राजनीति
शिवसेना नेता का दावा, ठाकरे के साथ समझौता करने को बेताब भाजपा
शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता किशोर तिवारी ने शुक्रवार को चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि राज्य में विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के साथ समझौता करने की बेहद कोशिश कर रही है।
भाजपा दो दशकों से अधिक समय से अपनी पूर्व सहयोगी शिवसेना की सभी मांगों को मानने को तैयार है, जिसने राज्य में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार का नेतृत्व करने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है।
उन्होंने एक निजी स्थानीय टीवी चैनल के साथ बातचीत में बताया कि इससे भी अधिक, चूंकि ठाकरे 2014 के लोकसभा चुनावों में एक प्रमुख राष्ट्रीय विपक्ष के दावेदार के रूप में उभर सकते हैं, जिसने भाजपा को हिलाकर रख दिया है।
तिवारी , जिन्हें राज्य मंत्री (एमओएस) का दर्जा दिया गया है, उन्होंने आगे कहा, “हर दो हफ्ते में, भाजपा नेता सीएम को फोन करते हैं, और अतीत को दफनाने और नए सिरे से शुरूआत करने का अनुरोध करते हैं।”
तिवारी ने बाद में आईएएनएस को बताया, “वास्तव में, विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस जैसे लोग चाहते हैं कि मैं शिवसेना-भाजपा के बीच मध्यस्थता करूं और दोनों पार्टियों के बीच एक समझौता करूं।”
उन्होंने तर्क दिया कि पिछले छह महीनों में, फडणवीस और भाजपा के अन्य बड़े लोग ठाकरे के साथ ‘एक समझौता करने के लिए’ मिलने का समय मांग रहे हैं।
हालांकि, सीएम ने भाजपा के सभी प्रस्तावों को नकार दिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से पिछले जून में यह स्पष्ट कर दिया था कि वह भाजपा के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे और गठबंधन में बने रहेंगे। उन्होंने कहा था, “मैंने राकांपा-कांग्रेस को अपना वचन दिया है और मैं उनके साथ विश्वासघात नहीं करूंगा।”
ठाकरे सहित शिवसेना के शीर्ष नेताओं ने बार-बार भाजपा नेतृत्व पर लोकसभा चुनाव से पहले फरवरी 2019 में किए गए ‘विश्वासघात और समान सत्ता-शेयर व्यवस्था के अपने वादे को तोड़ने’ का आरोप लगाया है।
बाद में, भाजपा ने कथित तौर पर ठाकरे को एक ‘झूठा’ व्यक्ति कहते हुए इससे इनकार किया, जिसके परिणामस्वरूप अंतत: नवंबर 2019 में अभूतपूर्व एमवीए सरकार सत्ता में आई।
तिवारी ने कहा कि नवंबर 2019 में एक समय पर, नई दिल्ली के चिंतित भाजपा नेताओं ने सुबह 3 बजे ठाकरे को जगाया और उन्हें माफ करने और सभी बातें भूल जाने की भीख मांगी थी।
तिवारी ने कहा कि फिर भी सफल नहीं होने पर, भाजपा ने सरकार को गिराने और भगवा पार्टी को सत्ता में लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी।
शिवसेना नेता ने कहा, “यह केवल राकांपा अध्यक्ष शरद पवार, शिवसेना सांसद संजय राउत और अन्य कांग्रेस नेताओं का ²ढ़ संकल्प था कि लोकतंत्र पर रक्तहीन तख्तापलट का पदार्फाश हो गया। फडणवीस का तथाकथित दूसरा कार्यकाल मुश्किल से 80 घंटे तक चला।”
उन्होंने कहा कि उस बड़ी विफलता के बाद, भाजपा नेता सीएम और उनके परिवार के सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाते रहे और उन्हें सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में खींचने का प्रयास किया।
