व्यापार
सेंसेक्स 1000 अंक से ज्यादा उछला
बड़े शेयरों में खरीदारी के चलते बीएसई सेंसेक्स सोमवार को 1000 अंक से अधिक उछल गया। बीएसई सेंसेक्स 1068.75 अंक यानी 1.55% की बढ़त के साथ 71,769.43 अंक पर कारोबार कर रहा है।
तेल और गैस शेयरों का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा। ओएनजीसी 7 प्रतिशत और रिलायंस इंडस्ट्रीज 4 प्रतिशत ऊपर है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम में 4 फीसदी, बीपीसीएल में 3 फीसदी की तेजी है।
ऊर्जा शेयरों में कोल इंडिया 3 फीसदी ऊपर है, कैस्ट्रोल 4 फीसदी ऊपर है।
इंफ्रास्ट्रक्चर शेयरों में आईआरबी 13 फीसदी, एनबीसीसी 8 फीसदी, एनसीसी 7 फीसदी ऊपर है।
अदानी पावर, अदानी पोर्ट्स, अदानी एनर्जी के साथ व्यापार में अदानी के शेयरों में 3 फीसदी की तेजी है।
सेंसेक्स के शेयरों में रिलायंस शीर्ष पर है, इसके बाद एलएंडटी और पावरग्रिड में 3 फीसदी की तेजी आई।
इस सप्ताह दो महत्वपूर्ण घटनाएं होने वाली हैं : अंतरिम बजट और दर निर्णय पर फेड की बैठक। जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार ने कहा, लेकिन इन घटनाओं का बाजार पर बड़े पैमाने पर असर पड़ने की संभावना नहीं है।
उन्होंने कहा, बाजार को प्रभावित करने में सक्षम बड़ी घोषणाओं के बिना ही बजट लेखानुदान होगा।
फेड के फैसले के संबंध में, किसी दर में कटौती की उम्मीद नहीं है, लेकिन टिप्पणी पर नजर रखी जाएगी।
लाल सागर में अशांति एक गंभीर मुद्दा बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि ब्रेंट क्रूड 83 डॉलर तक पहुंच गया है।
व्यापार
आकलन वर्ष 2026 में 100 करोड़ रुपए से अधिक आय दिखाने वाले करदाताओं की संख्या 39 प्रतिशत बढ़कर 576 हुई: रिपोर्ट

भारत में उच्च आय वर्ग के करदाताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, आकलन वर्ष (एवाई) 2026 में 100 करोड़ रुपए या उससे अधिक वार्षिक आय घोषित करने वाले करदाताओं की संख्या 39 प्रतिशत बढ़कर 576 हो गई है, जबकि एक वर्ष पहले एवाई25 में यह संख्या 415 थी। यह वृद्धि भारत में बढ़ती आय, व्यवसायिक विस्तार और आर्थिक गतिविधियों में तेजी का संकेत मानी जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल अति-उच्च आय वर्ग ही नहीं, बल्कि 1 करोड़ रुपए या उससे अधिक आय दिखाने वाले करदाताओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। आकलन वर्ष 2026 में इस श्रेणी के करदाताओं की संख्या बढ़कर 5,35,672 हो गई, जो आकलन वर्ष 2025 में 4,71,419 थी। यानी इस वर्ग में सालाना आधार पर 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
हालांकि रिपोर्ट बताती है कि सबसे ऊपरी आय वर्ग में वृद्धि की रफ्तार व्यापक उच्च आय वर्ग की तुलना में कहीं अधिक तेज रही है। 100 करोड़ रुपए से अधिक आय वाले करदाताओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव के साथ बढ़ी है।
आकलन वर्ष 2022 में इस श्रेणी में केवल 142 करदाता थे। इसके बाद आकलन वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर 301 हो गई, जो 112 प्रतिशत की भारी वृद्धि थी। वहीं, आकलन वर्ष 2024 में इसमें मामूली गिरावट आई और संख्या घटकर 284 रह गई। लेकिन इसके बाद फिर तेजी लौटी और आकलन वर्ष 2025 में यह बढ़कर 415 तथा आकलन वर्ष 2026 में 576 तक पहुंच गई।
इसके विपरीत, 1 करोड़ रुपए से अधिक आय वाले करदाताओं की संख्या लगातार स्थिर गति से बढ़ती रही है। आकलन वर्ष 2022 में इस वर्ग में 1,93,800 करदाता थे। यह संख्या आकलन वर्ष 2023 में बढ़कर 2,69,184, आकलन वर्ष 2024 में 3,49,974, एवाई 2025 में 4,71,419 और आकलन वर्ष 2026 में 5,35,672 तक पहुंच गई।
