत्पर है।
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