राष्ट्रीय
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए भेदभाव नियमों पर फिलहाल लगाई रोक, 2012 के नियम जारी रहेंगे
नई दिल्ली, 29 जनवरी : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने फिलहाल यूजीसी के नए रेगुलेशन पर रोक लगा दी है और स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि तब तक 2012 के यूजीसी रेगुलेशन ही लागू रहेंगे।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि उन्होंने यूजीसी के नए नियमों के सेक्शन 3सी को चुनौती दी है। उनका कहना था कि रेगुलेशन में भेदभाव की जो परिभाषा दी गई है, वह संविधान के अनुरूप नहीं है।
विष्णु शंकर जैन ने तर्क दिया कि संविधान के अनुसार, भेदभाव का प्रश्न देश के सभी नागरिकों से जुड़ा है, जबकि यूजीसी के नए नियमों में भेदभाव को केवल विशेष वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह परिभाषा न केवल अधूरी है, बल्कि संवैधानिक भावना के विपरीत भी है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मान लीजिए दक्षिण भारत का कोई छात्र उत्तर भारत में दाखिला लेता है या उत्तर का छात्र दक्षिण में पढ़ने जाता है और उसके खिलाफ कोई अपमानजनक टिप्पणी की जाती है, जबकि दोनों पक्षों की जाति की जानकारी नहीं है, तो ऐसी स्थिति में कौन-सा प्रावधान लागू होगा?
इस पर विष्णु जैन ने जवाब दिया कि सेक्शन 3ई ऐसी परिस्थितियों को कवर करता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी के जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव होता है, तो उसके लिए अलग से प्रावधान मौजूद है और उस पर कार्रवाई की जा सकती है।
एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील ने सवाल उठाया कि यूजीसी के नए नियमों में रैगिंग से जुड़े प्रावधान क्यों हटाए गए हैं। उन्होंने आशंका जताई कि नया रेगुलेशन शिक्षा व्यवस्था को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेल रहा है। उनका कहना था कि भविष्य में ऐसा हो सकता है कि कोई फ्रेशर, जो सामान्य वर्ग से आता हो, पहले ही दिन अपराधी की तरह देखा जाने लगे और जेल तक पहुंच जाए। यह गंभीर चिंता का विषय है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं। सवाल यह है कि क्या इस नए कानून के जरिए हम और पीछे की ओर जा रहे हैं?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यूजीसी के नए रेगुलेशन को समाप्त करने और उस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अदालत अनुमति दे, तो वे इससे बेहतर और संतुलित रेगुलेशन तैयार कर सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह एक संवैधानिक मामला है। हालांकि, कोर्ट ने रेगुलेशन में प्रयुक्त भाषा को लेकर चिंता जताई।
चीफ जस्टिस ने कहा कि रेगुलेशन में इस्तेमाल किए गए शब्दों से यह संकेत मिलता है कि इसके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि अदालत समाज में एक निष्पक्ष और समावेशी माहौल बनाने पर विचार कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सेक्शन 2ई पहले से मौजूद है, तो फिर 2सी की प्रासंगिकता कैसे बनती है?
राजनीति
असम के आदर्श विद्यालयों से बच्चों को मिल रहा ‘बेस्ट’ जैसा माहौल : हिमंता बिस्वा सरमा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि उनकी सरकार ने आदर्श विद्यालय पहल के जरिए राज्य में सरकारी स्कूलों की पूरी सोच ही बदल दी है। इन स्कूलों में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि छात्रों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि आदर्श विद्यालय सिर्फ नई इमारतें नहीं हैं, बल्कि इन्हें एक पूरे शैक्षिक इकोसिस्टम के रूप में विकसित किया गया है, जहां छात्रों को बड़े और नामी स्कूलों जैसी सुविधाएं मिल सकें।
उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा, “हमने असम में सरकारी स्कूल का मतलब ही बदल दिया है। आदर्श विद्यालय सिर्फ नई इमारतें नहीं हैं।”
मुख्यमंत्री ने इन स्कूलों में बनाई जा रही सुविधाओं के बारे में भी बताया। इनमें स्मार्ट क्लासरूम, साइंस और कंप्यूटर लैब, लाइब्रेरी और खेल के मैदान शामिल हैं।
उन्होंने कहा, “स्मार्ट क्लासरूम, साइंस और कंप्यूटर लैब, लाइब्रेरी, खेल के मैदान, एक ऐसा इकोसिस्टम जहां किसी भी ब्लॉक का बच्चा बेस्ट स्कूलों के बच्चों के साथ मुकाबला कर सके।”
उनके मुताबिक इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे चाहे किसी भी ब्लॉक या इलाके से आते हों, उन्हें देश के बेहतरीन शिक्षण संस्थानों के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिले।
आदर्श विद्यालय कार्यक्रम असम सरकार की सरकारी स्कूल शिक्षा को मजबूत करने की कोशिशों में से एक है। इसके तहत बुनियादी ढांचे में सुधार और छात्रों के लिए बेहतर शैक्षणिक माहौल बनाया जा रहा है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में।
इस पहल के तहत मॉडल स्कूल बनाए जा रहे हैं जो आधुनिक पढ़ाई-लिखाई की सुविधाओं से लैस हैं। सिर्फ बिल्डिंग ही नहीं, बल्कि ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जो बच्चों के शैक्षणिक विकास, एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी और उनके एक्सपोजर को बढ़ावा दे।