रिपोर्ट के अनुसार, आकलन वर्ष 2022 के मुकाबले अब 1 करोड़ रुपए से अधिक आय वाले करदाताओं की संख्या दोगुने से भी अधिक हो चुकी है, जबकि 100 करोड़ रुपए से अधिक आय वाले करदाताओं की संख्या चार गुना बढ़ गई है। इससे संकेत मिलता है कि देश में अत्यधिक उच्च आय अर्जित करने वाले व्यक्तियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर भी सकारात्मक अनुमान जताए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 8 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसके अलावा, क्रेडिट ग्रोथ 19.3 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आरबीआई की एफसीएनआर(बी) जमा योजना के जरिए विदेशी मुद्रा भंडार में मजबूती आने की उम्मीद है और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 707 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
हालांकि रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में समान मजबूती नहीं दिखाई दे रही है। जून तिमाही के दौरान हेल्थकेयर, सीमेंट और मनोरंजन (एंटरटेनमेंट) जैसे कुछ क्षेत्रों में मार्जिन पर दबाव देखने को मिला। इससे पता चलता है कि शीर्ष आय वर्ग और कुछ व्यवसायों की मजबूत आय वृद्धि के बावजूद कॉरपोरेट जगत के सभी हिस्सों में समान प्रदर्शन नहीं हो रहा है।
राष्ट्रीय समाचार
सरकारी योजनाओं के दम पर भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार मजबूत, 10.88 प्रतिशत सीएजीआर से बढ़ रहा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर

केंद्र सरकार की उत्पादन, आत्मनिर्भरता और औद्योगिक विकास से जुड़ी नीतियों के चलते भारत का विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र देश की आर्थिक वृद्धि का प्रमुख आधार बनकर उभरा है। सरकार द्वारा शनिवार को जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट के अनुसार, उत्पादन, निर्यात और निवेश में लगातार वृद्धि के कारण मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भी भारत ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।
फैक्टशीट के अनुसार, भारत का विनिर्माण क्षेत्र वर्तमान में देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 16 से 17 प्रतिशत का योगदान देता है और इससे 2.7 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। स्थिर कीमतों पर इस क्षेत्र की सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) वृद्धि दर का चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) 10.88 प्रतिशत रहा है, जो इसकी मजबूत विकास क्षमता को दर्शाता है।
सरकार ने बताया कि जुलाई 2026 में भारत का माल निर्यात (मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट) बढ़कर 44.24 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 36.98 अरब डॉलर था। वहीं जून 2026 में विनिर्माण उत्पादन में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो औद्योगिक गतिविधियों में लगातार सुधार का संकेत है।
रक्षा क्षेत्र में भारत ने पिछले एक दशक में उल्लेखनीय बदलाव देखा है। आत्मनिर्भरता पर जोर, लक्षित निवेश और नीतिगत सुधारों के परिणामस्वरूप स्वदेशी रक्षा उत्पादन का मूल्य वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया। यह पिछले वित्त वर्ष के 1,54,071 करोड़ रुपए की तुलना में 15.6 प्रतिशत अधिक है। तुलना करें तो वर्ष 2014-15 में देश का रक्षा उत्पादन केवल 46,429 करोड़ रुपए था।
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र ने भी तेज गति से विस्तार किया है। वित्त वर्ष 2025-26 में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन बढ़कर 13.11 लाख करोड़ रुपए हो गया, जो वित्त वर्ष 2024-25 के 11.32 लाख करोड़ रुपए की तुलना में 15.8 प्रतिशत अधिक है। मोबाइल फोन विनिर्माण और निर्यात में भी बड़ी वृद्धि दर्ज की गई है। मोबाइल फोन निर्यात बढ़कर 2.59 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जिससे भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।