तिवारी ने आगे कहा, “आज तक, भाजपा एमवीए को लगातार परेशान कर रही है, केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है, शिवसेना, एनसीपी नेताओं या मंत्रियों तथा उनके परिवारों के खिलाफ फर्जी मामले दर्ज कर रही है। यहां तक कि वह एमवीए में शामिल होने वाले पूर्व भाजपा नेताओं को भी नहीं बख्श रही है। इन सभी हथकंडों का उद्देश्य तीन पार्टियों के गठबंधन को तोड़ने के लिए मजबूर करना है।”
शिवसेना की ओर से यह प्रतिक्रिया केंद्रीय उद्योग मंत्री नारायण राणे द्वारा गुरुवार से शुरू की गई अपनी ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ के दौरान शिवसेना पर किए गए नए हमलों के बाद सामने आई हैं।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
इजरायल का दावा, ‘हवाई हमले में हिज्बुल्लाह के वरिष्ठ कमांडर की मौत’

इजरायली सेना ने रविवार को दावा किया कि दक्षिणी लेबनान में किए गए हवाई हमले में हिज्बुल्लाह के बद्र रीजनल डिवीजन के एक वरिष्ठ कमांडर की मौत हो गई। लेबनानी मीडिया के अनुसार इस हमले में 4 लोगों की मौत हुई है।
इजरायली सेना ने एक बयान में कहा कि अबू हसन अला की शनिवार देर रात दीर अल-जहरानी पर हुए हमले में मौत हो गई। इजरायल ने इस हमले को दक्षिणी लेबनान में अपने सैनिकों को निशाना बनाकर किए गए ड्रोन हमलो का “जवाब” बताया। उस हमले में तीन सैनिक घायल हो गए थे।
लेबनान की सरकारी नेशनल न्यूज एजेंसी ने कहा कि इजरायली लड़ाकू विमानों ने दो मंजिला इमारत पर हमला किया, जिसमें चार लोग मारे गए और पांच घायल हो गए।
शनिवार को ही, अंसार गांव पर इजरायली एयरस्ट्राइक में सात लोग मारे गए थे, जो 2024 में हुए सीजफायर के बाद सबसे भीषण हमला था।
इसे लेकर, इजरायल डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) ने एक बयान जारी किया था। कहा था कि उसने दक्षिणी लेबनान में रात भर किए हवाई हमलों में हिज्बुल्लाह की एलीट राडवान फोर्स के एक कमांडर को मार गिराया।
आईडीएफ ने कहा कि मारे गए शख्स की पहचान अली समीर अल-हज हसन के तौर पर हुई है, जो यूनिट में बटालियन कमांडर के पद पर तैनात थे।
इसमें यह भी कहा गया कि नबातिह जिले के अंसार शहर में हिजबुल्लाह हेडक्वार्टर में कमांडर को मार गिराया गया; यह हमला “सिक्योरिटी जोन” में काम कर रही इजरायली सेना के खिलाफ हिजबुल्लाह के हमले के जवाब में किया गया था।
इस बीच, लेबनान में यूनाइटेड नेशंस इंटरिम फोर्स (यूएनआईएफआईएल) की प्रवक्ता कैंडिस अर्दील ने कहा है कि दक्षिणी लेबनान में एक इंटरनेशनल मौजूदगी जरूरी बनी हुई है।
अर्दील ने बताया कि यूएन सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने विचार के लिए तीन विकल्प रखे हैं।
अर्दील ने कहा कि यूएनआईएफआईएल के शांति सैनिक दक्षिणी लेबनान में मौजूद हैं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 को लागू करने में पार्टियों का समर्थन करते रहेंगे, जो उनके अनुसार दक्षिणी लेबनान में स्थिरता की नींव है।
राष्ट्रीय समाचार
साइबर सुरक्षा आकलन में मानवीय निर्णय क्षमता की परीक्षा को एनआईईएलआईटी ने ‘साइबर कुश्ती 2026’ लॉन्च किया

