अंतरराष्ट्रीय समाचार
ब्रिटेन दौरे पर पीएम मोदी: ऐतिहासिक संबंधों से लेकर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट तक, 1993 की नींव पर 2025 की साझेदारी
नई दिल्ली, 24 जुलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिटेन दौरे पर हैं। दो दिवसीय यह यात्रा भारत-ब्रिटेन संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। खासकर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) के जरिए द्विपक्षीय व्यापार को एक नई ऊंचाई देने की कोशिश है। यह पीएम मोदी की चौथी ब्रिटेन यात्रा है, जबकि कीर स्टार्मर के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहला दौरा है।
लंदन पहुंचने पर पीएम मोदी का स्वागत किया गया, जहां खासतौर पर भारतीय नागरिक उनके बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। लंदन का माहौल इस दौरान पूरी तरह ‘मोदीमय’ हो गया था, जहां भारतीय मूल के लोगों में जबरदस्त उत्साह देखा गया। खैर, इस यात्रा के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटेन से उनके जुड़ाव की कुछ पुरानी तस्वीरें भी चर्चा में हैं। ‘मोदी आर्काइव’ ने 1993 के बाद की यात्राओं का ब्योरा साझा किया है, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि एक कार्यकर्ता के तौर पर गए थे।
1993 में उनका पहला ब्रिटेन दौरा हुआ था, जब वे भाजपा के महासचिव और राष्ट्रीय राजनीति में एक उभरती हुई हस्ती थे। अपनी पहली अमेरिकी यात्रा से लौटते वक्त उनका अचानक ब्रिटेन जाना हुआ, जहां वह कुछ समय रुके। न कोई तय कार्यक्रम था, न कोई भव्य मंच। यह बस अमेरिका से लौटते समय एक सहज, अनौपचारिक पड़ाव था।
अपने पहले ब्रिटेन के पड़ाव में उन्होंने भारतीय प्रवासी समुदाय से जुड़ने का अवसर नहीं छोड़ा। उन्होंने ‘सनराइज रेडियो’ और एक गुजराती अखबार जैसी सामुदायिक संस्थाओं का दौरा किया। उन्होंने क्रॉयडन और हेस्टिंग्स में कई परिवारों से मुलाकात की। यह अनौपचारिक बातचीत थी। लंदन अंडरग्राउंड में उन्होंने ब्रिटेन में रहने वाले आम भारतीयों के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया। अहम यह है कि वह जो बीज उस समय बोए गए, उन्होंने आने वाले दशकों तक भारत की प्रवासी कूटनीति को मजबूती दी।
भाजपा जमीनी स्तर पर खुद को मजबूत कर रही थी तो गुजरात में नरेंद्र मोदी इस जिम्मेदारी को निभा रहे थे। उस समय 1985 और 1995 के बीच पार्टी का जमीनी नेटवर्क एक से बढ़कर 16 हजार से ज्यादा ग्राम इकाइयों तक पहुंचा था। इसका फायदा 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिला। उस समय नरेंद्र मोदी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव थे। गुजरात में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 26 में से 20 लोकसभा सीटें जीतीं।
इस शानदार जीत के बाद 1999 में दूसरी बार ब्रिटेन दौरे पर गए थे। उनकी 5 दिवसीय ब्रिटेन यात्रा का केंद्र बिंदु नीसडेन के स्वामीनारायण स्कूल में आयोजित ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी (यूके) का ऐतिहासिक कार्यक्रम था। उस कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी, “भाजपा राष्ट्रवाद और देशभक्ति का प्रतीक है।”
उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं और एनडीए के नीतिगत दृष्टिकोण पर विस्तार से चर्चा की। नरेंद्र मोदी ने भाजपा को सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि परंपरा, धर्म, संस्कृति और आधुनिकता से जुड़ा हुआ एक आंदोलन बताया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की दुनिया भर में प्रशंसा की जाती है।
इस यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी का लोहाना महाजन समुदाय ने गर्मजोशी से स्वागत किया था, जहां उन्होंने प्रवासी भारतीयों को भारतीय सभ्यता के ‘सच्चे राजदूत’ कहा।
सितंबर 2000 में भी नरेंद्र मोदी लंदन में एक छोटी यात्रा पर गए। कैरेबियन में विश्व हिंदू सम्मेलन और अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र शांति सम्मेलन की यात्रा पर जाते समय वो लंदन में ठहरे। ब्रिटेन की इस संक्षिप्त यात्रा में भी नरेंद्र मोदी ने एक अमिट छाप छोड़ी।
