राष्ट्रीय समाचार
वाधवानी फाउंडेशन 200 करोड़ रुपये लघु उद्योगों की मदद के लिए देगी
वाधवानी फाउंडेशन (डब्ल्यूएफ) ने कोविड-19 के कारण आर्थिक नुकसान उठाने वाले लघु और मझोले (एसएमई) की मदद करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मचारियों में कोविड-19 से संबंधित ज्ञान व कौशल में सुधार लाने की दृष्टि से 200 करोड़ रुपये आर्थिक अनुदान देने का संकल्प लिया है। वाधवानी फाउंडेशन ने बुधवार को कहा कि वह ‘सहायता’ नामक इस बड़ी पहल को संचालित करने के लिए साझेदारों का एक इकोसिस्टम बना रहा है जिसमें सरकार के विभिन्न मंत्रालय, एजेंसी, बैंक और कनसलटिंग फर्म शामिल होंगे।
सहायता नामक इस पहल में तीन कार्यक्रम संलग्न हैं – सहायता बिजनेस स्टेबिलिटी प्रोग्राम, इसके तहत 10,000 तक लघु और मझोले उद्योगों के कारीगरों को परिवर्तनकारी व्यवसाय परामर्श प्रदान किए जाएंगे जिससे उन्हें अपने कौशल क्षेत्र में बने रहने, आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।
दूसरा है सहायता कोविड-19 स्किलिंग प्रोग्राम जिसका मकसद शुरुआत में 5,000 मौजूदा और नए सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मियों को कुशल बनाना है और बाद में इस संख्या को 50,000 प्रति महीने तक के हिसाब से आगे बढ़ाना है और आखिरकार दस लाख मौजूदा और नए स्वास्थ्य कर्मियों को अपनी सेवाएं प्रदान कराना है।
तीसरा है सहायता पब्लिक हेल्थ इनोवेशन प्रोग्राम जिसके तहत भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी के नवाचार में गति लाने की दृष्टि से 50 स्टार्टअप और शुरुआती स्तर की कंपनियों में नवाचार अनुदान या निवेश प्रदान की जाएगी।
इस गैर-लाभकारी फाउंडेशन ने कहा कि प्रत्येक पुरस्कार 25 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये के बीच होगा।
वाधवानी फाउंडेशन के संस्थापक और अध्यक्ष रोमेश वाधवानी ने अपने एक बयान में कहा, “कोविड-19 से स्वास्थ्य और आर्थिक दोनों संकट पैदा हुए हैं जिससे खासकर लघु और मझोले उद्योगों व रोजगार को भारी क्षति पहुंची है। एसएमई को वित्तीय और उचित परामर्श के अभाव में छोटी व लंबी अवधि में भारी नुकसान होगा।”
उन्होंने आगे कहा, “सहायता में फाउंडेशन के बड़े निवेश से 10,000 एसएमई कर्मियों को जो सलाह दी जाएगी उससे सरकार के वृहद प्रोत्साहन पैकेज के प्रयासों में मदद मिलेगी। इन कारीगरों को उचित परामर्श सेवाएं प्रदान कर उन्हें अपने कारोबार को आगे बढ़ाने, उनमें स्थिरता लाने में उनकी मदद की जाएगी जिससे अन्तत: सफलता हासिल कर 10,000 रोजगार बचाने या बनाने में मदद मिलेगी।”
फाउंडेशन ने कहा कि उसने पिछले 90 दिनों में तीनों सहायता कार्यक्रमों का निर्माण किया है और इन्हें तेजी से लागू करने के काम की शुरुआत अगस्त से की जाएगी।
वाधवानी फाउंडेशन के अध्यक्ष और सीईओ अजय केला ने कहा, “वाधवानी फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से इस कार्यक्रम के लिए एसएमई का चयन करने के लिए सिडबी, क्लिक्स कैपिटल, आईआईएफएल फाइनेंस, पावर 2 एसएमई और मैग्मा फिनकॉर्प के साथ साझेदारी पर हस्ताक्षर किए हैं। अगस्त से शुरू होने वाले इस सहायता कार्यक्रम में हर महीने 50 एसएमई शामिल किए जाएंगे जिसमें धीरे-धीरे 500 एसएमई प्रति महीने तक की वृद्धि होती जाएगी।”
वाधवानी फाउंडेशन ने कहा कि वह अगस्त, 2020 में मेक्सिको में सहायता को लॉन्च करेंगे और 2021 में ब्राजील में कार्यक्रम के विस्तार के लिए योजनाएं बनाई जाएंगी और 2021 के मध्य में अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, फिलीपींस और बांग्लादेश) में इसका प्रसार किया जाएगा।
राजनीति
आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए लगातार उठाता रहेगा कदम : वित्त मंत्री

