राजनीति
सीबीआई कोर्ट ने जारी किया लालू प्रसाद का पासपोर्ट
पटना की सीबीआई अदालत ने मंगलवार को राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का पासपोर्ट जारी कर दिया। चारा घोटाले से जुड़े मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसी ने लालू का पासपोर्ट जब्त कर लिया था। अदालत ने 6 जून को 75 वर्षीय वयोवृद्ध नेता की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई के बाद पासपोर्ट जारी किया।
सूत्रों ने कहा है कि लालू प्रसाद को अपने पासपोर्ट को नवीकरण कराना होगा क्योंकि इसकी अवधि समाप्त हो गई है।
राजद नेता जल्द ही किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सिंगापुर जाएंगे।
लालू प्रसाद किडनी और फेफड़ों में गंभीर संक्रमण सहित कई बीमारियों से पीड़ित हैं। उन्हें रक्तचाप से संबंधित जटिलताएं भी हैं।
चारा घोटाले में जेल की आधी से ज्यादा सजा पूरी करने के बाद वह फिलहाल जमानत पर हैं।
राष्ट्रीय समाचार
राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से डरी हुई है भाजपा : संजय राउत

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के पुणे में होने वाले ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर सियासत तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सदस्य संजय राउत ने कहा कि इस कार्यक्रम से भारतीय जनता पार्टी डर गई है।
संजय राउत ने कहा, “राहुल गांधी पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के लिए आ रहे हैं। हजारों छात्र, खासकर लड़कियां, इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी और राहुल गांधी से बातचीत करेंगी।”
उन्होंने कहा, “पुणे ऐसी जगह है, यहां से स्वतंत्रता की चिंगारी भी निकली थी। यहां से छात्रों की गूंज उठेगी और पूरे देश में जाएगी, और इस वजह से भारतीय जनता पार्टी डर गई है।”
पुलिस द्वारा लगाई गई शर्तों पर राउत ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के साथ-साथ देश के प्रतिष्ठित नेता भी हैं। राहुल गांधी आज यहां आने वाले हैं, और पुलिस ने 30 से ज्यादा शर्तें लगाई हैं। हां, प्रधानमंत्री आते हैं, केंद्रीय गृह मंत्री आते हैं। भाजपा के कई नेता यहां आते हैं, क्या उन पर आपने शर्तें रखीं। नेता प्रतिपक्ष के साथ इस तरह का बर्ताव लोकतंत्र में होता है क्या?”
बता दें कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी 22 अगस्त 2026 को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं। यह कार्यक्रम शाम 4:30 बजे से रात 9:30 बजे के बीच आरटीओ चौक के पास एसएसपीएमएस कॉलेज ग्राउंड में निर्धारित है।
‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की शुरुआत कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा 17 जून 2026 को राजस्थान के कोटा शहर से की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और बेरोजगारी जैसे युवाओं व छात्रों के मुद्दों को उठाना है। कोटा के बाद इसके अन्य कार्यक्रम 17 जुलाई को देहरादून, 8 अगस्त को प्रयागराज और अब 22 अगस्त को पुणे में आयोजित किए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय समाचार
दिल्ली: रेलवे यूनिट ने 8 घंटे के अंदर मर्डर केस सुलझाया, तीन नाबालिग हिरासत में

राजधानी दिल्ली में नांगलोई और मंगोलपुरी स्टेशन के बीच रेलवे ट्रैक पर चाकू से हमला और हत्या के मामले को पुलिस ने 8 घंटे में सुलझा लिया है। इस मामले में तीन नाबालिगों को हिरासत में लिया गया है।
रेलवे पुलिस के अनुसार, गुरुवार को एक युवक की चाकू से हमला करके हत्या की गई थी। पूछताछ में चश्मदीदों से पता चला कि शाम करीब 6 बजे एक युवक अपने दोस्तों के साथ नांगलोई और मंगोलपुरी रेलवे स्टेशनों के बीच राज पार्क इंडस्ट्रियल एरिया में रेलवे ट्रैक के पास रील बना रहा था। लगभग 17-20 साल की उम्र के तीन अनजान लड़के उनके पास आए और उनकी गतिविधि में दखल देने लगे, जिससे झगड़ा हो गया।
झगड़े के दौरान एक आरोपी ने पीड़ित को पकड़ लिया, जबकि दूसरे ने अपने साथी को चाकू थमा दिया, जिसने पीड़ित के पेट में चाकू घोंप दिया। तीनों आरोपी नांगलोई रेलवे स्टेशन की ओर भाग गए। इसके बाद पीड़ित के दो दोस्त उसे घायल अवस्था में अस्पताल ले गए।
इसके अनुसार, सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई। बाद में रेलवे पुलिस को सूचना मिली कि पीड़ित की चोटों के कारण मौत हो गई है। इस कारण एफआईआर में अन्य धाराएं जोड़ी गईं। शव का पोस्टमार्टम कराया गया और उसे पीड़ित परिवार को सौंप दिया गया।
रेलवे पुलिस ने बताया कि चश्मदीदों, रेलवे ट्रैक/स्टेशनों और आसपास के इलाकों के सीसीटीवी फुटेज, स्थानीय खुफिया जानकारी और तकनीकी जांच के माध्यम से आरोपियों की पहचान करने और उन्हें पकड़ने के प्रयास किए जा रहे थे। अपराध में इस्तेमाल हथियार को बरामद करने के प्रयास भी किए जा रहे थे। लगातार कोशिशों के बाद तीन नाबालिग आरोपियों को पकड़ा गया।
रेलवे पुलिस ने अपराध करते समय आरोपियों की ओर से पहने गए कपड़े बरामद किए। साथ ही, अपराध में इस्तेमाल हथियार यानी ऑनलाइन खरीदा गया चाकू भी आरोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया गया।
राष्ट्रीय समाचार
चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे एथेनॉल नहीं है कारण, गन्ने का कम उत्पादन और रिकवरी का है असर: कृषि विशेषज्ञ

