अंतरराष्ट्रीय समाचार
हम उन पर भरोसा नहीं करते’: पाकिस्तान की यूएस-ईरान बातचीत में मध्यस्थता की कोशिश पर इजरायली राजदूत
भारत में इजरायल के राजदूत रियुवेन अजार ने कहा कि इजरायल उन देशों पर भरोसा नहीं करता है जिनके साथ उसके डिप्लोमैटिक संबंध नहीं हैं। जब न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ बातचीत के दौरान इजरायली राजदूत से पूछा गया कि क्या मौजूदा हालात में इजरायल पाकिस्तान पर भरोसा करता है, तो उन्होंने यह प्रतिक्रिया दी। उन्होंने साफ कर दिया है कि इजरायल पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करता है।
अजार ने इस बात पर जोर दिया कि इजरायल का नजरिया उसके अपने और खास साथियों के अंदाज से तय होता है। इजरायली राजदूत ने आईएएनएस से कहा, “हम ऐसे देश पर भरोसा नहीं करने जा रहे हैं जिसके हमारे साथ डिप्लोमैटिक संबंध नहीं हैं। हम अपने और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर भरोसा करते हैं।”
दरअसल, जब से अमेरिकी राष्ट्रपति ने ये दावा किया कि ईरान और अमेरिका हमले को रोकने के लिए बातचीत की पहल हो रही है, तब से पाकिस्तान ने दोनों पक्षों में बातचीत की मध्यस्थता की पेशकश की। इसी के बाद इजरायली राजदूत ने पाकिस्तान को लेकर यह प्रतिक्रिया दी है।
बता दें, एक तरफ ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच भारी संकट जारी है, तो वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी भारी तनाव है। ऐसे में अपने देश के साथ जारी झगड़े को सुलझाने के बजाए पाकिस्तानी सरकार ने अमेरिका और ईरान में सुलह कराने की पहल कर दी। पाकिस्तान ने खुद को बातचीत के लिए एक संभावित जगह के तौर पर पेश किया है। इसके लिए उसने वॉशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ अपने संबंधों का हवाला दिया है, जबकि वह अफगानिस्तान में आम लोगों और आम इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले करता रहता है।
उनसे पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में अमेरिका के कथित निवेश प्लान और इसका भारत-इजरायल संबंधों पर पड़ने वाले असर के बारे में पूछा गया। अजार ने कहा कि यह मामला सीधे तौर पर इजरायल से जुड़ा नहीं है, जबकि उन्होंने नई दिल्ली के साथ करीबी सहयोग की बात दोहराई।
उन्होंने कहा, “इजरायल इससे जुड़ा नहीं है। भारत के साथ हमारा बहुत बड़ा सहयोग है। खुशकिस्मती से, प्रधानमंत्री मोदी के दौरे की वजह से, हम रक्षा क्षेत्र और दूसरे क्षेत्रों में बड़े समझौते को आगे बढ़ा पाए हैं और उन पर हस्ताक्षर कर पाए हैं।”
बता दें, इजरायल ने पहले भी आतंकी घटनाओं के बाद भारत को मजबूत डिप्लोमैटिक समर्थन दिया है। जम्मू और कश्मीर के पहलगाम हमले के बाद इजरायल उन पहले देशों में से था जिसने भारत के सेल्फ-डिफेंस के अधिकार के लिए एकजुटता और समर्थन दिखाया था। बता दें, पहलगाम हमले में पाकिस्तान के समर्थन वाले आतंकवादियों ने 26 पर्यटकों की हत्या की थी।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हमले की निंदा करने के लिए खुद प्रधानमंत्री मोदी से बात की और इजरायल में 7 अक्टूबर को हुए हमलों से तुलना करते हुए एकजुटता दिखाई। उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं होना चाहिए।
पहलगाम हमले के बाद, भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी इंफ्रास्ट्रक्चर को टारगेट करते हुए ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। अजार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह भी कहा था कि इजरायल भारत के सेल्फ-डिफेंस के अधिकार का समर्थन करता है और कहा कि “आतंकवादियों को पता होना चाहिए कि उनके जघन्य अपराधों से छिपने की कोई जगह नहीं है।”
नेतन्याहू उन पहले ग्लोबल नेताओं में से थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से भारत के जवाब का समर्थन किया और दोहराया कि हर देश को अपने नागरिकों को बॉर्डर पार के खतरों से बचाने का मौलिक अधिकार है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
ईरान के जहाज पर यूक्रेन के हमले का जवाब देना जरूरी : विदेश मंत्री अब्बास अराघची

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि कैस्पियन सागर में ईरान के कमर्शियल जहाज पर यूक्रेन के हमले को बिना जवाब दिए ऐसे नहीं छोड़ा जा सकता।