भारत अब सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार के अनुसार, सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम 1.0 के तहत जुलाई 2026 तक 1.64 लाख करोड़ रुपए से अधिक निवेश वाली 12 विनिर्माण इकाइयों को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब, एक एकीकृत गैलियम नाइट्राइड माइक्रो-एलईडी डिस्प्ले फैब और नौ पैकेजिंग इकाइयां शामिल हैं।
इसके अलावा, बड़े पैमाने के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण (एलएसईएम) के लिए लागू प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना ने मोबाइल निर्माण इकोसिस्टम में करीब 96,000 करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है। सरकार का मानना है कि इन पहलों से भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स हब बनाने में मदद मिलेगी।
फैक्टशीट में यह भी कहा गया है कि फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में उत्पादन, नवाचार और निर्यात में लगातार वृद्धि ने भारत की पहचान एक विश्वसनीय वैश्विक दवा आपूर्तिकर्ता के रूप में और मजबूत की है। भारतीय दवा उद्योग वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और आने वाले वर्षों में इसके और विस्तार की उम्मीद है।
राष्ट्रीय समाचार
बाजार की पाठशाला: डेट फंड्स क्या होते हैं, इनमें कैसे होता है निवेश? जानिए इनके फायदे और किन जोखिमों का रखना चाहिए ध्यान

म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले लोगों के बीच इक्विटी फंड काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन हर निवेशक ज्यादा जोखिम लेकर शेयर बाजार में पैसा लगाना नहीं चाहता, ऐसे निवेशकों के लिए डेट फंड्स एक बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। अगर आप भी डेट फंड्स के बारे में विस्तार से समझना चाहते हैं कि ये क्या हैं, इनमें निवेश कैसे होता है और इनके फायदे-नुकसान क्या हैं, तो चलिए हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।
दरअसल, डेट फंड म्यूचुअल फंड की ऐसी श्रेणी हैं, जो मुख्य रूप से बॉन्ड, सरकारी प्रतिभूतियों, ट्रेजरी बिल, कॉरपोरेट डेट और अन्य निश्चित आय वाले साधनों में निवेश करते हैं, जिनका उद्देश्य निवेशकों के पैसे को अपेक्षाकृत स्थिर आय वाले साधनों में लगाकर रिटर्न हासिल करना होता है।
डेट फंड को आसान भाषा में समझें तो ये ऐसे म्यूचुअल फंड हैं, जिनमें आपका पैसा कंपनियों या सरकार द्वारा जारी किए गए डेट इंस्ट्रूमेंट्स में लगाया जाता है। जब कोई कंपनी या सरकार बॉन्ड जारी करके पैसा जुटाती है, तो निवेशक को उस रकम पर ब्याज मिलता है। डेट फंड इसी तरह के कई साधनों में निवेश करके एक पोर्टफोलियो तैयार करते हैं।
डेट फंड की अलग-अलग श्रेणियां होती हैं। इनमें लिक्विड फंड, ओवरनाइट फंड, अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन फंड, शॉर्ट ड्यूरेशन फंड, मीडियम ड्यूरेशन फंड, कॉरपोरेट बॉन्ड फंड और गिल्ट फंड जैसी कैटेगरी शामिल हैं। हर कैटेगरी की अवधि, जोखिम और रिटर्न की संभावना अलग हो सकती है।
डेट फंड में निवेश करना म्यूचुअल फंड की अन्य योजनाओं की तरह ही आसान है। निवेशक किसी म्यूचुअल फंड कंपनी, म्यूचुअल फंड प्लेटफॉर्म या निवेश ऐप के माध्यम से अपनी जरूरत के अनुसार डेट फंड चुन सकता है। निवेश करने से पहले फंड की कैटेगरी, पोर्टफोलियो में शामिल प्रतिभूतियां, क्रेडिट क्वालिटी, औसत अवधि, खर्च अनुपात और जोखिम स्तर को समझना जरूरी है।
