राष्ट्रीय समाचार
सीएए ख़िलाफ़ एनआरसी: क्या अंतर है, क्या ये जुड़े हुए हैं? आपको जो कुछ जानने की जरूरत है वह यहां है
लोकसभा चुनाव से पहले गृह मंत्रालय ने 11 मार्च को नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), 2019 लागू करने की घोषणा की थी. दिसंबर 2019 में पारित होने के बाद, इस कानून ने पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया, कई लोगों ने इसे भेदभावपूर्ण करार दिया। एक और विवादास्पद निर्णय जिसका देश में कड़ा विरोध हुआ, वह था राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) जिसने भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए पंजीकरण अनिवार्य कर दिया।
उनकी शुरूआत के बाद से, एनआरसी और सीएए के बीच संभावित संबंध के बारे में चिंताएं जताई गई हैं। आलोचकों की राय है कि सीएए और एनआरसी मिलकर मुसलमानों के खिलाफ प्रभावी रूप से भेदभाव करेंगे।
सीएए क्या है?
नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), जो 2016 का है, को 2019 में संसद द्वारा अनुमोदित किया गया था। इस फैसले के कारण भारत में, मुख्य रूप से असम में, व्यापक विरोध प्रदर्शन हुआ। 11 दिसंबर 2019 को पारित यह कानून उन हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की अनुमति देता है जो 31 दिसंबर 2014 से पहले मुस्लिम बहुल बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में चले गए।
केंद्र ने कहा कि इन छह धर्मों के लोगों को पड़ोसी मुस्लिम बहुल देशों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है और सरकार ने मानवीय आधार पर उन्हें भारतीय नागरिकता की पेशकश की है। हालाँकि, सूची से मुसलमानों को बाहर करने से सरकार की पहल पर संदेह पैदा हो गया है, आलोचकों ने इसे एक जानबूझकर किया गया प्रयास और भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को कमजोर करने वाला बताया है।
गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार स्पष्ट किया है कि सीएए केवल अवैध अप्रवासियों पर लागू है और यह किसी भी भारतीय नागरिक को प्रभावित नहीं करता है।
एनआरसी क्या है?
1955 के नागरिकता अधिनियम के तहत स्थापित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) भारतीय नागरिकों का एकमात्र रिकॉर्ड है। इसका मुख्य उद्देश्य वैध भारतीय निवासियों की पहचान करना है और अब तक इसे केवल असम में लागू किया गया है। हालाँकि, गृह मंत्री अमित शाह ने अवैध अप्रवासियों की पहचान के लिए देशभर में एनआरसी का विस्तार करने की योजना की घोषणा की है।
सीएए की तरह, एनआरसी को भी कड़े विरोध और संदेह का सामना करना पड़ा, जिससे सीएए के साथ इसके संबंधों पर सवाल उठे। दोनों ने मिलकर चिंता जताई है कि नागरिकों को भारत में अपनी कानूनी स्थिति साबित करने के लिए मजबूर किया जाएगा।
सीएए और एनआरसी के बीच अंतर
जबकि सीएए केवल भारत में रहने वाले अवैध अप्रवासियों पर लागू होता है, एनआरसी केवल भारतीय नागरिकों को कवर करता है। सरकार के आश्वासन के बावजूद, सीएए और एनआरसी के संभावित संयुक्त प्रभाव के बारे में चिंताएं बनी हुई हैं, मुसलमानों को एनआरसी से बाहर किए जाने और संभावित रूप से उन्हें राज्यविहीन कर दिए जाने का डर है।
मौसम
असम में बाढ़ : आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने नदियों के बढ़ते जलस्तर को लेकर चेतावनी जारी की

असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एएसडीएमए) ने शुक्रवार को एक एडवाइजरी जारी कर लोगों से शिवसागर जिले में दिखौ नदी से दूर रहने को कहा, क्योंकि पानी का स्तर घटने के बावजूद अभी भी खतरनाक रूप से ऊंचा बना हुआ है।
अधिकारियों ने बताया कि यह चेतावनी तब जारी की गई जब सेंट्रल वॉटर कमीशन (सीडब्ल्यूसी) ने रिपोर्ट दी कि शुक्रवार सुबह शिवसागर में दिखौ नदी में बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है।
सीडब्ल्यूसी के अनुसार, सुबह 9 बजे नदी का जलस्तर 94.26 मीटर था, जो 92.40 मीटर के खतरे के निशान से 1.86 मीटर ऊपर है। हालांकि जलस्तर कम होने लगा है, फिर भी यह गंभीर बाढ़ की श्रेणी में बना हुआ है, इसलिए लोगों को सतर्क रहने की आवश्यकता है।
जनहित और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जारी एक एडवाइजरी में एएसडीएमए ने कहा, “असम के शिवसागर जिले में दिखौ नदी का जलस्तर लगातार बढ़ने के कारण नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे नदी से दूर रहें।”
अधिकारियों ने बताया कि यह चेतावनी शुक्रवार सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक लागू रहेगी और जिला प्रशासन तथा आपदा प्रबंधन अधिकारी स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
सीडब्ल्यूसी ने यह भी बताया कि भले ही नदी का जलस्तर 2 जुलाई, 2024 को दर्ज किए गए पिछले सबसे ऊंचे बाढ़ स्तर यानी 94.35 मीटर से 0.09 मीटर नीचे है, फिर भी यह नदी के किनारे बसे निचले इलाकों के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है।
अधिकारियों ने जोखिम वाले इलाकों में रहने वालों से अपील की है कि जब तक बाढ़ की स्थिति में सुधार न हो, वे मछली पकड़ने, नहाने या किसी अन्य गतिविधि के लिए नदी के पास न जाएं।
अधिकारियों ने कहा कि इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीमें और जिला प्रशासन नदी की स्थिति पर कड़ी नजर रख रहे हैं। अगर जलस्तर फिर से बढ़ता है या नई बारिश से स्थिति बिगड़ती है, तो वे जरूरी कदम उठाने के लिए तैयार हैं।
लोगों से यह भी कहा गया है कि वे आधिकारिक सलाह का पालन करें, अफवाहें न फैलाएं और बाढ़ से जुड़ी किसी भी इमरजेंसी की सूचना तुरंत स्थानीय प्रशासन या आपदा प्रबंधन अधिकारियों को दें।
अपराध
450 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले में ईडी का एक्शन, दिल्ली-यूपी-पंजाब में आठ ठिकानों पर छापेमारी