सरकार राज्य के जिलों में आदर्श विद्यालयों का नेटवर्क लगातार बढ़ा रही है, ताकि स्कूल शिक्षा के बुनियादी ढांचे को अपग्रेड किया जा सके और सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच मिल सके।
यह पहल असम में सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाने और राज्य के अलग-अलग हिस्सों के छात्रों के बीच शिक्षा के अवसरों में जो असमानता है, उसे कम करने के लिहाज से भी अहम है।
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि फोकस इस बात पर है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा भी बेहतर संसाधनों वाले संस्थानों के छात्रों के बराबर खड़ा होकर मुकाबला करने की सोच सके।
मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब असम सरकार राज्य भर में शिक्षा के बुनियादी ढांचे का विस्तार और आधुनिकीकरण कर रही है। आदर्श विद्यालय मॉडल का मकसद सरकारी स्कूलों को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक शिक्षण सुविधाओं के साथ छात्रों और अभिभावकों के लिए अधिक आकर्षक बनाना है।
सरकार अपनी बड़ी शिक्षा सुधार योजना के तहत स्कूलों में लैब, डिजिटल लर्निंग और दूसरी सुविधाओं को मजबूत करने पर भी ध्यान दे रही है। आदर्श विद्यालय पहल के जरिए सरकार सरकारी स्कूलों को सिर्फ बुनियादी शिक्षा देने वाले संस्थान के बजाय एक आधुनिक लर्निंग स्पेस के रूप में स्थापित करना चाहती है, जो छात्रों को आगे की पढ़ाई और प्रतिस्पर्धी अवसरों के लिए तैयार कर सके।
राष्ट्रीय
सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक बनर्जी के पीए की जमानत याचिका पर सुनवाई, राज्य सरकार ने किया विरोध

सालबोनी जमीन मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक (पीए) सुमित रॉय से हिरासत में पूछताछ की मांग की है।
सरकार का कहना है कि जांच के दौरान सुमित रॉय से जुड़े खातों में करीब 15 करोड़ नकद जमा होने की जानकारी सामने आई है। अब जांच टीम यह पता करना चाहती है कि यह पैसा कहां से आया और इसका जमीन के मामले से कोई संबंध है या नहीं।
सुमित रॉय की अग्रिम जमानत की मांग वाली याचिका पर गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुमित रॉय से पूछताछ के दौरान बैंक खातों में जमा बड़ी रकम के बारे में सवाल किए गए थे। सरकार के मुताबिक, बैंक रिकॉर्ड और पेन से यह रकम सुमित रॉय से जुड़ी होने की बात सामने आई है।
सरकार ने यह भी बताया कि 17 जून 2021 को करीब 71 लाख जमा किए गए थे। यह वही समय था जब जमीन से जुड़े कथित लेन-देन की जांच चल रही थी। सरकार का कहना है कि इन पैसों के बारे में पूरी जानकारी लेने के लिए सुमित रॉय से हिरासत में पूछताछ जरूरी है।
सुमित रॉय की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने सरकार की दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इन पैसों को लेकर पहले ही सफाई दी जा चुकी है। उनके मुताबिक, यह रकम पार्टी की सदस्यता फीस और चंदे से जुड़ी थी। वकील ने कहा कि सुमित रॉय का काम ही पार्टी से मिलने वाली रकम को जमा करना और उसके चालान को जमा करना था।
राजनीति
राहुल गांधी पर मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट का जल्द सुनवाई से इनकार, सीजेआई बोले-हमारे सामने सब बराबर

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले में जल्द सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे सामने सब बराबर हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता को मामले की शीघ्र सुनवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन दाखिल करने को कहा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने भरोसा दिया कि आवेदन मिलने के बाद उस पर विचार किया जाएगा।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि राहुल गांधी इस मामले में कोई वीआईपी नहीं हैं और उनकी अपील करीब पांच महीने से सुनवाई के लिए लंबित है।
उन्होंने कहा कि मामला कई बार सूची में आया लेकिन किसी कारण से सुनवाई नहीं हो सकी। गौरव भाटिया ने दलील दी कि बार-बार मामले की सुनवाई टलना संस्थान के लिए भी उचित नहीं है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि मामले में तय प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। आवेदन मिलने के बाद वह उस पर विचार करेगा।
बता दें कि यह मामला दिसंबर 2022 में राहुल गांधी की ओर से दिए गए एक बयान से जुड़ा है। भारत-चीन सीमा पर हुई झड़प को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी ने दावा किया था कि चीनी सैनिक अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के जवानों को पीट रहे हैं। उनके इस बयान पर बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के पूर्व डायरेक्टर उदय शंकर श्रीवास्तव ने शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी का बयान भारतीय सेना के लिए अपमानजनक है और इससे सेना की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। इसी मामले में लखनऊ की अदालत ने राहुल गांधी को पेश होने के लिए समन जारी किया था।
समन को चुनौती देते हुए राहुल गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने पहले मामले में आगे की कार्रवाई पर रोक लगाई थी।
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