उन्होंने ब्रिटिश उप-प्रधानमंत्री जॉन प्रेस्कॉट से मुलाकात के दौरान एशिया में राजनीतिक स्थिरता और भारतीय उपमहाद्वीप की स्थिति के बारे में चर्चा की। इस चर्चा में सबसे महत्वपूर्ण विषय ‘वैश्विक आतंकवाद’ था। वहां एक बयान में नरेंद्र मोदी ने कहा, “आतंकवाद मानवता के विरुद्ध एक बुराई है, चाहे वह भारत में हो, मध्य पूर्व में हो या उत्तरी आयरलैंड में।”
यह उल्लेखनीय है कि 9/11 के आतंकी हमलों से लगभग एक साल पहले ही नरेंद्र मोदी ने वैश्विक आतंकवाद को मानवता के लिए एक साझा खतरा बताया था, जब अधिकतर वैश्विक नेतृत्व इस चुनौती की गंभीरता को समझने में पीछे था।
यही नहीं, नरेंद्र मोदी उन लोगों को नहीं भूलते जो भारत के साथ खड़े होते हैं, 2003 में इसका उदाहरण देखने को मिला।
अगस्त 2003 में भूकंप ने भुज ही नहीं पूरे गुजरात को हिला दिया। उस समय नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे। भुज भूकंप के बाद वे धन्यवाद देने के लिए ब्रिटेन दौरे पर गए। खचाखच भरे वेम्बली कॉन्फ्रेंस सेंटर में उनकी आवाज गूंज रही थी। नरेंद्र मोदी ने कहा था, “आप सभी गुजरात के सच्चे मित्र हैं और मैं दोस्ती का ऋण चुकाने आया हूं।”
उन्होंने हजारों प्रवासी भारतीयों को संबोधित किया, जिन्होंने 2001 के भूकंप के दौरान गुजरात के लिए सहायता, समर्थन और संसाधन जुटाए थे। उन्होंने प्रवासी भारतीयों की न सिर्फ उनकी उदारता के लिए, बल्कि भारत के साथ उनके भावनात्मक जुड़ाव के लिए भी प्रशंसा की और उन्हें “गुजरात के सच्चे दोस्त” कहा।
इस यात्रा में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भी मुलाकात हुई, जो उस समय लंदन में थे।
कुछ इसी तरह पीएम मोदी का ब्रिटेन के प्रति जुड़ाव 2011 में गुजरात की स्वर्ण जयंती पर देखने को मिला। हालांकि, वह स्वयं ब्रिटेन नहीं गए थे, बल्कि गांधीनगर से ही डिजिटल माध्यम (‘जूम’) के जरिए लंदन के मेफेयर में मौजूद श्रोताओं को संबोधित किया था। उत्साही श्रोताओं से मोदी ने कहा, “गुजरात और विकास एक-दूसरे के पर्याय हैं। गुजरात इतिहास रच रहा है।”
फ्रेंड्स ऑफ गुजरात, गुजरात समाचार और ‘एशियन वॉयस’ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में ब्रिटिश सांसद, लॉर्ड्स और समुदाय के नेताओं समेत 90 विशिष्ट अतिथि शामिल थे। इनमें लॉर्ड गुलाम नून भी शामिल थे, जिन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ सीधे तौर पर जीवंत संवाद किया।
उस समय नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि महात्मा मंदिर 18 हजार गांवों की मिट्टी से बनेगा और ब्रिटेन में रहने वाले गौरवशाली गुजराती भी इसमें योगदान देंगे।
यह संदेश स्पष्ट था कि नरेंद्र मोदी के लिए प्रवासी भारतीय सिर्फ दर्शक नहीं हैं, बल्कि वे भारत-निर्माण के सक्रिय भागीदार हैं।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
पीयूष गोयल ने भारत को ग्लोबल डेटा हब के तौर पर पेश किया

वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शिकागो में भारतीय-अमेरिकियों से कहा कि भारत कम लागत वाली स्वच्छ ऊर्जा, देशव्यापी पावर ग्रिड, सस्ता डेटा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ी संख्या में टैलेंट पूल (कुशल मानव संसाधन) की सुविधा देता है, जो इसे ग्लोबल डेटा सेंटरों के लिए एक आकर्षक जगह बनाते हैं।
यूएस इंडियन कम्युनिटी फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, गोयल ने यूएस कंपनियों और भारतीय-अमेरिकी उद्यमियों से भारत में निवेश करने, खासकर उभरती टेक्नोलॉजी और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में, जोरदार अपील की।
यह कार्यक्रम मिलवॉकी में जी 20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में शामिल होने और अमेरिकी व्यवसायों और निवेशकों के साथ कई बैठकें करने के बाद हुआ।