रुपए में गिरावट पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की प्राथमिकता घरेलू मुद्रा के किसी स्तर का बचाव करना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित माहौल तैयार करना है।
राष्ट्रीय राजधानी में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में उन्होंने कहा कि वैश्विक कारणों के चलते रुपए पर दबाव के बीच केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए लगातार कदम उठाता रहेगा।
उन्होंने कहा, “आरबीआई रुपए में स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने नियामक उपायों के जरिए अहम कोशिशें कर रहा है। वे रुपए को किसी खास स्तर पर बनाए करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।”
सीतारमण ने कहा, “आगे भी इसी तरह के उपाय जारी रहेंगे।”
उनका यह बयान तब आया है जब हाल ही में भारतीय रुपए में गिरावट के बाद मुद्रा बाजार को स्थिर करने के लिए केंद्रीय बैंक ने कई कदम उठाए थे।
इससे पहले अक्टूबर में, केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए एक खास डॉलर लिक्विडिटी विंडो खोली थी, कैंसल किए गए फॉरेन-एक्सचेंज डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स को फिर से बुक करने के नियमों को कड़ा किया था और बिना अंडरलाइंग एक्सपोजर वाले कुछ डेरिवेटिव ट्रांजैक्शन की लिमिट को 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दिया था।
हालांकि, इन उपायों से मार्केट को भरोसा मिला और रुपया मजबूत होकर 94.50 प्रति डॉलर के स्तर पर आ गया है।
वित्त मंत्री सीतारमण ने कहा कि नीति-निर्माता राजकोषीय अनुशासन और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार के जरिए मजबूत व्यापक आर्थिक आधार बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि हाल ही में मुद्रा में आई ज्यादातर कमजोरी ऐसे कारणों से है जो भारत के नियंत्रण से बाहर हैं।
उन्होंने कहा, “पिछले डेढ़ साल में रुपए की कीमत में काफी गिरावट आई है और इसे रोकने के लिए उपाय किए गए हैं।”
उनके अनुसार, “लेकिन इसके पीछे कई कारण हैं और मेरा मानना है कि उनमें से ज्यादातर देश के बाहर की चुनौतियों से जुड़े हैं।”
मंगलवार को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले रुपया 77 पैसे मजबूत होकर 95.05 पर पहुंच गया।
भारत की आर्थिक मजबूती पर भरोसा जताते हुए मंत्री ने कहा कि केंद्रीय बैंक सतर्क रहेगा और अगर जरूरत पड़ी तो मुद्रा बाजार में अस्थिरता को रोकने के लिए अतिरिक्त कदम उठाएगा।
राष्ट्रीय समाचार
भारत को बढ़ती ऊर्जा मांग के चलते तेजी से बढ़ानी होगी कोयला आधारित क्षमता: सीईए चेयरमैन

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के चेयरमैन घनश्याम प्रसाद ने मंगलवार को कहा कि भारत को अपनी तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग को बनाए रखने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी के विस्तार के साथ पहले लगाए गए अनुमान से अधिक कोयला आधारित ऊर्जा क्षमता को तैयार करना होगा।
इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक कार्यक्रम में सीईए प्रमुख ने कहा कि मांग के रुझानों की वजह से नीति निर्मताओं को आने वाले दशक में भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कोयले से बिजली बनाने की क्षमता बढ़ाने के पैमाने पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।
इसके अलावा, सरकार ने पिछले साल अनुमान लगाया था कि 2035 तक देश की कोयले से चलने वाली बिजली उत्पादन क्षमता में 97 गीगावाट की बढ़ोतरी होगी, जिससे कुल स्थापित कोयला आधारित ऊर्जा क्षमता लगभग 307 गीगावाट हो जाएगी।
हालांकि, बिजली की खपत में उम्मीद से ज्यादा तेजी से हो रही बढ़ोतरी भविष्य की जरूरतों को काफी बढ़ा सकती है।