देश भर में चीनी की कीमतों में आई तेजी को लेकर चल रही बहस के बीच कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि इसकी मुख्य वजह चीनी को एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट करना नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन और चीनी रिकवरी में आई कमी है। उनका कहना है कि सरकार चीनी, एथेनॉल और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी करती है और उपभोक्ताओं की जरूरत को प्राथमिकता दी जाती है।
नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में जो तेजी देखने को मिली है, वह कुछ हद तक अप्रत्याशित जरूर है, लेकिन इसके लिए सीधे तौर पर एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि सरकार हर साल चीनी उत्पादन का आकलन करते समय यह सुनिश्चित करती है कि देश की घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे।
उन्होंने कहा कि देश में सालाना करीब 280 लाख टन चीनी की आवश्यकता होती है। इसके बाद ही अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए अनुमति दी जाती है। उन्होंने बताया कि चालू वर्ष में लगभग 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में किया गया, जबकि करीब 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी हुआ। इसके बावजूद देश में पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है।
प्रोफेसर मोहन ने कहा, “इस वर्ष देश में करीब 306 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है और इसके अलावा पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य परिस्थितियों में भारत के पास 50 लाख टन या उससे अधिक का बफर स्टॉक रहता है, ताकि किसी अप्रत्याशित स्थिति में बाजार में आपूर्ति प्रभावित न हो। ऐसे में केवल एथेनॉल डायवर्जन को चीनी महंगी होने का कारण बताना उचित नहीं होगा।”
उन्होंने कहा कि भारतीय चीनी उद्योग के लिए एथेनॉल एक “गेम चेंजर” साबित हुआ है। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन जरूरत से कहीं अधिक हो जाता था, तब बाजार में कीमतें गिर जाती थीं और चीनी मिलों को नुकसान उठाना पड़ता था, जिसका सीधा असर किसानों के भुगतान पर पड़ता था।
उन्होंने बताया कि पहले अतिरिक्त चीनी को निर्यात करने का विकल्प था, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण यह हमेशा लाभकारी नहीं रहता था। ऐसे में सरकार ने अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में उपयोग करने की नीति अपनाई, जिससे न केवल चीनी उद्योग को स्थिरता मिली, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोलियम आयात में कमी और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने जैसे कई लाभ भी प्राप्त हुए।
उन्होंने कहा कि सरकार लगातार उत्पादन की स्थिति की समीक्षा करती है और उसी के अनुसार तय करती है कि कितनी चीनी एथेनॉल के लिए डायवर्ट की जा सकती है। यदि उत्पादन कम होने की आशंका होती है, तो सरकार डायवर्जन और निर्यात दोनों पर नियंत्रण कर सकती है।
इस बीच, बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने आईएएनएस से कहा कि मौजूदा स्थिति की एक बड़ी वजह गुणवत्तापूर्ण गन्ना उत्पादन में कमी भी है। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गन्ने की फसल की अवधि अधिक होने के कारण वहां चीनी रिकवरी भी ज्यादा होती है, जबकि उत्तर भारत में अपेक्षाकृत कम अवधि में गन्ने की कटाई और पेराई हो जाती है।
उन्होंने कहा कि फिलहाल उत्तर भारत में गन्ना पेराई का “लीन सीजन” चल रहा है। जैसे ही कटाई और पेराई का मुख्य सीजन शुरू होगा, चीनी उत्पादन में वृद्धि होगी और बाजार में आपूर्ति बेहतर होने से कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
डॉ. हरिओम ने आगे बताया कि उत्तर भारत में ज्यादातर किसान अप्रैल-मई के दौरान गन्ने की बुआई करते हैं और लगभग 10 से 11 महीने में फसल तैयार हो जाती है। इसके विपरीत महाराष्ट्र में किसान अक्टूबर-नवंबर में गन्ना लगाते हैं और फसल को 13 से 14 महीने तक खेत में रहने देते हैं। इस लंबी अवधि के कारण गन्ने में चीनी संचय अधिक होता है और रिकवरी बेहतर मिलती है।
उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में गन्ना जुलाई-अगस्त के दौरान लगाया जाता है और इसकी फसल अवधि 18 महीने तक पहुंच जाती है। यही वजह है कि तमिलनाडु में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता देश में सबसे अधिक मानी जाती है। वहीं महाराष्ट्र में चीनी रिकवरी लगभग 13-14 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जो देश में सबसे बेहतर स्तरों में शामिल है।
डॉ. हरिओम ने कहा कि उत्तर भारत के किसान यदि धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करें और उसके साथ अंतरवर्ती फसलें जैसे गेहूं, सरसों, मसूर, चना या सब्जियां लगाएं, तो उन्हें अतिरिक्त आय मिल सकती है और गन्ने की गुणवत्ता में भी सुधार हो सकता है।
उन्होंने बताया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किए गए शोध में पाया गया कि गन्ने के साथ लौकी, करेला, नेनुआ, भिंडी, मूंग और अन्य फसलें उगाने से गन्ने के उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इसके विपरीत किसानों को अतिरिक्त उत्पादन और आय का लाभ मिलता है।
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