निवेशक अपनी सुविधा के अनुसार एकमुश्त निवेश या एसआईपी के जरिए भी डेट फंड में पैसा लगा सकता है। हालांकि, डेट फंड चुनते समय केवल पिछले रिटर्न को देखकर फैसला करना सही नहीं है। निवेश का उद्देश्य और वह पैसा कितने समय के लिए निवेश करना है, इसके आधार पर फंड का चुनाव करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अक्सर डेट फंड को पूरी तरह सुरक्षित निवेश मान लिया जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है। डेट फंड में जोखिम इक्विटी फंड की तुलना में अलग प्रकार का होता है। इसमें मुख्य रूप से क्रेडिट रिस्क और ब्याज दर का जोखिम महत्वपूर्ण होते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, क्रेडिट रिस्क तब होता है जब फंड जिस कंपनी के बॉन्ड में निवेश करता है, उसकी वित्तीय स्थिति खराब हो जाए या वह ब्याज अथवा मूलधन चुकाने में समस्या का सामना करे। वहीं ब्याज दर बढ़ने पर लंबी अवधि वाले बॉन्ड की कीमत प्रभावित हो सकती है। इसलिए ब्याज दरों में बदलाव का असर डेट फंड के रिटर्न पर भी पड़ सकता है।
वहीं, डेट फंड के फायदे की बात करें तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि निवेशक को अपने पोर्टफोलियो में स्थिर आय वाले साधनों का एक्सपोजर मिलता है। इक्विटी फंड की तुलना में इनमें आमतौर पर बाजार की तेज उतार-चढ़ाव वाली स्थितियों का असर कम होता है। इसी वजह से कई निवेशक अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी के साथ डेट फंड का इस्तेमाल विविधीकरण के लिए करते हैं।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डेट फंड उन निवेशकों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं जिनका निवेश लक्ष्य कुछ महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक का है और जो अपने पैसे को सीधे किसी एक बॉन्ड या फिक्स्ड डिपॉजिट में लगाने के बजाय विभिन्न डेट इंस्ट्रूमेंट्स में फैलाना चाहते हैं। फंड मैनेजर अलग-अलग प्रतिभूतियों में निवेश करके जोखिम को फैलाने की कोशिश करता है।
यह कहना सही नहीं होगा कि डेट फंड हमेशा एफडी से ज्यादा रिटर्न देते हैं। बैंक एफडी में ब्याज दर पहले से तय होती है, जबकि डेट फंड का रिटर्न बाजार की परिस्थितियों, ब्याज दरों और फंड के पोर्टफोलियो पर निर्भर करता है। इसलिए डेट फंड में मिलने वाला रिटर्न निश्चित नहीं होता।
यही कारण है कि डेट फंड को गारंटीड रिटर्न वाला उत्पाद समझकर निवेश नहीं करना चाहिए। निवेश करने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित फंड किस तरह की प्रतिभूतियों में पैसा लगा रहा है और उसका जोखिम स्तर क्या है।
डेट फंड का एक महत्वपूर्ण नुकसान यह है कि इनमें रिटर्न की गारंटी नहीं होती। ब्याज दरों में बदलाव, बॉन्ड की क्रेडिट क्वालिटी में गिरावट या बाजार की परिस्थितियों के कारण फंड का एनएवी बढ़ या घट सकता है। कुछ डेट फंड में कम अवधि के बावजूद जोखिम हो सकता है, जबकि लंबी अवधि वाले डेट फंड ब्याज दरों में बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
इसके अलावा, डेट फंड में निवेश करने पर फंड मैनेजमेंट और अन्य खर्चों का असर भी रिटर्न पर पड़ता है। इसलिए किसी भी फंड का चयन करते समय केवल उसका पिछला प्रदर्शन देखना पर्याप्त नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे निवेशक जो अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी की तुलना में अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव वाले निवेश को शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए डेट फंड एक विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, सही फंड का चुनाव निवेश की अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार होना चाहिए। छोटी अवधि के लक्ष्य के लिए अलग तरह के डेट फंड और लंबी अवधि के लक्ष्य के लिए अलग कैटेगरी उपयुक्त हो सकती है।
डेट फंड में पैसा लगाने से पहले क्रेडिट क्वालिटी, ब्याज दर का जोखिम, फंड की अवधि, पोर्टफोलियो में शामिल बॉन्ड, खर्च अनुपात और फंड की कैटेगरी को जरूर समझें। यह भी ध्यान रखें कि डेट फंड बैंक एफडी की तरह निश्चित रिटर्न या मूलधन की गारंटी नहीं देते।
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