प्रसाद ने कहा, “मांग बढ़ रही है और जैसे-जैसे मांग बढ़ती है, हमें उस मांग को पूरा करने के लिए आपूर्ति के स्थिर स्रोतों की जरूरत है।”
प्रसाद के अनुसार, कोयले से चलने वाली अतिरिक्त क्षमता की जरूरतें पहले के अनुमानों से ज्यादा हो सकती हैं और मौजूदा विस्तार योजनाओं के अलावा 105 गीगावाट से 150 गीगावाट तक पहुंच सकती हैं।
उनका यह बयान उस चुनौती को दिखाता है जिसका सामना भारत कर रहा है, क्योंकि देश तेजी से बढ़ती बिजली की खपत और साफ ऊर्जा की ओर बढ़ने के अपने लंबे समय के लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
प्रसाद ने कहा कि इस साल बिजली की मांग में काफी तेजी आई है और रोजाना की पीक डिमांड पिछले साल के मुकाबले 45 गीगावाट से 50 गीगावाट ज्यादा रही है।
इसके अलावा, मानसून के मौसम में कम बारिश की वजह से पनबिजली उत्पादन भी कम हुआ है, जिससे सप्लाई की कमी को पूरा करने के लिए थर्मल पावर प्लांट पर निर्भरता बढ़ गई है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में बिजली की कमी बढ़कर 560 मिलियन किलोवाट-घंटे हो गई, जो अगस्त 2023 के बाद सबसे ज्यादा स्तर था और यह तब हुआ जब कोयले से चलने वाले पावर प्लांट से बिजली का उत्पादन ज्यादा था।
राष्ट्रीय समाचार
जम्मू-कश्मीर : डोडा में गाड़ी पलटने से चार लोग घायल, दो महिलाएं भी शामिल

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में सड़क हादसे में कम से कम चार लोग घायल हो गए। अधिकारियों ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी।
अधिकारियों ने बताया कि जिले के भल्ला इलाके में शेनाई के पास एक गाड़ी के पलटने से उसमें सवार चार लोग घायल हो गए, जिनमें दो महिलाएं भी शामिल हैं।
केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “अभी-अभी डोडा से भदरवाह जा रही एक मिनी-बस के साथ हुए दुर्भाग्यपूर्ण सड़क हादसे के बारे में पता चलने पर डोडा के डीसी कृष्ण लाल से बात की।”
मंत्री ने कहा, “घायल यात्रियों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया है और उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है। अच्छी बात यह है कि किसी की मौत नहीं हुई है। हर जरूरी मदद दी जा रही है। मेरा कार्यालय जिला प्रशासन के संपर्क में है।”
घायलों की पहचान; आशिक हुसैन (35), पिता गुलाम रसूल (भदरवाह के गोठा के निवासी); मोहम्मद जावेद (48), पिता तालिब हुसैन और उनकी पत्नी रुबीना बेगम (46) (दोनों भल्ला के ब्रासू के निवासी); और इंशा (35), पत्नी राशिद अहमद (भदरवाह की निवासी); के रूप में हुई है।
इस बीच, पुलिस ने घटना का संज्ञान लिया है और आगे की जानकारी की पुष्टि की जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी जिलों (जैसे रामबन, डोडा, किश्तवाड़, उधमपुर और बड़गाम के कुछ हिस्सों) में सड़क हादसे मुश्किल भौगोलिक स्थिति, खराब मौसम और मानवीय या बुनियादी ढांचे से जुड़ी वजहों से होते हैं।
खतरनाक इलाके, खराब सड़क बनावट, संकरी सड़कें, तीखे मोड़, खड़ी ढलान और कम दृश्यता के कारण पहाड़ी हाईवे और लिंक रोड पर गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाता है।
जरूरी सुरक्षा सुविधाओं जैसे क्रैश बैरियर, पैरापेट वॉल और सही सड़क संकेतों की कमी के कारण अक्सर छोटी-मोटी लापरवाही भी गहरी खाइयों में गिरने जैसे जानलेवा हादसों में बदल जाती है।
मानसून की बारिश, बर्फ पिघलने और घने कोहरे के कारण अक्सर भूस्खलन, चट्टानें खिसकने और सड़क की सतह खराब होने जैसी घटनाएं होती हैं, जिससे पकड़ और दृश्यता बहुत कम हो जाती है।
जुलाई और मानसून के महीनों में हादसों में काफी बढ़ोतरी होती है क्योंकि गीली सड़कों और कीचड़ के कारण गाड़ी पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है।
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