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईईएलआईटी) ने ‘साइबर कुश्ती 2026’ की शुरुआत की है। यह एक राष्ट्रव्यापी साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) हैकाथॉन है, जिसका उद्देश्य प्रतिभागियों की केवल कमजोरियों की पहचान करने की क्षमता नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा आकलन के दौरान मानवीय निर्णय क्षमता का परीक्षण करना है। इसकी घोषणा रविवार को की गई।
‘साइबर कुश्ती 2026’ को साइबर सुरक्षा, डिजिटल फोरेंसिक और इंटेलिजेंस पर आयोजित तीसरे राष्ट्रीय सम्मेलन (एनसीसीडीएफआई 2026) के आधिकारिक समानांतर तकनीकी ट्रैक के रूप में शुरू किया गया है। इस पहल का आयोजन नेशनल सिक्योरिटी डेटाबेस (एनएसडी) के अंतर्गत इन्फॉर्मेशन शेयरिंग एंड एनालिसिस सेंटर के सहयोग से किया जा रहा है, जबकि सीईआरटी-इन इसमें नॉलेज पार्टनर की भूमिका निभा रहा है।
प्रतियोगिता के लिए पंजीकरण 15 अगस्त से शुरू हो चुका है और 10 सितंबर तक जारी रहेगा। इसमें भाग लेना पूरी तरह निःशुल्क है और तीन सदस्यीय टीमों में छात्र तथा स्वतंत्र शोधकर्ता हिस्सा ले सकते हैं। पारंपरिक साइबर सुरक्षा प्रतियोगिताओं से अलग, जो मुख्य रूप से कमजोरियों की पहचान या ‘कैप्चर द फ्लैग’ (सीटीएफ) चुनौतियों पर केंद्रित होती हैं, ‘साइबर कुश्ती 2026’ को इस प्रकार तैयार किया गया है कि यह प्रतिभागियों की सुरक्षा जोखिमों का मूल्यांकन और प्राथमिकता तय करने की क्षमता की जांच कर सके।
आयोजकों ने कहा कि यह प्रतियोगिता ऐसे पेशेवरों की बढ़ती आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जो स्वचालित प्रणालियों द्वारा उत्पन्न गलत संकेतों (फॉल्स पॉजिटिव) और वास्तविक खतरों के बीच अंतर कर सकें।
प्रतियोगिता के प्रारूप के तहत सभी टीमों को एक समान, जानबूझकर अपूर्ण रखा गया ‘सिक्योरिटी असेसमेंट पैकेज’ प्रदान किया जाएगा। इस पैकेज में एआई द्वारा तैयार निष्कर्ष, सोर्स कोड, एप्लिकेशन लॉग, आर्किटेक्चर दस्तावेज, स्टैटिक एनालिसिस रिपोर्ट, डिपेंडेंसी स्कैन और सीक्रेट्स स्कैन जैसी सामग्री शामिल होगी।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बताया कि प्रतिभागियों की विश्लेषणात्मक क्षमता को परखने के लिए आयोजकों ने जानबूझकर इसमें कुछ गलत, दोहराए गए और वास्तविक निष्कर्ष शामिल किए हैं, जबकि कुछ वास्तविक कमजोरियों को छोड़ा भी गया है। प्रतिभागियों को एक संशोधित और प्राथमिकता-आधारित सुरक्षा आकलन रिपोर्ट तैयार करनी होगी तथा अपने निष्कर्षों और निर्णयों का स्पष्ट औचित्य भी बताना होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिभागियों को केवल वास्तविक सुरक्षा खामियों की पहचान करने के लिए ही नहीं, बल्कि गलत या भ्रामक निष्कर्षों को सही ढंग से खारिज करने के लिए भी पुरस्कृत किया जाएगा।
कार्यक्रम के शुभारंभ पर प्रोफेसर त्रिपाठी ने कहा कि साइबर सुरक्षा का परिदृश्य अब केवल समस्याओं की पहचान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह तय करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि कौन-सी खामियां सबसे गंभीर हैं और किन पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मशीनें बड़े पैमाने पर सुरक्षा संबंधी निष्कर्ष तैयार कर सकती हैं, लेकिन उनकी सत्यता की पुष्टि करने और प्राथमिकता तय करने के लिए मानवीय विवेक और निर्णय क्षमता अब भी अपरिहार्य है।
राष्ट्रीय समाचार
ब्राह्मण चेहरों के अभाव में बसपा 2027 में कैसे साधेगी सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला?