ईरानी विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की पर आरोप लगाया कि उन्होंने इजरायल के कहने पर यूएन चार्टर का खुला उल्लंघन करके यूरोप को अपनी लड़ाई में घसीटने का आदेश दिया।
न्यूज एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्री अराघची ने कहा कि उन्होंने शनिवार और रविवार को यूरोपीय संघ की विदेश नीति की प्रमुख काजा कैलास और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन पर हुई बातचीत में स्पष्ट कर दिया था कि कीव में मुफ्तखोर ने जो किया, उसे बिना जवाब दिए नहीं जाने नहीं दिया जा सकता।
ईरानी विदेश मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, अराघची ने शनिवार को ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास के साथ एक फोन कॉल में यह बात कही। इसके साथ ही दोनों पक्षों ने हाल के क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर चर्चा की।
बयान के अनुसार, अराघची ने यूक्रेनी हमले की निंदा की और ईयू, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इसके गुनाहगारों और समर्थकों को जिम्मेदार ठहराने की अपील की।
इसमें आगे कहा गया कि दोनों पक्षों ने होर्मुज स्ट्रेट में हो रहे घटनाक्रम पर भी बात की और क्षेत्रीय तनाव को मैनेज करने के लिए डिप्लोमैटिक पहल की जरूरत पर जोर दिया।
एक अलग बयान में मंत्रालय ने कहा कि ईरान ने हमले को लेकर शनिवार को तेहरान में यूक्रेन के चार्ज डी’अफेयर्स को बुलाया और औपचारिक रूप से इस काम की निंदा करते हुए विरोध पत्र दिया।
ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह हमला शनिवार को स्थानीय समय के हिसाब से सुबह 3:00 बजे हुआ और इसमें जहाज में धमाका हुआ और एक नाविक की मौत हो गई।
अर्धसरकारी मेहर न्यूज एजेंसी ने रविवार को बताया कि हमले में तीन नाविक भी घायल हुए हैं।
ईरान के उत्तरी गिलान प्रांत के गवर्नर हादी हकशेनास के हवाले से बताया गया कि स्टील लादे इस जहाज पर उस समय हमला हुआ, जब वह रूस के अस्त्राखान बंदरगाह से ईरान के गिलान प्रांत स्थित अंजली बंदरगाह की ओर जा रहा था।
हकशेनास ने कहा कि हमले में जहाज का ब्रिज (नियंत्रण कक्ष) पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे वह अपनी यात्रा जारी रखने में असमर्थ हो गया। उन्होंने कहा कि इस घटना को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कानूनी माध्यमों से उठाया जाएगा।
वहीं, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने शनिवार को दावा किया कि यूक्रेनी बलों ने कैस्पियन सागर में एक रूसी युद्धपोत और ईरान से जुड़े सैन्य सामान की ढुलाई में इस्तेमाल किए जा रहे जहाजों को निशाना बनाया है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
भारत-तंजानिया के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर, विदेश कार्यालय परामर्श में कई मुद्दों पर हुई चर्चा

भारत और तंजानिया ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने को लेकर बातचीत की। दोनों देशों के बीच दार एस सलाम में हुए विदेश कार्यालय परामर्श में व्यापार, रक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और विकास सहयोग समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि भारत और तंजानिया के बीच विदेश कार्यालय परामर्श (एफओसी) 22 जुलाई 2026 को तंजानिया के दार एस सलाम में आयोजित किया गया। इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत के विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (ईएंडएसए) जनेश काइन और तंजानिया के विदेश मामलों एवं पूर्वी अफ्रीकी सहयोग मंत्रालय के एशिया और ऑस्ट्रेलिया विभाग की निदेशक फेलिस्टर रुगाम्बवा ने की।
एफओसी के दौरान जनेश काइन ने तंजानिया के विदेश मामलों एवं पूर्वी अफ्रीकी सहयोग मंत्रालय के स्थायी सचिव राजदूत डॉ. सैमवेल विलियम शेलुकिंडो से भी मुलाकात की।
मंत्रालय ने बताया कि बैठक में दोनों देशों ने आपसी संबंधों की समीक्षा की और व्यापार व निवेश, विकास सहयोग, रक्षा और सुरक्षा सहयोग, डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, कृषि, स्वास्थ्य, संस्कृति और लोगों के बीच संबंधों जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा की।