गोयल ने कहा, “दुनिया के भरोसेमंद देशों में, जहां आप अपने डेटा को लेकर सुरक्षित महसूस करते हैं और मौजूदा जियोपॉलिटिकल हालात में निवेश करना सुरक्षित समझते हैं, भारत डेटा सेंटर बनाने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह है।”
उन्होंने कहा कि 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पद संभालने के बाद से भारत के बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव आया है।
उन्होंने बताया कि पहले भारत में कई क्षेत्रीय ग्रिड थे और देश के अलग-अलग हिस्सों में बिजली की कमी और अधिकता की अलग-अलग स्थिति थी। सरकार ने भरोसे को मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में मदद के लिए ग्रिड को आपस में जोड़ा।
गोयल ने कहा, “इसलिए आज, चीन के बाद, हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा ग्रिड है।”
उन्होंने कहा, “भारत के पास एक नेशनल ग्रिड है। एक जुड़े हुए ग्रिड में 520 गीगावाट बिजली है। और अगले 6 या 7 सालों में, यह 1000 गीगावाट हो जाएगी।”
गोयल ने बताया कि 520-गीगावाट ग्रिड की इंस्टॉल्ड क्षमता में क्लीन एनर्जी (जिसमें सोलर, विंड, हाइड्रो और न्यूक्लियर पावर शामिल हैं) का हिस्सा पहले से ही 60 प्रतिशत है।
उन्होंने कहा, “2033 तक, जब हमारी क्षमता 1000 गीगावाट होगी, तो इस इंस्टॉल्ड क्षमता का 70 प्रतिशत क्लीन एनर्जी से आएगा।”
मंत्री ने कहा कि ग्रिड का आकार और उसका आपस में जुड़ा होना डेटा सेंटर के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि उन्हें कई स्तरों पर पावर बैकअप (रिडंडेंसी) की जरूरत होती है।
गोयल ने कहा, “हम दुनिया में कहीं भी सबसे कम कीमत पर चौबीसों घंटे क्लीन एनर्जी या रिन्यूएबल एनर्जी दे सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि कंपनियां अभी सात से आठ सेंट में 24 घंटे 80 प्रतिशत गारंटीड क्लीन एनर्जी ले सकती हैं, जबकि 100 प्रतिशत क्लीन एनर्जी की कीमत लगभग 11 या 12 सेंट हो सकती है। उन्होंने कहा, “दुनिया में कहीं भी आपको इन डेटा पॉइंट्स पर इस स्तर की रिडंडेंसी (बैकअप सुविधा) और क्लीन एनर्जी एक साथ नहीं मिल सकती।”
गोयल ने भारत में डेटा और इंफ्रास्ट्रक्चर की कम लागत का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा, “भारत में डेटा की लागत दुनिया में सबसे कम है, शायद सबसे कम।” उन्होंने आगे कहा कि यह अमेरिका में यूजर्स द्वारा प्रति गीगाबाइट भुगतान की जाने वाली कीमत का लगभग पांच से आठ प्रतिशत हो सकता है।
उन्होंने सभा को बताया कि भारत में डेटा-सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की लागत अमेरिका या यूरोप की तुलना में एक-चौथाई से एक-पांचवें हिस्से तक हो सकती है।
गोयल ने भारत के युवा तकनीकी टैलेंट का भी जिक्र किया और कहा कि हर साल साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स में लगभग 14 लाख (1.4 मिलियन) छात्र ग्रेजुएट होते हैं।
इससे पहले, मंत्री ने भारतीय-अमेरिकियों से निवेश, टेक्नोलॉजी, ज्ञान-साझाकरण और उद्यमिता के माध्यम से भारत के आर्थिक विस्तार में भाग लेने की व्यापक अपील की थी।
उन्होंने कहा, “अमेरिका के पास पूंजी और टेक्नोलॉजी की ताकत है। भारत के पास महत्वाकांक्षा है। भारत-अमेरिका साझेदारी बढ़ती रहेगी, फलती-फूलती रहेगी और आप सभी को अवसर प्रदान करती रहेगी। आप सभी भारत के एंबेसडर हैं, आप भारत और अमेरिका के बीच एक जीवंत पुल हैं।”
गोयल ने मिल्वौकी में जी20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के बाद शिकागो की यात्रा की, जहां मंत्रियों ने वैश्विक व्यापार चुनौतियों, विश्व व्यापार संगठन के भविष्य और जबरन श्रम और राज्य-समर्थित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के माध्यम से उत्पादित वस्तुओं से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा की।