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के लखनऊ जोनल कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए एम/एस संतोष ओवरसीज लिमिटेड और उससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ शुक्रवार को कई स्थानों पर छापेमारी की।
यह कार्रवाई करीब 450 करोड़ रुपए के बैंक धोखाधड़ी मामले की जांच के सिलसिले में की गई।
ईडी सूत्रों के अनुसार, यह जांच सीबीआई द्वारा दर्ज मामले के आधार पर की जा रही है। आरोप है कि संतोष ओवरसीज लिमिटेड ने बैंकों के एक कंसोर्टियम से लगभग 450 करोड़ रुपए का ऋण लिया था। जांच में सामने आया है कि इस लोन की राशि को कथित तौर पर फर्जी कंपनियों, एंट्री ऑपरेटरों और संबंधित संस्थाओं के नेटवर्क के जरिए इधर-उधर किया गया। इसके लिए फर्जी बिल और सर्कुलर वित्तीय लेनदेन का सहारा लिया गया ताकि पैसों की असली आवाजाही को छिपाया जा सके।
ईडी ने इस मामले में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पंजाब में स्थित आठ ठिकानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया। इन स्थानों में कंपनी के प्रमोटरों, उनसे जुड़ी कंपनियों और कथित सहयोगियों के परिसरों को शामिल किया गया है। ईडी के मुताबिक, तलाशी की कार्रवाई शांतिपूर्ण तरीके से चल रही है और मामले की आगे की जांच जारी है।
इससे पहले 20 जुलाई को भी ईडी के लखनऊ जोनल कार्यालय ने एक बड़े फर्जी डिग्री और जाली शैक्षणिक दस्तावेज मामले में कार्रवाई की थी। उस दौरान एजेंसी ने 25.44 करोड़ रुपए की चल और अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच किया था।
अटैच की गई संपत्तियों में एक फार्महाउस, कई फ्लैट और वाहन शामिल थे। यह जांच उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की गई थी। एसटीएफ की जांच में खुलासा हुआ था कि हापुड़ स्थित मोनाड यूनिवर्सिटी के नाम पर एक बड़ा गिरोह फर्जी डिग्री और शैक्षणिक दस्तावेज तैयार कर रहा था।
जांच में यह भी सामने आया कि यह गिरोह फर्जी मार्कशीट, डिग्री, प्रोविजनल सर्टिफिकेट, माइग्रेशन सर्टिफिकेट और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज तैयार करने, बेचने और उनकी फर्जी पुष्टि कराने का अवैध कारोबार चला रहा था।
राजनीति
बरनाला में लाठीचार्ज के खिलाफ हड़ताल पर पंजाब के 25 हजार सफाई कर्मचारी, शहरों में गहरा सकता है कचरा संकट

बरनाला में पुलिस के लाठीचार्ज का विरोध करते हुए सफाई कर्मचारियों ने पंजाब सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है। इस घटना के रोष स्वरूप पंजाबभर के हजारों सफाई कर्मचारी सामूहिक रूप से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। इस बड़े फैसले से आने वाले दिनों में राज्य के शहरों में कचरा उठाने और साफ-सफाई की भारी समस्या पैदा होना तय माना जा रहा है।
पंजाब नगर पालिका कर्मचारी संगठन के पंजाब अध्यक्ष गोपाल थापर ने हड़ताल का ऐलान करते हुए पुलिस प्रशासन की सख्त शब्दों में निंदा की। उन्होंने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कि जब तक कर्मचारियों की मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक यह हड़ताल लगातार जारी रहेगी।
संगठन ने मांग की है कि बरनाला घटना के लिए जिम्मेदार एसएचओ, डीएसपी और एसएसपी को तुरंत सस्पेंड किया जाए। गोपाल थापर ने यह भी मांग की कि दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हो। पुलिसकर्मियों पर इरादा कत्ल और महिलाओं से छेड़छाड़ के गंभीर आरोपों के तहत पर्चा दर्ज किया जाए।
संगठन के पंजाब अध्यक्ष गोपाल थापर ने दावा किया कि हड़ताल में पंजाब की 166 नगर काउंसिलों, नगर पंचायतों और नगर निगमों के लगभग 25 हजार सफाई कर्मचारी शामिल हो चुके हैं। राज्यभर में कामकाज पूरी तरह ठप कर दिया गया है। शहरों से कचरा न उठाए जाने के कारण जगह-जगह गंदगी के ढेर लगने शुरू हो गए हैं, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ना स्वाभाविक है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर चुप है। अरविंद केजरीवाल के कहे अनुसार पंजाब सरकार काम कर रही है। गोपाल थापर ने कहा, “अरविंद केजरीवाल दिल्ली में मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं और पंजाब में अत्याचार हो रहा है।”
गोपाल थापर ने कहा कि पंजाब में कभी भी सफाई कर्मचारियों पर लाठीचार्ज नहीं हुआ था। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने जल्द कोई ठोस कार्रवाई नहीं की तो संघर्ष को और तेज किया जाएगा।
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