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 2007 के विधानसभा चुनाव में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के जरिए यूपी में सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के सामने उस सामाजिक गठजोड़ को फिर से मजबूत करने की चुनौती है।
पिछले कुछ वर्षों में बसपा के कई प्रमुख ब्राह्मण चेहरे पार्टी से अलग हुए या निष्कासित किए गए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मायावती पुराने चेहरों के आभाव के बीच ब्राह्मण समाज और अन्य सामाजिक समूहों को साथ लेकर नया सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला कैसे तैयार करेंगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2007 में बसपा की सत्ता में वापसी में ब्राह्मण मतदाताओं के एक बड़े हिस्से का समर्थन महत्वपूर्ण रहा था। उस समय पार्टी ने दलित आधार के साथ ब्राह्मण समाज को जोड़कर व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार किया था। अब पार्टी के सामने चुनौती केवल नए ब्राह्मण चेहरों को आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि समाज के बीच पुराने भरोसे को दोबारा कायम करने की भी है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत कहते हैं कि बसपा के सामने इस समय कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भरोसा बनाए रखने की चुनौती है। हाल ही में अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को पार्टी से निष्कासित किया गया है। इससे पहले राकेशधर त्रिपाठी, रंगनाथ मिश्रा, रामू द्विवेदी, कुशल तिवारी, विनय शंकर तिवारी, ब्रजेश पाठक और गुड्डू त्रिपाठी जैसे कई प्रमुख ब्राह्मण चेहरे बसपा से अलग हो चुके हैं। रामवीर उपाध्याय का परिवार भी बसपा की राजनीति में सक्रिय रहा है। इनमें से कई नेता बाद में दूसरे राजनीतिक दलों में महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई दिए और कुछ को मंत्री पद भी मिला।
विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत के मुताबिक, वर्तमान में सतीश चंद्र मिश्रा बसपा के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के रूप में पार्टी के साथ मजबूती से जुड़े हुए हैं। ऐसे में 2027 में सत्ता की दावेदारी के लिए मायावती को केवल ब्राह्मण समाज ही नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संतुलन साधते हुए संगठन को भी मजबूत करना होगा।
ब्राह्मण संगठन से जुड़े अभिषेक पांडेय कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण है। कई विधानसभा क्षेत्रों में यह समुदाय चुनावी मुकाबले को प्रभावित करने की स्थिति में रहता है। ऐसे में 2027 से पहले ब्राह्मण समाज का समर्थन हासिल करना किसी भी राजनीतिक दल के व्यापक सामाजिक गठजोड़ की रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।
हालांकि, मायावती का कहना है कि पार्टी से निकाले गए या निजी स्वार्थ के चलते दूसरे दलों में गए नेताओं के राजनीतिक समर्पण का आकलन उनके कार्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे कई लोगों ने बसपा सरकार के दौरान भी अपने निजी और पारिवारिक हितों को प्राथमिकता दी और पार्टी तथा समाज के हित में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई।
मायावती ने यह भी कहा कि पार्टी में लंबे समय से ईमानदार और निष्ठावान वरिष्ठ नेता नए कर्मठ एवं समर्पित कार्यकर्ताओं, खासकर युवाओं को तैयार कर रहे हैं। पार्टी की यह ‘नर्सरी’ लगातार जारी है और नए लोगों को संगठन में आगे बढ़ाने का काम किया जा रहा है।
बसपा से निष्कासित अनंत मिश्रा ने कहा कि 2007 में ब्राह्मण समाज को बसपा से जोड़ने में सतीश मिश्रा के चेहरे, मायावती के प्रति समाज के भरोसे और जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने कहा कि उस समय ब्राह्मण समाज को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी का स्पष्ट संदेश मिला था। लगातार पार्टी के राजनीतिक प्रदर्शन में गिरावट पर नेतृत्व को आत्मचिंतन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अब वह अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के बीच जाकर उनकी राय लेंगे और उनके सुझाव के आधार पर आगे की रणनीति तय करेंगे।
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