शिकागो यात्रा के दौरान, गोयल ने अमेरिकी व्यवसायों और निवेशकों से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि उन्होंने बिजनेस ग्रुप के माध्यम से विभिन्न आकार की कंपनियों के साथ बातचीत की और बड़े निवेशकों के साथ कई आमने-सामने की बैठकें कीं।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की योजना इस क्षेत्र में एक बड़ा, मल्टी-सेक्टरल बिजनेस डेलिगेशन लाने की है, जो संभवत अगले साल की पहली तिमाही में हो सकता है।
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ट्रंप का दावा: ईरान के साथ युद्ध ‘बहुत जल्द’ होगा खत्म, इसके बाद तेजी से गिरेंगी तेल की कीमतें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ युद्ध ‘बहुत जल्द’ खत्म हो जाएगा। उन्होंने अनुमान जताया कि संघर्ष खत्म होते ही तेल की कीमतों में तेज गिरावट आएगी। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान सैन्य और आर्थिक रूप से काफी कमजोर हो चुका है।
टेक्सास पहुंचने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए और बाद में डेंटन में पीटरबिल्ट मोटर्स की एक फैक्ट्री के दौरे के दौरान ट्रंप ने कहा कि अब ईरान के सामने यह फैसला करने का समय है कि संघर्ष किस तरह खत्म होगा।
ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, “ईरान का मामला बहुत जल्द किसी न किसी तरह खत्म होने वाला है। या तो वह खुद कहेगा कि देखिए, वहां 301 प्रतिशत महंगाई है। उनके पास पैसा नहीं है, उनकी करेंसी नहीं है। उनकी सेना हार चुकी है, उनकी नौसेना खत्म हो गई है, वायुसेना खत्म हो गई है, सब कुछ खत्म हो गया है।”
उन्होंने कहा, “किसी न किसी तरह यह बहुत जल्द खत्म होने वाला है। और जब यह खत्म होगा, तो तेल की कीमतें चट्टान की तरह तेजी से नीचे गिरेंगी।”
ट्रंप ने कहा कि कीमतों में राहत देने के लिए अमेरिका किसी यूरोपीय देश के पास मौजूद डीजल के स्टॉक को जारी कराने पर विचार कर सकता है। हालांकि, उन्होंने उस देश का नाम नहीं बताया।
ट्रंप ने कहा, “हां, हम ऐसा कर सकते हैं। उनके पास कुछ डीजल है, लेकिन कीमतें नीचे आ रही हैं। सभी कीमतें नीचे आ रही हैं।”
उन्होंने कहा, “एक चीज यह है कि तेल की कीमत थोड़ी ज्यादा है, लेकिन यह बाइडेन के समय के मुकाबले काफी कम है। और हमने वह काम किया जो बाइडेन ने नहीं किया।”
पीटरबिल्ट की फैक्ट्री में अपने बाद के संबोधन में भी ट्रंप ने कई बार ईरान और ऊर्जा की कीमतों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास ईरानी पाबंदियों के बावजूद अमेरिका ने तेल की आवाजाही जारी रखने में मदद की है।
ट्रंप ने कहा, “यह बहुत जल्द खत्म होगा, किसी न किसी तरह इसे खत्म होना ही है। या तो वे कोई सही और समझदारी वाला कदम उठाएंगे या वे ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।”
उन्होंने कहा, “तो किसी न किसी तरह यह खत्म होने वाला है। और जब यह खत्म होगा तो तेल की कीमत बहुत तेजी से नीचे जाएगी। इस बीच तेल की कीमतें पहले ही काफी नीचे आ चुकी हैं।”
ट्रंप से ब्रिटेन के आरएएफ फेयरफोर्ड से जुड़ी एक कथित नाकाम आतंकी साजिश में ईरान की संभावित भूमिका को लेकर भी सवाल पूछा गया। इस पर ट्रंप ने कहा कि वह ईरान की भूमिका की पुष्टि नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “मैं इसकी पुष्टि के साथ नहीं कह सकता, लेकिन ऐसा ही लग रहा है।”
टेक्सास दौरे के दौरान ट्रंप ने ईरान पर अपनी टिप्पणियों के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार को अर्थव्यवस्था की स्थिति के लिए जितना श्रेय मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा है।
ट्रंप ने कहा, “हमारे आंकड़े शानदार हैं। हम मैनेजमेंट के मामले में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।” उन्होंने शेयर बाजार, रिटायरमेंट खातों और नई फैक्ट्रियों में हो रहे निवेश का जिक्र किया। साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी सरकार को अपने आर्थिक रिकॉर्ड के बारे में लोगों तक अपनी बात ज्यादा बेहतर तरीके से पहुंचाने की जरूरत है।
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भारत के दो नगीने नीरजा और स्मित: जान पर खेलकर इंसानियत को जिंदा रखा, अपने-पराए का भेद मिटाया