मंत्रालय के अनुसार, दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से जल्द ही संयुक्त आयोग बैठक (जेसीएम) और संयुक्त रक्षा सहयोग समिति की बैठक आयोजित करने पर सहमति जताई। इसके अलावा, दोनों देशों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपने विचार साझा किए, जिनमें दोनों की समान रुचि है।
मंत्रालय ने बताया कि दोनों पक्षों ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल और सहयोग की सराहना की। दोनों देशों ने यह भी सहमति जताई कि विदेश कार्यालय परामर्श का अगला दौर भारत में आपसी सुविधा के अनुसार किसी तारीख पर आयोजित किया जाएगा।
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ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ अहम परमाणु समझौते को मंजूरी दीः रिपोर्ट

‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से मंगलवार को रिपोर्ट दी कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक अहम परमाणु समझौते को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी है।
इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है और अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। इस 30 साल के समझौते से सऊदी अरब को एक सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम तक पहुंच मिल जाएगी।
‘द जर्नल’ के अनुसार, समझौते को इस तरह से तैयार किया गया है कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के उभरते हुए न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर के केंद्र में रहें और विदेशी कंपनियां इससे बाहर रहें। यह डील वॉशिंगटन और रियाद के बीच न्यूक्लियर सहयोग के बड़े विस्तार का संकेत हो सकती है। इससे मिडिल ईस्ट में संवेदनशील न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के प्रसार को लेकर कांग्रेस में चिंताएं फिर से बढ़ सकती हैं।
एक अहम प्रावधान के तहत, अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में यूरेनियम एनरिचमेंट (संवर्धन) प्लांट बना सकती हैं। ‘जर्नल’ के अनुसार, यह प्रोजेक्ट तभी आगे बढ़ेगा जब अमेरिका और सऊदी अरब की संयुक्त स्टडी में यह नतीजा निकले कि ऐसे प्लांट की जरूरत है।
यूरेनियम एनरिचमेंट से आम नागरिकों के इस्तेमाल वाले न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए ईंधन बनाया जा सकता है। इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, अगर बहुत ऊंचे स्तर पर किया जाए तो न्यूक्लियर हथियारों के लिए भी सामग्री बनाई जा सकती है। दोहरे इस्तेमाल की इसी क्षमता की वजह से एनरिचमेंट लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय न्यूक्लियर बातचीत के सबसे संवेदनशील हिस्सों में से एक रहा है।
ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि सीधे अमेरिकी दखल से सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम पर वॉशिंगटन का असर बढ़ेगा। तर्क है कि अमेरिका की भागीदारी से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को सैन्य मकसद के लिए इस्तेमाल होने से रोकने में भी मदद मिलेगी।
अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने पिछले हफ्ते के आखिर में इस समझौते को मंजूरी दे दी थी। उम्मीद है कि अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान बुधवार को इस पर हस्ताक्षर करेंगे।
राइट ने अप्रैल 2025 में इस क्षेत्र की अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान अपने सऊदी समकक्ष के साथ प्रस्तावित सहयोग पर चर्चा की थी। इस समझौते से रिएक्टर बनाने, परमाणु ईंधन सेवाएं देने और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के काम में लगी अमेरिकी कंपनियों को बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिल सकते हैं।
सऊदी अरब तेल के अलावा अपने ऊर्जा स्रोतों और अर्थव्यवस्था में विविधता लाने की कोशिश के तहत नागरिक परमाणु ऊर्जा विकसित करना चाहता है। सऊदी अरब का यह भी तर्क है कि परमाणु ऊर्जा से देश में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने और निर्यात के लिए अधिक तेल बचाने में मदद मिल सकती है।
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