नई दिल्ली । हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ता विमान जब अचानक संकट में घिरता है तो दिमाग काम करना बंद कर देता है। यात्रियों के पास सोचने के लिए बहुत कम समय होता है। ऐसे वक्त में विमान के पायलट और चालक दल का एक फैसला सैकड़ों जिंदगियों का भविष्य तय कर सकता है। स्मित मच्छार और नीरजा भनोट दो ऐसे ही नाम हैं जिन्होंने जान पर खेलकर दुनिया को इंसानियत का पाठ पढ़ाया। ये नहीं देखा कि लोग अपने हैं या पराए! याद रखा तो सिर्फ कर्तव्य और मानव सेवा का मर्म। 1986 की नीरजा भनोट के शौर्य से लेकर 2026 में कैप्टन स्मित मच्छार की जांबाजी तक, दो पीढ़ियों के ये दो नाम भारत के इकबाल में चार चांद लगाते हैं।
शुरुआत भनोट से! 5 सितंबर 1986 को पैन एम की फ्लाइट 73 कराची एयरपोर्ट पर आतंकवादियों ने हाईजैक कर ली थी। विमान में सैकड़ों यात्री सवार थे और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी। उस समय विमान की वरिष्ठ फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने असाधारण साहस का उदाहरण पेश किया।
कॉकपिट क्रू के विमान से निकल जाने के बाद यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी नीरजा और उनके सहयोगियों पर आ गई थी। नीरजा ने आतंकवादियों की मांग के अनुसार यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा किए, लेकिन अमेरिकी नागरिकों की पहचान छिपाने के लिए कई पासपोर्ट अलग कर दिए। जब हालात बिगड़े और विमान के अंदर गोलीबारी शुरू हुई तो उन्होंने यात्रियों को आपातकालीन निकास की ओर जाने में मदद की।
इस दौरान नीरजा ने बच्चों और दूसरे यात्रियों को बचाने की कोशिश की। वह खुद आतंकवादियों की गोली का शिकार हुईं और उनकी मौत हो गई। भारत सरकार ने उनके साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। अपने-पराए का भेद मिटा अदम्य साहस दिखाने वाली नीरजा को पाकिस्तान ने भी सम्मानित किया। उन्हें मरणोपरांत ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से नवाजा गया।
समय बदला, जमाना बदला लेकिन अगर कुछ नहीं मिला तो भारतीयों के हर परिस्थिति में कुछ कर गुजरने का जज्बा। करीब चार दशक बाद विमानन जगत में एक और ऐसी घटना घटी, जिसमें एक भारतीय पायलट ने जान पर खेलकर 174 लोगों की जिंदगियां बचाने में अहम योगदान दिया।
भारत के सीने पर 30 सितंबर 2026 का दिन खुरच कर लिख दिया गया है। इसी दिन फ्लाईदुबई की दुबई-तेल अवीव उड़ान के दौरान कॉकपिट में एक गंभीर हिंसक वारदात हुई। भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर साथी पायलट ने कथित तौर पर चाकू से हमला किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद स्मित ने विमान और उसमें सवार यात्रियों की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी नहीं भूली।
बाद में यात्रियों की मदद से बड़ा विमान हादसा टाल दिया गया। घटना के बाद विमान का रुख बदला गया और उसे सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतारा गया। स्मित को अस्पताल ले जाया गया और उनकी स्थिति स्थिर बताई गई।
नीरजा और स्मित की घटनाओं में करीब 40 साल का अंतर है। परिस्थितियां भी बिल्कुल अलग थीं। नीरजा के सामने हथियारबंद अपहरणकर्ता थे, जबकि स्मित का दुश्मन उनका साथी पायलट ही था। लेकिन दोनों घटनाओं में एक बात समान रही: ‘संकट की घड़ी में दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना और अपना कर्तव्य।’
नीरजा की कहानी बलिदान की कहानी बन गई। वह यात्रियों को बचाते हुए खुद अपनी जिंदगी हार गईं। स्मित की कहानी में भी खतरा उतना ही वास्तविक था, लेकिन वह विमान को सुरक्षित उतारने और यात्रियों की जान बचाने के बाद इलाज के लिए अस्पताल पहुंच सके।इन घटनाओं की खासियत यह भी है कि इनमें बहादुरी किसी युद्धक्षेत्र में नहीं दिखाई गई। एक विमान के भीतर, सीमित जगह और संकटकाल में लिए गए त्वरित निर्णयों ने इन भारतीयों को यादगार बना दिया।
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